संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 388 of 770
Read in context| ३८६ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
|---|
(शुक्रदोष—) शुक्र अस्त हों तो यात्रामें हानि होती है। यदि वह सम्मुख हो तो यात्रा करनेसे पराजय होती है। सम्मुख शुक्रके दोषको कोई भी ग्रह नहीं हटा सकता है। किंतु वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भरद्वाज और गौतम—इन पाँच गोत्रवालोंको सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है। यदि एक ग्रामके भीतर ही यात्रा करनी हो या विवाहमें जाना हो या दुर्भिक्ष होनेपर अथवा राजाओंमें युद्ध होनेपर तथा राजा या ब्राह्मणोंका कोप होनेपर कहीं जाना पड़े तो इन अवस्थाओंमें सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है। शुक्र यदि नीच राशिमें या शत्रुराशिमें अथवा वक्रगति या पराजित* हो तो यात्रा करनेवालोंकी पराजय होती है। यदि शुक्र अपनी उच्चराशि (मीन)-में हो तो यात्रामें विजय होती है॥ ६३५-६३८॥
अपने जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या लग्नमें तथा शत्रुकी राशिसे छठी राशिमें या लग्नमें अथवा इन सबोंके स्वामी जिस राशिमें हों, उस लग्न या राशिमें यात्रा करनेवालेकी मृत्यु होती है। परंतु यदि जन्मलग्नराशिपति और अष्टम राशिपतिमें परस्पर मैत्री हो तो उक्त अष्टमराशिजन्य दोष स्वयं नष्ट हो जाता है॥ ६३९-६४०॥
द्विस्वभाव लग्न यदि पापग्रहसे युक्त या दृष्ट हो तो यात्रामें पराजय होती है तथा स्थिर राशि पापग्रहसे युक्त न हो तो वह यात्रालग्नमें अशुभ है। यदि स्थिर राशिलग्नमें शुभग्रहका योग या दृष्टि हो तो शुभ फल होता है॥ ६४१॥
धनिष्ठा नक्षत्रके उत्तरार्धसे आरम्भ करके (रेवतीपर्यन्त) पाँच नक्षत्रोंमें गृहार्थ तृण-काष्ठोंका संग्रह, दक्षिणकी यात्रा, शय्या (तकिया, पलङ्ग आदि)-का बनाना, घरको छवाना आदि कार्य नहीं करने चाहिये॥ ६४२॥
यदि यात्रालग्नमें जन्मलग्न, जन्मराशि या इन दोनोंके स्वामी हों अथवा जन्मलग्न या जन्मराशिसे ३, ६, ११, १० वीं राशि हो तो शत्रुओंका नाश होता है॥ ६४३॥
यदि शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुम्भ) तथा दिग्द्वार (यात्राकी दिशा)-की राशि लग्नमें हो अथवा किसी भी लग्नमें शुभग्रहके वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुओंका नाश होता है॥ ६४४॥
शत्रुके जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या उन दोनोंके स्वामी जिस राशिमें हों वह राशि यात्रालग्नमें हो तो शत्रुता नाश होता है॥ ६४५॥
मीन लग्नमें या लग्नगत मीनके नवमांशमें यात्रा करनेसे मार्ग (रास्ता) टेढ़ा हो जाता है। (अर्थात् बहुत घूमना पड़ता है।) तथा कुम्भलग्न और लग्नगत कुम्भका नवमांश भी यात्रामें अत्यन्त निन्दित है॥ ६४६॥
जलचर राशि (कर्क, मीन) या जलचर राशिका नवमांश लग्नमें हो तो नौकाद्वारा नदी-नद आदि मार्गसे यात्रा शुभ होती है॥ ६४६ १/२॥
(लग्नभावोंकी संज्ञा—) १- मूर्ति (तन), २-कोष (धन), ३-धन्वी (पराक्रम, भ्राता), ४-वाहन (सवारी, माता), ५-मन्त्र (विद्या, संतान), ६-शत्रु (रोग, मामा), ७-मार्ग (यात्रा, पति-पत्नी), ८-आयु (मृत्यु), ९-मन (अन्तःकरण, भाग्य), १०-व्यापार (व्यवसाय, पिता), ११- प्राप्ति (लाभ), १२- अप्राप्ति (व्यय)—ये क्रमसे लग्न आदि १२ स्थानोंकी संज्ञाएँ हैं॥ ६४७-६४८॥
पापग्रह (शनि, रवि, मङ्गल, राहु तथा केतु—ये) तीसरे और ग्यारहवेंको छोड़कर अन्य सब
* जब मङ्गलादि ग्रहोंमें किन्हीं दो ग्रहोंकी एक राशिमें अंशकला बराबर हो तो दोनोंमें युद्ध समझा जाता है। उन दोनोंमें जो उत्तर रहता है, वह विजयी तथा दक्षिण रहनेवाला पराजित होता है।