ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.
This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.
The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.
सूक्त—२१ देवता—इंद्र
सूक्त—२१ देवता—इंद्र
असावि देवं गोऋजीकमन्धो न्यस्मिन्निन्द्रो जनुषेमुवोच.
बोधामसि त्वा हर्यश्व यज्ञैर्बोधा नः स्तोममन्धसो मदेषु.. (१)
दिव्य एवं गव्यमिश्रित सोमरस निचोड़ा गया है. ये इंद्र इस सोमरूपी अन्न में स्वभाव से
सम्मिलित रहते हैं. हे हरि नामक घोड़ों वाले इंद्र! हम यज्ञों के द्वारा तुम्हें हमारी बात बताते
हैं। तुम सोम के नशे में हमारी बात समझो. (१)
प्र यन्ति यज्ञं विपयन्ति बर्हिः सोममादो विदथे दुध्रवाचः.
न्यु भ्रियन्ते यशसो गृभादा दूरउपब्दो वृषणो नृषाचः.. (२)
यजमान यज्ञ में जाते हैं और कुश बिछाते हैं. यज्ञ में सोमलता कूटने के पत्थर भयानक
शब्द करते हैं. यशस्वी, दूर तक शब्द करने वाले, ऋत्विजों को मिलाने वाले एवं
अभिलाषापूरक पत्थर पत्थरों से बने घर से लिए जाते हैं. (२)
त्वमिन्द्र स्रवितवा अपस्कः परिष्ठिता अहिना शूर पूर्वीः.
त्वद्वावक्रे रथ्यो३ न धेना रेजन्ते विश्वा कृत्रिमाणि भीषा.. (३)
हे शूर इंद्र! तुमने वृत्र द्वारा रोके हुए जलों को प्रवाहित किया था. तुम्हारे कारण ही
नदियां रथस्वामियों के समान निकलती हैं. सारा संसार तुम्हारे भय से कांपता है. (३)
भीमो विवेषायुधेभिरेषामपांसि विश्वा नर्याणि विद्वान्.
इन्द्रः पुरो जर्हषाणो वि दूधोद्वि वज्रहस्तो महिना जघान.. (४)
इंद्र ने मानवहितकारी एवं सब कामों को जानने वाले आयुधों द्वारा भयंकर बनकर
असुरों को घेरा था एवं उनके नगरों को कंपित बनाया था. महान् एवं हाथ में वज्र धारण करने
वाले इंद्र ने असुरों को मारा था. (४)
न यातव इन्द्र जूजुवुर्नो न वन्दना शविष्ठ वेद्याभिः.
स शर्धदर्यो विषुणस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवा अपि गुर्ऋतं नः.. (५)
हे इंद्र! राक्षस हमारी हिंसा न करें. हे अतिशय बली इंद्र! वे राक्षस हमें प्रजाहीन न
बनावें. स्वामी इंद्र कुटिल व्यक्ति के मारने में उत्साह दिखाते हैं. ब्रह्मचर्यहीन लोग हमारे यज्ञ में
बाधा न बनें. (५)
अभि क्रत्वेन्द्र भूरध ज्मन्न ते विव्यङ्न्महिमानं रजांसि.
स्वेना हि वृत्रं शवसा जघन्थ न शत्रुरन्तं विविदद्युधा ते.. (६)
हे इंद्र! तुम कर्म द्वारा धरती पर वर्तमान प्राणियों को पराजित करते हो. सब लोक
मिलकर भी तुम्हारी महिमा से नहीं बढ़ सकते. तुमने अपनी शक्ति से वृत्र को मारा था. युद्ध
के द्वारा शत्रु तुम्हारा अंत नहीं पाते. (६)
देवाश्चित्ते असुर्याय पूर्वेऽनु क्षत्राय ममिरे सहांसि.
इन्द्रो मघानि दयते विषह्येन्द्रं वाजस्य जोहुवन्त सातौ.. (७)
हे इंद्र! प्राचीन देवों और राक्षसों ने शक्तिप्रयोग एवं हिंसा करने में स्वयं को तुमसे हीन
माना था. इंद्र शत्रुओं को हराकर उनका धन अपने भक्तों को देते हैं. स्तोता अन्न पाने के लिए
इंद्र की स्तुति करते हैं. (७)
कीरिश्चिद्धि त्वामवसे जुहावेशानमिन्द्र सौभगस्य भूरे:.
अवो बभूथ शतमूते अस्मे अभिक्षत्तूस्तवावतो वरूता.. (८)
हे स्वामी इंद्र! स्तोता तुम्हें अपनी रक्षा के लिए बुलाता है. हे बहुतों की रक्षा करने वाले
इंद्र! तुम हमारे विपुल धन के रक्षक बने थे. तुम्हारे समान शक्तिशाली यदि कोई हमारा हिंसक
हो तो उसे रोको. (८)
सखायस्त इन्द्र विश्वह स्याम नमोवृधासो महिना तरुत्र.
वन्वन्तु स्मा तेऽवसा समीकेऽभीतिमर्यो वणुषां शवांसि.. (९)
हे इंद्र! हम स्तुति द्वारा तुम्हें बढ़ाते हुए सदा तुम्हारे मित्र रहें. हे महत्त्व द्वारा सबकी रक्षा
करने वाले इंद्र! तुम्हारी रक्षा के सहारे श्रेष्ठ होता युद्ध में अभय होकर हिंसकों की शक्ति नष्ट
करें. (९)
स न इन्द्र त्वयताया इषे धास्तमना च ये मघवानो जुनन्ति.
वस्वी षु ते जरित्रे अस्तु शक्तिर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे इंद्र! अपने दिए हुए अन्न का उपभोग करने के लिए हमारी रक्षा करो. जो लोग अपने
आप तुम्हें हव्य देते हैं, उनकी भी रक्षा करो. तुम्हारे स्तोता मुझ में तुम्हारी प्रशंसनीय स्तुतियां
करने की शक्ति हो. तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (१०)
सूक्त—२२ देवता—इंद्र
पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वाद्रिः.
सोतुर्बाहुभ्यां सुयतो नार्वा.. (१)
हे इंद्र! तुम सोमरस पिओ. सोम तुम्हें प्रसन्न करे. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी! जैसे
लगाम द्वारा घोड़ा वश में किया जाता है, उसी प्रकार सोमरस निचोड़ने वाले के दोनों हाथों
द्वारा पकड़े गए पत्थरों ने तुम्हारे लिए सोम तैयार किया है. (१)
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यस्ते मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्व हंसि.
स त्वामिन्द्र प्रभूवसो ममत्तु.. (२)
हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी एवं अधिक धन वाले इंद्र! जो सोम तुम्हारे अनुकूल भली
प्रकार निचोड़ा गया एवं नशीला है एवं जिसे पीकर तुम राक्षसों को मारते हो, वह सोमरस
तुम्हें प्रसन्न बनावे. (२)
बोधा सु मे मघवन्वाचमेमां यां ते वसिष्ठो अर्चति प्रशस्तिम्.
इमा ब्रह्म सधमादे जुषस्व.. (३)
हे धनस्वामी इंद्र! मैं वसिष्ठ तुम्हारी प्रशंसा के रूप में जो बातें कहता हूं, उन्हें भली
प्रकार समझो एवं यज्ञ में उन्हें स्वीकार करो. (३)
श्रुधी हवं विपिपानस्याद्रेर्बोधा विप्रस्यार्चतो मनीषाम्.
कृष्वा दुवांस्यन्तमा सचेमा.. (४)
हे इंद्र! मुझ सोमपानकर्त्ता के पत्थर की पुकार सुनो एवं स्तुति करने वाले विद्वान् की
स्तुति समझो. तुम मेरे सहायक बनकर मेरी इन सेवाओं को समझो. (४)
न ते गिरो अपि मृष्ये तुरस्य न सुष्टुतिमसुर्यस्य विद्वान्.
सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि.. (५)
हे शत्रुहिंसक इंद्र! तुम्हारी शक्ति को जानने वाला मैं तुम्हारी स्तुतियों को नहीं त्याग
सकता. मैं तुम्हारा असाधारण यशवाला नाम सदा बोलूंगा. (५)
भूरि हि ते सवना मानुषेषु भूरि मनीषी हवते त्वामित्.
मारे अस्मन्मघवञ्ज्योक्कः.. (६)
हे इंद्र! मनुष्यों में तुम्हारे बहुत से सवन हैं. स्तोता तुम्हें ही अधिक बुलाता है. चिरकाल
तक अपने को हमसे अलग मत रखना. (६)
तुभ्येदिमा सवना शूर विश्वा तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धना कृणोमि.
त्वं नृभिर्हव्यो विश्वधासि.. (७)
हे शूर इंद्र! ये सब सवन तुम्हारे हेतु ही हैं. ये उन्नतिकारक स्तोत्र मैं तुम्हारे निमित्त ही
बोलता हूं. तुम अनेक प्रकार से मानवों द्वारा बुलाने योग्य हो. (७)
नू चिन्नु ते मन्यमानस्य दस्मोदश्रुवन्ति महिमानमुग्र.
न वीर्यमिन्द्र ते न राधः.. (८)
हे दर्शनीय इंद्र! तुम्हारी स्तुतियां सुनकर तुम्हारी महिमा कौन नहीं जानेगा? हे उग्र इंद्र!
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सूक्त—२३ देवता—इंद्र
तुम्हारी शक्ति और धन को कौन नहीं समझेगा. (८)
ये च पूर्व ऋषयो ये च नूतना इन्द्र ब्रह्माणि जनयन्त विप्राः.
अस्मे ते सन्तु सख्या शिवानि यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (९)
हे इंद्र! सभी प्राचीन एवं नवीन ऋषि तुम्हारे लिए स्तोत्र बनाते हैं. तुम्हारी मित्रता हमारे
लिए मंगलकारी हो. तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (९)
सूक्त—२३ देवता—इंद्र
उदु ब्रह्माण्याैरत श्रवस्येन्द्रं समर्ये महया वसिष्ठ.
आ यो विश्वानि शवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचांसि.. (१)
ऋषियों ने सब स्तुतियां अन्न पाने की अभिलाषा से कही हैं. हे वसिष्ठ! तुम भी स्तोत्र व
हव्य द्वारा इंद्र की पूजा करो. जिस इंद्र ने अपनी शक्ति से समस्त लोकों को विस्तृत किया है,
वे मुझ समीपगामी की स्तुतियां सुनें. (१)
अयामि घोष इन्द्र देवजामिरिरज्यन्त यच्छुरुधो विवाचि.
नहि स्वमायुश्चिकिते जनेषु तानीदंहांस्यति पर्ष्यस्मान्.. (२)
हे इंद्र! जब ओषधियां बढ़ती हैं, तब देवों को प्रिय लगने वाले शब्द बोले जाते हैं.
मानवों में कोई भी अपनी आयु नहीं जानता. तुम हमारे पापों को दूर करो. (२)
युजे रथं गवेषणं हरिभ्यामुप ब्रह्माणि जुजुषाणमस्थुः.
वि बाधिष्टस्य रोदसी महित्वेन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघन्वान्.. (३)
मैं इंद्र के गायों को खोजने वाले रथ को हरि नामक अश्वों से युक्त करता हूं. सब लोग
स्तुतियां स्वीकार करने वाले इंद्र की सेवा करते हैं. इंद्र ने अपनी शक्ति से द्यावा-पृथिवी को
बाधा पहुंचाई है तथा शत्रुसमूह का नाश किया है. (३)
आपश्चित्पिप्युः स्तर्यो३ न गावो नक्षन्नृतं जरितारस्त इन्द्र.
याहि वायुर्न नियुतो नो अच्छा त्वं हि धीभिर्दायसे वि वाजान्.. (४)
हे इंद्र! जिस प्रकार बिना ब्याई गाय मोटी होती है, उसी प्रकार तुम्हारी कृपा से जल बढ़े
एवं तुम्हारे स्तोता जल को प्राप्त करें. वायु जिस प्रकार घोड़ों के पास जाती है, उसी प्रकार
तुम हमारे पास आओ. तुम यज्ञकर्मों द्वारा अन्न देते हो. (४)
ते त्वा मदा इन्द्र मादयन्तु शुष्मिणं तुविराधसं जरित्रे.
एको देवत्रा दयसे हि मर्तानस्मिञ्छुछ्र सवने मादयस्व.. (५)
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हे इंद्र! नशीला सोम तुम्हें प्रसन्न करे. तुम स्तोता को शक्तिशाली एवं धनवान् पुत्र देते
हो. हे शूर इंद्र! देवों में एकमात्र तुम्हीं मानवों के प्रति दया करते हो. तुम इस यज्ञ में प्रसन्न
बनो. (५)
एवेदिन्द्रं वृषणं वज्रबाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः.
स नः स्तुतो वीरवद्धातु गोमद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
वसिष्ठगोत्रीय ऋषि इसी प्रकार स्तुतियों द्वारा अभिलाषापूरक एवं वज्रबाहु इंद्र की पूजा
करते हैं. वे स्तुति सुनकर हमें वीरों एवं गायों से युक्त धन दें. हे इंद्र! तुम कल्याणसाधनों द्वारा
हमारी सदा रक्षा करो. (६)
सूक्त—२४ देवता—इंद्र
योनिष्ट इन्द्र सदने अकारि तमा नृभिः पुरुहूत प्रयाहि.
असो यथा नोऽविता वृधे च ददो वसूनि ममदश्च सोमैः.. (१)
हे इंद्र! तुम्हारे सदन के लिए स्थान बनाया गया है. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! मरुतों
के साथ
एष स्तोमो मह उग्राय वाहे धुर्यो३ वात्यो न वाजयन्नधायि.
इन्द्र त्वायमर्क इट्टे वसूनां दिवीव द्यामधि नः श्रोमतं धाः.. (५)
रथ के घोड़े के समान शक्तिशाली यह मंत्रसमूह महान्, उग्र एवं विश्वभारवहन समर्थ इंद्र
को लक्ष्य करके बनाया गया है. हे इंद्र! यह स्तोता तुमसे धन मांगता है. तुम हमें स्वर्ग के
समान तेजस्वी पुत्र दो. (५)
एवा न इन्द्र वार्यस्य पूर्धि प्र ते महीं सुमतिं वेविदाम.
इषं पिन्व मघवद्भ्यः सुवीरां यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
हे इंद्र! इस प्रकार तुम हमें उत्तम धन से पूर्ण करो. हम तुम्हारी महती दया प्राप्त करें.
हम हव्य वालों को वीर पुत्रों से युक्त अन्न दो एवं सभी कल्याणसाधनों से हमारी रक्षा करो.
(६)
सूक्त—२५ देवता—इंद्र
आ ते मह इन्द्रोत्युग्र समन्यवो यत्समरन्त सेनाः.
पताति दिद्युन्नर्यस्य बाह्वोर्मा ते मनो विष्वद्र्य१ग्वि चारीत्.. (१)
हे उग्र, महान् एवं मानवहितैषी इंद्र! तुम्हारी क्रोधभरी सेनाएं जब युद्ध करती हैं, तब
तुम्हारे हाथ में स्थित वज्र हमारी रक्षा के लिए गिरे. तुम्हारा सब ओर जाने वाला मन विचलित
न हो. (१)
नि दुर्ग इन्द्र श्लथिह्यमित्रानभि ये नो मर्तासो अमन्ति.
आरे तं शंसं कृणुहि निनित्सोरा नो भर सम्भरणं वसूनाम्.. (२)
हे इंद्र! युद्ध में जो लोग हमारे सामने आकर हमें पराजित करते हैं, उन शत्रुओं का नाश
करो. हमारी निंदा के इच्छुक व्यक्ति का नाम मिटा दो. हमें धन का समूह दो. (२)
शतं ते शिप्रिन्नूतयः सुदासे सहस्रं शंसा उत रातिरस्तु.
जहि वधर्वंनुषो मर्त्यस्यास्मे द्युम्नमधि रत्नं च धेहि.. (३)
हे साफा वाले इंद्र! तुम्हारे सैकड़ों रक्षासाधन एवं हजारों कामनाएं एवं धन मुझ सुदास
के हों. हिंसक मनुष्य के आयुध का तुम नाश करो एवं हमारे लिए दीप्तिशाली यश एवं रत्न
दो. (३)
त्वावतो हीन्द्र क्रत्वे अस्मि त्वावतोऽवितुः शूर रातौ.
विश्वेदहानि तविषीव उग्रँ ओकः कृणुष्व हरिवो न मर्धीः.. (४)
हे इंद्र! मैं तुम्हारे समान महान् व्यक्ति के यज्ञकर्म में लगा हूं. मैं तुम्हारे समान रक्षक के
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दान में नियुक्त हूं. हे बली एवं उग्र इंद्र! सब दिन हमारे लिए घर बनाओ. हे हरि नामक घोड़ों
के स्वामी इंद्र! हमारी हिंसा मत करो. (४)
कुत्सा एते हर्यश्वाय शूषमिन्द्रे सहो देवजूतमियानाः.
सत्रा कृधि सुहना शूर वृत्रा वयं तरुत्राः सनुयाम वाजम्.. (५)
हम हरि नामक घोड़ों वाले इंद्र के लिए ये सुखकर स्तुतियां बनाते हैं एवं इंद्र से देवप्रेरित
बल की याचना करते हैं. हम सभी दुःखों को पार करके बल प्राप्त करेंगे. हे शूर इंद्र! हमें सदा
शत्रुहनन में समर्थ बनाओ. हम अतिशय सुरक्षित होकर अन्न प्राप्त करें. (५)
एवा न इन्द्र वार्यस्य पूर्धि प्र ते महीं सुमतिं वेविदाम.
इषं पिन्व मघवद्भ्यः सुवीरां यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
हे इंद्र! इस प्रकार तुम हमें उत्तम धन से पूर्ण करो. हम हव्य वालों को वीर पुत्रों से युक्त
अन्न दो एवं सभी कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (६)
सूक्त—२६ देवता—इंद्र
न सोम इन्द्रमसुतो ममाद नाब्रह्माणो मघवानं सुतासः.
तस्मा उक्थं जनये यज्जुजोषन्नृवन्नवीयः शृणवद्यथा नः.. (१)
धनस्वामी इंद्र के उद्देश्य से न निचोड़ा हुआ एवं स्तुतिहीन सोमरस उन्हें प्रसन्न नहीं
करता. इंद्र की सेवा करने वाला मैं राजा के द्वारा भी आदरपूर्वक सुनने योग्य एवं नवीन
मंत्रसमूह इंद्र के निमित्त पढ़ता हूं. (१)
उक्थउक्थे सोम इन्द्रं ममाद नीथेनीथे मघवानं सुतासः.
यदीं सबाधः पितरं न पुत्राः समानदक्षा अवसे हवन्ते.. (२)
प्रत्येक मंत्रसमूह के पाठ के समय सोम धनस्वामी इंद्र को प्रसन्न करता है. प्रत्येक स्तोत्र
के समय निचोड़े गए सोमरस इंद्र को तृप्त करते हैं. परस्पर मिलित एवं समान उत्साह वाले
ऋत्विज् इंद्र को अपनी रक्षा के लिए उसी प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार पुत्र पिता को बुलाते
हैं. (२)
चकार ता कृणवन्नूनमन्या यानि ब्रुवन्ति वेधसः सुतेषु.
जनीरिव पतिरेकः समानो नि मामृजे पुर इन्द्रः सु सर्वाः.. (३)
सोमरस निचुड़ जाने पर स्तोतागण जिन कर्मों का वर्णन करते हैं, इंद्र ने प्राचीन काल में
वे सब कर्म किए हैं एवं इस समय अन्य कर्म भी करते हैं. पति जिस प्रकार पत्नी का मर्दन
करता है, उसी प्रकार इंद्र ने अकेले ही शत्रुनगरियों को तहस-नहस कर डाला. (३)
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एवा तमाहुरूत शृण्व इन्द्र एको विभक्ता तरणिर्मघानाम्.
मिथस्तुर ऊतयो यस्य पूर्वीरस्मे भद्राणि सश्चत प्रियाणि.. (४)
इंद्र के विषय में ऋत्विज् कहते हैं कि वे अकेले ही धन बांटने एवं विपत्तियों से पार
करने वाले हैं. यह भी सुना गया है कि इंद्र के पास परस्पर मिले अनेक रक्षासाधन हैं. इंद्र की
कृपा से हमें प्रिय कल्याणप्रद वस्तुएं मिलें. (४)
एवा वसिष्ठ इन्द्रमूतये नृन्कृष्टीनां वृषभं सुते गृणाति.
सहस्रिण उप नो माहि वाजान् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
वसिष्ठ ऋषि सोमरस निचुड़ जाने पर मनुष्यों की रक्षा के लिए प्रजाओं के
अभिलाषापूरक इंद्र की स्तुति इस प्रकार करते हैं. हे इंद्र! हमारे हजारों प्रकार के अन्न एवं
कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५)
सूक्त—२७ देवता—इंद्र
इन्द्रं नरो नेमधिता हवन्ते यत्पार्या युनजते धियस्ताः.
शूरो नृषाता शवसश्चकान आ गोमति व्रजे भजा त्वं नः.. (१)
जब युद्ध की तैयारी होने लगती है तो नेता युद्ध में इंद्र को बुलाते हैं. हे शूर, मनुष्यों के
पोषक एवं शक्ति की कामना करने वाले इंद्र! हमें गायों वाली गोशाला में पहुंचाओ. (१)
य इन्द्र शुष्मो मघवन्ते अस्ति शिक्षा सखिभ्यः पुरुहूत नृभ्यः.
त्वं हि दृळ्हा मघवन्विचेता अपा वृधि परिवृतं न राधः.. (२)
हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम्हारा जो बल है, उसे अपने सखा स्तोताओं को दो.
तुमने दृढ़ शत्रुनगरियों को छिन्नभिन्न किया है. तुम बुद्धि का प्रकाश करके छिपा हुआ धन
हमारे लिए प्रकट करो. (२)
इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधि क्षमि विषुरूपं यदस्ति.
ततो ददाति दाशुषे वसूनि चोदद्राध उपस्तुतश्चिदवार्क.. (३)
इंद्र पशु आदि गतिशील प्राणियों एवं मनुष्यों के स्वामी हैं. धरती में नानारूप धन है,
उसके राजा भी इंद्र हैं. हव्यदाता को धन देने वाले इंद्र हमारी स्तुति सुनकर धन हमारे सामने
भेजें. (३)
नू चिन्न इन्द्रो मघवा सहूती दानो वाजं नि यमते न ऊती.
अनूना यस्य दक्षिणा पीपाय वामं नृभ्यो अभिवीता सखिभ्यः.. (४)
हमने धनस्वामी एवं दानशील इंद्र को मरुतों के साथ बुलाया है. वे हमारी रक्षा के लिए
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शीघ्र ही अन्न दें. जो इंद्र स्तोताओं को संपूर्ण धन देते थे, वे ही मनुष्यों को उत्तम धन दें. (४)
नू इन्द्र राये वरिवस्कृधी न आ ते मनो ववृत्याम मघाय.
गोमदश्वावद्रथवद्वयन्तो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हे इंद्र! धनप्राप्ति के लिए शीघ्र धन दो. हम पूज्य स्तुतियों द्वारा तुम्हारा मन अपनी ओर
खींच लेंगे. तुम हमें गायों, अश्वों एवं रथों का स्वामी बनाओ एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी
सदा रक्षा करो. (५)
सूक्त—२८ देवता—इंद्र
ब्रह्मा ण इन्द्रोप याहि विद्वानर्वाञ्चस्ते हरयः सन्तु युक्ताः.
विश्वे चिद्धि त्वा विहवन्त मर्ता अस्माकमिच्छृणुहि विश्वमिन्व.. (१)
हे इंद्र! तुम जानते हुए हमारी स्तुतियों के समीप आओ. तुम्हारे घोड़े हमारे सामने ही
रथ में जुड़े हैं. हे सबको प्रसन्न करने वाले इंद्र! यद्यपि तुम्हें सभी लोग बुलाते हैं, फिर भी तुम
हमारी पुकार सुनो. (१)
हवं त इन्द्र महिमा व्यानड् ब्रह्म यत्पासि शवसिन्नृषीणाम्.
आ यद्वज्रं दधिषे हस्त उग्र घोरः सन्क्रत्वा जनिष्ठा अषाळ्हः.. (२)
हे शक्तिशाली इंद्र! जिस समय तुम ऋषियों के स्तोत्रों की रक्षा करते हो, उस समय
तुम्हारी महिमा स्तुतिकर्त्ता को व्याप्त करे. हे उग्र इंद्र! जिस समय तुम अपने हाथ में वज्र
पकड़ते हो, उस समय कर्म द्वारा भयंकर बनकर शत्रुओं को असहनीय हो जाते हो. (२)
तव प्रणीतीन्द्र जोहुवानान्संत्यन्नृन्न रोदसी निनेथ.
महे क्षत्राय शवसे हि जज्ञेऽतूतुर्जिं चित्तूतूजिरशिश्रत्.. (३)
हे इंद्र! जो लोग तुम्हारे कहने के अनुसार तुम्हारी बार-बार स्तुति करते हैं, उन्हें तुम
लोक एवं धरती पर स्थापित करते हो. तुमने महान् शक्ति एवं धन लेने के लिए जन्म लिया है.
तुम्हारा यजमान यज्ञरहितों की हिंसा करता है. (३)
एभिर्न इन्द्राहभिर्दशस्य दुर्मित्रासो हि क्षितयः पवन्ते.
प्रति यच्चष्टे अनृतमनेना अव द्विता वरुणो मायी नः सात्.. (४)
हे इंद्र! तुम्हारी मित्रता का ढोंग करने वाले दुष्ट लोग आ रहे हैं. इनसे धन छीनकर हमें
दो. पाप नष्ट करने वाले एवं बुद्धिमान् वरुण हमारा जो पाप देखें. उससे हमें हर प्रकार से
छुड़ाएं. (४)
वोचेमेदिन्द्रं मघवानमेनं महो रायो राधसो यद्ददन्नः.
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यो अर्चतो ब्रह्मकृतिमविष्ठो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हम उसी धनस्वामी इंद्र की स्तुति करते हैं, जिसने हमें आराधना के योग्य महान् धन
दिया एवं स्तोता के स्तुतिकर्म की रक्षा की. हे इंद्र! तुम कल्याणसाधनों से हमारी सदा रक्षा
करो. (५)
सूक्त—२९ देवता—इंद्र
अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्व आ तु प्र याहि हरिवस्तदोकाः.
पिबा त्व१स्य सुषुतस्य चारोर्ददो मघानि मघवन्न्नियानः.. (१)
हे इंद्र! यह सोम तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. हे हरि नामक अश्वों वाले इंद्र! उसे सेवन
करने हेतु शीघ्र आओ. भली प्रकार निचोड़े गए इस सुंदर सोमरस को पिओ. हे धनस्वामी
इंद्र! हमारी याचना सुनकर हमें धन दो. (१)
ब्रह्मन्वीर ब्रह्मकृतिं जुषाणोऽर्वाचीनो हरिभिर्याहि तूम्य्.
अस्मिन्न् षु सवने मादयस्वोप ब्रह्माणि शृणव इमा नः.. (२)
हे महान् एवं शक्तिशाली इंद्र! तुम स्तुतियों को सुनते हुए अपने घोड़ों की सहायता से
शीघ्र हमारी ओर आओ. तुम इस यज्ञ में भली प्रकार प्रमुदित बनो एवं हमारी इन स्तुतियों को
सुनो. (२)
का ते अस्त्यरङ्कृतिः सूक्तैः कदा नूनं ते मघवन् दाशेम.
विश्वा मतीरा ततने त्वायाधा म इन्द्र शृणवो हवेमा.. (३)
हे इंद्र! हमारे द्वारा की हुई स्तुतियों द्वारा तुम्हारी शोभा कैसे होती है? हे धनस्वामी इंद्र!
हम कब तुम्हें प्रसन्न करें? मैं तुम्हारी कामना करता हुआ ही सब स्तुतियां बोलता हूं, इसलिए
मेरी इन स्तुतियों को सुनो. (३)
उतो घा ते पुरुष्या३ इदासन्त्येषां पूर्वेषामशृणोऋषीणाम्.
अधाहं त्वा मघवञ्जोहवीमि त्वं न इन्द्रासि प्रमतिः पितेव.. (४)
हे इंद्र! वे सब प्राचीन ऋषि मानवहितकारी थे, जिनकी स्तुतियां तुमने सुनीं. हे
धनस्वामी इंद्र! इसलिए मैं तुम्हें बार-बार बुलाता हूं. तुम पिता के समान मेरे बंधु हो. (४)
वोचेमेदिन्द्रं मघवानमेनं महो रायो राधसो यद्ददन्नः.
यो अर्चतो ब्रह्मकृतिमविष्ठो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हम उसी धनस्वामी इंद्र की स्तुतियां करते हैं. जिसने हमें आराधना के योग्य महान् धन
दिया एवं स्तोता के स्तुतिकार्य की रक्षा की. हे इंद्र! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा
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सूक्त—३० देवता—इंद्र
करो. (५)
सूक्त—३० देवता—इंद्र
आ नो देव शवसा याहि शुष्मिन्भवा वृध इन्द्र रायः अस्य.
महे नृम्णाय नृपते सुवज्र महि क्षत्राय पौंस्याय शूर.. (१)
हे शक्तिशाली इंद्र देव! तुम अपनी शक्ति द्वारा हमारे पास आओ एवं हमारे धन के
बढ़ाने वाले बनो. हे नृपति, शोभनवज्र वाले एवं शूर इंद्र! तुम महान् बली एवं शत्रुनाशक बनो.
(१)
हवन्त उ त्वा हव्यं विवाचि तनूषु शूराः सूर्यस्य सातौ.
त्वं विश्वेषु सेन्यो चनेषु त्वं वृत्राणि रन्धया सुहन्तु.. (२)
हे बुलाने योग्य इंद्र! लोग युद्ध में शरीररक्षा एवं सूर्यप्राप्ति के लिए तुम्हें बुलाते हैं. सब
मनुष्यों में तुम्हीं सेनापति होने योग्य हो. तुम अपने सुहंतु वज्र द्वारा शत्रुओं को हमारे वश में
करो. (२)
अहा यदिन्द्र सुदिना व्युच्छादधो यत्केतुमुपमं समत्सु.
न्य१ग्निः सीददसुरो न होता हुवानो अत्र सुभगाय देवान्.. (३)
हे इंद्र! जब अच्छे दिन आते हैं और तुम स्वयं को युद्ध के समीप वर्तमान समझते हो,
तब देवों के बुलाने वाले एवं बलवान् अग्नि हमें धन देने के लिए देवों को बुलाते हुए यज्ञ में
स्थित होते हैं. (३)
वयं ते त इन्द्र ये च देव स्तवन्त शूर ददतो मघानि.
यच्छा सूरिभ्य उपमं वरूथं स्वाभुवो जरणामश्नवन्त.. (४)
हे शूर इंद्र देव! हम तुम्हारे हैं. जो हव्य देते हुए तुम्हारी स्तुति करते हैं, वे भी तुम्हारे ही
हैं. उन स्तोताओं को उत्तम धन दो. वे सुसमृद्ध होकर बुढ़ापा प्राप्त करें. (४)
वोचेमेदिन्द्रं मघवानमेनं महो रायो राधसो यद्ददन्नः.
यो अर्चतो ब्रह्मकृतिमविष्ठो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हम उसी धनस्वामी इंद्र की स्तुतियां करते हैं, जिसने हमें आराधना के योग्य महा धन
दिया है एवं स्तोता के स्तुतिकार्य की रक्षा की है. हे इंद्र! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा
करो. (५)
सूक्त—३१ देवता—इंद्र
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प्र व इन्द्राय मादनं हर्यश्वाय गायत. सखायः सोमपाव्ने.. (१)
हे मित्रो! तुम हरि नामक अश्वों वाले एवं सोमरस पीने वाले इंद्र को प्रसन्न करने वाली
स्तुतियां गाओ. (१)
शंसेदुक्थं सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः. चकृमा सत्यराधसे.. (२)
हे इंद्र! तुम हमें अन्न देने के अभिलाषी बनो. हे शतक्रतु! तुम हमें गाय देने की कामना
करो. हे निवासदाता इंद्र! तुम हमें सोना देने की कामना करो. (२)
त्वं न इन्द्र वाजयुरुस्त्वं गव्युः शतक्रतो. त्वं हिरण्ययुर्वसो.. (३)
हे स्तोता! शोभनदान वाले एवं सत्यधन इंद्र के प्रति जिस प्रकार अन्य स्तोता
दीप्तिकारक स्तोत्र बोलते हैं, उसी प्रकार तुम भी बोलो और हम भी बोलेंगे. (३)
वयमिन्द्र त्वायवोऽभि प्र णोनुमो वृषन्. विद्धी त्व१स्य नो वसो.. (४)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हारी अभिलाषा करने वाले हम लोग तुम्हारी अधिक स्तुति
करते हैं. हे निवासदाता इंद्र! हमारी स्तुति को तुम शीघ्र जानो. (४)
मा नो निदे च वक्तवेऽर्यो रन्धीरराव्णे. त्वे अपि क्रतुर्मम.. (५)
हे स्वामी इंद्र! तुम हमें कठोर वचन बोलने वाले, निंदा करने वाले एवं दीनहीनों के वश
में मत करना. मेरा स्तोत्र तुम्हें प्राप्त हो. (५)
त्वं वर्मासि सप्रथः पुरोयोधश्च वृत्रहन्. त्वया प्रति ब्रुवे युजा.. (६)
हे वृत्रहंता इंद्र! तुम कवच के समान हमारे रक्षक, सब जगह प्रसिद्ध व हमारे आगे युद्ध
करने वाले हो. मैं तुम्हारी सहायता से शत्रुओं का नाश करूंगा. (६)
महाँ उतासि यस्य तेऽनु स्वधावरी सहः. मम्नाते इन्द्र रोदसी.. (७)
हे इंद्र! तुम महान् हो. तुम्हारे बल को अन्नयुक्त द्यावा-पृथिवी स्वीकार करते हैं. (७)
तं त्वा मरुत्वती परि भुवद्द्वाणी सयावरी. नक्षमाणा सह द्युभिः.. (८)
हे इंद्र! तुम्हारे साथ चलने वाले तेजों के कारण व्याप्त होती हुई एवं स्तोताओं के वचनों
से युक्त स्तुति तुम्हें प्राप्त हो. (८)
ऊर्ध्वास्त्वान्दिन्दवो भुवन्दस्ममुप द्यवि. सं ते नमन्त कृष्टयः.. (९)
हे स्वर्ग के समीप एवं दर्शनीय इंद्र! हमारे सोम तुम्हारे उद्देश्य से पूर्ण हैं एवं प्रजाएं तुम्हें
प्रणाम करती हैं. (९)
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प्र वो महे महिवृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम्.
विशः पूर्वीः प्र चरा चर्षणिप्राः.. (१०)
हे महान् धनों को बढ़ाने वाले पुरुषो! तुम महान् इंद्र के उद्देश्य से सोम तैयार करो एवं
उत्तम ज्ञान वाले इंद्र के प्रति शोभनस्तुति बोलो. हे प्रजाओं की अभिलाषा पूर्ण करने वाले
इंद्र! जो लोग तुम्हें हव्य से पूर्ण करते हैं, तुम उनके सामने जाओ. (१०)
उरुव्यचसे महिने सुवृक्तिमिन्द्राय ब्रह्म जनयन्त विप्राः.
तस्य व्रतानि न मिनन्ति धीराः.. (११)
बुद्धिमान् लोग महान् व्याप्ति वाले एवं महान् इंद्र को लक्ष्य करके स्तुतियों एवं हव्य का
निर्माण करते हैं. धीर पुरुष इंद्रसंबंधी व्रतों को नष्ट नहीं करते हैं. (११)
इन्द्रं वाणीरनूत्तमन्युमेव सत्रा राजानं दधिरे सहध्यै.
हर्यश्वाय बर्हया समापीन्.. (१२)
हे स्तोता! सब प्रकार से विश्व के स्वामी एवं बाधाहीन क्रोध वाले इंद्र की स्तुतियां
शत्रुओं को पराजित करने के लिए की जाती हैं. तुम इंद्र की स्तुति के लिए बंधुओं को प्रेरित
करो. (१२)
सूक्त—३२ देवता—इंद्र
मो षु त्वा वाघतश्चनारे अस्मन्नि रीरमन्.
आरात्ताच्चित् सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि.. (१)
हे इंद्र! हमसे दूरवर्ती यजमान तुम्हें पाकर प्रसन्न न हों. इसलिए तुम दूर से भी हमारे यज्ञ
में आओ एवं हमारी स्तुति सुनो. (१)
इमे हि ते ब्रह्मकृतः सुते सचा मधौ न मक्ष आसते.
इन्द्रे कामं जरितारो वसूयवो रथे न पादमा दधुः.. (२)
हे इंद्र! तुम्हारे निमित्त निचोड़े गए सोमरस के चारों ओर ये स्तोता इस प्रकार बैठते हैं,
जैसे शहद पर मधुमक्खियां बैठती हैं. धनकामी स्तोता इंद्र को अपनी स्तुति इस प्रकार
समर्पित करते हैं, जिस प्रकार लोग रथ पर पैर रखते हैं. (२)
रायस्कामो वज्रहस्तं सुदक्षिणं पुत्रो न पितरं हुवे.. (३)
धन का अभिलाषी मैं वज्रधारी एवं शोभनदान वाले इंद्र को इस प्रकार बुलाता हूं, जिस
प्रकार पिता को पुत्र बुलाता है. (३)
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इम इन्द्राय सुन्विरे सोमासो दध्याशिरः.
ताँ आ मदाय वज्रहस्त पीतये हरिभ्यां याह्योक आ.. (४)
दही मिला हुआ यह सोमरस इंद्र के लिए ही निचोड़ा गया है. हे वज्रहस्त इंद्र! इस सोम
को आनंद हेतु पीने के लिए अपने घोड़ों द्वारा यज्ञशाला की ओर आओ. (४)
श्रवच्छुत्कर्ण ईयते वसूनां नू चिन्नो मर्धिषद् गिरः.
सद्यश्चिद्यः सहस्त्राणि शता ददन्नकिर्दित्सन्तमा मिनत्.. (५)
इंद्र के कान याचना सुनने वाले हैं. उनसे हम धन मांगते हैं. वे इन्हें सुनकर निष्फल न
करें. जो इंद्र याचना के बाद ही हजारों एवं सैकड़ों दान देते हैं, उन देने के इच्छुक इंद्र को कोई
न रोके. (५)
स वीरो अप्रतिष्कुत इन्द्रेण शूशुवे नृभिः.
यस्ते गभीरा सवनानि वृत्रहन्त्सुनोत्या च धावति.. (६)
हे वृत्रहंता इंद्र! जो तुम्हारे लिए गहरा सोम निचोड़ता है एवं तुम्हारे पीछे चलता है, वह
वीर है. वह विरोधरहित एवं सेवकों द्वारा सेवित रहता है. (६)
भवा वरूथं मघवन्मघोनां यत्समजासि शर्धतः.
वि त्वाहतस्य वेदनं भजेमह्या दूणाशो भरा गयम्.. (७)
हे धनस्वामी इंद्र! तुम हव्य देने वालों के उपद्रव रोकने वाले कवच बनो एवं उनके
उत्साही शत्रुओं को नष्ट करो. हम तुम्हारे द्वारा विनष्ट शत्रु का धन प्राप्त करें, हमें ऐसा घर दो
जो मुश्किल से नष्ट हो सके. (७)
सुनोता सोमपाव्ने सोममिन्द्राय वज्रिणे.
पचता पक्तीरवसे कृणुध्वमित्पृणन्नित्पृणते मयः.. (८)
हे सेवको! तुम सोम पीने वाले एवं वज्रधारी इंद्र के लिए सोम निचोड़ो, इंद्र को तृप्त
करने के लिए पुरोडाश पकाओ एवं इंद्र के प्रिय कर्त्तव्य कर्म करो. इंद्र यजमान को सुख देते
हुए हव्य को पूरा करते हैं. (८)
मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे.
तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे.. (९)
हे सेवको! तुम सोम वाले यज्ञों को नष्ट मत करो, उत्साही बनो एवं महान् शत्रुनाशक इंद्र
से धन पाने के लिए यज्ञकर्म करो. शीघ्र काम करने वाला व्यक्ति जीतता है, घर में निवास
करता है एवं पुष्ट होता है. देव बुरा काम करने वाले का साथ नहीं देते. (९)
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नकिः सुदासो रथं पर्यास न रीरमत्.
इन्द्रो यस्याविता यस्य मरुतो गमत्स गोमति व्रजे.. (१०)
शोभनदान वाले का रथ न कोई दूर फेंक सकता है एवं न उसे कोई अपने स्वार्थ के लिए
पकड़ सकता है. इंद्र एवं मरुद्गण जिसके रक्षक हैं, वह गायों वाली गोशाला में जाएगा.
(१०)
गमद्वाजं वाजयन्निन्द्र मर्त्यो यस्य त्वमविता भुवः.
अस्माकं बोध्यविता रथानामस्माकं शूर नृणाम्.. (११)
हे इंद्र! तुम जिस मनुष्य के रक्षक बनोगे, वह स्तुतियों द्वारा तुम्हें शक्तिशाली बनाता
हुआ अन्न प्राप्त करेगा. हे शूर इंद्र! तुम हमारे रथों एवं पुत्रादि के रक्षक बनो. (११)
उदिन्वस्य रिच्यतेंऽशो धनं न जिग्युषः.
य इन्द्रो हरिवान्न दभन्ति तं रिपो दक्षं दधाति सोमिनि.. (१२)
विजयी व्यक्ति के धन के समान इंद्र का भाग सभी देवों से अधिक है. हरि नामक अश्वों
के स्वामी इंद्र जिस यजमान को शक्तिशाली बनाते हैं, उसे शत्रु नहीं मार सकते. (१२)
मन्त्रमखर्वं सुधितं सुपेशसं दधात यज्ञियेष्वा.
पूर्वीश्चन प्रसितयस्तरन्ति तं य इन्द्रे कर्मणा भुवत्.. (१३)
हे मनुष्यो! अधिक, विधानयुक्त एवं सुंदर मंत्रों को यज्ञपात्र देवों में इंद्र को ही अर्पित
करो. जो व्यक्ति अपने कर्म से इंद्र का मन आकर्षित कर लेता है, उसे अनेक पाश नहीं
बांधते. (१३)
कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति.
श्रद्धा इत्ते मघवन्पार्ये दिवि वाजी वाजं सिषासति.. (१४)
हे इंद्र! जो व्यक्ति तुम्हारे मन में रहता है, उसे कौन आदमी दबा सकता है? हे धनस्वामी
इंद्र! जो तुम्हारे प्रति श्रद्धालु होकर हवि देता है, वह स्वर्ग एवं भविष्य में अन्न पाता है. (१४)
मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु.
तव प्रणीती हर्यश्व सूरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता.. (१५)
हे धनवान् इंद्र! जो तुम्हें प्रिय धन देते हैं, उन्हें तुम युद्ध में उत्साहित करो. हे हरि नामक
घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम तुम्हारी कृपा से अपने स्तोताओं सहित पापों से पार हो जावें. (१५)
तवेदिन्द्रावमं वसु त्वं पुष्यसि मध्यमम्.
सत्रा विश्वस्य परमस्य राजसि नकिष्ट्वा गोषु वृण्वते.. (१६)
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हे इंद्र! यह अधम धन तुम्हारा है. तुम मध्यम धन के स्वामी हो. तुम समस्त उत्तम धन के
राजा हो. यह बात सत्य है कि गो संबंधी दान देने से तुम्हें कोई रोक नहीं सकता. (१६)
त्वं विश्वस्य धनदा असि श्रुतो य ईं भवन्त्याजयः.
तवायं विश्वः पुरुहूत पार्थिवोऽवस्युर्नार्म भिक्षते.. (१७)
हे इंद्र! तुम विश्व को धन देने वाले हो. होने वाले युद्धों में भी तुम धनद के रूप में प्रसिद्ध
हो. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! रक्षा के निमित्त सभी लोग तुमसे धन मांगते हैं. (१७)
यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय.
स्तोतारमिद्धिषिषेय रदावसो न पाप्त्वाय रासीय.. (१८)
हे इंद्र! जितने धन के तुम ईश्वर हो, उतने के ही हम भी स्वामी बनें. हे धन देने वाले इंद्र!
मैं धन से स्तोता की रक्षा करूंगा एवं पाप के लिए धन नहीं दूंगा. (१८)
शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे राय आ कुहचिद्विदे.
नहि त्वदन्यन्मघवन्न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन.. (१९)
हे इंद्र! तुम्हारा पूजक पुरुष कहीं हो, मैं उसे प्रतिदिन दान दूंगा. हे धनी इंद्र! तुम्हारे
अतिरिक्त हमारा कोई भी जातीय एवं पिता नहीं है. (१९)
तरणिरित्सिषासति वाजं पुरन्ध्या युजा.
आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमिं तष्टेव सुद्रवम्.. (२०)
शीघ्र कर्म करने वाला व्यक्ति महान् कर्म के सहारे अन्न का भोग करता है. जैसे बढ़ई
उत्तम लकड़ी की बनी पहिए की नेमि को झुकाता है, उसी प्रकार मैं बहुतों द्वारा बुलाए हुए
इंद्र को स्तुति द्वारा झुकाऊंगा. (२०)
न दुष्टुती मर्त्यो विन्दते वसु न स्रेधन्तं रयिर्नशत्.
सुशक्तिरिन्मघवन्तुभ्यं मावते देष्णं यत्पार्ये दिवि. (२१)
बुरी स्तुतियां करने वाला मनुष्य धन प्राप्त नहीं करता. धन हिंसक के पास भी नहीं
जाता. हे धनस्वामी इंद्र! स्वर्ग एवं भविष्य में मुझ जैसे व्यक्ति को जो देने योग्य है, उसे
उत्तमकर्म वाला ही पा सकता है. (२१)
अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धााइव धेनवः.
ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः.. (२२)
हे शूर इंद्र! हम बिना दुही गाय के समान चमस में सोम भरकर तुम्हारी स्तुति करते हैं.
तुम जंगम प्राणियों एवं स्थिर पदार्थों के स्वामी एवं सबको देखने वाले हो. (२२)
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न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते.
अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे.. (२३)
हे धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे समान स्वर्ग अथवा धरती में न कोई उत्पन्न हुआ है और न
जन्म लेगा. हम घोड़ा, अन्न एवं गो चाहते हुए तुम्हें बुलाते हैं. (२३)
अभी षतस्तदा भरेन्द्र ज्यायः कनीयसः.
पुरूवसुर्हि मघवन्त्सनादसि भरेभरे च हव्यः.. (२४)
हे ज्येष्ठ इंद्र! मुझ कनिष्ठ को वह धन दो. तुम चिरकाल से अधिक धन वाले हो एवं
प्रत्येक यज्ञ में बुलाए जाते हो. (२४)
परा णुदस्व मघवन्नमित्रानत्सुवेदा नो वसू कृधि.
अस्माकं बोध्यविता महाधने भवा वृधः सखीनाम्.. (२५)
हे धनस्वामी इंद्र! शत्रुओं को हमसे पराङ्मुख करो एवं हमारे लिए धन को सुलभ
बनाओ. तुम हमारे रक्षक बनो एवं हम मित्रों के महान् धन के बढ़ाने वाले बनो. (२५)
इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा.
शिक्षा णो अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि.. (२६)
हे इंद्र! हमारे लिए प्रज्ञान लाओ. जैसे पिता पुत्र को देता है, वैसे ही तुम हमें धन दो. हे
बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम यज्ञजीवी प्रतिदिन सूर्य को प्राप्त करें. (२६)
मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो३ माशिवासो अव क्रमुः.
त्वया वयं प्रवतः शश्वतीरपोऽति शूर तरामसि.. (२७)
हे इंद्र! अज्ञात हिंसक एवं शत्रु लोग हम पर आक्रमण न करें. हे शूर इंद्र! हम नम्र होकर
तुम्हारे साथ बहुत से कार्यों में सफलता प्राप्त करें. (२७)
सूक्त—३३ देवता—वसिष्ठ एवं उनके पुत्र
श्वित्यञ्चो मा दक्षिणतस्कपर्दा धियंजिन्वासो अभि हि प्रमन्दुः.
उत्तिष्ठन्वोचे परि बर्हिषो नॄन्न मे दूरादवितवे वसिष्ठाः.. (१)
गोरे रंग वाले, यज्ञकर्म पूर्ण करने वाले एवं शिर के दक्षिण भाग में चोटी रखने वाले
वसिष्ठपुत्र मुझे प्रसन्न करते हैं. मैं यज्ञ से उठता हुआ उनसे कहता हूं कि हे वसिष्ठपुत्रो! मुझसे
दूर मत जाओ. (१)
दूरादिन्द्रमनयन्ना सुतेन तिरो वैशन्तमति पान्तमुग्रम्.
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पाशद्युम्नस्य वायतस्य सोमात्सुतादिन्द्रोऽवृणीता वसिष्ठान्.. (२)
वसिष्ठपुत्र वयत्सूत पाशद्युम्न का दूर से तिरस्कार करके चमस में भरे सोमरस को पीते
हुए इंद्र को ले आए थे. इंद्र ने भी उसे छोड़कर सोमरस निचोड़ने वाले वसिष्ठपुत्रों को स्वीकार
किया था. (२)
एवेन्नु कं सिन्धुमेभिस्ततारेवेन्नु कं भेदमैभिर्जघान.
एवेन्नु कं दाशराज्ञे सुदासं प्रावदिन्द्रो ब्रह्मणा वो वसिष्ठा:.. (३)
इसी प्रकार वसिष्ठपुत्रों ने सुखपूर्वक सिंधु नदी को पार किया था. इसी प्रकार इन्होंने
भेद नामक शत्रु को मारा. हे वसिष्ठपुत्रो! इसी प्रकार दाशराज्ञ युद्ध में तुम्हारे मंत्रों की शक्ति से
इंद्र ने सुदास राजा की रक्षा की थी. (३)
जुष्टी नरो ब्रह्मणा व: पितॄणामक्षमव्ययं न किला रिषाथ.
यच्छक्वरीषु बृहता रवेणेन्द्रे शुष्ममदधाता वसिष्ठा:.. (४)
हे नेताओ! तुम्हारे स्तोत्र से पितर प्रसन्न होते हैं. मैं अपने आश्रम को जाने के लिए रथ
का पहिया चला रहा हूं. तुम क्षीण मत होना. हे वसिष्ठपुत्रो! तुमने शक्वरी नामक ऋचाओं
द्वारा एवं श्रेष्ठ शब्द से इंद्र का बल पाया है. (४)
उद् द्यामिवेत्तृष्णजो नाथितासोऽदीध्युर्दाशराज्ञे वृतास:.
वसिष्ठस्य स्तुवत इन्द्रो अश्रोदुरुं तृत्सुभ्यो अकृणोदु लोकम्.. (५)
प्यासे एवं राजाओं से घिरे हुए वसिष्ठपुत्रों ने वर्षा की याचना करते हुए दाशराज्ञ युद्ध में
इंद्र को सूर्य के समान ऊपर उठाया था. वसिष्ठ की स्तुतियां इंद्र ने सुनी थीं एवं तृत्सु राजाओं
को विस्तृत राज्य दिया था. (५)
दण्डाइवेद्गो अजनास आसन्परिच्छिन्ना भरता अर्भकास:.
अभवच्च पुरएता वसिष्ठ आदित्तृत्सूनां विशो अप्रथन्त.. (६)
जिस प्रकार गायों को हांकने वाले डंडे संख्या में कम एवं सीमित आकार के होते हैं,
उसी प्रकार शत्रुओं से घिरे हुए भरतवंशी अल्पसंख्यक थे. इसके बाद वसिष्ठ ऋषि
भरतवंशियों के पुरोहित बने एवं तृत्सु राजाओं की प्रजा बढ़ने लगी. (६)
त्रय: कृण्वन्ति भुवनेषु रेतस्तिस्र: प्रजा आर्या ज्योतिरग्रा:.
त्रयो घर्मास उषसं सचन्ते सर्वां इत्ताँ अनु विदुर्वसिष्ठा:.. (७)
अग्नि, वायु और सूर्य—तीनों लोकों में जल उत्पन्न करते हैं. ये तीनों श्रेष्ठप्रजा एवं
अतिशय दीप्तिमान हैं. ये तीनों दीप्तिशाली उषा का वरण करते हैं. वसिष्ठ के पुत्र इन्हें जानते
हैं. (७)
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सूर्यस्येव वक्षथो ज्योतिरेषां समुद्रस्येव महिमा गभीरः.
वातस्येव प्रजवो नान्येन स्तोमो वसिष्ठा अन्वेत्तवे वः.. (८)
हे वसिष्ठपुत्रो! तुम्हारी महिमा सूर्य के समान प्रकाशित एवं सागर के समान गंभीर है.
वायुवेग के समान तुम्हारी महिमा का भी दूसरा कोई अनुमान नहीं कर सकता. (८)
त इन्निण्यं हृदयस्य प्रकेतैः सहस्रवल्शमभि सं चरन्ति.
यमेन ततं परिधिं वयन्तोऽप्सरस उप सेदुर्वसिष्ठाः.. (९)
वे वसिष्ठपुत्र अपने हृदय के ज्ञान द्वारा अंतर्हित होकर हजार शाखाओं वाले संसार में
घूमते हैं. वे यम द्वारा विस्तारित वस्त्र को बुनते हुए अप्सरा के पास गए. (९)
विद्युतो ज्योतिः परि सञ्जिहानं मित्रावरुणा यदपश्यतां त्वा.
तत्ते जन्मोतैकं वसिष्ठागस्त्यो यत्त्वा विश आजभार.. (१०)
हे वसिष्ठ! तुम्हें बिजली के समान ज्योतिरूप आत्मा का त्याग करते हुए मित्र व वरुण
ने देखा था. वह तुम्हारा एक जन्म था. इससे पहले अगस्त्य तुम्हें तुम्हारे वासस्थान से लाए थे.
(१०)
उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या ब्रह्मन्मनसोऽधि जातः.
द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन विश्वे देवाः पुष्करे त्वाददन्त.. (११)
हे वसिष्ठ! तुम मित्र व वरुण के पुत्र हो. हे ब्रह्मन्! तुम उर्वशी के मन से उत्पन्न हुए हो.
उर्वशी को देखकर मित्र व अरुण का वीर्य स्खलित हुआ था. उस समय सभी देवों ने दिव्य
स्तोत्र बोलते हुए तुम्हें पुष्कर में धारण किया था. (११)
स प्रकेत उभयस्य प्रतिद्वान्र्त्सहस्रदान उत वा सदानः.
यमेन ततं परिधिं वयिष्यन्नप्सरसः परि जज्ञे वसिष्ठः.. (१२)
उत्तम ज्ञान वाले वसिष्ठ स्वर्ग एवं धरती दोनों को जानकर हजार दान करने वाले अथवा
सर्वस्व दान करने वाले हुए थे. यम के द्वारा विस्तृत वस्त्र को बुनने की अभिलाषा से वसिष्ठ
अप्सरा से उत्पन्न हुए थे. (१२)
सत्रे ह जाताविषितो नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम्.
ततो ह मान उदियाय मध्यात्ततो जातमृषिमाहुर्वसिष्ठम्.. (१३)
यज्ञ में दीक्षित मित्र और वरुण ने दूसरे लोगो की स्तुतियां एवं प्रार्थनाएं मान कर अपना
वीर्य एक साथ घड़े में स्खलित किया था. उस घड़े से अगस्त्य उत्पन्न हुए. लोग वसिष्ठ ऋषि
को भी उसी घड़े से उत्पन्न बताते हैं. (१३)
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सूक्त—३४ देवता—विश्वेदेव
उक्थभृतं सामभृतं बिभर्ति ग्रावाणं बिभ्रत्प्र वदात्यग्रे.
उपैनमाध्वं सुमनस्यमाना आ वो गच्छाति प्रतृदो वसिष्ठः.. (१४)
हे तृत्सुओ! वसिष्ठ तुम्हारे पास आ रहे हैं. तुम प्रसन्नचित होकर उनकी पूजा करना.
वसिष्ठ सबसे आगे रहकर मंत्रसमूह एवं सोम को धारण करते हैं. पत्थरों द्वारा सोम कूटने
वाले अध्वर्यु को धारण करते हैं एवं कर्त्तव्य बताते हैं. (१४)
सूक्त—३४ देवता—विश्वेदेव
प्र शुक्रैतु देवी मनीषा अस्मत्सुतष्टो रथो न वाजी.. (१)
दीप्त व सब अभिलाषाओं को देने वाली स्तुति वेगशाली एवं सुसंस्कृत रथ के समान
हमारे पास से देवों के पास जावे. (१)
विदुः पृथिव्या दिवो जनित्रं शृण्वन्त्यापो अध क्षरन्तीः.. (२)
बहने वाला जल स्वर्ग और धरती दोनों की उत्पत्ति जानता है एवं स्तुतियां सुनता है. (२)
आपश्चिदस्मै पिन्वन्त पृथ्वीर्वृत्रेषु शूरा मंसन्त उग्राः.. (३)
विस्तृत जल इन इंद्र को तृप्त करते हैं. शत्रुबाधा होने पर उग्र एवं शूर लोग इंद्र की स्तुति
करते हैं. (३)
आ धूर्ष्वस्मै दधाताश्वानिन्द्रो न वज्री हिरण्यबाहुः.. (४)
इंद्र के आगमन के लिए घोड़ों को रथ के आगे जोड़ो. इंद्र वज्रधारी एवं सोने के हाथों
वाले हैं. (४)
अभि प्र स्थाताहेव यज्ञं यातेव पत्मन्त्मना हिनोत.. (५)
हे मनुष्यो! यज्ञ के सामने जाओ एवं यात्री के समान यज्ञमार्ग पर स्वयं ही चलो. (५)
त्मना समत्सु हिनोत यज्ञं दधात केतुं जनाय वीरम्.. (६)
हे सेवको! युद्धों में अपने आप जाओ. लोगों को ज्ञान कराने वाले एवं पापनाशक यज्ञों
को धारण करो. (६)
उदस्य शुष्माद्भानुर्नार्त बिभर्ति भरं पृथिवी न भूम.. (७)
इस यज्ञ के बल के कारण ही सूर्य उदित होता है. धरती जिस प्रकार प्राणियों का भार
वहन करती है, उसी प्रकार यज्ञ भी करता है. (७)
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