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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

About this granth

The Narada Purana (नारद पुराण) is one of the eighteen major Puranas, a Vaishnava text traditionally ascribed to Veda Vyasa. In its first part the four Kumaras, Sanaka, Sanandana, Sanatana and Sanatkumara, instruct the sage Narada in dharma, devotion and knowledge; the second part unfolds as a dialogue between Vasishtha and King Mandhata. It is notable for summarising the Vedangas (phonetics, ritual, grammar, etymology, astronomy and metre) and for giving a synopsis of all eighteen Puranas.

This is the Gita Press, Gorakhpur "Sankshipt Naradpuran", an illustrated, large-type edition in Hindi only: an abridged Hindi rendering without the Sanskrit text. The copy records the eighteenth reprint of Samvat 2076. It follows the four padas of the first part and then the later part.

The later part is dominated by the glory of the Ekadashi fast, the story of King Rukmangada, and the merits of various places of pilgrimage. At about 770 pages, it is meant for readers who want the stories and teachings of the Purana in plain Hindi.

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३७५

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३७५

जन्मकालिक ग्रहोंकी स्थिति तथा जन्म-नक्षत्र-सम्बन्धी आठ प्रकारके कूटद्वारा वर-वधूकी कुण्डलीका मिलान किया जाता है। यदि जन्म-लग्न या जन्म-राशि (चन्द्रमा) से १, ४, ७, ८ या १२ वें स्थानमें मङ्गल या अन्य पापग्रह वरकी कुण्डलीमें हों तो पत्नीके लिये और कन्याकी कुण्डलीमें हों तो वरके लिये अनिष्टकारी होते हैं। यदि दोनोंकी कुण्डलियोंमें उक्त स्थानोंमें पापग्रहकी संख्या समान हो तो उक्त दोष नहीं माना जाता है। उदाहरणके लिये—

वरकी कुण्डली

+---------------+---------------+
|       ५       |       ३       |
| रा० ६         |               |
|       ४ चं० गु०       २ बु०   |
|                               |
|     श० ७      |     १ सू०     |
|                               |
|   ८           |         के० १२|
|       १० मं०  |           शु० |
|       ९       |      ११       |
+---------------+---------------+

पुनर्वसुके चतुर्थ चरणमें जन्म

कन्याकी कुण्डली

+---------------+---------------+
|     ५ चं०     |     ३ के०     |
| ६             |               |
|           ४           २ बु०   |
|                               |
|       ७       |     १ सू०     |
|                               |
|   ८           |             १२|
|       १० श० मं०           शु० |
|     ९ गु० रा  |      ११       |
+---------------+---------------+

पूर्वाफाल्गुनीके प्रथम चरणमें जन्म

यहाँ वरकी कुण्डलीमें ४थे और ७वें स्थानमें शनि और मङ्गल दो पापग्रह हैं तथा कन्याकी कुण्डलीमें भी ७ वें स्थानमें शनि, मङ्गल हैं, जिससे दोनोंके परस्पर माङ्गलिक दोष नष्ट होनेके कारण इन दोनोंका वैवाहिक सम्बन्ध श्रेष्ठ सिद्ध होता है। यहाँ भकूटके गुण इस प्रकार हैं—

वरकन्यागुण
१ वर्ण—ब्राह्मणक्षत्रिय१
२ वश्य—जलचरवनचर१
३ तारा—५६१॥
४ योनि—मार्जारमूषक०
५ ग्रह (राशीश)—चन्द्रसूर्य५
६ गण—देवमनुष्य६
७ भकूट—२१२०
८ नाड़ी—१२८

$\overline{गुणोंका योग-२२॥}$

इस तरह नक्षत्रमेलापकमें भी गुणोंका योग २२॥ है। अठारहसे अधिक होनेके कारण इन दोनोंका विवाह-सम्बन्ध श्रेष्ठ सिद्ध होता है।

इसी प्रकार अन्य कुण्डलियोंसे भी ग्रह और नक्षत्रका मेल देखकर विवाहका निर्णय करना चाहिये।

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* संक्षिप्त नारदपुराण *

(विवाहोंके भेद—) ऊपर बताये हुए शुभ समयमें (१) प्राजापत्य, (२) ब्राह्म, (३) दैव और (४) आर्ष—ये चार प्रकारके विवाह करने चाहिये। ये ही चारों विवाह उपर्युक्त फल देनेवाले होते हैं। इससे अतिरिक्त जो गान्धर्व, आसुर, पैशाच तथा राक्षस विवाह हैं, वे तो सब समय समान ही फल देनेवाले होते हैं॥ ५१०-५११॥

(अभिजित् और गोधूलि लग्न—) सूर्योदय-कालमें जो लग्न रहता है, उससे चतुर्थ लग्नका नाम अभिजित् है और सातवाँ गोधूलि-लग्न कहलाता है। ये दोनों विवाहमें पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाले होते हैं॥ ५१२॥ पूर्व तथा कलिङ्ग देशवासियोंके लिये गोधूलि-लग्न प्रधान है और अभिजित्-लग्न तो सब देशोंके लिये मुख्य कहा गया है, क्योंकि वह सब दोषोंका नाश करनेवाला है॥ ५१३॥

(अभिजित्-प्रशंसा—) सूर्यके मध्य आकाशमें जानेपर अभिजित् मुहूर्त होता है, वह समस्त दोषोंको नष्ट कर देता है, ठीक उसी तरह, जैसे त्रिपुरासुरको श्रीशिवजीने नष्ट किया था॥ ५१४॥

पुत्रका विवाह करनेके बाद छः मासोंके भीतर पुत्रीका विवाह नहीं करना चाहिये। एक पुत्र या पुत्रीका विवाह करनेके बाद दूसरे पुत्रका उपनयन भी नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार एक मङ्गल कार्य करनेके बाद छः मासोंके भीतर दूसरा मङ्गल कार्य नहीं करना चाहिये। एक गर्भसे उत्पन्न दो कन्याओंका विवाह यदि छः मासके भीतर हो तो निश्चय ही तीन वर्षके भीतर उनमेंसे एक विधवा होती है॥ ५१५-५१६॥ अपने पुत्रके साथ जिसकी पुत्रीका विवाह हो, फिर उसके पुत्रके साथ अपनी पुत्रीका विवाह करना 'प्रत्युद्वाह' कहलाता है। ऐसा कभी नहीं करना चाहिये तथा किसी एक ही वरको अपनी दो कन्याएँ नहीं देनी चाहिये। दो सहोदर वरोंको दो सहोदरा कन्याएँ नहीं देनी चाहिये। दो सहोदरोंका एक ही दिन (एक साथ) विवाह या मुण्डन नहीं करना चाहिये॥ ५१७ १/२॥

(गण्डान्त-दोष—) पूर्वकथित गण्डान्तमें यदि दिनमें बालकका जन्म हो तो वह पिताका, रात्रिमें जन्म हो तो माताका और संध्या (सायं या प्रातः) कालमें जन्म हो तो वह अपने शरीरके लिये घातक होता है। गण्डका यह परिणाम अन्यथा नहीं होता है। मूलमें उत्पन्न होनेवाली संतान पुत्र हो या कन्या, श्वशुरके लिये घातक होती है, किंतु मूलके चतुर्थ चरणमें जन्म लेनेवाला बालक श्वशुरका नाश नहीं करता है तथा आश्लेषाके प्रथम चरणमें जन्म लेनेवाला बालक भी पिताका या श्वशुरका विनाश करनेवाला नहीं होता है। ज्येष्ठाके अन्तिम चरणमें उत्पन्न बालक ही श्वशुरके लिये घातक होता है, कन्या नहीं। किसी प्रकार पूर्वाषाढ़ या मूलमें उत्पन्न कन्या भी माता या पिताका नाश करनेवाली नहीं होती है। ज्येष्ठा नक्षत्रमें उत्पन्न कन्या अपने पतिके बड़े भाईके लिये और विशाखामें जन्म लेनेवाली कन्या अपने देवरके लिये घातक होती है॥ ५१८-५२१॥

(वधू-प्रवेश—) विवाहके दिनसे ६, ८, १० और ७वें दिनमें वधू-प्रवेश (पतिगृहमें प्रथम प्रवेश) हो तो वह सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाला होता है। द्वितीय वर्ष, जन्म-राशि, जन्म-लग्न और जन्म-दिनको छोड़कर अन्य समयमें सम्मुख शुक्र रहनेपर भी वैवाहिक यात्रा (वधू-प्रवेश) शुभ होती है॥ ५२२-५२३॥

(देव-प्रतिष्ठा—) उत्तरायणमें, बृहस्पति और शुक्र उदित हों तो चैत्रको छोड़कर माघ आदि पाँच मासोंके शुक्लपक्षमें और कृष्णपक्षमें भी आरम्भसे आठ दिनतक सब देवताओंकी स्थापना शुभदायक होती है। जिस देवताकी जो तिथि है, उसमें उस देवताकी और २, ३, ५, ६, ७, १०, ११, १२, १३ तथा पूर्णिमा—इन तिथियोंमें सब देवताओंकी स्थापना शुभ होती है। तीनों उत्तरा, पुनर्वसु, मृगशिरा, रेवती, हस्त, चित्रा, स्वाती, पुष्य, अश्विनी, रोहिणी,

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३७७

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३७७

शतभिषा, श्रवण, अनुराधा और धनिष्ठा—इन नक्षत्रोंमें तथा मङ्गलवारको छोड़कर अन्य वारोंमें देव-प्रतिष्ठा करनी चाहिये। स्थापना करनेवाले (यजमान)-के लिये सूर्य, तारा और चन्द्रमा बलवान् हों, उस दिनके पूर्वाह्नमें, शुभ समय, शुभ लग्न और शुभ नवमांशमें तथा यजमानकी जन्मराशिसे अष्टम राशिको छोड़कर अन्य लग्नोंमें देवताओंकी प्रतिष्ठा शुभदायक होती है॥ ५२४-५२९॥

मेष आदि सब राशियाँ शुभ ग्रहसे युक्त या दृष्ट हों तो देवस्थापनके लिये श्रेष्ठ समझी जाती हैं। प्रत्येक कार्यमें पञ्चाङ्ग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण) शुभ होने चाहिये और लग्नसे अष्टम स्थान भी शुभ (ग्रहवर्जित) होना आवश्यक है॥ ५३०॥ (१) लग्नमें चन्द्रमा, सूर्य, मङ्गल, राहु, केतु और शनि कर्ताके लिये घातक होते हैं। अन्य (बुध, गुरु और शुक्र) लग्नमें धन, धान्य और सब सुखोंको देनेवाले होते हैं। (२) द्वितीय भावमें पापग्रह अनिष्ट फल देनेवाले और शुभग्रह धनकी वृद्धि करनेवाले होते हैं। (३) तृतीय भावमें शुभ और पाप सब ग्रह पुत्र-पौत्रादि सुखको बढ़ानेवाले होते हैं। (४) चतुर्थ भावमें शुभग्रह शुभफल और पापग्रह पाप-फलको देते हैं। (५) पञ्चम भावमें पापग्रह कष्टदायक और शुभग्रह पुत्रादि सुख देनेवाले होते हैं। (६) षष्ठ भावमें शुभग्रह शत्रुको बढ़ानेवाले और पापग्रह शत्रुके लिये घातक होते हैं। (७) सप्तम भावमें पापग्रह रोगकारक और शुभग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। (८) अष्टम भावमें शुभग्रह और पापग्रह सभी कर्ता (यजमान)-के लिये घातक होते हैं। (९) नवम भावमें पापग्रह हों तो वे धर्मको नष्ट करनेवाले हैं और शुभग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। (१०) दशम भावमें पापग्रह दुःखदायक और शुभग्रह सुयशकी वृद्धि करनेवाले होते हैं। (११) एकादश स्थानमें पाप और शुभ सब ग्रह सब प्रकारसे लाभकारक ही होते हैं। (१२) लग्नसे द्वादश स्थानमें पाप या शुभ सभी ग्रह व्यय (खर्च)-को बढ़ानेवाले होते हैं॥ ५३१-५३६॥

(प्रतिष्ठामें अन्य विशेष बात—) प्रतिष्ठा करानेवाले पुरोहित (या आचार्य)-को अर्थज्ञान न हो तो यजमानका अनिष्ट होता है। मन्त्रोंका अशुभ उच्चारण हो तो ऋत्विजों (यज्ञ करानेवालों)-का और कर्म विधिहीन हो तो कर्ताकी स्त्रीका अनिष्ट होता है। इसलिये नारद! देव-प्रतिष्ठाके समान दूसरा शत्रु भी नहीं है। यदि लग्नमें अधिक गुण हों और थोड़े-से दोष हों तो उसमें देवताओंकी प्रतिष्ठा कर लेनी चाहिये। इससे कर्ता (यजमान)-के अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि होती है। मुने! अब मैं संक्षेपसे ग्राम, मन्दिर तथा गृह आदिके निर्माणकी बात बताता हूँ॥ ५३७-५३९॥

(गृहनिर्माणके विषयमें ज्ञातव्य बातें—) गृह आदि बनाना हो तो पहले गन्ध, वर्ण, रस तथा आकृतिके द्वारा क्षेत्र (भूमि)-की परीक्षा कर लेनी चाहिये। यदि उस स्थानकी मिट्टीमें मधु (शहद)-के समान गन्ध हो तो ब्राह्मणोंके, पुष्पसदृश गन्ध हो तो क्षत्रियोंके, आम्ल (खटाई)-के समान गन्ध हो तो वैश्योंके और मांसकी-सी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्रोंके बसनेयोग्य जानना चाहिये। वहाँकी मिट्टीका रंग श्वेत हो तो ब्राह्मणोंके, लाल हो तो क्षत्रियोंके, पीत (पीला) हो तो वैश्योंके और कृष्ण (काला) हो तो वह शूद्रोंके निवासके योग्य है। यदि वहाँकि मिट्टीका स्वाद मधुर हो तो ब्राह्मणोंके, कडुवा (मिर्चके समान) हो तो क्षत्रियोंके, तिक्त हो तो वैश्योंके और कषाय (कसैला) स्वाद हो तो उस स्थानको शूद्रोंके निवास करनेयोग्य समझना चाहिये ॥ ५४०-५४१॥ ईशान, पूर्व और उत्तर दिशामें प्लव (नीची) भूमि सबके लिये अत्यन्त वृद्धि देनेवाली होती है। अन्य दिशाओंमें प्लव (नीची) भूमि सबके लिये हानि करनेवाली होती है॥ ५४२॥

(गृहभूमि-परीक्षा—) जिस स्थानमें घर बनाना

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३७८* संक्षिप्त नारदपुराण *

हो वहाँ अरत्नि (कोहिनीसे कनिष्ठा अंगुलितक) के बराबर लम्बाई, चौड़ाई और गहराई करके कुण्ड बनावे। फिर उसे उसी खोदी हुई मिट्टीसे भरे। यदि भरनेसे मिट्टी शेष बच जाय तो उस स्थानमें वास करनेसे सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। यदि मिट्टी कम हो जाय तो वहाँ रहनेसे सम्पत्तिकी हानि होती है। यदि सारी मिट्टीसे वह कुण्ड भर जाय तो मध्यम फल समझना चाहिये॥ ५४३॥ अथवा उसी प्रकार अरत्निके मापका कुण्ड बनाकर सायंकाल उसको जलसे पूरित कर दे और प्रातःकाल देखे; यदि कुण्डमें जल अवशिष्ट हो तो उस स्थानमें वृद्धि होगी। यदि कीचड़ (गीली मिट्टी) ही बची हो तो मध्यम फल है और यदि कुण्डकी भूमिमें दरार पड़ गयी हो तो उस स्थानमें वास करनेसे हानि होगी॥ ५४४॥

मुने ! इस प्रकार निवास करनेयोग्य स्थानकी भलीभाँति परीक्षा करके उक्त लक्षणयुक्त भूमिमें दिक्साधन (दिशाओंका ज्ञान) करनेके लिये समतल भूमिमें वृत्त (गोल रेखा) बनावे। वृत्तके मध्य भागमें द्वादशांगुल शंकु (बारह विभाग या पर्वसे युक्त एक सीधी लकड़ी)-की स्थापना करे और दिक्साधनविधिसे दिशाओंका ज्ञान करे। फिर कर्ताके नामके अनुसार षड्वर्ग शुद्ध क्षेत्रफल (वास्तुभूमिकी लम्बाई-चौड़ाईका गुणनफल) ठीक करके अभीष्ट लम्बाई-चौड़ाईके बराबर (दिशासाधित रेखानुसार) चतुर्भुज बनावे। उस चतुर्भुज रेखामार्गपर सुन्दर प्राकार (चहारदीवारी) बनावे। लम्बाई और चौड़ाईमें पूर्व आदि चारों दिशाओंमें आठ-आठ द्वारके भाग होते हैं। प्रदक्षिणक्रमसे उनके निम्नाङ्कित फल हैं। (जैसे पूर्वभागमें उत्तरसे दक्षिणतक) १- हानि, २- निर्धनता, ३- धनलाभ, ४- राजसम्मान, ५- बहुत धन, ६- अति चोरी, ७-अति क्रोध तथा ८- भय—ये क्रमशः आठ द्वारोंके फल हैं। दक्षिण दिशामें क्रमशः १- मरण, २- बन्धन, ३- भय, ४-धनलाभ, ५- धनवृद्धि, ६-निर्भयता, ७- व्याधिभय तथा ८-निर्बलता—ये (पूर्वसे पश्चिम तकके) आठ द्वारोंके फल हैं। पश्चिम दिशामें क्रमशः १-पुत्रहानि, २-शत्रुवृद्धि, ३-लक्ष्मीप्राप्ति, ४-धनलाभ, ५-सौभाग्य, ६-अति दौर्भाग्य, ७-दुःख तथा ८-शोक—ये दक्षिणसे उत्तरतकके आठ द्वारोंके फल हैं। इसी प्रकार उत्तर दिशामें (पश्चिमसे पूर्वतक) १-स्त्री-हानि, २-निर्बलता, ३- हानि, ४-धान्यलाभ, ५-धनागम, ६-सम्पत्ति-वृद्धि, ७-भय तथा ८-रोग—ये क्रमशः आठ द्वारोंके फल हैं॥ ५४५-५५२ ॥

इसी तरह पूर्व आदि दिशाओंके गृहादिमें भी द्वार और उसके फल समझने चाहिये। द्वारका जितना विस्तार (चौड़ाई) हो, उससे दुगुनी ऊँची किवाड़ें बनाकर उन्हें घरमें (चहारदीवारीके) दक्षिण या पश्चिम भागमें लगावे॥ ५५३॥ चहारदीवारीके भीतर जितनी भूमि हो, उसके इक्यासी पद (समान खण्ड) बनावे। उनके बीचके नौ खण्डोंमें ब्रह्माका स्थान समझे। यह गृहनिर्माणमें अत्यन्त निन्दित है। चहारदीवारीसे मिले हुए जो चारों ओरके ३२ भाग हैं, वे पिशाचांश कहलाते हैं। उनमें घर बनाना दुःख, शोक और भय देनेवाला होता है। शेष अंशों (पदों)-में घर बनाये जायें तो पुत्र, पौत्र और धनकी वृद्धि करनेवाले होते हैं॥ ५५४-५५५ ½॥

वास्तुभूमिकी दिशा-विदिशाओंकी रेखा वास्तुकी शिरा कहलाती है। एवं ब्रह्मभाग, पिशाचभाग तथा शिराका जहाँ-जहाँ योग हो, वहाँ-वहाँ वास्तुकी मर्मसन्धि समझनी चाहिये। वह मर्मसन्धि गृहारम्भ तथा गृह-प्रवेशमें अनिष्टकारक समझी जाती है॥ ५५६-५५७ ½ ॥

(गृहारम्भमें प्रशस्त मास—) मार्गशीर्ष, फाल्गुन, वैशाख, माघ, श्रावण और कार्तिक—ये मास गृहारम्भमें पुत्र, आरोग्य और धन देनेवाले होते हैं॥ ५५८ ½ ॥

(दिशाओंमें वर्ग और वर्गेश—) पूर्व आदि आठों दिशाओंमें क्रमशः अकारादि आठ वर्ग होते हैं। इन दिशावर्गोंके क्रमशः गरुड, मार्जार, सिंह,

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३७९

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३७९

श्वान, सर्प, मूषक, गज और शशक (खरगोश)—ये योनियाँ होती हैं। इन योनि-वर्गोंमें अपने पाँचवें वर्गवाले परस्पर शत्रु होते हैं¹॥ ५५९-५६०॥

(जिस ग्राममें या जिस दिशामें घर बनाना हो, वह साध्य तथा घर बनानेवाला साधक, कर्ता और भर्ता आदि कहलाता है। इसको ध्यानमें रखना चाहिये।) साध्य (ग्राम)-की वर्ग-संख्याको लिखकर, उसके पीछे (बायें भागमें) साधककी वर्ग-संख्या लिखे। उसमें आठका भाग देकर जो शेष बचे, वह साधकका धन होता है। इसके विपरीत विधिसे (अर्थात् साधककी वर्ग-संख्याके बायें भागमें साध्यकी वर्ग-संख्या रखकर जो संख्या बने, उसमें आठसे भाग देकर शेष) साधकका ऋण होता है। इस प्रकार ऋणकी संख्या अल्प और धन-संख्या अधिक हो तो शुभ माने (अर्थात् उस ग्राम या उस दिशामें बनाया हुआ घर रहने योग्य है, ऐसा समझे)²॥ ५६१(क-ख)॥

इसी प्रकार साधकके नक्षत्र साध्यके नक्षत्रतक गिनकर जो संख्या हो उसको चारसे गुणा करके गुणनफलमें सातसे भाग दे तो शेष साधकका धन होता है॥ ५६२॥

(वास्तुभूमि तथा घरके धन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार और अंशके ज्ञानका साधन—)
वास्तुभूमि या घरकी चौड़ाईको लम्बाईसे गुणा करनेपर गुणनफल ‘पद’ कहलाता है। उस (पद)-को (६ स्थानोंमें रखकर) क्रमशः ८, ३, ९, ८,


१. दिशा और वर्ग जाननेका चक्र, यथा—

पूर्व १
८ ईशान<br>शवर्ग<br>शशकपूर्व १<br>अवर्ग<br>गरुड़अग्नि २<br>कवर्ग<br>मार्जार
७ उत्तर<br>यवर्ग<br>गजदक्षिण ३<br>चवर्ग<br>सिंह
६ वायु<br>पवर्ग<br>मूषकपश्चिम ५<br>तवर्ग<br>सर्पनर्ऋत्य ४<br>टवर्ग<br>श्वान

उदाहरण—अवर्ग (अ इ उ ऋ लृ ए ऐ ओ औ)-की पूर्व दिशा और गरुडयोनि है। वहाँसे क्रमशः दिशा गिननेपर पाँचवीं दिशा (पश्चिम)-में तवर्ग और सर्प इस अवर्ग एवं गरुडका शत्रु है। इस प्रकार परस्पर सम्मुख दिशामें शत्रुता होती है। इसी तरह कवर्ग (क ख ग घ ङ)-की दिशा अग्निकोण ओर योनि मार्जार (बिलाव) है। चवर्ग (च छ ज झ ञ)-की दक्षिण दिशा और सिंह योनि है। टवर्ग (ट ठ ड ढ ण)-की नैर्ऋत्य दिशा और श्वान योनि है। तवर्ग (त थ द ध न)-की पश्चिम दिशा और सर्प योनि है। पवर्ग (प फ ब भ म)-की वायुकोण दिशा और मूषक (चूहा) योनि है। यवर्ग (य र ल व)-की उत्तर दिशा और गज (हाथी) योनि है। शवर्ग (श ष स ह)-की ईशान दिशा और शशक (खरगोश) योनि है। इसका प्रयोजन यह है कि अपने-अपने नामके आदि अक्षरसे अपना वर्ग समझकर दिशा और योनिका ज्ञान करे। शत्रु-दिशामें अपने रहनेके लिये घर न बनावे। अर्थात् उस दिशाके घरमें स्वयं वास न करे तथा शत्रुवर्गवाले गाँवमें जाकर वास न करे इत्यादि। इसके सिवा, विशेष प्रयोजन मूलमें कहे गये हैं।

२. उदाहरण—विचार करना है कि ‘जयनारायण’ नामक व्यक्तिको गोरखपुरमें बसने या व्यापार करनेमें किस प्रकारका लाभ होगा? तो साध्य (गोरखपुर)-की वर्ग-संख्या २ के बायें भागमें साधक (जयनारायण)-की वर्ग-संख्या ३ रखनेसे ३२ हुआ। इसमें ८ से भाग देनेपर शून्य अर्थात् ८ बचा, यह साधक (जयनारायण)-का धन हुआ तथा इससे विपरीत वर्ग-संख्या २३को रखकर इसमें ८ का भाग देनेसे शेष ७ बचा। यह साधक (जयनारायण)-का ऋण हुआ। यहाँ ऋण ७ से धन अधिक है; अतः जयनारायणके लिये गोरखपुर निवास करनेयोग्य है—यह सिद्ध हुआ। तात्पर्य यह कि जयनारायणको गोरखपुरमें ८ लाभ और ७ खर्च होता रहेगा।

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३८० * संक्षिप्त नारदपुराण *

९, ६ से गुणा करे और गुणनफलमें क्रमशः १२, ८, ८, २७, ७, ९ से भाग दे। फिर जो शेष बचें, वे क्रमशः धन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार तथा अंश होते हैं। धन अधिक हो तो वह घर शुभ होता है। यदि ऋण अधिक हो तो अशुभ होता है तथा विषम (१, ३, ५, ७) आय शुभ और सम (२, ४, ६, ८) आय अशुभ होता है। घरका जो नक्षत्र हो, वहाँसे अपने नामके नक्षत्रतक गिनकर जो संख्या हो, उसमें ९ से भाग दे। फिर यदि शेष (तारा) ३ बचे तो धनका नाश होता है। ५ बचे तो यशकी हानि होती है और ७ बचे तो गृहकर्ताका ही मरण होता है। घरकी राशि और अपनी राशि गिननेपर परस्पर २, १२ हो तो धनहानि होती है; ९, ५ हो तो पुत्रकी हानि होती है और ६, ८ हो तो अनिष्ट होता है; अन्य संख्या हो तो शुभ समझना चाहिये। सूर्य और मङ्गलके वार तथा अंश हो तो उस घरमें अग्निभय होता है। अन्य वार-अंश हो तो सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी सिद्धि होती है¹ ॥ ५६३-५६७ ॥

(वास्तुपुरुषकी स्थिति—) भादों आदि तीन-तीन मासोंमें क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंकी ओर मस्तक करके बायीं करवटसे सोये हुए महासर्पस्वरूप 'चर' नामक वास्तुपुरुष प्रदक्षिणक्रमसे विचरण करते रहते हैं। जिस समय जिस दिशामें वास्तुपुरुषका मस्तक हो, उस समय उसी दिशामें घरका दरवाजा बनाना चाहिये। मुखसे विपरीत दिशामें घरका दरवाजा बनानेसे रोग, शोक और भय होते हैं। किंतु यदि घरमें चारों दिशाओंमें द्वार हो तो यह दोष नहीं होता है ॥ ५६८-५७० ॥

गृहारम्भकालमें नींवके भीतर हाथभरके गड्ढेमें स्थापित करनेके लिये सोना, पवित्र स्थानकी रेणु (धूलि), धान्य और सेवारसहित ईंट घरके भीतर संग्रह करके रखे। घरकी जितनी लंबाई हो, उसके मध्यभागमें वास्तुपुरुषकी नाभि रहती है। उसके तीन अङ्गुल नीचे (वास्तुपुरुषके पुच्छभागकी ओर) कुक्षि रहती है। उसमें शंकुका न्यास करनेसे पुत्र आदिकी वृद्धि होती है ॥ ५७१-५७२ ॥

(शंकुप्रमाण—) खदिर (खैर), अर्जुन, शाल (शाखू), युगपत्र (कचनार) रक्तचन्दन, पलाश, रक्तशाल, विशाल आदि वृक्षोंसे किसीकी लकड़ीसे शंकु बनता है। ब्राह्मणादि वर्णोंके लिये क्रमशः २४, २३, २० और १६ अंगुलके शंकु होने चाहिये। उस शंकुके बराबर-बराबर तीन भाग करके ऊपरवाले भागमें चतुष्कोण, मध्यवाले भागमें अष्टकोण और नीचेवाले (तृतीय) भागमें बिना कोणका (गोलाकार) उसका स्वरूप होना उचित है। इस प्रकार उत्तम लक्षणोंसे युक्त कोमल और छेदरहित शंकु शुभ दिनमें बनावे। उसको षड्वर्गद्वारा शुद्ध सूत्रसे सूत्रित² भूमि (गृहक्षेत्र)-में मृदु, ध्रुव क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रोंमें, अमावास्या और रिक्ताको छोड़कर अन्य


१. उदाहरण—मान लीजिये, घरकी लंबाई २५ हाथ और चौड़ाई १५ हाथ है तो इनको परस्पर गुणा करनेसे ३७५ यह पद हुआ। इसको ८ से गुणा करनेपर गुणनफल ३००० हुआ। इसमें १२ का भाग देनेपर शेष ० अर्थात् १२ धन हुआ। फिर पदको ३ से गुणा किया तो ११२५ हुआ। इसमें ८ से भाग देकर शेष ५ ऋण हुआ। पुनः पद ३७५ को ९ से गुणा किया तो ३३७५ हुआ। इसमें ८ से भाग देनेपर शेष ७ आय हुआ। इसी तरह पदको ८ से गुणा करनेपर ३००० हुआ। इसमें २७ से भाग दिया तो शेष ३ नक्षत्र हुआ। फिर पदको ९ से गुणा किया तो ३३७५ हुआ। इसमें ७ से भाग देनेपर शेष १ वार हुआ। पुनः पद ३७५ को ६ से गुणा किया तो २२५० हुआ। इसमें ९ से भाग देनेपर शेष ० अर्थात् ९ अंश हुआ। यहाँ सब वस्तुएँ शुभ हैं, केवल वार १ रवि हुआ। इसलिये इस प्रकारके घरमें सब कुछ रहते हुए भी अग्निका भय रहेगा; ऐसा समझना चाहिये; इसलिये ऐसा पद देखकर लेना चाहिये, जिसमें सर्वथा शुभ हो।

२. पूर्वोक्त आय और षड्वर्गादिसे शोधित गृहके चारों ओरकी लंबाई-चौड़ाईके प्रमाण-तुल्य सूत्रसे घिरी हुई भूमिको ही यहाँ सूत्रित कहा है।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३८१

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३८१

तिथियोंमें, रविवार, मङ्गलवार तथा चर लग्नको छोड़कर अन्य वारों और अन्य (स्थिर या द्विस्वभाव) लग्नोंमें, जब पापग्रह लग्नमें न हो, अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हो; शुभ राशि लग्न हो और उसमें शुभ नवमांश हो, उस लग्नमें शुभग्रहका संयोग या दृष्टि हो; ऐसे समय (सुलग्न)-में ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन कराते हुए माङ्गलिक वाद्य और सौभाग्यवती स्त्रियोंके मङ्गलगीत आदिके साथ मुहूर्त बतानेवाले दैवज्ञ (ज्योतिषके विद्वान् ब्राह्मण) के पूजन (सत्कार)-पूर्वक कुक्षिस्थानमें शंकुकी स्थापना करे। लग्नसे केन्द्र और त्रिकोणमें शुभ ग्रह तथा ३, ६, ११ में पापग्रह और चन्द्रमा हो तो यह शंकुस्थापन श्रेष्ठ है॥५७३—५७९½॥

घरके छः भेद होते हैं—१-एकशाला, २-द्विशाला, ३-त्रिशाला, ४-चतुश्शाला, ५-सप्तशाला तथा ६- दशशाला। इन छहों शालाओंमेंसे प्रत्येकके १६ भेद होते हैं। उन सब भेदोंके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—१-ध्रुव, २-धान्य, ३-जय, ४-नन्द, ५-खर, ६-कान्त, ७-मनोरम, ८ सुमुख, ९ दुर्मुख, १० क्रूर, ११ शत्रुद, १२ स्वर्णद, १३ क्षय, १४ आक्रन्द, १५ विपुल और १६ वाँ विजय नामक गृह होता है। चार अक्षरोंके प्रस्तारके भेदसे क्रमशः इन गृहोंकी गणना करनी चाहिये॥५८०—५८२½॥

(प्रस्तारभेद—) प्रथम ४ गुरु (ऽ) चिह्न लिखकर उनमें प्रथम गुरुके नीचे लघु (।) चिह्न लिखे। फिर आगे जैसा ऊपर हो उसी प्रकारके गुरु या लघु चिह्न लिखना चाहिये। फिर उसके नीचे (तीसरी पङ्क्तिमें) प्रथम गुरु चिह्नके नीचे लघु चिह्न लिखकर आगे (दाहिने भागमें) जैसे ऊपर गुरु या लघु हो वैसा ही चिह्न लिखे तथा पीछे (बायें भागमें) गुरु चिह्नसे पूरा करे। इसी प्रकार पुनः-पुनः तबतक लिखता जाय जबतक कि पंक्ति (प्रस्तार)-में सब चिह्न लघु न हो जाय। इस प्रकार चार दिशा होनेके कारण ४ अक्षरोंसे १६ भेद होते हैं। प्रत्येक भेदमें चारों चिह्नोंको प्रदक्षिणक्रमसे पूर्व आदि दिशा समझकर जहाँ-जहाँ लघु चिह्न पड़े, वहाँ-वहाँ घरका द्वार और अलिन्द (द्वारके आगेका भाग=चबूतरा) बनाना चाहिये। इस प्रकार पूर्वादि दिशाओंमें अलिन्दके भेदोंसे १६ प्रकारके घर होते हैं*॥५८३-५८४½॥

१.प्रस्तारस्वरूप—

संख्यास्वरूप: पूर्व,स्वरूप: दक्षिण,स्वरूप: पश्चिम,स्वरूप: उत्तरनामद्वारकी दिशा
१ऽऽऽऽध्रुवऊर्ध्व (ऊपर)
२।ऽऽऽधान्यपूर्व
३ऽ।ऽऽजयदक्षिण
४।।ऽऽनन्दपूर्व-दक्षिण
५ऽऽ।ऽखरपश्चिम
६।ऽ।ऽकान्तपूर्व-पश्चिम
७ऽ।।ऽमनोरमदक्षिण-पश्चिम
८।।।ऽसुमुखपूर्व-दक्षिण-पश्चिम
९ऽऽऽ।दुर्मुखउत्तर
१०।ऽऽ।क्रूरपूर्व-उत्तर
११ऽ।ऽ।शत्रुददक्षिण-उत्तर
१२।।ऽ।स्वर्णदपूर्व-दक्षिण-उत्तर
१३ऽऽ।।क्षयपश्चिम-उत्तर
१४।ऽ।।आक्रन्दपूर्व-पश्चिम-उत्तर
१५ऽ।।।विपुलदक्षिण-पश्चिम-उत्तर
१६।।।।विजयपूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तर
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३८२* संक्षिप्त नारदपुराण *

वास्तुभूमिकी पूर्वदिशामें स्नानगृह, अग्निकोणमें पाकगृह (रसोईघर), दक्षिणमें शयनगृह, नैर्ऋत्यकोणमें शस्त्रागार, पश्चिममें भोजनगृह, वायुकोणमें धन-धान्यादि रखनेका घर, उत्तरमें देवताओंका गृह और ईशानकोणमें जलका गृह (स्थान) बनाना चाहिये तथा आग्नेयकोणसे आरम्भ करके उक्त दो-दो घरोंके बीच क्रमशः मन्थन (दूध-दहीसे घृत निकालने)-का, घृत रखनेका, पैखानेका, विद्याभ्यासका, स्त्रीसहवासका, औषधका और शृङ्गारकी सामग्री रखनेका घर बनाना शुभ कहा गया है। अतः इन सब घरोंमें उन-उन सब वस्तुओंको रखना चाहिये॥ ५८५—५८८ १/२ ॥

(आयोंने नाम और दिशा—) पूर्वादि आठ दिशाओंमें क्रमसे ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृक्ष, खर (गदहा), गज और ध्वांक्ष (काक)—ये आठ आय होते हैं॥ ५८९ १/२ ॥

(घरके समीप निन्द्य वृक्ष—) पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा तथा काँटेवाले और दुग्धवाले सब वृक्ष, पीपल, कपित्थ (कैथ), अगस्त्य वृक्ष, सिन्धुवार (निर्गुण्डी) और इमली—ये सब वृक्ष घरके समीप निन्दित कहे गये हैं। विशेषतः घरके दक्षिण और पश्चिम-भागमें ये सब वृक्ष हों तो धन आदिका नाश करनेवाले होते हैं॥ ५९०—५९१ १/२ ॥

(गृह-प्रमाण—) घरके स्तम्भ (खम्भे) घरके पैर होते हैं। इसलिये वे समसंख्या (४, ६, ८ आदि)-में होनेपर ही उत्तम कहे गये हैं; विषम संख्यामें नहीं। घरको न तो अधिक ऊँचा ही करना चाहिये, न अधिक नीचा ही। इसलिये अपनी इच्छा (निर्वाह)-के अनुसार भित्ति (दीवार) की ऊँचाई करनी चाहिये। घरके ऊपर जो घर (दूसरा मंजिल) बनाया जाता है, उसमें भी इस प्रकारका विचार करना चाहिये। घरोंकी ऊँचाईके प्रमाण आठ प्रकारके कहे गये हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—१-पाञ्चाल, २-वैदेह, ३-कौरव, ४-कुजन्यक¹, ५-मागध, ६-शूरसेन, ७ गान्धार और ८ आवन्तिक।

जहाँ घरकी ऊँचाई उसकी चौड़ाईसे सवागुनी अधिक होती है, वह भूतलसे ऊपरतकका पाञ्चालमान कहलाता है, फिर उसी ऊँचाईको उत्तरोत्तर सवागुनी बढ़ानेसे वैदेह आदि सब मान होते हैं। इनमें पाञ्चालमान तो सर्वसाधारण जनोंके लिये शुभ है। ब्राह्मणोंके लिये आवन्तिकमान, क्षत्रियोंके लिये गान्धारमान तथा वैश्योंके लिये कौजन्यमान है। इस प्रकार ब्राह्मणादि वर्णोंके लिये यथोत्तर गृहमान समझना चाहिये तथा दूसरे मंजिल और तीसरे मंजिलके मकानमें भी पानीका बहाव पहले बताये अनुसार ही बनाना चाहिये²॥ ५९२—५९८॥

(घरमें प्रशस्त आय—) ध्वज अथवा गज आयमें ऊँट और हाथीके रहनेके लिये घर बनवावे तथा अन्य सब पशुओंके घर भी उसी (ध्वज और गज) आयमें बनाने चाहिये। द्वार, शय्या, आसन, छाता और ध्वजा—इन सबोंके निर्माणके लिये सिंह, वृष अथवा ध्वज आय होने चाहिये॥ ५९९ १/२ ॥

अब मैं नूतनगृहमें प्रवेशके लिये वास्तुपूजाकी विधि बताता हूँ—घरके मध्यभागमें तन्दुल (चावल)-पर पूर्वसे पश्चिमकी ओर एक-एक हाथ लम्बी दस रेखाएँ खींचे। फिर उत्तरसे दक्षिणकी ओर भी उतनी ही लम्बी-चौड़ी दस रेखाएँ बनावे। इस प्रकार उसमें बराबर-बराबर ८१ पद (कोष्ठ) होते हैं। उनमें आगे बताये जानेवाले ४५ देवताओंका यथोक्त स्थानमें नामोल्लेख करे। बत्तीस देवता बाहर (प्रान्तके कोष्ठोंमें) और तेरह देवता भीतर


१. मूलमें 'कुजन्यकम्' पाठ है; परंतु कुजन्य कोई प्रसिद्ध देश नहीं है; इसलिये प्रतीत होता है कि यहाँ 'कान्यकुब्जकम्' के स्थानमें 'कुब्जकन्यकम्' था। फिर लेखकादिके दोषसे 'कुजन्यकम्' हो गया है।
२. पूर्व या उत्तर प्लवभूमिमें घर बनाना प्रशस्त कहा गया है। यदि नीचेके तल्लेमें पूर्व दिशामें जलस्राव हो तो ऊपरके मंजिलमें भी पूर्व दिशामें ही जलस्राव होना चाहिये।

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | ३८३
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पूजनीय होते हैं। उन ४५ देवताओंके स्थान और नामका क्रमशः वर्णन करता हूँ। किनारेके बत्तीस कोष्ठोंमें ईशान कोणसे आरम्भ करके क्रमशः बत्तीस देवता पूज्य हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं-कृपीट योनि (अग्नि) १, पर्जन्य २, जयन्त, ३, इन्द्र ४, सूर्य ५, सत्य ६, भृश ७, आकाश ८, वायु ९, पूषा १०, अनृत (वितथ) ११, गृहक्षत^१ १२, यम १३, गन्धर्व १४, भृङ्गराज १५, मृग १६, पितर १७, दौवारिक १८, सुग्रीव १९, पुष्प-दन्त २०, वरुण २१, असुर २२, शेष २३, राजयक्ष्मा^२ २४, रोग २५, अहि २६, मुख्य २७, भल्लाटक २८, सोम २९, सर्प ३०, अदिति ३१ और दिति ३२,- ये चारों किनारोंके देवता हैं। ईशान, अग्नि, नैर्ऋत्य और वायुकोणके देवोंके समीप क्रमशः आप ३३, सावित्र ३४, जय ३५, तथा रुद्र ३६ के पद हैं। ब्रह्माके चारों ओर पूर्व आदि आठों दिशाओंमें क्रमशः अर्यमा ३७, सविता ३८, विवस्वान् ३९, विबुधाधिप ४०, मित्र ४१, राजयक्ष्मा ४२, पृथ्वीधर ४३, आपवत्स ४४ हैं और मध्यके नव पदोंमें (४५) ब्रह्माजीको स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार सब पदोंमें ये पैंतालीस देवता पूजनीय होते हैं। जैसे ईशान-कोणमें आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि और दिति-ये पाँच देव एकपद होते हैं, उसी प्रकार अन्य कोणोंके पाँच-पाँच देवता भी एक-पदके भागी हैं। अन्य जो बाह्य-पङ्क्तिके (जयन्त, इन्द्र आदि) बीस देवता हैं, वे सब द्विपद (दो-दो पदोंके भागी) हैं तथा ब्राह्मसे पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशामें जो अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर-ये चार देवता हैं, वे त्रिपद (तीन-तीन पदोंके भागी) हैं, अतः वास्तु-विधिके ज्ञाता विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ब्रह्माजीसहित इन एकपद्, द्विपद तथा त्रिपद देवताओंका वास्तुमन्त्रों-द्वारा दूर्वा, दही, अक्षत, फूल, चन्दन, धूप, दीप और नैवेद्यादिसे विधिवत् पूजन करे। अथवा ब्राह्ममन्त्रसे आवाहनादि षोडश (या पञ्च) उपचारोंद्वारा उन्हें दो श्वेत वस्त्र समर्पित करे^३॥६००-६१३॥


१-२. अन्य संहिताओंमें १२ वाँ बृहत्क्षत; २४ वाँ पापयक्ष्मा कहा गया है।
३. एकाशीतिपद वास्तुचक्र-

शिखी १पर्जन्य २जयन्त ३इन्द्र ४सूर्य ५सत्य ६भृश ७आकाश ८वायु ९
दिति ३२आप ३३जयन्तइन्द्रसूर्यसत्यभृशसावित्र ३४पूषा १०
अदिति ३१अदिति४४ आपवत्सअर्यमा३७ अर्यमाअर्यमा३८ सवितावितथवितथ ११
सर्प ३०सर्पपृथ्वीधरविवस्वान्गृहक्षतगृहक्षत १२
सोम २९सोमपृथ्वीधर ४३४५ ब्रह्माविवस्वान् ३९यमयम १३
भल्लाटक २८भल्लाटकपृथ्वीधरविवस्वान्गन्धर्वगन्धर्व १४
मुख्य २७मुख्यराजयक्ष्मा ४२मित्रमित्र ४१मित्रविबुधाधिप ४०भृङ्गभृङ्ग १५
अहि २६रुद्र ३६शेषअसुरवरुणपुष्पदन्तसुग्रीवजय ३५मृग १६
रोग २५राजयक्ष्मा २४शेष २३असुर २२वरुण २१पुष्पदन्त २०सुग्रीव १९दौवारिक १८पितर १७
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३८४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

नैवेद्यमें तीन प्रकारके (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य) अन्न माङ्गलिक गीत और वाद्यके साथ अर्पण करे। अन्तमें ताम्बूल (पान-सोपारी) अर्पण करके वास्तुपुरुषकी इस प्रकार प्रार्थना करे॥ ६१४ ॥

वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्यानिरत प्रभो।
मद्गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा॥

‘भूमिशय्यापर शयन करनेवाले वास्तुपुरुष! आपको मेरा नमस्कार है। प्रभो! आप मेरे घरको धन-धान्य आदिसे सम्पन्न कीजिये।’

इस प्रकार प्रार्थना करके देवताके समक्ष पूजा करानेवाले (पुरोहित)-को यथाशक्ति दक्षिणा दे तथा अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें भी दक्षिणा दे। जो मनुष्य सावधान होकर गृहारम्भ या गृहप्रवेशके समय इस विधिसे वास्तुपूजा करता है, वह आरोग्य, पुत्र, धन और धान्य प्राप्त करके सुखी होता है। जो मनुष्य वास्तुपूजा न करके नये घरमें प्रवेश करता है, वह नाना प्रकारके रोग, क्लेश और संकट प्राप्त करता है॥ ६१५-६१८॥

जिसमें किंवाड़ें न लगी हों, जिसे ऊपरसे छत आदिके द्वारा छाया न गया हो तथा जिसके लिये (पूर्वोक्त रूपसे वास्तुपूजन करके) देवताओंको बलि (नैवेद्य) और ब्राह्मण आदिको भोजन न दिया गया हो, ऐसे नूतन गृहमें कभी प्रवेश न करे; क्योंकि वह विपत्तियोंकी खान (स्थान) होता है॥ ६१९॥

(यात्रा-प्रकरण—) अब मैं जिस प्रकारसे यात्रा करनेपर वह राजा तथा अन्य जनोंके लिये अभीष्ट फलकी सिद्धि करानेवाली होती है, उस विधिका वर्णन करता हूँ। जिनके जन्म-समयका ठीक-ठीक ज्ञान है, उन राजाओं तथा अन्य जनोंको उस विधिसे यात्रा करनेपर उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जिन मनुष्योंका जन्मसमय अज्ञात है, उनको तो घुणाक्षर* न्यायसे ही कभी फलकी प्राप्ति हो जाती है, तथापि उनको भी प्रश्नलग्नसे तथा निमित्त और शकुन आदिद्वारा शुभाशुभ देखकर यात्रा करनेसे अभीष्ट फलका लाभ होता है॥ ६२०-६२१॥

(यात्रामें निषिद्धि तिथियाँ—) षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा और शुक्लपक्षकी प्रतिपदा—इन तिथियोंमें यात्रा करनेसे दरिद्रता तथा अनिष्टकी प्राप्ति होती है॥ ६२२॥

(विहित नक्षत्र—) अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, रेवती, अश्विनी, श्रवण, पुष्य और धनिष्ठा—इन नक्षत्रोंमें यदि अपने जन्म-नक्षत्रसे सातवीं, पाँचवीं और तीसरी तारा न हो तो यात्रा अभीष्ट फलको देनेवाली होती है॥ ६२३॥

(दिशाशूल—) शनि और सोमवारके दिन पूर्व दिशाकी ओर न जाय, गुरुवारको दक्षिण न जाय, शुक्र और रविवारको पश्चिम न जाय तथा बुध और मङ्गलको उत्तर दिशाकी यात्रा न करे॥ ६२४॥ ज्येष्ठा, पूर्वभाद्रपद, रोहिणी और उत्तराफाल्गुनी—ये नक्षत्र क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशामें शूल होते हैं।

(सर्वदिग्गमन नक्षत्र—) अनुराधा, हस्त, पुष्य और अश्विनी—ये चार नक्षत्र सब दिशाओंकी यात्रामें प्रशस्त हैं॥ ६२५॥

(दिग्द्वार-नक्षत्र—) कृत्तिकासे आरम्भ करके सात-सात नक्षत्रसमूह पूर्वादि दिशाओंमें रहते हैं। तथा अग्निकोणसे वायुकोणतक परिघदण्ड रहता है; अतः इस प्रकार यात्रा करनी चाहिये,


* जैसे घुन (कीटविशेष) काठको खोदता रहता है तो उससे कहीं अकारादि अक्षरका स्वरूप अकस्मात् बन जाता है; उसी प्रकार जो अपने जन्मसमयसे अपरिचित हैं, वे लग्न आदिको न जानकर भी यात्रा करते-करते कभी संयोगवश शुभ फलके भागी हो जाते हैं।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
    ३८५

जिससे परिघदण्डका लङ्घन न हो^१ ॥ ६२६ ॥
पूर्वके नक्षत्रोंमें अग्निकोणकी यात्रा करे। इसी प्रकार दक्षिणके नक्षत्रोंमें अग्निकोण तथा पश्चिम और उत्तरके नक्षत्रोंमें वायुकोणकी यात्रा कर सकते हैं।

(दिशाओंकी राशियाँ—) पूर्व आदि चार दिशाओंमें मेष आदि १२ राशियाँ पुनः पुनः (तीन आवृत्तिसे) आती हैं^२॥ ६२७॥

(लालाटिकयोग—) जिस दिशामें यात्रा करनी हो, उस दिशाका स्वामी ललाटगत (सामने) हो तो यात्रा करनेवाला लौटकर नहीं आता है। पूर्व दिशामें यात्रा करनेवालेको लग्नमें यदि सूर्य हो तो वह ललाटगत माना जाता है। यदि शुक्र लग्नसे ग्यारहवें या बारहवें स्थानमें हों तो अग्निकोणमें यात्रा करनेसे, मङ्गल दशम भावमें हो तो दक्षिणयात्रा करनेसे, राहु नवें और आठवें भावमें हो तो नैर्ऋत्य कोणकी यात्रासे, शनि सप्तम भावमें हो तो पश्चिम-यात्रासे, चन्द्रमा पाँचवें और छठे भावमें हो तो वायुकोणकी यात्रासे, बुध चतुर्थ भावमें हो तो उत्तरकी यात्रासे, गुरु तीसरे और दूसरे भावमें हो तो ईशानकोणकी यात्रा करनेसे ललाटगत होते हैं। जो मनुष्य जीवनकी इच्छा रखता हो, वह इस ललाटयोगको त्यागकर यात्रा करे ॥ ६२८-६३२ ॥

लग्नमें वक्रगति ग्रह या उसके षड्वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करनेवाले राजाओंकी पराजय होती है॥ ६३३ ॥

जब जिस अयन^३ में सूर्य और चन्द्रमा दोनों हों, उस समय उस दिशाकी यात्रा शुभ फल देनेवाली होती है। यदि दोनों भिन्न अयनमें हों तो जिस अयनमें सूर्य हों उधर दिनमें तथा जिस अयनमें चन्द्रमा हों उधर रात्रिमें यात्रा शुभ होती है। अन्यथा यात्रा करनेसे यात्रीकी पराजय होती है॥ ६३४॥


१. पूर्व नक्षत्रमें पश्चिम या दक्षिण जानेसे परिघदण्डका लङ्घन होगा। चक्र देखिये—
(पूर्व)

कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा
भरणी <br> अश्विनी <br> रेवती <br> उत्तरभाद्रपद <br> पूर्वभाद्रपद <br> शतभिषा <br> धनिष्ठामघा <br> पूर्वफाल्गुनी <br> उत्तराफाल्गुनी <br> हस्त <br> चित्रा <br> स्वाती <br> विशाखा
परिघदण्ड
श्रवण, अभिजित्, उत्तराषाढ़, पूर्वाषाढ़, मूल, ज्येष्ठा, अनुराधा,

२. दिग्‌राशिबोधक चक्र—
(पूर्व)

मेष, १सिंह, ५धनु, ९,
मीन १२<br>वृश्चिक ८<br>कर्क ४२ वृष<br>६ कन्या<br>१० मकर
कुम्भ ११तुला ७मिथुन ३

३. मकरसे ६ राशि उत्तरायण है। इनमें सूर्य-चन्द्रमा हों तो उत्तरकी यात्रा शुभ होती है, क्योंकि दोनों सम्मुख होते हैं। इससे सिद्ध होता है कि यदि सूर्य और चन्द्रमा दाहिने भागमें पड़ें तो भी यात्रा शुभ हो सकती है। इसलिये उस समय पश्चिम-यात्रा भी शुभ ही समझनी चाहिये एवं कर्कसे छः राशि दक्षिणायन समझें।

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३८६* संक्षिप्त नारदपुराण *

(शुक्रदोष—) शुक्र अस्त हों तो यात्रामें हानि होती है। यदि वह सम्मुख हो तो यात्रा करनेसे पराजय होती है। सम्मुख शुक्रके दोषको कोई भी ग्रह नहीं हटा सकता है। किंतु वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भरद्वाज और गौतम—इन पाँच गोत्रवालोंको सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है। यदि एक ग्रामके भीतर ही यात्रा करनी हो या विवाहमें जाना हो या दुर्भिक्ष होनेपर अथवा राजाओंमें युद्ध होनेपर तथा राजा या ब्राह्मणोंका कोप होनेपर कहीं जाना पड़े तो इन अवस्थाओंमें सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है। शुक्र यदि नीच राशिमें या शत्रुराशिमें अथवा वक्रगति या पराजित* हो तो यात्रा करनेवालोंकी पराजय होती है। यदि शुक्र अपनी उच्चराशि (मीन)-में हो तो यात्रामें विजय होती है॥ ६३५-६३८॥

अपने जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या लग्नमें तथा शत्रुकी राशिसे छठी राशिमें या लग्नमें अथवा इन सबोंके स्वामी जिस राशिमें हों, उस लग्न या राशिमें यात्रा करनेवालेकी मृत्यु होती है। परंतु यदि जन्मलग्नराशिपति और अष्टम राशिपतिमें परस्पर मैत्री हो तो उक्त अष्टमराशिजन्य दोष स्वयं नष्ट हो जाता है॥ ६३९-६४०॥

द्विस्वभाव लग्न यदि पापग्रहसे युक्त या दृष्ट हो तो यात्रामें पराजय होती है तथा स्थिर राशि पापग्रहसे युक्त न हो तो वह यात्रालग्नमें अशुभ है। यदि स्थिर राशिलग्नमें शुभग्रहका योग या दृष्टि हो तो शुभ फल होता है॥ ६४१॥

धनिष्ठा नक्षत्रके उत्तरार्धसे आरम्भ करके (रेवतीपर्यन्त) पाँच नक्षत्रोंमें गृहार्थ तृण-काष्ठोंका संग्रह, दक्षिणकी यात्रा, शय्या (तकिया, पलङ्ग आदि)-का बनाना, घरको छवाना आदि कार्य नहीं करने चाहिये॥ ६४२॥

यदि यात्रालग्नमें जन्मलग्न, जन्मराशि या इन दोनोंके स्वामी हों अथवा जन्मलग्न या जन्मराशिसे ३, ६, ११, १० वीं राशि हो तो शत्रुओंका नाश होता है॥ ६४३॥

यदि शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुम्भ) तथा दिग्द्वार (यात्राकी दिशा)-की राशि लग्नमें हो अथवा किसी भी लग्नमें शुभग्रहके वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुओंका नाश होता है॥ ६४४॥

शत्रुके जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या उन दोनोंके स्वामी जिस राशिमें हों वह राशि यात्रालग्नमें हो तो शत्रुता नाश होता है॥ ६४५॥

मीन लग्नमें या लग्नगत मीनके नवमांशमें यात्रा करनेसे मार्ग (रास्ता) टेढ़ा हो जाता है। (अर्थात् बहुत घूमना पड़ता है।) तथा कुम्भलग्न और लग्नगत कुम्भका नवमांश भी यात्रामें अत्यन्त निन्दित है॥ ६४६॥

जलचर राशि (कर्क, मीन) या जलचर राशिका नवमांश लग्नमें हो तो नौकाद्वारा नदी-नद आदि मार्गसे यात्रा शुभ होती है॥ ६४६ १/२॥

(लग्नभावोंकी संज्ञा—) १- मूर्ति (तन), २-कोष (धन), ३-धन्वी (पराक्रम, भ्राता), ४-वाहन (सवारी, माता), ५-मन्त्र (विद्या, संतान), ६-शत्रु (रोग, मामा), ७-मार्ग (यात्रा, पति-पत्नी), ८-आयु (मृत्यु), ९-मन (अन्तःकरण, भाग्य), १०-व्यापार (व्यवसाय, पिता), ११- प्राप्ति (लाभ), १२- अप्राप्ति (व्यय)—ये क्रमसे लग्न आदि १२ स्थानोंकी संज्ञाएँ हैं॥ ६४७-६४८॥

पापग्रह (शनि, रवि, मङ्गल, राहु तथा केतु—ये) तीसरे और ग्यारहवेंको छोड़कर अन्य सब


* जब मङ्गलादि ग्रहोंमें किन्हीं दो ग्रहोंकी एक राशिमें अंशकला बराबर हो तो दोनोंमें युद्ध समझा जाता है। उन दोनोंमें जो उत्तर रहता है, वह विजयी तथा दक्षिण रहनेवाला पराजित होता है।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३८७

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३८७

भावोंमें जानेसे भावफलको नष्ट कर देते हैं²। तीसरे और ग्यारहवें भावमें जानेसे वे इन दोनों भावोंको पुष्ट करते हैं। सूर्य और मङ्गल ये दोनों दशम भावको भी नष्ट नहीं करते, अपितु दशम भावमें जानेसे उस भावफल (व्यापार, पिता, राज्य तथा कर्म)- को पुष्ट ही करते हैं और शुभग्रह (चन्द्र, बुध, गुरु तथा शुक्र) जिस भावमें जाते हैं, उस भावफलको पुष्ट ही करते हैं; केवल षष्ठ (६) भावमें जानेसे उस भावफल (शत्रु और रोग)-को नष्ट करते हैं॥६४९॥ शुभ ग्रहोंमें शुक्र सप्तम भावको और चन्द्रमा लग्न एवं अष्टम (१, ८) को पुष्ट नहीं करते हैं। (अपितु नष्ट ही करते हैं।)

( अभिजित्-प्रशंसा— ) अभिजित् मुहूर्त (दिनका मध्यकाल = १२ बजेसे १ घड़ी आगे और १ घड़ी पीछे) अभीष्ट फल सिद्ध करनेवाला योग है। यह दक्षिण दिशाकी यात्रा छोड़कर अन्य दिशाओंकी यात्रामें शुभ फल देता है। इस (अभिजित् मुहूर्त)-में पञ्चाङ्ग (तिथि-वारादि) शुभ न हो तो भी यात्रामें वह उत्तम फल देनेवाला होता है॥६५०-६५१॥

( यात्रा-योग— ) लग्न और ग्रहोंकी स्थितिसे नाना प्रकारके यात्रा-योग होते हैं। अब उन योगोंका वर्णन करता हूँ, क्योंकि राजाओं (क्षत्रियौं)- को योगबलसे ही अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। ब्राह्मणोंको नक्षत्रबलसे तथा अन्य मनुष्योंको मुहूर्तबलसे इष्टसिद्धि होती है। तस्करोंको शकुनबलसे अपने अभीष्टकी प्राप्ति होती है॥६५२ १/२॥ शुक्र, बुध और बृहस्पति—इन तीनमेंसे कोई भी यदि केन्द्र या त्रिकोणमें हो तो 'योग' कहलाता है। यदि उनमेंसे दो ग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो 'अधियोग' कहलाता है तथा यदि तीनों लग्नसे केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (९, ५)-में हों तो योगाधियोग कहलाता है॥६५३ १/२॥ योगमें यात्रा करनेवालोंका कल्याण होता है। अधियोगमें यात्रा करनेसे विजय प्राप्त होती है और योगाधियोगमें यात्रा करनेवालेको कल्याण, विजय तथा सम्पत्तिका भी लाभ होता है॥६५४ १/२॥ लग्नसे दसवें स्थानमें चन्द्रमा, षष्ठ स्थानमें शनि और लग्नमें सूर्य हों तो इस समयमें यात्रा करनेवाले राजाको विजय तथा शत्रुंकी सम्पत्ति भी प्राप्त होती है॥६५५ १/२॥ शुक्र, रवि, बुध, शनि और मङ्गल—ये पाँचों ग्रह क्रमसे लग्न चतुर्थ, सप्तम, तृतीय और षष्ठ भावमें हों तो यात्रा करनेवाले राजाके सम्मुख आये हुए शत्रुगण आगमें पड़ी हुई लाहकी भाँति नष्ट हो जाते हैं॥६५६ १/२॥ बृहस्पति लग्नमें और अन्य ग्रह यदि दूसरे और ग्यारहवें भावमें हों तो इस योगमें यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुओंकी सेना यमराजके घर पहुँच जाती है॥६५७ १/२॥ यदि लग्नमें शुक्र, ग्यारहवेंमें रवि और चतुर्थ भावमें चन्द्रमा हो तो इस योगमें यात्रा करनेवाला राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे हाथियोंके झुंडको सिंह॥६५८ १/२॥

अपने उच्च (मीन)-में स्थित शुक्र लग्नमें हो अथवा अपने उच्च (वृष)-का चन्द्रमा लाभ (११) भावमें स्थित हो तो यात्रा करनेवाला नरेश अपने शत्रुंकी सेनाको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे भगवान् श्रीकृष्णने पूतनाको नष्ट किया था॥६५९ १/२) यदि यात्राके समय शुभग्रह केन्द्रमें या त्रिकोणमें हों तथा पापग्रह तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थानमें हों तो यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुकि लक्ष्मी अभिसारिकाकी भाँति उसके समीप आ जाती है॥६६० १/२॥ गुरु, रवि और चन्द्रमा—ये क्रमशः लग्न, ६ और ८ में हों तो यात्रा करनेवाले राजाके सामने दुर्जनोंकी मैत्रीके समान शत्रुओंकी सेना नहीं ठहरती है॥६६१ १/२॥ यदि लग्नसे ३, ६, ११ में पापग्रह हों और शुभ-ग्रह बलवान् होकर


२. जैसे पापग्रह लग्न (तनुभाव)-में रहता है तो शरीरमें कष्ट-पीड़ा देता है तथा धन-भावमें धनका नाश करता है। किंतु जब तीसरेमें रहता है तो पराक्रमको और ग्यारहवें रहता है तो लाभको पुष्ट करता है।

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३८८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


अपने उच्चादि स्थानमें (स्थित) हों तो शत्रुको भूमि यात्रा करनेवाले राजाके हाथमें आ जाती है॥ ६६२ १/२॥ अपने उच्च (कर्क)-में स्थित बृहस्पति यदि लग्नमें हों और चन्द्रमा ११ भावमें स्थित हों तो यात्रा करनेवाला नरेश अपने शत्रुको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे त्रिपुरासुरको श्रीशिवजीने नष्ट किया था॥ ६६३ १/२ ॥ शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ) राशिमें स्थित शुक्र यदि लग्नमें हों और गुरु ग्यारहवें स्थानमें हों तो यात्रा करनेवाला पुरुष तारकासुरको कार्तिकेयकी भाँति अपने शत्रुको नष्ट कर देता है॥ ६६४ १/२ ॥ गुरु लग्नमें और शुक्र किसी केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो यात्री नरेश अपने शत्रुओंको वैसे ही भस्म कर देता है, जैसे वनको दावानल॥ ६६५ १/२॥ यदि बुध लग्नमें और अन्य शुभग्रह किसी केन्द्रमें हों तथा नक्षत्र भी अनुकूल हो तो उसमें यात्रा करनेवाला राजा अपने शत्रुओंको वैसे ही सोख लेता है, जैसे सूर्यकी किरणें ग्रीष्म-ऋतुमें क्षुद्र नदियोंको सोख लेती है॥ ६६६ १/२॥ सम्पूर्ण शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तथा सूर्य या चन्द्रमा ग्यारहवें भावमें स्थित हों तो यात्रा करनेवाला नरेश अन्धकारको सूर्यकी भाँति अपने शत्रुको नष्ट कर देता है॥ ६६७ १/२ ॥

शुभग्रह यदि अपनी राशिमें स्थित होकर केन्द्र (१, ४, ७, १०), त्रिकोण (५, ९) तथा आय (११) भावमें हो तो यात्रा करनेवाला राजा रूईको अग्निके समान अपने शत्रुओंको जलाकर भस्म कर देता है॥ ६६८ १/२) चन्द्रमा दसवें भावमें और बृहस्पति केन्द्रमें हों तो उसमें यात्रा करनेवाला राजा अपने सम्पूर्ण शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे प्रणवसहित पञ्चाक्षर-मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) पाप-समूहका नाश कर देता है॥ ६६९ १/२ ॥ अकेला शुक्र भी यदि वर्गोत्तम नवमांशगत लग्नमें स्थित हो तो उसमें भी यात्रा करनेसे राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे पापोंको श्रीभगवान्‌का स्मरण॥ ६७० १/२॥ शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तथा चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांशमें हो तो यात्रा करनेसे राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार सपरिवार नष्ट करता है, जैसे इन्द्र पर्वतोंको॥ ६७१ १/२ ॥ बृहस्पति अथवा शुक्र अपने मित्रकी राशिमें होकर केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो ऐसे समयमें यात्रा करनेवाला भूपाल सर्पोंको गरुड़के समान अपने शत्रुओंको अवश्य नष्ट कर देता है॥ ६७२ १/२ ॥ यदि एक भी शुभग्रह वर्गोत्तम नवमांशमें स्थित होकर केन्द्रमें हो तो यात्रा करनेवाला नरेश पाप-समूहोंको गङ्गाजीके समान अपने शत्रुओंको क्षणभरमें नष्ट कर देता है॥ ६७३ १/२॥ जो राजा शत्रुओंको जीतनेके लिये उपर्युक्त राजयोगोंमें यात्रा करता है, उसका कोपानल शत्रुओंकी स्त्रियोंके अश्रुजलसे शान्त होता है॥ ६७४ १/२॥ आश्विन मासके शुक्लपक्षकी दशमी तिथि 'विजया' कहलाती है। उसमें जो यात्रा करता है, उसे अपने शत्रुओंपर विजय प्राप्त होती है अथवा शत्रुओंसे सन्धि (मेल) हो जाती है। किसी भी दशामें उसकी पराजय नहीं होती है॥ ६७५ १/२ ॥

(मनोजय-प्रशंसा—) यात्रा आदि सभी कार्योंमें निमित्त और शकुन आदि (लग्न एवं ग्रहयोग)-की अपेक्षा भी मनोजय (मनको वशमें तथा प्रसन्न रखना) प्रबल है। इसलिये मनस्वी पुरुषोंके लिये यत्नपूर्वक फलसिद्धिमें मनोजय ही प्रधान कारण होता है॥ ६७६ १/२ ॥

(यात्रामें प्रतिबन्ध—) यदि घरमें उत्सव, उपनयन, विवाह, प्रतिष्ठा या सूतक उपस्थित हो तो जीवनकी इच्छा रखनेवालोंको बिना उत्सवको समाप्त किये यात्रा नहीं करनी चाहिये॥ ६७७ १/२)

(यात्रामें अपशकुन—) यात्राके समय यदि परस्पर दो भैंसों या चूहोंमें लड़ाई हो, स्त्रीसे कलह हो या स्त्रीका मासिक धर्म हुआ हो, वस्त्र आदि शरीरसे खिसककर गिर पड़े, किसीपर क्रोध हो जाय या मुखसे दुर्वचन कहा गया हो

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* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३८९


तो उस दशामें राजाको यात्रा नहीं करनी चाहिये॥ ६७८ १/२ ॥

(दिशा, वार तथा नक्षत्र दोहद*—) यदि राजा घृतमिश्रित अन्न खाकर पूर्व दिशाकी यात्रा करे, तिलचूर्ण मिलाया हुआ अन्न खाकर दक्षिण दिशाको जाय और घृतमिश्रित खीर खाकर उत्तर दिशाकी यात्रा करे तो निश्चय ही वह शत्रुओंपर विजय पाता है। रविवारको सज्जिका (मिसिरी और मसाला मिला हुआ दही), सोमवारको खीर, मङ्गलवारको काँजी, बुधवारको दूध, गुरुवारको दही, शुक्रवारको दूध तथा शनिवारको तिल और भात खाकर यात्रा करे तो शत्रुओंको जीत लेता है। अश्विनीमें कुल्माष (उड़दका एक भेद), भरणीमें तिल, कृत्तिकामें उड़द, रोहिणीमें गायका दही, मृगशिरामें गायका घी, आर्द्रामें गायका दूध, आश्लेषामें खीर, मघामें नीलकण्ठका दर्शन, हस्तमें षाष्टिक्य (साठी धान्य)-के चावलका भात, चित्रामें प्रियंगु (कँगनी), स्वातीमें अपूप (मालपुआ), अनुराधामें फल (आम, केला आदि), उत्तराषाढ़में शाल्य (अगहनी धानका चावल), अभिजित्में हविष्य, श्रवणमें कृशरान्न (खिचड़ी), धनिष्ठामें मूँग, शतभिषामें जौका आटा, उत्तरभाद्रपदमें खिचड़ी तथा रेवतीमें दही-भात खाकर राजा यदि हाथी, घोड़े, रथ या नरयान (पालकी)-पर बैठकर यात्रा करे तो वह शत्रुओंपर विजय पाता है और उसका अभीष्ट सिद्ध होता है॥ ६७९-६८४॥

(यात्राविधि—) प्रज्वलित अग्निमें तिलोंसे हवन करके जिस दिशामें जाना हो, उस दिशाके स्वामीको उन्हींके समान रङ्गवाले वस्त्र, गन्ध तथा पुष्प आदि उपचार अर्पण करके उन दिक्पालोंके मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक उनका पूजन करे। फिर अपने इष्टदेव और ब्राह्मणोंको प्रणाम करके ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद लेकर राजाको यात्रा करनी चाहिये॥ ६८५ १/२ ॥

(दिक्पालोंके स्वरूपका ध्यान—) (१ पूर्व दिशाके स्वामी) देवराज इन्द्र शचीदेवीके साथ ऐरावतपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पा रहे हैं। उनके हाथमें वज्र है। उनकी कान्ति सुवर्ण-सदृश है तथा वे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। (२ अग्निकोणके अधीश्वर) अग्निदेवके सात हाथ, सात जिह्वाएँ और छः मुख हैं। वे भेड़पर सवार हैं, उनकी कान्ति लाल है, वे स्वाहादेवीके प्रियतम हैं तथा स्रुक्-स्रुवा और नाना प्रकारके आयुध धारण करते हैं। (३ दक्षिण दिशाके स्वामी) यमराजका दण्ड ही अस्त्र है। उनकी आँखें लाल हैं और वे भैंसेपर आरूढ़ हैं। उनके शरीरका रङ्ग कुछ लाली लिये हुए साँवला है। वे ऊपरकी ओर मुँह किये हुए हैं तथा शुभस्वरूप हैं। (४ नैर्ऋत्यकोणके अधिपति) निर्ऋतिका वर्ण नील है। वे अपने हाथोंमें ढाल और तलवार लिये रहते हैं; मनुष्य ही उनका वाहन है। उनकी आँखें भयंकर तथा केश ऊपरकी ओर उठे हुए हैं। वे सामर्थ्यशाली हैं और उनकी गर्दन बहुत बड़ी है। (५ पश्चिम दिशाके स्वामी) वरुणकी अङ्गकान्ति पीली है। वे नागपाश धारण करते हैं। ग्राह उनका वाहन है। वे कालिकादेवीके प्राणनाथ हैं और रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। (६ वायव्य कोणके अधिपति) वायुदेव काले रङ्गके मृगपर आरूढ़ हैं। अञ्जनीके पति हैं, वे समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप हैं। उनकी दो भुजाएँ हैं और वे हाथमें दण्ड धारण करते हैं। इस प्रकार उनका ध्यान और पूजन करे। (७ उत्तर दिशाके


१. दोहद—जिसे जिस वस्तुकी विशेष चाह होती है, जिसकी प्राप्तिसे मन प्रसन्न हो जाता है, वह उसका 'दोहद' कहलाता है। पूर्व दिशाकी अधिष्ठात्रीदेवी चाहती है कि लोग घृतमिश्रित अन्न खायें। रविवारका अधिपति चाहता है कि लोग रसाला (सिखरन—मिसिरी और मसाला मिला हुआ दही) खायें इत्यादि। इसी प्रकार अन्य वारादिमें भी जानना चाहिये। दोहद-भक्षण करनेसे उस वार आदिका दोष नष्ट हो जाता है।

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३९० * संक्षिप्त नारदपुराण *

स्वामी) कुबेर घोड़ेपर सवार हैं। उनकी दो भुजाएँ हैं। वे हाथमें कलश धारण करते हैं। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके सदृश है। वे चित्रलेखादेवीके प्राणवल्लभ तथा यक्षों और गन्धर्वोंके राजा हैं। (८ ईशानकोणके स्वामी) गौरीपति भगवान् शङ्कर हाथमें पिनाक लिये वृषभपर आरूढ़ हैं। वे सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। उनकी अङ्गकान्ति श्वेत है। माथेपर चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित होता है और सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं। (इस प्रकार इन सब दिक्पालोंका ध्यान और पूजन करना चाहिये) ॥ ६८६—६९३ १/२ ॥

(प्रस्थानविधि—) यदि किसी आवश्यक कार्यवश निश्चित यात्रा-लग्नमें राजा स्वयं न जा सके तो छत्र, ध्वजा, शस्त्र, अस्त्र या वाहनमेंसे किसी एक वस्तुको यात्राके निर्धारित समयमें घरसे निकालकर जिस दिशामें जाना हो, उसी दिशाकी ओर दूर रखा दे। अपने स्थानसे निर्गमस्थान (प्रस्थान रखनेकी जगह) २०० दण्ड (चार हाथकी लग्गी)-से दूर होना उचित है। अथवा चालीस या कम-से-कम बारह दण्डकी दूरी होनी आवश्यक है। राजा स्वयं प्रस्तुत होकर जाय तो किसी एक स्थानमें सात दिन न ठहरे। अन्य (राज-मन्त्री तथा साधारण) जन भी प्रस्थान करके एक स्थानमें छः या पाँच दिन न ठहरे। यदि इससे अधिक ठहरना पड़े तो उसके बाद दूसरा शुभ मुहूर्त और उत्तम लग्न विचारकर यात्रा करे॥ ६९४—६९६ १/२ ॥

असमयमें (पौषसे चैत्रपर्यन्त) बिजली चमके, मेघकी गर्जना हो या वर्षा होने लगे तथा त्रिविध (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) उत्पात होने लग जाय तो राजाको सात राततक अन्य स्थानोंकी यात्रा नहीं करनी चाहिये॥ ६९७ १/२ ॥

(शकुन—) यात्राकालमें रला नामक पक्षी, चूहा, सियारिन, कौआ तथा कबूतर—इनके शब्द वामभागमें सुनायी दें तो शुभ होता है। छछुंदर, पिंगला (उल्लू), पल्ली और गदहा—ये यात्राके समय वामभागमें हों तो श्रेष्ठ हैं। कोयल, तोता और भरदूल आदि पक्षी यदि दाहिने भागमें आ जायँ तो श्रेष्ठ हैं। काले रंगको छोड़कर अन्य सब रंगोंके चौपाये यदि वाम भागमें दीख पड़ें तो श्रेष्ठ हैं तथा यात्रासमयमें कृकलास (गिरगिट) का दर्शन शुभ नहीं है॥ ६९८—७००॥

यात्राकालमें सूअर, खरगोश, गोधा (गोह) और सर्पोंकी चर्चा शुभ होती है, किंतु किसी भूली हुई वस्तुको खोजनेके लिये जाना हो तो इनकी चर्चा अच्छी नहीं होती है। वानर और भालुओंकी चर्चाका विपरीत फल होता है॥ ७०१॥

यात्रामें मोर, बकरा, नेवला, नीलकण्ठ और कबूतर दीख जायँ तो इनके दर्शनमात्रसे शुभ होता है; परंतु लौटकर अपने नगरमें आने या घरमें प्रवेश करनेके समय ये दर्शन दें तो सब अशुभ ही समझना चाहिये। यात्राकालमें रोदन शब्दरहित कोई शव (मुर्दा) सामने दीख पड़े तो यात्राके उद्देश्यकी सिद्धि होती है। परंतु लौटकर घर आने तथा नवीन गृहमें प्रवेश करनेके समय यदि रोदन शब्दके साथ मुर्दा दीख पड़े तो वह घातक होता है॥ ७०२-७०३॥

(अपशकुन—) यात्राके समय पतित, नपुंसक, जटाधारी, पागल, औषध आदि खाकर वमन (उलटी) करनेवाला, शरीरमें तेल लगानेवाला, वसा, हड्डी, चर्म, अङ्गार (ज्वालारहित अग्नि), दीर्घ रोगी, गुड़, कपास (रूई), नमक, प्रश्न (पूछने या टोकनेका शब्द), तृण, गिरगिट, बन्ध्या स्त्री, कुबड़ा, गेरुआ वस्त्रधारी, खुले केशवाला, भूखा तथा नंगा—ये सब सामने उपस्थित हो जायँ तो अभीष्ट-सिद्धि नहीं होती है॥ ७०४-७०५॥

(शुभ शकुन—) प्रज्वलित अग्नि, सुन्दर घोड़ा, राजसिंहासन, सुन्दरी स्त्री, चन्दन आदिकी सुगन्ध, फूल, अक्षत, छत्र, चामर, डोली या पालकी, राजा, खाद्य पदार्थ, ईख, फल, चिकनी मिट्टी, अन्न, शहद, घृत, दही, गोबर, चूना, धुला

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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हुआ वस्त्र, शङ्ख, श्वेत बैल, ध्वजा, सौभाग्यवती स्त्री, भरा हुआ कलश, रत्न (हीरा, मोती आदि), भृङ्गार (गडुवा), गौ, ब्राह्मण, नगाड़ा, मृदङ्ग, दुन्दुभि, घण्टा तथा वीणा (बाँसुरी) आदि वाद्योंके शब्द, वेदमन्त्र एवं मङ्गल गीत आदिके शब्द—ये सब यात्राके समय यदि देखने या सुननेमें आवें तो यात्रा करनेवाले लोगोंके सब कार्य सिद्ध करते हैं॥७०६-७०९॥

(अपशकुन-परिहार—) यात्राके समय प्रथम बार अपशकुन हो तो खड़ा होकर इष्टदेवका स्मरण करके फिर चले। दूसरा अपशकुन हो तो ब्राह्मणोंकी पूजा (वस्त्र, द्रव्य आदिसे उनका सत्कार) करके चले। यदि तीसरी बार अपशकुन हो जाय तो यात्रा स्थगित कर देनी चाहिये॥७१०॥

(छींकके फल—) यात्राके समय सभी दिशाओंकी छींक निन्दित है। गौकी छींक घातक होती है, किंतु बालक, वृद्ध, रोगी या कफवाले मनुष्यकी छींक निष्फल होती है॥७११॥

परस्त्रियोंका स्पर्श करनेवाला तथा ब्राह्मण और देवताके धनका अपहरण करनेवाला तथा अपने छोड़े हुए हाथी और घोड़ेको बाँध लेनेवाला, शत्रु यदि सामने आ जाय तो राजा उसे अवश्य मार डाले; परंतु स्त्रियों तथा शस्त्रहीन मनुष्योंपर कदापि हाथ न उठावे॥७१२॥

(गृह-प्रवेश—) नये घरमें प्रथम बार प्रवेश करना हो तो उत्तरायणके शुभ मुहूर्तमें करे। पहले दिन विधिपूर्वक वास्तु-पूजा और बलि (नैवेद्य) अर्पण करके गृहमें प्रवेश करना चाहिये॥७१३॥

(गृह-प्रवेशमें विहित मास—) माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ—इन चार मासोंमें गृहप्रवेश श्रेष्ठ होता है। तथा अगहन और कार्तिक इन दो मासोंमें मध्यम होता है।

(विहित नक्षत्र—) मृगशिरा, पुष्य, रेवती, शतभिषा, चित्रा, अनुराधा और स्थिर-संज्ञक (तीनों उत्तरा और रोहिणी) नक्षत्रोंमें बृहस्पति और शुक्र दोनों उदित हों तब रवि और मङ्गलको छोड़कर अन्य वारोंमें रिक्ता (४, ९, १४) तथा अमावास्या छोड़कर अन्य तिथियोंमें दिन या रात्रिके समय गृहप्रवेश शुभप्रद होता है। चन्द्रबल और ताराबलसहित उपद्रवरहित दिनके पूर्वाह्न भागमें स्थिर राशिके नवमांशयुक्त स्थिर लग्नमें जब लग्नसे अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हो, शुभग्रह त्रिकोण या केन्द्रमें हों, पापग्रह ३, ६, ११ भावोंमें हों और चन्द्रमा लग्न, १२, ८, ६ इनसे भिन्न स्थानोंमें हों, तब गृह-प्रवेश करनेवाले यजमानकी जन्मराशि, जन्मलग्न या इन दोनोंसे उपचय (३, ६, १०, ११ वीं) राशिके गृह-प्रवेश लग्नमें विद्यमान होनेपर सब प्रकारके सुख और सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। अन्यथा इससे विपरीत समयमें गृह-प्रवेश किया जाय तो शोक और निर्धनता प्राप्त होती है॥७१४-७१९॥

(प्रवेश-विधि—) जिस नूतन गृहमें प्रवेश करना हो, उसको चित्र आदिसे सजाकर तथा पुष्प-तोरण आदिसे अलंकृत करके वेद-ध्वनि, शान्तिपाठ, सौभाग्यवती स्त्रियोंके माङ्गलिक गीत तथा वाद्य आदिके शब्दोंके साथ सूर्यको वाम भागमें रखकर जलसे भरे हुए कलशको आगे करके उसमें प्रवेश करना चाहिये॥७२०॥

(वृष्टि-विचार—) वर्षा-प्रवेश (आर्द्रा नक्षत्रमें सूर्यके प्रवेश)-के समय यदि शुक्लपक्ष हो, चन्द्रमा जलचर राशिमें या लग्नसे केन्द्र (१, ४, ७, १०)-में स्थित होकर शुभग्रहसे देखे जाते हों तो अधिक वृष्टि होती है। यदि उस समय चन्द्रमापर पापग्रहकी दृष्टि हो तो दीर्घकालमें अल्पवृष्टि समझनी चाहिये। (इससे सिद्ध होता है कि यदि चन्द्रमापर पाप और शुभ दोनों ग्रहोंकी दृष्टि हो तो मध्यम वृष्टि होती है।) जिस प्रकार चन्द्रमासे फल कहा गया है, उसी प्रकार उस समय शुक्रसे भी समझना चाहिये। (अर्थात् सूर्यके आर्द्रा-प्रवेशके समय चन्द्रमा और शुक्र

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३१२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

दोनोंकी स्थिति देखकर तारतम्यसे फल समझना चाहिये॥ ७२१-७२२॥

वर्षाकालमें आर्द्रासे स्वातीतक सूर्यके रहनेपर चन्द्रमा यदि शुक्रसे सप्तम स्थानमें अथवा शनिसे पञ्चम, नवम तथा सप्तम स्थानमें हो, उसपर शुभ ग्रहकी दृष्टि पड़े तो उस समय अवश्य वर्षा होती है॥ ७२३॥

यदि बुध और शुक्र समीपवर्ती (एक राशिमें स्थित) हों तो तत्काल वर्षा होती है। किंतु उन दोनों (बुध और शुक्र)-के बीचमें सूर्य हों तो वृष्टिका अभाव होता है॥ ७२४॥

यदि मघा आदि पाँच नक्षत्रोंमें शुक्र पूर्व दिशामें उदित हों और स्वातीसे तीन नक्षत्रों (स्वाती, विशाखा, अनुराधा)-में शुक्र पश्चिम दिशामें उदित हों तो निश्चय ही वर्षा होती है। इससे विपरीत हो तो वर्षा नहीं समझनी चाहिये॥ ७२५॥

यदि सूर्यके समीप (एक राशिके भीतर होकर) कोई ग्रह आगे या पीछे पड़ते हों तो वे वर्षा अवश्य करते हैं; किंतु उनकी गति वक्र न हुई हो तभी ऐसा होता है॥ ७२६॥

दक्षिण गोल (तुलासे मीनतक)-में शुक्र यदि सूर्यसे वाम भागमें पड़े तो वृष्टिकारक होता है। उदय या अस्तके समय यदि आर्द्रांमें सूर्यका प्रवेश हो तो भी वर्षा होती है॥ ७२७॥

यदि सूर्यका आर्द्रा-प्रवेश सन्ध्याके समय हो तो शस्य (धान)-की वृद्धि होती है। यदि रात्रिमें हो तो मनुष्योंको सब प्रकारकी सम्पत्ति प्राप्त होती है। यदि प्रवेशकालमें चन्द्रमा, गुरु, बुध एवं शुक्रसे आर्द्रा भेदित हो तो क्रमशः अल्पवृष्टि, धान्य-हानि, अनावृष्टि और धान्य-वृद्धि होती है; इसमें संशय नहीं है। यदि ये चारों चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र प्रवेश-लग्नसे केन्द्रमें पड़ते हों तो ईति (खेतीके टिड्डी आदि सब उपद्रव)-का नाश होता है॥ ७२८-७२९॥

यदि सूर्य पूर्वाषाढ़ नक्षत्रमें प्रवेशके समय मेघोंसे आच्छन्न हों तो आर्द्रासे मूलतक प्रतिदिन वर्षा होती है॥ ७३०॥

यदि रेवतीमें सूर्यके प्रवेश करते समय वर्षा हो जाय तो उससे दस नक्षत्र (रेवतीसे आश्लेषा)-तक वर्षा नहीं होती है। सिंह-प्रवेशमें लग्न यदि मङ्गलसे भिन्न (भेदित) हो, कर्क-प्रवेशमें अभिन्न हो एवं कन्या-प्रवेशमें भिन्न हो तो उत्तम वृष्टि होती है॥ ७३१½॥ उत्तर भाद्रपद पूर्वधान्य, रेवती परधान्य तथा भरणी सर्वधान्य नक्षत्र है। अश्विनीको सर्वधान्योंका नाशक नक्षत्र कहा गया है। वर्षाकाल (चातुर्मास्य)-में पश्चिम उदित हुए शुक्र यदि गुरुसे सप्तम राशिमें निर्बल हों तो आर्द्रासे सात नक्षत्रतक प्रतिदिन अतिवृष्टि होती है। चन्द्रमण्डलमें परिवेष (घेरा) हो और उत्तर दिशामें बिजली दीख पड़े या मेढकोंके शब्द सुनायी पड़ें तो निश्चय ही वर्षा होती है। पश्चिम भागमें लटका हुआ मेघ यदि आकाशके बीचमें होकर दक्षिण दिशामें जाय तो शीघ्र वर्षा होती है। बिलाव अपने नाखूनोंसे धरतीको खोदे, लोहे (तथा ताँबे और कांसी आदि)-में मल जमने लगे अथवा बहुत-से बालक मिलकर सड़कोंपर पुल बाँधें तो ये वर्षाके सूचक चिह्न हैं।

चींटीकी पङ्क्ति छिन्न-भिन्न हो जाय, आकाशमें बहुतेरे जुगनू दीख पड़ें तथा सर्पोंका वृक्षपर चढ़ना और प्रसन्न होना देखा जाय तो ये सब दुर्भिक्ष-सूचक हैं।

उदय या अस्त-समयमें यदि सूर्य या चन्द्रमाका रंग बदला हुआ जान पड़े या उनकी कान्ति मधुके समान दीख पड़े तथा बड़े जोरकी हवा चलने लगे तो अतिवृष्टि होती है॥ ७३२-७३८½॥

(पृथ्वीके आधार कूर्मके अङ्ग-विभाग-)

कूर्मदेवता पूर्वकी ओर मुख करके स्थित हैं, उनके नव अङ्गोंमें इस भारत भूमिके नौ विभाग

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३९३

करके प्रत्येक खण्डमें प्रदक्षिणक्रमसे विभिन्न मण्डलों (देशों)-को समझे। अन्तर्वेदी (मध्यभाग)-में पाञ्चालदेश स्थित है, वही कूर्मभगवान्‌का नाभिमण्डल है। मगध और लाट देश पूर्व दिशामें विद्यमान हैं, वे ही उनका मुखमण्डल हैं। स्त्री, कलिङ्ग और किरात देश भुजा हैं। अवन्ती, द्रविड और भिल्लदेश उनका दाहिना पार्श्व हैं। गौड, कौंकण, शाल्व, आन्ध्र और पौण्ड्र देश—ये सब देश दोनों अगले पैर हैं। सिन्ध, काशी, महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्र देश पुच्छ-भाग हैं। पुलिन्द, चीन, यवन और गुर्जर—ये सब देश दोनों पिछले पैर हैं। कुरु, काश्मीर, मद्र तथा मत्स्य-देश वाम पार्श्व हैं। खस (नेपाल) अङ्ग, वङ्ग, वाहीक और काम्बोज—ये दोनों हाथ हैं॥ ७३९-७४४॥

इन नवों अङ्गोंमें क्रमशः कृत्तिका आदि तीन-तीन नक्षत्रोंका न्यास करे। जिस अङ्गके नक्षत्रमें पापग्रह रहते हैं, उस अङ्गके देशोंमें तबतक अशुभ फल होता है और जिस अङ्गके नक्षत्रोंमें शुभग्रह रहते हैं, उस अङ्गके देशोंमें शुभ फल होते हैं॥ ७४५॥

(मूर्ति-प्रतिमा-विकार—) देवताओंकी प्रतिमा यदि नीचे गिर पड़े, जले, बार-बार रोये, गावे, पसीनेसे तर हो जाय, हँसे, अग्नि, धुआँ, तेल, शोणित, दूध या जलका वमन करे, अधोमुख हो जाय, एक स्थानसे दूसरे स्थानमें चली जाय तथा इसी तरहकी अनेक अद्भुत बातें दीख पड़ें तो यह प्रतिमा-विकार कहलाता है। यह विकार अशुभ फलका सूचक होता है।

(विविध विकार—) यदि आकाशमें गन्धर्वनगर (ग्रामके समान आकार), दिनमें ताराओंका दर्शन, उल्कापातन, काष्ठ, तृण और शोणितकी वर्षा, गन्धर्वोंका दर्शन, दिग्दाह, दिशाओंमें धूम छा जाना, दिन या रात्रिमें भूकम्प होना, बिना आगके स्फुलिङ्ग (अङ्गार) दीखना, बिना लकड़ीके आगका जलना, रात्रिमें इन्द्रधनुष या परिवेश (घेरा) दीखना, पर्वत या वृक्षादिके ऊपर उजला कौआ दिखायी देना तथा आगकी चिनगारियोंका प्रकट होना आदि बातें दिखायी देने लगें, गौ, हाथी और घोड़ोंके दो या तीन मस्तकवाला बच्चा पैदा हो, प्रातःकाल एक साथ ही चारों दिशाओंमें अरुणोदय-सा प्रतीत हो, गाँवमें गीदड़ोंका दिनमें बास हो, धूम-केतुओंका दर्शन होने लगे तथा रात्रिमें कौओंका और दिनमें कबूतरोंका क्रन्दन हो तो ये भयंकर उत्पात हैं। वृक्षोंमें बिना समयके फूल या फल दीख पड़ें तो उस वृक्षको काट देना चाहिये और उसकी शान्ति कर लेनी चाहिये। इस प्रकारके और भी जो बड़े-बड़े उत्पात दृष्टिगोचर होते हैं, वे स्थान (देश या ग्राम)-का नाश करनेवाले होते हैं। कितने ही उत्पात घातक होते हैं; कितने ही शत्रुओंसे भय उपस्थित करते हैं। कितने ही उत्पातोंसे भय, यश, मृत्यु, हानि, कीर्ति, सुख-दुःख और ऐश्वर्यकी भी प्राप्ति होती है। यदि वल्मीक (दीमककी मिट्टीके ढेर)-पर शहद दीख पड़े तो धनकी हानि होती है। द्विजश्रेष्ठ! इस तरहके सभी उत्पातोंमें यत्नपूर्वक कल्पोक्त विधिसे शान्ति अवश्य कर लेनी चाहिये। नारदजी! इस प्रकार संक्षेपसे मैंने ज्योतिषशास्त्रका वर्णन किया है। अब वेदके छहों अङ्गोंमें श्रेष्ठ छन्दःशास्त्रका परिचय देता हूँ॥ ७४६-७५८॥ (पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५६)

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३९४* संक्षिप्त नारदपुराण *

छन्दःशास्त्रका संक्षिप्त परिचय¹

सनन्दनजी कहते हैं—नारद! छन्द दो प्रकारके बताये जाते हैं—वैदिक² और लौकिक³। मात्रा और वर्णके भेदसे वे लौकिक या वैदिक छन्द भी पुनः दो-दो प्रकारके हो जाते हैं (मात्रिक⁴ छन्द और वर्णिक⁵ छन्द)॥ १॥ छन्दःशास्त्रके विद्वानोंने मगण, यगण, रगण, सगण, तगण, जगण, भगण और नगण तथा गुरु एवं लघु—इन्हींको छन्दोंकी सिद्धिमें कारण बताया है॥ २॥ जिसमें सभी अर्थात् तीनों अक्षर गुरु हों उसे मगण(SSS) कहा गया है। जिसका आदि अक्षर लघु (और शेष दो अक्षर गुरु) हो, वह यगण ( ISS) माना गया है। जिसका मध्यवर्ती अक्षर लघु हो, वह रगण ( S IS) और जिसका अन्तिम अक्षर गुरु हो, वह सगण ( IIS) है॥ ३॥ जिसमें अन्तिम अक्षर लघु हो, वह तगण ( SSI) कहा गया है, जहाँ मध्य गुरु हो, वह जगण ( ISI) और जिसमें आदि गुरु हो, वह भगण ( S II) है। मुने! जिसमें तीनों अक्षर लघु हों, वह नगण ( III)

१. शास्त्रकारोंने द्विजातियोंके लिये छहों अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंके अध्ययनका आदेश दिया है। उन्हीं अङ्गोंमेंसे छन्द भी एक अङ्ग है। इसे वेदका चरण माना गया है—‘छन्दः पादौ तु वेदस्य।’ (पा० शि० ४१) ‘अनुष्टुभा यजति, बृहत्या गायति, गायत्र्या स्तौति।’ (पिं० सूत्रवृत्ति अध्याय १) (अनुष्टुप्‌से यजन करे, बृहती छन्दद्वारा गान करे, गायत्री छन्दसे स्तुति करे) इत्यादि विधियोंका श्रवण होनेसे छन्दका ज्ञान परम आवश्यक सिद्ध होता है। छन्द न जाननेसे प्रत्यवाय भी होता है; जैसा कि छन्दोग ब्राह्मणका वचन है—‘यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दोदैवतविनियोगेन ब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स स्थाणुं वर्च्छति गर्तं वा पद्यते प्रमीयते वा पापीयान् भवति यातयामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति।’ (पिं० सूत्रवृत्ति अध्याय १) (जो ऋषि छन्द, देवता तथा विनियोगको जाने बिना ब्राह्मणमन्त्रसे यज्ञ कराता और शिष्योंको पढ़ाता है, वह ठूंठे काठके समान हो जाता है, नरकमें गिरता है, वेदोक्त आयुका पूरा उपभोग न करके बीचमें ही मृत्युको प्राप्त होता है अथवा महान् पापका भागी होता है। उसके किये हुए समस्त वेदपाठ यातयाम (प्रभाव-शून्य व्यर्थ) हो जाते हैं); इसलिये छन्दका ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिये। इसीके लिये इस छन्दःशास्त्रका आरम्भ हुआ है।

२. वेदमन्त्रोंमें जो गायत्री, अनुष्टुप्, बृहती और त्रिष्टुप् आदि छन्द प्रयुक्त हुए हैं, उनको वैदिक छन्द कहते हैं। यथा—

तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
—यह गायत्री छन्द है।

३. इतिहास, पुराण, काव्य आदिके पद्योंमें प्रयुक्त जो छन्द हैं, वे लौकिक कहे गये हैं। यथा—

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
—यह ‘श्लोक अनुष्टुप् छन्द है।

४. परिगणित मात्राओंसे पूर्ण होनेवाले छन्दोंको ‘मात्रिक’ कहते हैं। जैसे—आर्या छन्दके प्रथम और तृतीय पाद बारह मात्राओंसे, द्वितीय पाद अठारह मात्राओंसे और चतुर्थ पाद पन्द्रह मात्राओंसे पूर्ण होते हैं। आर्याके पूर्वार्ध सदृश उत्तरार्ध भी हो तो ‘गीति’ और उत्तरार्ध-सदृश पूर्वार्ध हो तो ‘उपगीति’ छन्द होते हैं।
आर्याका उदाहरण—

वृन्दावने सलीलं वल्गुद्रुमकाण्डनिहिततनुयष्टिः। स्मेरमुखार्पितवेणुः कृष्णो यदि मनसि कः स्वर्गः॥

५. परिगणित अक्षरोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दोंको ‘वर्णिक’ कहते हैं। यथा—

जयन्ति गोविन्दमुखारविन्दे मरन्दसान्द्राधरमन्दहासाः। चित्ते चिदानन्दमयं तमोघ्नममन्दमिन्दुद्रवमुद्गिरन्तः॥
—यह इन्द्रवज्रा-उपेन्द्रवज्राके मेलसे बना हुआ उपजाति नामक छन्द है।