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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 386 of 770

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Page 386

३८४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

नैवेद्यमें तीन प्रकारके (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य) अन्न माङ्गलिक गीत और वाद्यके साथ अर्पण करे। अन्तमें ताम्बूल (पान-सोपारी) अर्पण करके वास्तुपुरुषकी इस प्रकार प्रार्थना करे॥ ६१४ ॥

वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्यानिरत प्रभो।
मद्गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा॥

‘भूमिशय्यापर शयन करनेवाले वास्तुपुरुष! आपको मेरा नमस्कार है। प्रभो! आप मेरे घरको धन-धान्य आदिसे सम्पन्न कीजिये।’

इस प्रकार प्रार्थना करके देवताके समक्ष पूजा करानेवाले (पुरोहित)-को यथाशक्ति दक्षिणा दे तथा अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें भी दक्षिणा दे। जो मनुष्य सावधान होकर गृहारम्भ या गृहप्रवेशके समय इस विधिसे वास्तुपूजा करता है, वह आरोग्य, पुत्र, धन और धान्य प्राप्त करके सुखी होता है। जो मनुष्य वास्तुपूजा न करके नये घरमें प्रवेश करता है, वह नाना प्रकारके रोग, क्लेश और संकट प्राप्त करता है॥ ६१५-६१८॥

जिसमें किंवाड़ें न लगी हों, जिसे ऊपरसे छत आदिके द्वारा छाया न गया हो तथा जिसके लिये (पूर्वोक्त रूपसे वास्तुपूजन करके) देवताओंको बलि (नैवेद्य) और ब्राह्मण आदिको भोजन न दिया गया हो, ऐसे नूतन गृहमें कभी प्रवेश न करे; क्योंकि वह विपत्तियोंकी खान (स्थान) होता है॥ ६१९॥

(यात्रा-प्रकरण—) अब मैं जिस प्रकारसे यात्रा करनेपर वह राजा तथा अन्य जनोंके लिये अभीष्ट फलकी सिद्धि करानेवाली होती है, उस विधिका वर्णन करता हूँ। जिनके जन्म-समयका ठीक-ठीक ज्ञान है, उन राजाओं तथा अन्य जनोंको उस विधिसे यात्रा करनेपर उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जिन मनुष्योंका जन्मसमय अज्ञात है, उनको तो घुणाक्षर* न्यायसे ही कभी फलकी प्राप्ति हो जाती है, तथापि उनको भी प्रश्नलग्नसे तथा निमित्त और शकुन आदिद्वारा शुभाशुभ देखकर यात्रा करनेसे अभीष्ट फलका लाभ होता है॥ ६२०-६२१॥

(यात्रामें निषिद्धि तिथियाँ—) षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा और शुक्लपक्षकी प्रतिपदा—इन तिथियोंमें यात्रा करनेसे दरिद्रता तथा अनिष्टकी प्राप्ति होती है॥ ६२२॥

(विहित नक्षत्र—) अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, रेवती, अश्विनी, श्रवण, पुष्य और धनिष्ठा—इन नक्षत्रोंमें यदि अपने जन्म-नक्षत्रसे सातवीं, पाँचवीं और तीसरी तारा न हो तो यात्रा अभीष्ट फलको देनेवाली होती है॥ ६२३॥

(दिशाशूल—) शनि और सोमवारके दिन पूर्व दिशाकी ओर न जाय, गुरुवारको दक्षिण न जाय, शुक्र और रविवारको पश्चिम न जाय तथा बुध और मङ्गलको उत्तर दिशाकी यात्रा न करे॥ ६२४॥ ज्येष्ठा, पूर्वभाद्रपद, रोहिणी और उत्तराफाल्गुनी—ये नक्षत्र क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशामें शूल होते हैं।

(सर्वदिग्गमन नक्षत्र—) अनुराधा, हस्त, पुष्य और अश्विनी—ये चार नक्षत्र सब दिशाओंकी यात्रामें प्रशस्त हैं॥ ६२५॥

(दिग्द्वार-नक्षत्र—) कृत्तिकासे आरम्भ करके सात-सात नक्षत्रसमूह पूर्वादि दिशाओंमें रहते हैं। तथा अग्निकोणसे वायुकोणतक परिघदण्ड रहता है; अतः इस प्रकार यात्रा करनी चाहिये,


* जैसे घुन (कीटविशेष) काठको खोदता रहता है तो उससे कहीं अकारादि अक्षरका स्वरूप अकस्मात् बन जाता है; उसी प्रकार जो अपने जन्मसमयसे अपरिचित हैं, वे लग्न आदिको न जानकर भी यात्रा करते-करते कभी संयोगवश शुभ फलके भागी हो जाते हैं।