माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 352, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३३४ ) माधवनिदान ।
वर्त्माश्रित ( कोएमॆं स्थित ) जो वायु, सो निमेष ( पलकके उघाडने मूंदनेवाली
नस ) में प्रवेश होकर बारंबार पलकोंको चलायमान करे, उसको निमेष ( नेत्रका
मिचकाना ) कहते हैं, विदेहेने भी लिखा है। यह रोग भी सन्निपातज है ॥
शोणितार्शके लक्षण ।
वर्त्मस्थो यो विवर्द्धेत लोहितो मृदुरंकुरः ।
तद्रक्तजं शोणितार्शश्छिन्नं छिन्नं प्रवर्द्धते ॥ ९६ ॥
रुधिरके सम्बन्धसे नेत्रके कोएके भीतर भागमें लाल तथा नरम अंकुर बढे
उसको शोणितार्श कहते हैं, उसको जैसे जैसे काटे तैसे २ बढता है इस रक्तज
व्याधिको विदेह आचार्य असाध्य कहते हैं ।
लगणके लक्षण
अपाकी कठिनः स्थूलो ग्रन्थिर्वर्त्मभवोऽरुजः ।
सकण्डूः पिच्छिलः कोलसंस्थानो लगणस्तु सः ॥ ९७ ॥
नेत्रके कोएमॆं बेरके समान बडी कठिन खुजलीसंयुक्त चिकनी गांठ होय उसको
लगण कहते हैं । यह रोग कफजन्य है, इसमें पीडा और पकना नहीं होय ॥
बिसवर्त्मके लक्षण ।
त्रयो दोषा बहिः शोथं कुर्युश्छिद्राणि वर्त्मनोः ।
प्रस्रवत्यंतरुदकं बिसवद्विसवर्त्म तत् ॥ ९८ ॥
तीनों दोष कुपित होकर नेत्रके कोएको सुजाय देवें तथा उनमें छिद्र होजाय, उन
कोयौमेंसे कमलतन्तुके समान भीतरसे पानी झरे, इस रोगको बिसवर्त्म कहते हैं ॥
कुञ्चनके लक्षण ।
वाताद्या वर्त्मसंकोचं जनयंति यदा मलाः ।
तदा द्रष्टुं न शक्नोति कुंचनं नाम तद्विदुः ॥ ९९ ॥
वातादिदोष जब कोएके मार्गको संकुचित करें तब मनुष्य नेत्रको उघाड कर
नहीं देखसके, इस रोगको कुञ्चन कृच्छ्रोन्मीलन कहते हैं, यह रोग सुश्रुताचार्यने
नहीं लिखा, माधवाचार्यने ही लिखा है ॥
१ निमेषिणीः शिरा वायुः प्रविश्य व्यवतिष्ठते । अत्यर्थं चलते वर्त्म निमेषः स न सिध्यति ॥
२ वायुः शोणितमादाय शिराणां प्रमुखे स्थितः । जनयत्यंकुरं ताम्रं वर्त्मनि च्छिन्नरोहणम् ॥
तच्छोणितार्शोऽसाध्यं स्याद्रक्तास्राव्यथ रक्तजम् ॥