माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २८० ) माधवनिदान ।
( २८० ) माधवनिदान ।
बाहु ( भुजा ) की जड़, कंधा और पसवाडे इन ठिकाने पित्त कुपित होकर काले
फोडोंसे व्याप्त तथा वेदनायुक्त जो पिडिका होय उसको कक्षा वा कखलाई कहते हैं॥
गन्धमालाके लक्षण ।
एकामेतादृशीं दृष्ट्वा पिडिकां स्फोटसन्निभाम् ।
त्वग्गतां पित्तकोपेन गन्धमालां प्रचक्षते ॥ १५ ॥
पित्तके कोपसे जो कक्षामें कही हुई काले फोडेके समान एक पिडिका त्वचाके
भीतर होय उसको गन्धमाला कहते हैं ॥
अग्निरोहिणी ( काली फुन्सी ) ।
कक्षाभागेषु ये स्फोटा जायन्ते मांसदारुणाः ।
अन्तर्दाहज्वरकरा दीप्तपावकसन्निभाः ॥ १६ ॥
सप्ताहाद् द्वादशाहाद्वा पक्षाद्वा हंति मानवम् ।
तामग्निरोहिणीं विद्यादसाध्यां सान्निपातिकीम् ॥ १७ ॥
कांखके आसपास मांसके विदारण करनेवाले जो फोडे होते हैं तिसकरके अन्त-
र्दाह होय तथा ज्वर होय वे फोडे प्रदीप्त अग्निके समान लाल होयँ, इन फोडोंमें
वायु अधिक होनेसे सात दिन, पित्ताधिक्यसे बारह दिन और कफाधिक्यसे १५
दिनमें रोगी मरे, यह अग्निरोहिणी नामक त्रिदोषजा पिडिका असाध्य है ॥
चिप्पके लक्षण ।
नखमांसमधिष्ठाय वातः पित्तं च देहिनाम् ।
कुर्वाते दाहपाकौ च तं व्याधिं चिप्पमादिशेत् ॥ १८ ॥
वायु और पित्त नखोंके मांसमें स्थित होकर दाह और पाकको करे, इस रोगको
चिप्प ऐसे कहते हैं, यह अल्प दोषोंसे होय तो इसको कुनख कहते हैं ॥
अनुशयीके लक्षण ।
गभीरामल्पसंरम्भां सवर्णामुपरि स्थिताम् ।
पादस्यानुशयीं तां तु विद्यादन्तः प्रपाकिनीम् ॥ १९ ॥
पैरोंमें त्वचाके समान वर्ण यत्किंचित् सूजनयुक्त भीतरसे पकी जो पिडिका होय
उसको अनुशयी कहते हैं ॥
विदारिकाके लक्षण ।
विदारिकन्दवद् वृत्ता कक्षावंक्षणसन्धिषु ।
विदारिका भवेद्रक्ता सर्वजा सर्वलक्षणा ॥ २० ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( २८१ )
विदारीकंदके समान गोल, कांखमें अथवा वंक्षणस्थानमें जो गांठ तांबेके
रंगकीसी होय उसको विदारिका कहते हैं, यह सन्निपातसे होय है, इसमें तीनों
दोषोंके लक्षण होते हैं ॥
शर्करा ।
प्राप्य मांसशिरास्नायु श्लेष्मा मेदस्तथाऽनिलः ।
ग्रंथिं करोत्यसौ भिन्नो मधुसर्पिर्वसानिभम् ॥ २१ ॥
स्रवत्यास्रावमनिलस्तत्र वृद्धिं गतः पुनः ।
मांसं विशोष्य ग्रथितां शर्करां जनयेत्ततः ॥ २२ ॥
कफ मेद वायु ये मांस शिरा और स्नायु इनमें प्राप्त हों गांठ बांधते हैं, जब वह
फूटे तब उसमेंसे शहद, घृत, चर्बी इनके समान स्राव हो तिसकरके वायु पुनः बढ़-
कर मांसको सुखाय उसकी बारीक खिंचीसी गांठ करे, उसको शर्करा कहते हैं ॥
शर्करार्वुदके लक्षण ।
दुर्गन्धि क्लिन्नमत्यर्थं नानावर्णं ततः शिराः ।
सृजंति रक्तं सहसा तद्विद्याच्छर्करार्वुदम् ॥ २३ ॥
शर्करा होनेके अनन्तर नाडियोंसे दुर्गन्ध क्लेदयुक्त अनेक प्रकारके घृत, मेद और
वसा इनके वर्णका रुधिर स्रवै, उसको शर्करार्वुद कहते हैं परन्तु भोजने शर्करार्वुदको
शर्करा रोगके अंतर्गत कहा है ॥
पाददारीके लक्षण ।
परिक्रमणशीलस्य वायुरत्यर्थरूक्षयोः ।
पादयोः कुरुते दारीं पाददारीं तमादिशेत् ॥ २४ ॥
जिस पुरुषको बहुत चलना पडे है उसके पैर वायुके योगसे अत्यन्त रूक्ष होकर
विदीर्ण हों ( फाटें ) उसको पाददारी कहते हैं अर्थात् विवाई कहते हैं । विपादिका
कुष्ठ फटे नहीं है, यह फूट निकले है, यह इनमें भेद जानना ॥
कदर ( ठेक ) के लक्षण ।
शर्करोन्मथिते पादे क्षते वा कंटकादिभिः ।
ग्रंथिः कोलवदुत्सन्नो जायते कदरं तु तत् ॥ २५ ॥
१ तमेव भिन्नदुर्गन्धं घृतमेदोगिभं शिराः । स्रवंति स्रावमनिशं तदा स्याच्छर्करार्वुदम् ॥१॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA