ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअपश्यं त्वा मनसा चेकितानं तपसो जातं तपसो विभूतम्.
इह प्रजामिह रयिं रराणः प्र जायस्व प्रजया पुत्रकाम.. (१)
हे कर्मों के ज्ञानी, तप से उत्पन्न एवं तपस्या से उन्नत यजमान! मैंने अपने मन की आंखों
से तुम्हें देखा है. तुम यहां संतान एवं धन पाकर प्रसन्न बनो एवं पुत्र की कामना से संतान के
रूप में जन्म लो. (१)
अपश्यं त्वा मनसा दीध्यानां स्वायां तनू ऋत्व्ये नाधमानाम्.
उप मामुच्चा युवतिर्बभूयाः प्र जायस्व प्रजया पुत्रकामे.. (२)
हे पत्नी! मैंने मन की आंखों से तुम्हें दीप्तिशालिनी व ऋतु के अनुसार अपने शरीर में
गर्भाधान की कामना करती हुई देखा है. हे पुत्र की कामना करने वाली! मेरे समीप तुम उत्तम
तरुणी बनो एवं पुत्र उत्पन्न करो. (२)
अहं गर्भमदधामोषधीष्वहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः.
अहं प्रजा अजनयं पृथिव्यामहं जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान्.. (३)
मैं होता हूं, ओषधियों में गर्भ धारण करता हूं एवं सभी प्राणियों में गर्भ धारण का
कारण बनता हूं. मैंने धरती पर प्रजा को जन्म दिया है. मैं यज्ञ करके सब नारियों में पुत्र
उत्पन्न कर सकता हूं. (३)
सूक्त—१८४ देवता—विष्णु आदि
विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु.
आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते.. (१)
विष्णु नारी की योनि को गर्भाधान के योग्य बनावें. त्वष्टा उस में स्त्री एवं पुरुष के चिह्नों
का भाग सम्मिलित करें. प्रजापति योनि को वीर्य से सींचें एवं धाता तेरा गर्भ धारण करें. (१)
गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति.
गर्भं ते अश्विनौ देवावा धत्तां पुष्करस्रजा.. (२)
हे सिनीवाली! तुम गर्भ धारण कराओ. हे सरस्वती! तुम गर्भ की रक्षा करो. हे स्त्री!
सुनहरे कमलों की माला पहनने वाले अश्विनीकुमार देव तुम्हारे शरीर में गर्भ धारण करें. (२)
हिरण्ययी अरणी यं निर्मन्थतो अश्विना.
तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतवे.. (३)
हे पत्नी! अश्विनीकुमार जिस स्वनिर्मित अरणि का मंथन करते हैं, हम दशम मास में
तुम्हारे गर्भ के जन्म के लिए उसी अरणि को बुलाते हैं. (३)