माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३३४ ) माधवनिदान ।
( ३३४ ) माधवनिदान ।
वर्त्माश्रित ( कोएमॆं स्थित ) जो वायु, सो निमेष ( पलकके उघाडने मूंदनेवाली
नस ) में प्रवेश होकर बारंबार पलकोंको चलायमान करे, उसको निमेष ( नेत्रका
मिचकाना ) कहते हैं, विदेहेने भी लिखा है। यह रोग भी सन्निपातज है ॥
शोणितार्शके लक्षण ।
वर्त्मस्थो यो विवर्द्धेत लोहितो मृदुरंकुरः ।
तद्रक्तजं शोणितार्शश्छिन्नं छिन्नं प्रवर्द्धते ॥ ९६ ॥
रुधिरके सम्बन्धसे नेत्रके कोएके भीतर भागमें लाल तथा नरम अंकुर बढे
उसको शोणितार्श कहते हैं, उसको जैसे जैसे काटे तैसे २ बढता है इस रक्तज
व्याधिको विदेह आचार्य असाध्य कहते हैं ।
लगणके लक्षण
अपाकी कठिनः स्थूलो ग्रन्थिर्वर्त्मभवोऽरुजः ।
सकण्डूः पिच्छिलः कोलसंस्थानो लगणस्तु सः ॥ ९७ ॥
नेत्रके कोएमॆं बेरके समान बडी कठिन खुजलीसंयुक्त चिकनी गांठ होय उसको
लगण कहते हैं । यह रोग कफजन्य है, इसमें पीडा और पकना नहीं होय ॥
बिसवर्त्मके लक्षण ।
त्रयो दोषा बहिः शोथं कुर्युश्छिद्राणि वर्त्मनोः ।
प्रस्रवत्यंतरुदकं बिसवद्विसवर्त्म तत् ॥ ९८ ॥
तीनों दोष कुपित होकर नेत्रके कोएको सुजाय देवें तथा उनमें छिद्र होजाय, उन
कोयौमेंसे कमलतन्तुके समान भीतरसे पानी झरे, इस रोगको बिसवर्त्म कहते हैं ॥
कुञ्चनके लक्षण ।
वाताद्या वर्त्मसंकोचं जनयंति यदा मलाः ।
तदा द्रष्टुं न शक्नोति कुंचनं नाम तद्विदुः ॥ ९९ ॥
वातादिदोष जब कोएके मार्गको संकुचित करें तब मनुष्य नेत्रको उघाड कर
नहीं देखसके, इस रोगको कुञ्चन कृच्छ्रोन्मीलन कहते हैं, यह रोग सुश्रुताचार्यने
नहीं लिखा, माधवाचार्यने ही लिखा है ॥
१ निमेषिणीः शिरा वायुः प्रविश्य व्यवतिष्ठते । अत्यर्थं चलते वर्त्म निमेषः स न सिध्यति ॥
२ वायुः शोणितमादाय शिराणां प्रमुखे स्थितः । जनयत्यंकुरं ताम्रं वर्त्मनि च्छिन्नरोहणम् ॥
तच्छोणितार्शोऽसाध्यं स्याद्रक्तास्राव्यथ रक्तजम् ॥
भाषाटीकासमेत । (३३५)
पक्ष्मकोपके लक्षण ।
प्रचालितानि वातेन पक्ष्माण्यक्षि विशंति हि ।
घृष्यन्त्यक्षि मुहुस्तानि संरम्भं जनयन्ति च ॥ १०० ॥
असिते सितभागे च मूलकोशात्पतन्त्यपि ।
पक्ष्मकोपः स विज्ञेयो व्याधिः परमदारुणः ॥ १०१ ॥
वादीसे चलायमान कोएके बाल नेत्रमें प्रवेश करे और वह वारंवार नेत्रसे
रगडे जायँ, इसीसे नेत्रके काले वा सफेद भागमें सूजन होय, यह केश (बाल)
जडसे टूट जावें, अतएव इस व्याधिको पक्ष्मकोप अथवा उपपक्ष्म कहते हैं। यह
बडा दुःखदायक है ॥
पक्ष्मशातके लक्षण ।
वर्त्म पक्ष्माशयगतं पित्तं रोमाणि शातयेत् ।
कण्डूं दाहं च कुरुते पक्ष्मशातं तमादिशेत् ॥ १०२ ॥
पलकोंकी जडमें रहनेवाला पित्त कुपित होकर नेत्रोंके बाल जिनको वरुनी
अथवा बाफणी कहते हैं उनका नाश करे तथा नेत्रोंमें खुजली चले, दाह होय
उसको पक्ष्मशात कहते हैं। इस रोगको भी सुश्रुतने संख्या बढनेके भयसे नहीं
लिखा, माधवाचार्यने अन्य ग्रन्थोंके मतसे लिखा है ॥ इति वर्त्मजनिदानम् ॥
नेत्ररोगोंकी संख्या ।
नव संध्याश्रयास्तेषु वर्त्मजास्त्वेकाविंशतिः ।
शुक्लभागे दशैकश्च चत्वारः कृष्णभागजाः ॥ १ ॥
सर्वाश्रयाः सप्तदश दृष्टिजा द्वादशैव तु ।
बाह्यजौ द्वौ समाख्यातौ रोगौ परमदारुणौ ॥
भूय एतान्प्रवक्ष्यामि संख्यारूपचिकित्सितैः ॥ २ ॥
सन्धिमें होनेवाले नेत्ररोग ९ प्रकारके हैं और कोएमें होनेवाले रोग २१ हैं
और नेत्रके सफेद भागमें होनेवाले रोग ११ हैं और काले भागके ४ हैं और सर्व-
सर अर्थात् सर्व नेत्रमें होनेवाले रोग १७ हैं और दृष्टिके रोग १२ हैं और नेत्रके
बाहरके रोग २ हैं (ये हमने संगृहीत श्लोकमें लिखे हैं) ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
नेत्ररोगनिदानं समाप्तम् ॥