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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—३० देवता—इंद्र

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करो. (५)
सूक्त—३० देवता—इंद्र
आ नो देव शवसा याहि शुष्मिन्भवा वृध इन्द्र रायः अस्य.
महे नृम्णाय नृपते सुवज्र महि क्षत्राय पौंस्याय शूर.. (१)
हे शक्तिशाली इंद्र देव! तुम अपनी शक्ति द्वारा हमारे पास आओ एवं हमारे धन के
बढ़ाने वाले बनो. हे नृपति, शोभनवज्र वाले एवं शूर इंद्र! तुम महान् बली एवं शत्रुनाशक बनो.
(१)
हवन्त उ त्वा हव्यं विवाचि तनूषु शूराः सूर्यस्य सातौ.
त्वं विश्वेषु सेन्यो चनेषु त्वं वृत्राणि रन्धया सुहन्तु.. (२)
हे बुलाने योग्य इंद्र! लोग युद्ध में शरीररक्षा एवं सूर्यप्राप्ति के लिए तुम्हें बुलाते हैं. सब
मनुष्यों में तुम्हीं सेनापति होने योग्य हो. तुम अपने सुहंतु वज्र द्वारा शत्रुओं को हमारे वश में
करो. (२)
अहा यदिन्द्र सुदिना व्युच्छादधो यत्केतुमुपमं समत्सु.
न्य१ग्निः सीददसुरो न होता हुवानो अत्र सुभगाय देवान्.. (३)
हे इंद्र! जब अच्छे दिन आते हैं और तुम स्वयं को युद्ध के समीप वर्तमान समझते हो,
तब देवों के बुलाने वाले एवं बलवान् अग्नि हमें धन देने के लिए देवों को बुलाते हुए यज्ञ में
स्थित होते हैं. (३)
वयं ते त इन्द्र ये च देव स्तवन्त शूर ददतो मघानि.
यच्छा सूरिभ्य उपमं वरूथं स्वाभुवो जरणामश्नवन्त.. (४)
हे शूर इंद्र देव! हम तुम्हारे हैं. जो हव्य देते हुए तुम्हारी स्तुति करते हैं, वे भी तुम्हारे ही
हैं. उन स्तोताओं को उत्तम धन दो. वे सुसमृद्ध होकर बुढ़ापा प्राप्त करें. (४)
वोचेमेदिन्द्रं मघवानमेनं महो रायो राधसो यद्ददन्नः.
यो अर्चतो ब्रह्मकृतिमविष्ठो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हम उसी धनस्वामी इंद्र की स्तुतियां करते हैं, जिसने हमें आराधना के योग्य महा धन
दिया है एवं स्तोता के स्तुतिकार्य की रक्षा की है. हे इंद्र! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा
करो. (५)
सूक्त—३१ देवता—इंद्र
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प्र व इन्द्राय मादनं हर्यश्वाय गायत. सखायः सोमपाव्ने.. (१)
हे मित्रो! तुम हरि नामक अश्वों वाले एवं सोमरस पीने वाले इंद्र को प्रसन्न करने वाली
स्तुतियां गाओ. (१)
शंसेदुक्थं सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः. चकृमा सत्यराधसे.. (२)
हे इंद्र! तुम हमें अन्न देने के अभिलाषी बनो. हे शतक्रतु! तुम हमें गाय देने की कामना
करो. हे निवासदाता इंद्र! तुम हमें सोना देने की कामना करो. (२)
त्वं न इन्द्र वाजयुरुस्त्वं गव्युः शतक्रतो. त्वं हिरण्ययुर्वसो.. (३)
हे स्तोता! शोभनदान वाले एवं सत्यधन इंद्र के प्रति जिस प्रकार अन्य स्तोता
दीप्तिकारक स्तोत्र बोलते हैं, उसी प्रकार तुम भी बोलो और हम भी बोलेंगे. (३)
वयमिन्द्र त्वायवोऽभि प्र णोनुमो वृषन्. विद्धी त्व१स्य नो वसो.. (४)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हारी अभिलाषा करने वाले हम लोग तुम्हारी अधिक स्तुति
करते हैं. हे निवासदाता इंद्र! हमारी स्तुति को तुम शीघ्र जानो. (४)
मा नो निदे च वक्तवेऽर्यो रन्धीरराव्णे. त्वे अपि क्रतुर्मम.. (५)
हे स्वामी इंद्र! तुम हमें कठोर वचन बोलने वाले, निंदा करने वाले एवं दीनहीनों के वश
में मत करना. मेरा स्तोत्र तुम्हें प्राप्त हो. (५)
त्वं वर्मासि सप्रथः पुरोयोधश्च वृत्रहन्. त्वया प्रति ब्रुवे युजा.. (६)
हे वृत्रहंता इंद्र! तुम कवच के समान हमारे रक्षक, सब जगह प्रसिद्ध व हमारे आगे युद्ध
करने वाले हो. मैं तुम्हारी सहायता से शत्रुओं का नाश करूंगा. (६)
महाँ उतासि यस्य तेऽनु स्वधावरी सहः. मम्नाते इन्द्र रोदसी.. (७)
हे इंद्र! तुम महान् हो. तुम्हारे बल को अन्नयुक्त द्यावा-पृथिवी स्वीकार करते हैं. (७)
तं त्वा मरुत्वती परि भुवद्द्वाणी सयावरी. नक्षमाणा सह द्युभिः.. (८)
हे इंद्र! तुम्हारे साथ चलने वाले तेजों के कारण व्याप्त होती हुई एवं स्तोताओं के वचनों
से युक्त स्तुति तुम्हें प्राप्त हो. (८)
ऊर्ध्वास्त्वान्दिन्दवो भुवन्दस्ममुप द्यवि. सं ते नमन्त कृष्टयः.. (९)
हे स्वर्ग के समीप एवं दर्शनीय इंद्र! हमारे सोम तुम्हारे उद्देश्य से पूर्ण हैं एवं प्रजाएं तुम्हें
प्रणाम करती हैं. (९)
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प्र वो महे महिवृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम्.
विशः पूर्वीः प्र चरा चर्षणिप्राः.. (१०)
हे महान् धनों को बढ़ाने वाले पुरुषो! तुम महान् इंद्र के उद्देश्य से सोम तैयार करो एवं
उत्तम ज्ञान वाले इंद्र के प्रति शोभनस्तुति बोलो. हे प्रजाओं की अभिलाषा पूर्ण करने वाले
इंद्र! जो लोग तुम्हें हव्य से पूर्ण करते हैं, तुम उनके सामने जाओ. (१०)
उरुव्यचसे महिने सुवृक्तिमिन्द्राय ब्रह्म जनयन्त विप्राः.
तस्य व्रतानि न मिनन्ति धीराः.. (११)
बुद्धिमान् लोग महान् व्याप्ति वाले एवं महान् इंद्र को लक्ष्य करके स्तुतियों एवं हव्य का
निर्माण करते हैं. धीर पुरुष इंद्रसंबंधी व्रतों को नष्ट नहीं करते हैं. (११)
इन्द्रं वाणीरनूत्तमन्युमेव सत्रा राजानं दधिरे सहध्यै.
हर्यश्वाय बर्हया समापीन्.. (१२)
हे स्तोता! सब प्रकार से विश्व के स्वामी एवं बाधाहीन क्रोध वाले इंद्र की स्तुतियां
शत्रुओं को पराजित करने के लिए की जाती हैं. तुम इंद्र की स्तुति के लिए बंधुओं को प्रेरित
करो. (१२)
सूक्त—३२ देवता—इंद्र
मो षु त्वा वाघतश्चनारे अस्मन्नि रीरमन्.
आरात्ताच्चित् सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि.. (१)
हे इंद्र! हमसे दूरवर्ती यजमान तुम्हें पाकर प्रसन्न न हों. इसलिए तुम दूर से भी हमारे यज्ञ
में आओ एवं हमारी स्तुति सुनो. (१)
इमे हि ते ब्रह्मकृतः सुते सचा मधौ न मक्ष आसते.
इन्द्रे कामं जरितारो वसूयवो रथे न पादमा दधुः.. (२)
हे इंद्र! तुम्हारे निमित्त निचोड़े गए सोमरस के चारों ओर ये स्तोता इस प्रकार बैठते हैं,
जैसे शहद पर मधुमक्खियां बैठती हैं. धनकामी स्तोता इंद्र को अपनी स्तुति इस प्रकार
समर्पित करते हैं, जिस प्रकार लोग रथ पर पैर रखते हैं. (२)
रायस्कामो वज्रहस्तं सुदक्षिणं पुत्रो न पितरं हुवे.. (३)
धन का अभिलाषी मैं वज्रधारी एवं शोभनदान वाले इंद्र को इस प्रकार बुलाता हूं, जिस
प्रकार पिता को पुत्र बुलाता है. (३)
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इम इन्द्राय सुन्विरे सोमासो दध्याशिरः.
ताँ आ मदाय वज्रहस्त पीतये हरिभ्यां याह्योक आ.. (४)
दही मिला हुआ यह सोमरस इंद्र के लिए ही निचोड़ा गया है. हे वज्रहस्त इंद्र! इस सोम
को आनंद हेतु पीने के लिए अपने घोड़ों द्वारा यज्ञशाला की ओर आओ. (४)
श्रवच्छुत्कर्ण ईयते वसूनां नू चिन्नो मर्धिषद् गिरः.
सद्यश्चिद्यः सहस्त्राणि शता ददन्नकिर्दित्सन्तमा मिनत्.. (५)
इंद्र के कान याचना सुनने वाले हैं. उनसे हम धन मांगते हैं. वे इन्हें सुनकर निष्फल न
करें. जो इंद्र याचना के बाद ही हजारों एवं सैकड़ों दान देते हैं, उन देने के इच्छुक इंद्र को कोई
न रोके. (५)
स वीरो अप्रतिष्कुत इन्द्रेण शूशुवे नृभिः.
यस्ते गभीरा सवनानि वृत्रहन्त्सुनोत्या च धावति.. (६)
हे वृत्रहंता इंद्र! जो तुम्हारे लिए गहरा सोम निचोड़ता है एवं तुम्हारे पीछे चलता है, वह
वीर है. वह विरोधरहित एवं सेवकों द्वारा सेवित रहता है. (६)
भवा वरूथं मघवन्मघोनां यत्समजासि शर्धतः.
वि त्वाहतस्य वेदनं भजेमह्या दूणाशो भरा गयम्.. (७)
हे धनस्वामी इंद्र! तुम हव्य देने वालों के उपद्रव रोकने वाले कवच बनो एवं उनके
उत्साही शत्रुओं को नष्ट करो. हम तुम्हारे द्वारा विनष्ट शत्रु का धन प्राप्त करें, हमें ऐसा घर दो
जो मुश्किल से नष्ट हो सके. (७)
सुनोता सोमपाव्ने सोममिन्द्राय वज्रिणे.
पचता पक्तीरवसे कृणुध्वमित्पृणन्नित्पृणते मयः.. (८)
हे सेवको! तुम सोम पीने वाले एवं वज्रधारी इंद्र के लिए सोम निचोड़ो, इंद्र को तृप्त
करने के लिए पुरोडाश पकाओ एवं इंद्र के प्रिय कर्त्तव्य कर्म करो. इंद्र यजमान को सुख देते
हुए हव्य को पूरा करते हैं. (८)
मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे.
तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे.. (९)
हे सेवको! तुम सोम वाले यज्ञों को नष्ट मत करो, उत्साही बनो एवं महान् शत्रुनाशक इंद्र
से धन पाने के लिए यज्ञकर्म करो. शीघ्र काम करने वाला व्यक्ति जीतता है, घर में निवास
करता है एवं पुष्ट होता है. देव बुरा काम करने वाले का साथ नहीं देते. (९)
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नकिः सुदासो रथं पर्यास न रीरमत्.
इन्द्रो यस्याविता यस्य मरुतो गमत्स गोमति व्रजे.. (१०)
शोभनदान वाले का रथ न कोई दूर फेंक सकता है एवं न उसे कोई अपने स्वार्थ के लिए
पकड़ सकता है. इंद्र एवं मरुद्गण जिसके रक्षक हैं, वह गायों वाली गोशाला में जाएगा.
(१०)
गमद्वाजं वाजयन्निन्द्र मर्त्यो यस्य त्वमविता भुवः.
अस्माकं बोध्यविता रथानामस्माकं शूर नृणाम्.. (११)
हे इंद्र! तुम जिस मनुष्य के रक्षक बनोगे, वह स्तुतियों द्वारा तुम्हें शक्तिशाली बनाता
हुआ अन्न प्राप्त करेगा. हे शूर इंद्र! तुम हमारे रथों एवं पुत्रादि के रक्षक बनो. (११)
उदिन्वस्य रिच्यतेंऽशो धनं न जिग्युषः.
य इन्द्रो हरिवान्न दभन्ति तं रिपो दक्षं दधाति सोमिनि.. (१२)
विजयी व्यक्ति के धन के समान इंद्र का भाग सभी देवों से अधिक है. हरि नामक अश्वों
के स्वामी इंद्र जिस यजमान को शक्तिशाली बनाते हैं, उसे शत्रु नहीं मार सकते. (१२)
मन्त्रमखर्वं सुधितं सुपेशसं दधात यज्ञियेष्वा.
पूर्वीश्चन प्रसितयस्तरन्ति तं य इन्द्रे कर्मणा भुवत्.. (१३)
हे मनुष्यो! अधिक, विधानयुक्त एवं सुंदर मंत्रों को यज्ञपात्र देवों में इंद्र को ही अर्पित
करो. जो व्यक्ति अपने कर्म से इंद्र का मन आकर्षित कर लेता है, उसे अनेक पाश नहीं
बांधते. (१३)
कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति.
श्रद्धा इत्ते मघवन्पार्ये दिवि वाजी वाजं सिषासति.. (१४)
हे इंद्र! जो व्यक्ति तुम्हारे मन में रहता है, उसे कौन आदमी दबा सकता है? हे धनस्वामी
इंद्र! जो तुम्हारे प्रति श्रद्धालु होकर हवि देता है, वह स्वर्ग एवं भविष्य में अन्न पाता है. (१४)
मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु.
तव प्रणीती हर्यश्व सूरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता.. (१५)
हे धनवान् इंद्र! जो तुम्हें प्रिय धन देते हैं, उन्हें तुम युद्ध में उत्साहित करो. हे हरि नामक
घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम तुम्हारी कृपा से अपने स्तोताओं सहित पापों से पार हो जावें. (१५)
तवेदिन्द्रावमं वसु त्वं पुष्यसि मध्यमम्.
सत्रा विश्वस्य परमस्य राजसि नकिष्ट्वा गोषु वृण्वते.. (१६)
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हे इंद्र! यह अधम धन तुम्हारा है. तुम मध्यम धन के स्वामी हो. तुम समस्त उत्तम धन के
राजा हो. यह बात सत्य है कि गो संबंधी दान देने से तुम्हें कोई रोक नहीं सकता. (१६)
त्वं विश्वस्य धनदा असि श्रुतो य ईं भवन्त्याजयः.
तवायं विश्वः पुरुहूत पार्थिवोऽवस्युर्नार्म भिक्षते.. (१७)
हे इंद्र! तुम विश्व को धन देने वाले हो. होने वाले युद्धों में भी तुम धनद के रूप में प्रसिद्ध
हो. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! रक्षा के निमित्त सभी लोग तुमसे धन मांगते हैं. (१७)
यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय.
स्तोतारमिद्धिषिषेय रदावसो न पाप्त्वाय रासीय.. (१८)
हे इंद्र! जितने धन के तुम ईश्वर हो, उतने के ही हम भी स्वामी बनें. हे धन देने वाले इंद्र!
मैं धन से स्तोता की रक्षा करूंगा एवं पाप के लिए धन नहीं दूंगा. (१८)
शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे राय आ कुहचिद्विदे.
नहि त्वदन्यन्मघवन्न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन.. (१९)
हे इंद्र! तुम्हारा पूजक पुरुष कहीं हो, मैं उसे प्रतिदिन दान दूंगा. हे धनी इंद्र! तुम्हारे
अतिरिक्त हमारा कोई भी जातीय एवं पिता नहीं है. (१९)
तरणिरित्सिषासति वाजं पुरन्ध्या युजा.
आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमिं तष्टेव सुद्रवम्.. (२०)
शीघ्र कर्म करने वाला व्यक्ति महान् कर्म के सहारे अन्न का भोग करता है. जैसे बढ़ई
उत्तम लकड़ी की बनी पहिए की नेमि को झुकाता है, उसी प्रकार मैं बहुतों द्वारा बुलाए हुए
इंद्र को स्तुति द्वारा झुकाऊंगा. (२०)
न दुष्टुती मर्त्यो विन्दते वसु न स्रेधन्तं रयिर्नशत्.
सुशक्तिरिन्मघवन्तुभ्यं मावते देष्णं यत्पार्ये दिवि. (२१)
बुरी स्तुतियां करने वाला मनुष्य धन प्राप्त नहीं करता. धन हिंसक के पास भी नहीं
जाता. हे धनस्वामी इंद्र! स्वर्ग एवं भविष्य में मुझ जैसे व्यक्ति को जो देने योग्य है, उसे
उत्तमकर्म वाला ही पा सकता है. (२१)
अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धााइव धेनवः.
ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः.. (२२)
हे शूर इंद्र! हम बिना दुही गाय के समान चमस में सोम भरकर तुम्हारी स्तुति करते हैं.
तुम जंगम प्राणियों एवं स्थिर पदार्थों के स्वामी एवं सबको देखने वाले हो. (२२)
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न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते.
अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे.. (२३)
हे धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे समान स्वर्ग अथवा धरती में न कोई उत्पन्न हुआ है और न
जन्म लेगा. हम घोड़ा, अन्न एवं गो चाहते हुए तुम्हें बुलाते हैं. (२३)
अभी षतस्तदा भरेन्द्र ज्यायः कनीयसः.
पुरूवसुर्हि मघवन्त्सनादसि भरेभरे च हव्यः.. (२४)
हे ज्येष्ठ इंद्र! मुझ कनिष्ठ को वह धन दो. तुम चिरकाल से अधिक धन वाले हो एवं
प्रत्येक यज्ञ में बुलाए जाते हो. (२४)
परा णुदस्व मघवन्नमित्रानत्सुवेदा नो वसू कृधि.
अस्माकं बोध्यविता महाधने भवा वृधः सखीनाम्.. (२५)
हे धनस्वामी इंद्र! शत्रुओं को हमसे पराङ्मुख करो एवं हमारे लिए धन को सुलभ
बनाओ. तुम हमारे रक्षक बनो एवं हम मित्रों के महान् धन के बढ़ाने वाले बनो. (२५)
इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा.
शिक्षा णो अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि.. (२६)
हे इंद्र! हमारे लिए प्रज्ञान लाओ. जैसे पिता पुत्र को देता है, वैसे ही तुम हमें धन दो. हे
बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम यज्ञजीवी प्रतिदिन सूर्य को प्राप्त करें. (२६)
मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो३ माशिवासो अव क्रमुः.
त्वया वयं प्रवतः शश्वतीरपोऽति शूर तरामसि.. (२७)
हे इंद्र! अज्ञात हिंसक एवं शत्रु लोग हम पर आक्रमण न करें. हे शूर इंद्र! हम नम्र होकर
तुम्हारे साथ बहुत से कार्यों में सफलता प्राप्त करें. (२७)
सूक्त—३३ देवता—वसिष्ठ एवं उनके पुत्र
श्वित्यञ्चो मा दक्षिणतस्कपर्दा धियंजिन्वासो अभि हि प्रमन्दुः.
उत्तिष्ठन्वोचे परि बर्हिषो नॄन्न मे दूरादवितवे वसिष्ठाः.. (१)
गोरे रंग वाले, यज्ञकर्म पूर्ण करने वाले एवं शिर के दक्षिण भाग में चोटी रखने वाले
वसिष्ठपुत्र मुझे प्रसन्न करते हैं. मैं यज्ञ से उठता हुआ उनसे कहता हूं कि हे वसिष्ठपुत्रो! मुझसे
दूर मत जाओ. (१)
दूरादिन्द्रमनयन्ना सुतेन तिरो वैशन्तमति पान्तमुग्रम्.
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पाशद्युम्नस्य वायतस्य सोमात्सुतादिन्द्रोऽवृणीता वसिष्ठान्.. (२)
वसिष्ठपुत्र वयत्सूत पाशद्युम्न का दूर से तिरस्कार करके चमस में भरे सोमरस को पीते
हुए इंद्र को ले आए थे. इंद्र ने भी उसे छोड़कर सोमरस निचोड़ने वाले वसिष्ठपुत्रों को स्वीकार
किया था. (२)
एवेन्नु कं सिन्धुमेभिस्ततारेवेन्नु कं भेदमैभिर्जघान.
एवेन्नु कं दाशराज्ञे सुदासं प्रावदिन्द्रो ब्रह्मणा वो वसिष्ठा:.. (३)
इसी प्रकार वसिष्ठपुत्रों ने सुखपूर्वक सिंधु नदी को पार किया था. इसी प्रकार इन्होंने
भेद नामक शत्रु को मारा. हे वसिष्ठपुत्रो! इसी प्रकार दाशराज्ञ युद्ध में तुम्हारे मंत्रों की शक्ति से
इंद्र ने सुदास राजा की रक्षा की थी. (३)
जुष्टी नरो ब्रह्मणा व: पितॄणामक्षमव्ययं न किला रिषाथ.
यच्छक्वरीषु बृहता रवेणेन्द्रे शुष्ममदधाता वसिष्ठा:.. (४)
हे नेताओ! तुम्हारे स्तोत्र से पितर प्रसन्न होते हैं. मैं अपने आश्रम को जाने के लिए रथ
का पहिया चला रहा हूं. तुम क्षीण मत होना. हे वसिष्ठपुत्रो! तुमने शक्वरी नामक ऋचाओं
द्वारा एवं श्रेष्ठ शब्द से इंद्र का बल पाया है. (४)
उद् द्यामिवेत्तृष्णजो नाथितासोऽदीध्युर्दाशराज्ञे वृतास:.
वसिष्ठस्य स्तुवत इन्द्रो अश्रोदुरुं तृत्सुभ्यो अकृणोदु लोकम्.. (५)
प्यासे एवं राजाओं से घिरे हुए वसिष्ठपुत्रों ने वर्षा की याचना करते हुए दाशराज्ञ युद्ध में
इंद्र को सूर्य के समान ऊपर उठाया था. वसिष्ठ की स्तुतियां इंद्र ने सुनी थीं एवं तृत्सु राजाओं
को विस्तृत राज्य दिया था. (५)
दण्डाइवेद्गो अजनास आसन्परिच्छिन्ना भरता अर्भकास:.
अभवच्च पुरएता वसिष्ठ आदित्तृत्सूनां विशो अप्रथन्त.. (६)
जिस प्रकार गायों को हांकने वाले डंडे संख्या में कम एवं सीमित आकार के होते हैं,
उसी प्रकार शत्रुओं से घिरे हुए भरतवंशी अल्पसंख्यक थे. इसके बाद वसिष्ठ ऋषि
भरतवंशियों के पुरोहित बने एवं तृत्सु राजाओं की प्रजा बढ़ने लगी. (६)
त्रय: कृण्वन्ति भुवनेषु रेतस्तिस्र: प्रजा आर्या ज्योतिरग्रा:.
त्रयो घर्मास उषसं सचन्ते सर्वां इत्ताँ अनु विदुर्वसिष्ठा:.. (७)
अग्नि, वायु और सूर्य—तीनों लोकों में जल उत्पन्न करते हैं. ये तीनों श्रेष्ठप्रजा एवं
अतिशय दीप्तिमान हैं. ये तीनों दीप्तिशाली उषा का वरण करते हैं. वसिष्ठ के पुत्र इन्हें जानते
हैं. (७)
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सूर्यस्येव वक्षथो ज्योतिरेषां समुद्रस्येव महिमा गभीरः.
वातस्येव प्रजवो नान्येन स्तोमो वसिष्ठा अन्वेत्तवे वः.. (८)
हे वसिष्ठपुत्रो! तुम्हारी महिमा सूर्य के समान प्रकाशित एवं सागर के समान गंभीर है.
वायुवेग के समान तुम्हारी महिमा का भी दूसरा कोई अनुमान नहीं कर सकता. (८)
त इन्निण्यं हृदयस्य प्रकेतैः सहस्रवल्शमभि सं चरन्ति.
यमेन ततं परिधिं वयन्तोऽप्सरस उप सेदुर्वसिष्ठाः.. (९)
वे वसिष्ठपुत्र अपने हृदय के ज्ञान द्वारा अंतर्हित होकर हजार शाखाओं वाले संसार में
घूमते हैं. वे यम द्वारा विस्तारित वस्त्र को बुनते हुए अप्सरा के पास गए. (९)
विद्युतो ज्योतिः परि सञ्जिहानं मित्रावरुणा यदपश्यतां त्वा.
तत्ते जन्मोतैकं वसिष्ठागस्त्यो यत्त्वा विश आजभार.. (१०)
हे वसिष्ठ! तुम्हें बिजली के समान ज्योतिरूप आत्मा का त्याग करते हुए मित्र व वरुण
ने देखा था. वह तुम्हारा एक जन्म था. इससे पहले अगस्त्य तुम्हें तुम्हारे वासस्थान से लाए थे.
(१०)
उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या ब्रह्मन्मनसोऽधि जातः.
द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन विश्वे देवाः पुष्करे त्वाददन्त.. (११)
हे वसिष्ठ! तुम मित्र व वरुण के पुत्र हो. हे ब्रह्मन्! तुम उर्वशी के मन से उत्पन्न हुए हो.
उर्वशी को देखकर मित्र व अरुण का वीर्य स्खलित हुआ था. उस समय सभी देवों ने दिव्य
स्तोत्र बोलते हुए तुम्हें पुष्कर में धारण किया था. (११)
स प्रकेत उभयस्य प्रतिद्वान्र्त्सहस्रदान उत वा सदानः.
यमेन ततं परिधिं वयिष्यन्नप्सरसः परि जज्ञे वसिष्ठः.. (१२)
उत्तम ज्ञान वाले वसिष्ठ स्वर्ग एवं धरती दोनों को जानकर हजार दान करने वाले अथवा
सर्वस्व दान करने वाले हुए थे. यम के द्वारा विस्तृत वस्त्र को बुनने की अभिलाषा से वसिष्ठ
अप्सरा से उत्पन्न हुए थे. (१२)
सत्रे ह जाताविषितो नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम्.
ततो ह मान उदियाय मध्यात्ततो जातमृषिमाहुर्वसिष्ठम्.. (१३)
यज्ञ में दीक्षित मित्र और वरुण ने दूसरे लोगो की स्तुतियां एवं प्रार्थनाएं मान कर अपना
वीर्य एक साथ घड़े में स्खलित किया था. उस घड़े से अगस्त्य उत्पन्न हुए. लोग वसिष्ठ ऋषि
को भी उसी घड़े से उत्पन्न बताते हैं. (१३)
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