संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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स्वामी) कुबेर घोड़ेपर सवार हैं। उनकी दो भुजाएँ हैं। वे हाथमें कलश धारण करते हैं। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके सदृश है। वे चित्रलेखादेवीके प्राणवल्लभ तथा यक्षों और गन्धर्वोंके राजा हैं। (८ ईशानकोणके स्वामी) गौरीपति भगवान् शङ्कर हाथमें पिनाक लिये वृषभपर आरूढ़ हैं। वे सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। उनकी अङ्गकान्ति श्वेत है। माथेपर चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित होता है और सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं। (इस प्रकार इन सब दिक्पालोंका ध्यान और पूजन करना चाहिये) ॥ ६८६—६९३ १/२ ॥
(प्रस्थानविधि—) यदि किसी आवश्यक कार्यवश निश्चित यात्रा-लग्नमें राजा स्वयं न जा सके तो छत्र, ध्वजा, शस्त्र, अस्त्र या वाहनमेंसे किसी एक वस्तुको यात्राके निर्धारित समयमें घरसे निकालकर जिस दिशामें जाना हो, उसी दिशाकी ओर दूर रखा दे। अपने स्थानसे निर्गमस्थान (प्रस्थान रखनेकी जगह) २०० दण्ड (चार हाथकी लग्गी)-से दूर होना उचित है। अथवा चालीस या कम-से-कम बारह दण्डकी दूरी होनी आवश्यक है। राजा स्वयं प्रस्तुत होकर जाय तो किसी एक स्थानमें सात दिन न ठहरे। अन्य (राज-मन्त्री तथा साधारण) जन भी प्रस्थान करके एक स्थानमें छः या पाँच दिन न ठहरे। यदि इससे अधिक ठहरना पड़े तो उसके बाद दूसरा शुभ मुहूर्त और उत्तम लग्न विचारकर यात्रा करे॥ ६९४—६९६ १/२ ॥
असमयमें (पौषसे चैत्रपर्यन्त) बिजली चमके, मेघकी गर्जना हो या वर्षा होने लगे तथा त्रिविध (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) उत्पात होने लग जाय तो राजाको सात राततक अन्य स्थानोंकी यात्रा नहीं करनी चाहिये॥ ६९७ १/२ ॥
(शकुन—) यात्राकालमें रला नामक पक्षी, चूहा, सियारिन, कौआ तथा कबूतर—इनके शब्द वामभागमें सुनायी दें तो शुभ होता है। छछुंदर, पिंगला (उल्लू), पल्ली और गदहा—ये यात्राके समय वामभागमें हों तो श्रेष्ठ हैं। कोयल, तोता और भरदूल आदि पक्षी यदि दाहिने भागमें आ जायँ तो श्रेष्ठ हैं। काले रंगको छोड़कर अन्य सब रंगोंके चौपाये यदि वाम भागमें दीख पड़ें तो श्रेष्ठ हैं तथा यात्रासमयमें कृकलास (गिरगिट) का दर्शन शुभ नहीं है॥ ६९८—७००॥
यात्राकालमें सूअर, खरगोश, गोधा (गोह) और सर्पोंकी चर्चा शुभ होती है, किंतु किसी भूली हुई वस्तुको खोजनेके लिये जाना हो तो इनकी चर्चा अच्छी नहीं होती है। वानर और भालुओंकी चर्चाका विपरीत फल होता है॥ ७०१॥
यात्रामें मोर, बकरा, नेवला, नीलकण्ठ और कबूतर दीख जायँ तो इनके दर्शनमात्रसे शुभ होता है; परंतु लौटकर अपने नगरमें आने या घरमें प्रवेश करनेके समय ये दर्शन दें तो सब अशुभ ही समझना चाहिये। यात्राकालमें रोदन शब्दरहित कोई शव (मुर्दा) सामने दीख पड़े तो यात्राके उद्देश्यकी सिद्धि होती है। परंतु लौटकर घर आने तथा नवीन गृहमें प्रवेश करनेके समय यदि रोदन शब्दके साथ मुर्दा दीख पड़े तो वह घातक होता है॥ ७०२-७०३॥
(अपशकुन—) यात्राके समय पतित, नपुंसक, जटाधारी, पागल, औषध आदि खाकर वमन (उलटी) करनेवाला, शरीरमें तेल लगानेवाला, वसा, हड्डी, चर्म, अङ्गार (ज्वालारहित अग्नि), दीर्घ रोगी, गुड़, कपास (रूई), नमक, प्रश्न (पूछने या टोकनेका शब्द), तृण, गिरगिट, बन्ध्या स्त्री, कुबड़ा, गेरुआ वस्त्रधारी, खुले केशवाला, भूखा तथा नंगा—ये सब सामने उपस्थित हो जायँ तो अभीष्ट-सिद्धि नहीं होती है॥ ७०४-७०५॥
(शुभ शकुन—) प्रज्वलित अग्नि, सुन्दर घोड़ा, राजसिंहासन, सुन्दरी स्त्री, चन्दन आदिकी सुगन्ध, फूल, अक्षत, छत्र, चामर, डोली या पालकी, राजा, खाद्य पदार्थ, ईख, फल, चिकनी मिट्टी, अन्न, शहद, घृत, दही, गोबर, चूना, धुला