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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( २३६ ) माधवनिदान ।

( २३६ ) माधवनिदान ।
भ्रम, अनर्थभाषण, गिरना, इन्द्रिय और मन इनको मोह, हाथ पैरका फैलाना,
ग्लानि, उष्णता, अंगोंमें शिथिलता, मूर्च्छा, श्वासका चढना, वातजन्य तीव्र पीडा,
मांसका धोया हुआ पानी ऐसा रुधिर बहे, सर्व इन्द्रिय विकल होयँ अर्थात् सब इन्द्रि-
योंका व्यापार बन्द हो जाय ये लक्षण मांस आदि पाच मर्मविद्ध होनेसे होते हैं ॥
मर्मरहितशिराविद्धके लक्षण ।
सुरेन्द्रगोपप्रतिमं प्रभूतं रक्तं स्रवेत्तत्क्षणजश्च वायुः ।
करोति रोगान्विविधान्यथोक्ताञ्छिरासु विद्धास्वथवा क्षतासु ॥२०॥
शिरा कहिये ( नाडी ) बिंध जाय, अथवा शिरामें घाव हो जाय उसमेंसे इन्द्र-
गोप ( वीरबहूटी कीडों ) के समान लाल तथा पुष्कल रुधिर स्रवे तथा रक्तक्षय
होनेसे वायु कुपित होकर अनेक प्रकारके ( आक्षेपकादि ) रोग उत्पन्न करे है ॥
स्नायुविद्धके लक्षण ।
कौब्ज्यं शरीरावयवावसादः क्रियास्वशक्तिस्तुमुला रुजश्च ।
चिराद्व्रणो रोहति यस्य चापि तं स्नायुविद्धं पुरुषं व्यवस्येत् ॥ २१ ॥
कुबडापना, शरीरके अवयवोंका गिरना, काम करनेसे असमर्थपना, बहुत पीडा
और जिसका व्रण बहुत दिनमें भरे, उसकी स्नायु विद्धभई ऐसे जाने ॥
सन्धिविद्धके लक्षण ।
शोथाभिवृद्धिस्तुमुला रुजश्च बलक्षयः पर्वसु भेदशोथौ ।
क्षतेषु संधिष्वचलाचलेषु स्यात्सर्वकर्मोपरमश्च लिङ्गम् ॥ २२ ॥
चल अथवा अचल संधिका वेध होनेसे सूजन बढे, पीडा बहुत होय, शक्तिका
नाश होय, संधिमें भेदके समान पीडा होय, सूजन होय, कुछ कार्य करे परन्तु उसमें
उपराम होय ॥
हड्डी विंधगई हो उसके लक्षण ।
घोरा रुजो यस्य निशादिनेषु सर्वास्ववस्थासु च नैति शांतिम् ।
भिषग्विपाश्चिद्वितार्थसूत्रस्तमस्थिविद्धं पुरुषं व्यवस्येत् ॥ २३ ॥
जिस पुरुषके रातदिन घोर पीडा होय, जाग्रदादि तीनों अवस्थासे शांति नहीं
होय उसके अस्थि ( हड्डी ) विंधी है ऐसे श्रेष्ठ वैद्य जाने ॥
मर्मरहितशिरादिकोंके विद्धलक्षण कहके शिरादिमर्मविद्ध लक्षणोंका हवाला देते हैं-
यथास्वमेतानि विभावयेत्तु लिङ्गानि मर्मस्वभिताडितेषु ।
मर्मके ठिकाने चोटके लगनेसे ये पूर्वोक्त लक्षण जानने चाहिये । तुशब्दसे लक्षण
और सामान्य लक्षण होते हैं ऐसे जानना ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( २३७ )
मांसमर्मके लक्षण नहीं कहे उनको कहते हैं—
पांडुर्विवर्णः स्पृशितं न वेत्ति यो मांसमर्मस्वभिताडितः स्यात्॥२४॥
जो पुरुष मांसमर्मके ठिकाने विद्ध होता है, उसका पीला वर्ण, देहका विवर्ण होय
और स्पर्शका ज्ञान न होय ॥
सर्व व्रणके उपद्रव ।
विसर्पः पक्षघातश्च शिरास्तम्भोऽपतानकः ।
मोहोन्मादव्रणरुजाज्वरतृष्णा हनुग्रहः ॥ २५ ॥
कासश्छर्दिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथुः ।
षोडशोपद्रवाः प्रोक्ता व्रणानां व्रणचिन्तकैः ॥ २६ ॥
बिसर्प, पक्षाघात, शिरास्तम्भ, अपतानक, मोह, उन्माद, ज्वर, व्रणकी पीडा,
प्यास, हनुग्रह, खांसी, वमन, अतिसार, हिचकी, श्वास और कंप ये व्रणरोगके सोलह
उपद्रव व्रणरोगके जाननेवालोंने कहे हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
आगन्तुव्रण ( सद्योव्रण ) निदानं समाप्तम् ॥
अथ भग्ननिदानम् ।
भग्न दो प्रकारका है एक सव्रण और दूसरा व्रणरहित, इनमें सव्रणको
कहकर व्रणरहितको कहते हैं—
भग्नं समासाद्द्विविधं हुताश काण्डे च संधौ च हि तत्र संधौ ।
हे अग्निवेश ! कांडभंग और संधिभंग मिलकर संक्षेपसे भग्नरोग दो प्रकारका है ॥
संधिभंगके लक्षण ।
उत्पिष्टविश्लिष्टविवर्तितं च तिर्यक्च विक्षिप्तमधश्च षोढा ॥ १ ॥
तहां संधिस्थानका भग्नरोग छः प्रकारका है । उनके नाम कहते हैं—उत्पिष्ट,
विश्लिष्ट, विवर्तित, तिर्यक्, विक्षिप्त और अधःक्षिप्त । भग्ननाम टूटनेका है ॥
संधिभंगके सामान्य लक्षण ।
प्रसारणाकुंचनवर्तनोय्रा रुक्स्पर्शविद्वेषणमेतदुक्तम् ।
सामान्यतः सन्धिगतस्य लिङ्गं-
१ “कांडमस्थिकांडः” काण्डेन नलक्कपालवलयतरुणरुचकानां ग्रहणम् । २ द्वयोरस्थ्नोः
संधानं संधिः ॥