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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( १५० ) माधवनिदान ।

( १५० ) माधवनिदान ।
प्रथम स्फिक् कहिये कमरके नीचेका भाग जिसको कूला कहते हैं उसको स्तंभित
कर दे, पीछे क्रमसे कमर, पीठ, ऊरु, जानु, जंघा और पग इनको स्तम्भित करदे
अर्थात् ये रहिजाय, वेदना और तोद कहिये चोटनेकीसी पीडा होय और बारम्बार
कम्प होय, यह गृध्रसीरोग बादीसे होता है और वात कफसे होय तो इसमें तन्द्रा,
भारीपना और अरुचि ये विशेष होयँ । इस प्रकार गृध्रसीरोग दो प्रकारका है ॥
विश्वाचीके लक्षण ।
तलं प्रत्यङ्गुलीनां याः कण्डरा बाहुपृष्ठतः ।
बाह्वोः कर्मक्षयकरी विश्वाची चेति सोच्यते ॥ ५६ ॥
बाहुके पिछाडीसे लेकर हाथके ऊपरले भागपर्यंत प्रत्येक उंगलीके नीचे मोटी
नसें उनको दुष्ट कर हाथसे लेना देना पसारना मुट्टी मारनी इत्यादिक कार्योंका नाश-
कर्ता जो रोग होय उसको विश्वाचीरोग कहते हैं ॥
क्रोष्टुशीर्षके लक्षण ।
वातशोणितजः शोथो जानुमध्ये महारुजः ।
ज्ञेयः क्रोष्टुकशीर्षस्तु स्थूलः क्रोष्टुकशीर्षवत् ॥ ५७ ॥
वातरक्तसे दोनों जानुओं (घोण्टुओं) की संधिमें अत्यन्त पीडाकारक सूजन हों
और वे स्यार (गीदड) के मस्तकसमान मोटे हों उसको क्रोष्टुशीर्ष कहते हैं ॥
खंज और पांगुलेके लक्षण ।
वायुः कट्याश्रितः सक्थ्नः कण्डरामाक्षिपेद्यदा ।
खञ्जस्तदा भवेज्जन्तुः पङ्गुः सक्थ्नोर्द्वयोर्वधात् ॥ ५८ ॥
कमरमें रहा जो वात सो जंघाकी नसोंको ग्रहण कर एक पगको स्तंभित कर
दे उसको खोडा कहते हैं और दोनों जंघाओंकी नसोंको पकड दोनों स्तम्भित कर दे
उसको पांगुला कहते हैं ॥
कलायखंजके लक्षण ।
प्रकामं वेपते यस्तु खञ्जन्निव च गच्छति ।
कलायखञ्जं तं विद्यान्मुक्तसन्धिप्रबन्धनम् ॥ ५९ ॥
जो पुरुष चलते समय थरथर कांपे और खंज अर्थात् एक पैरसे हीन मालूम
होय, इस रोगमें संधिंके बंधन शिथिल होते हैं, इस रोगको कलायखंज कहते हैं ॥
वातकंटकके लक्षण ।
रुक्पादे विषमे न्यस्ते श्रमाद्वा जायते यदा ।
वातेन गुल्फमाश्रित्य तमाहुर्वातकंटकम् ॥ ६० ॥

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १५१ )
ऊंची नीची जगहमें पैर पडनेसे अथवा श्रमके होनेसे कुपित वायु टकनोंमें प्राप्त
होकर पीडा करे तो इस रोगको वातकण्टक कहते हैं ॥
पादहर्षके लक्षण ।
पादयोः कुरुते हर्षं पित्तासृक्सहितोऽनिलः ।
विशेषतश्च क्रमतः पादहर्षं तमादिशेत् ॥ ६१ ॥
जिसके पैर हर्षयुक्त झनझनाहट पीडायुक्त होंय और अत्यन्त सोय जावें उसको
पादहर्ष रोग कहते हैं । यह कफवातके कोपसे होय है ॥
अंसशोष अपबाहुकके लक्षण ।
अंसदेशे स्थितो वायुः शोषयेदंसबन्धनम् ।
शिराश्चाकुंच्य तत्रस्थो जनयेदपबाहुकम् ॥ ६२ ॥
कन्धेम रहा जो वायु सो कुपित होकर उसके बन्धनको सुखाय दे तब अंस-
शोष रोग प्रगट होय और कन्धेमें रहा जो वायु सो नसोंको संकोच करके अप-
बाहुक रोग प्रगट करे ॥
मूकादिक तीन रोगोंके लक्षण ।
आवृत्य वायुः सकफो धमनीः शब्दवाहिनीः ।
नरानकरोत्यक्रियकान्मूकमिन्मिनगद्गदान् ॥ ६३ ॥
कफयुक्त वायु शब्दके बहनेवाली नाडियोंमें प्राप्त होकर मनुष्योंकी वचन-
क्रियारहित मूक, मिन्मिन और गद्गद ऐसा करदे । मूक कहिये जिससे बोला न
जाय, मिन्मिन कहिये गिनगिनायकर नाकसे बोले और गद्गद बोलते समय बीचमें
पद और व्यञ्जनोंको न बोले और मन्द बोले इन रोगोंके कारण सदृश होकर
रोगोंके भिन्न भिन्न प्रकार होते हैं । वे दोषोंके उत्कर्ष करके अथवा प्रारब्धवशसे
होते हैं ऐसा जानना ॥
तूनीरोगके लक्षण ।
अधो या वेदना याति वर्च्चोमूत्राशयोत्थिता ।
भिन्दन्तीव गुदोपस्थं सा तूनी नाम नामतः॥ ६४ ॥
पक्वाशय और मूत्राशयसे उठी जो पीडा सो नीचे जाकर प्राप्त हो और गुदा
तथा उपस्थ कहिये स्त्रीपुरुषोंके गुह्यस्थान इनमें भेद करे अर्थात् पीडा करे उसको
तूनीरोग कहते हैं ॥
१ अद्य इति गुदोपस्थम् ।