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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1335 of 1855

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Page 1335

धन दो. (९)
अच्छ नः शीरशोचिषं गिरो यन्तु दर्शतम्.
अच्छा यज्ञासो नमसा पुरूवसुं पुरुप्रशस्तमूतये.. (१०)
हमारी स्तुतियां जलाने वाली ज्वालाओं से युक्त एवं दर्शनीय अग्नि के सामने जावें. रक्षा
पाने के लिए हमारे यज्ञ हव्य अन्न से युक्त होकर अधिक धन वाले एवं बहुतों द्वारा प्रशंसित
अग्नि के समीप जाएं. (१०)
अग्निं सूनुं सहसो जातवेदसं दानाय वार्याणाम्.
द्विता यो भूदमृतो मर्त्येष्वो होता मन्द्रतमो विशि.. (११)
सभी स्तुतियां वरण करने योग्य, धनदान के निमित्त, बल के पुत्र एवं जातधन अग्नि के
सामने जाएं. मरणरहित अग्नि मनुष्यों में दो रूपों में रहते हैं. देवों में अमर एवं मानवों में होम
पूरा करने वाले तथा प्रजाओं में अतिशय प्रसन्न करने वाले. (११)
अग्निं वो देवयज्ययाग्निं प्रयतध्वरे.
अग्निं धीषु प्रथममग्निमर्वत्यग्निं क्षेत्राय साधसे.. (१२)
हे यजमानो! मैं तुम्हारे देवसंबंधी यज्ञ के आरंभ होने पर अग्नि की स्तुति करता हूं. मैं
यज्ञ प्रारंभ करने के समय, बंधु-भाव प्राप्त होने पर एवं क्षेत्र-लाभ होने पर सब देवों से पहले
अग्नि की स्तुति करता हूं. (१२)
अग्निरिषां सख्ये ददातु न ईशे यो वार्याणाम्.
अग्निं तोके तनये शश्वदीमहे वसुं सन्तं तनूषाम्.. (१३)
वरण करने योग्य धनों के स्वामी अग्नि हम मित्रों को अन्न दें. हम निवासस्थान देने वाले
एवं अंगों का पालन करने वाले अग्नि से अपने पुत्र और पौत्र के लिए बहुत सा धन मांगते हैं.
(१३)
अग्निमीळिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम्.
अग्निं राये पुरुमीळ्ह श्रुतं नरोऽग्निं सुदीतये छर्दिः.. (१४)
हे पुरुमीढ ऋषि! तुम मंत्रों द्वारा दाहक ज्वालाओं वाले अग्नि की स्तुति रक्षा एवं धन
पाने के लिए करो. अन्य यजमान भी अग्नि की स्तुति करते हैं. तुम अग्नि से मेरे लिए घर
मांगो. (१४)
अग्निं द्वेषो योतवै नो गृणीमस्यग्निं शं योश्च दातवे.
विश्वासु विश्ववितेव हव्यो भुवद्वस्तुतॄंऋषूणाम्.. (१५)
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