ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे अग्नि! मेरे लिए तुम अन्नों को विशेषरूप से शुद्ध करना. हे देव! हम हव्ययुक्तों को
तुम अन्न दो. हम यजमान और स्तोता दोनों तुम्हारे दान के पात्र बनें. सदा कल्याणों द्वारा
हमारा पालन करो. (२५)
सूक्त—२ देवता—आप्री
जुषस्व नः समिधमग्ने अद्य शोचा बृहद्यजतं धूममृण्वन्.
उप स्पृश दिव्यं सानु स्तूपैः सं रश्मिभिस्ततनः सूर्यस्य.. (१)
हे अग्नि! आज हमारी समिधा को स्वीकार करो. यज्ञ के योग्य एवं प्रशंसनीय धुआं
उठाते हुए जलों एवं अपनी गर्म लपटों से ऊंचे आकाश को छुओ. तुम सूर्य से मिल जाओ.
(१)
नराशंसस्य महिमानमेषामुप स्तोषाम यजतस्य यज्ञैः.
ये सुक्रतवः शुचयो धियंधाः स्वदन्ति देवा उभयानि हव्या.. (२)
जो देव शोभनकर्म वाले, तेजस्वी, यज्ञकर्मों के धारक एवं दोनों प्रकार के हव्यों को
स्वीकार करने वाले हैं, हम उन देवों के बीच में यज्ञयोग्य एवं मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय अग्नि
की महिमा का वर्णन स्तुतियों द्वारा करते हैं. (२)
ईळेन्यं वो असुरं सुदक्षमन्तर्दूतं रोदसी सत्यवाचम्.
मनुष्वदग्निं मनुना समिद्धं समध्वराय सदमिन्महेम.. (३)
हे अध्वर्युगण! तुम स्तुति के योग्य, शक्तिशाली, शोभनबुद्धि वाले, धरती-आकाश के
बीच में देवों के दूतरूप में विचरण करने वाले, सत्यवचन, मनुष्य के समान और मन द्वारा
प्रज्वलित अग्नि को यज्ञ के लिए पूजते हो. (३)
सपर्यवो भरमाणा अभिज्ञु प्र वृञ्जते नमसा बर्हिरग्नौ.
आजुह्वाना घृतपृष्ठं पृषद्वदध्वर्यवो हविषा मर्चयध्वम्.. (४)
सेवा करने के अभिलाषी एवं घुटनों के सहारे बैठकर पात्रों में सोमरस भरते हुए अध्वर्यु
हव्य के साथ अग्नि को बर्हि देते हैं. हे अध्वर्युगण! घी से भीगे हुए एवं बड़ी-बड़ी बूंदों वाले
बर्हि को हव्य के साथ अग्नि में वहन करो. (४)
स्वाध्यो३ वि दुरो देवयन्तोऽशिश्रयू रथयुर्देवताता.
पूर्वी शिशुं न मातरा रिहाणे समग्रुवो न समनेष्वञ्जन्.. (५)
शोभनकर्म वाले, देवों की अभिलाषा करने वाले एवं रथ चाहने वाले लोगों ने यज्ञ में
द्वारों का सहारा लिया, अध्वर्युगण यज्ञ में प्राचीना जुहू एवं उपभृति को नदी के समान घी से
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