माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( २८१ )
विदारीकंदके समान गोल, कांखमें अथवा वंक्षणस्थानमें जो गांठ तांबेके
रंगकीसी होय उसको विदारिका कहते हैं, यह सन्निपातसे होय है, इसमें तीनों
दोषोंके लक्षण होते हैं ॥
शर्करा ।
प्राप्य मांसशिरास्नायु श्लेष्मा मेदस्तथाऽनिलः ।
ग्रंथिं करोत्यसौ भिन्नो मधुसर्पिर्वसानिभम् ॥ २१ ॥
स्रवत्यास्रावमनिलस्तत्र वृद्धिं गतः पुनः ।
मांसं विशोष्य ग्रथितां शर्करां जनयेत्ततः ॥ २२ ॥
कफ मेद वायु ये मांस शिरा और स्नायु इनमें प्राप्त हों गांठ बांधते हैं, जब वह
फूटे तब उसमेंसे शहद, घृत, चर्बी इनके समान स्राव हो तिसकरके वायु पुनः बढ़-
कर मांसको सुखाय उसकी बारीक खिंचीसी गांठ करे, उसको शर्करा कहते हैं ॥
शर्करार्वुदके लक्षण ।
दुर्गन्धि क्लिन्नमत्यर्थं नानावर्णं ततः शिराः ।
सृजंति रक्तं सहसा तद्विद्याच्छर्करार्वुदम् ॥ २३ ॥
शर्करा होनेके अनन्तर नाडियोंसे दुर्गन्ध क्लेदयुक्त अनेक प्रकारके घृत, मेद और
वसा इनके वर्णका रुधिर स्रवै, उसको शर्करार्वुद कहते हैं परन्तु भोजने शर्करार्वुदको
शर्करा रोगके अंतर्गत कहा है ॥
पाददारीके लक्षण ।
परिक्रमणशीलस्य वायुरत्यर्थरूक्षयोः ।
पादयोः कुरुते दारीं पाददारीं तमादिशेत् ॥ २४ ॥
जिस पुरुषको बहुत चलना पडे है उसके पैर वायुके योगसे अत्यन्त रूक्ष होकर
विदीर्ण हों ( फाटें ) उसको पाददारी कहते हैं अर्थात् विवाई कहते हैं । विपादिका
कुष्ठ फटे नहीं है, यह फूट निकले है, यह इनमें भेद जानना ॥
कदर ( ठेक ) के लक्षण ।
शर्करोन्मथिते पादे क्षते वा कंटकादिभिः ।
ग्रंथिः कोलवदुत्सन्नो जायते कदरं तु तत् ॥ २५ ॥
१ तमेव भिन्नदुर्गन्धं घृतमेदोगिभं शिराः । स्रवंति स्रावमनिशं तदा स्याच्छर्करार्वुदम् ॥१॥
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