माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 255, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( २३७ )
मांसमर्मके लक्षण नहीं कहे उनको कहते हैं—
पांडुर्विवर्णः स्पृशितं न वेत्ति यो मांसमर्मस्वभिताडितः स्यात्॥२४॥
जो पुरुष मांसमर्मके ठिकाने विद्ध होता है, उसका पीला वर्ण, देहका विवर्ण होय
और स्पर्शका ज्ञान न होय ॥
सर्व व्रणके उपद्रव ।
विसर्पः पक्षघातश्च शिरास्तम्भोऽपतानकः ।
मोहोन्मादव्रणरुजाज्वरतृष्णा हनुग्रहः ॥ २५ ॥
कासश्छर्दिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथुः ।
षोडशोपद्रवाः प्रोक्ता व्रणानां व्रणचिन्तकैः ॥ २६ ॥
बिसर्प, पक्षाघात, शिरास्तम्भ, अपतानक, मोह, उन्माद, ज्वर, व्रणकी पीडा,
प्यास, हनुग्रह, खांसी, वमन, अतिसार, हिचकी, श्वास और कंप ये व्रणरोगके सोलह
उपद्रव व्रणरोगके जाननेवालोंने कहे हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
आगन्तुव्रण ( सद्योव्रण ) निदानं समाप्तम् ॥
अथ भग्ननिदानम् ।
भग्न दो प्रकारका है एक सव्रण और दूसरा व्रणरहित, इनमें सव्रणको
कहकर व्रणरहितको कहते हैं—
भग्नं समासाद्द्विविधं हुताश काण्डे च संधौ च हि तत्र संधौ ।
हे अग्निवेश ! कांडभंग और संधिभंग मिलकर संक्षेपसे भग्नरोग दो प्रकारका है ॥
संधिभंगके लक्षण ।
उत्पिष्टविश्लिष्टविवर्तितं च तिर्यक्च विक्षिप्तमधश्च षोढा ॥ १ ॥
तहां संधिस्थानका भग्नरोग छः प्रकारका है । उनके नाम कहते हैं—उत्पिष्ट,
विश्लिष्ट, विवर्तित, तिर्यक्, विक्षिप्त और अधःक्षिप्त । भग्ननाम टूटनेका है ॥
संधिभंगके सामान्य लक्षण ।
प्रसारणाकुंचनवर्तनोय्रा रुक्स्पर्शविद्वेषणमेतदुक्तम् ।
सामान्यतः सन्धिगतस्य लिङ्गं-
१ “कांडमस्थिकांडः” काण्डेन नलक्कपालवलयतरुणरुचकानां ग्रहणम् । २ द्वयोरस्थ्नोः
संधानं संधिः ॥