माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १७० ) माधवनिदान ।
( १७० ) माधवनिदान ।
मूत्राशये वै गुदमुष्कयोश्च शोथो रुजा मूत्रविनिग्रहश्च ।
शुक्राश्मरी तत्स्रवणं भवेच्च ते ते विकारा विहते च शुक्रे॥१०॥
मैथुन करते समय वीर्य निकलनेको जो मनुष्य रोके अथवा और प्रकारसे शुक्रके
वेगको रोके उसके मूत्राशयमें सूजन होय तथा गुदामें और अंडकोशोंमें पीडा होय,
मूत्र बडे कष्टसे उतरे, शुक्राश्मरी ( पथरीके निदानमें आगे कहेंगे सो ) होय, शुक्रका
स्राव होय, ऐसे अनेक प्रकारके रोग होयँ ॥
तन्द्राङ्गमर्दारुचिः श्रमश्च क्षुधाभिघातात्कृशता च दृष्टेः ।
भूखके रोकनेसे तन्द्रा, अंगोंका टूटना, अरुचि, श्रम और दृष्टिका मन्द होना ये
रोग प्रगट होयँ । चकारसे कृशता और दुर्बलता होय यह अन्य ग्रन्थसे जानना ॥
कण्ठास्यशोषः श्रवणावरोधस्तृषाभिघाताद्धृदये व्यथा वै ॥११॥
प्यासके रोकनेसे कण्ठ और मुखका सूखना, कानोंसे मन्द सुनना और हृदयमें
पीडा ये लक्षण होयँ ॥
श्रान्तस्य निःश्वासविनिग्रहेण हृद्रोगमोहावथवापि गुल्मः ।
जो मनुष्य हारगया और वह श्वासको रोके उसके हृदयरोग, मोह और वाय-
गोला इतने रोग होयँ ॥
जृम्भाऽङ्गमर्दाक्षिशिरोऽतिजाड्यं निद्राभिघातादथ वापि तन्द्रा॥१२॥
आतीहुई निद्राके रोकनेसे जम्भाई, अंगोंका टूटना, नेत्र और मस्तककी अत्यन्त
जडता होना और तन्द्रा होय । इस प्रकार वेग रोकनेसे प्रगट रोगोंको कहे ॥
अब रूक्षादिकारणोंसे कुपित वायुसे उत्पन्न होनेवाले उदावर्त्त रोगोंको कहते हैं-
वायुः कोष्ठानुगो रूक्षकषायकटुतिक्तकैः । भोजनैः कुपितः
सद्य उदावर्त्तं करोति च ॥ १३॥ वातमूत्रपुरीषाश्रुकफमेदो-
वहानि वै । स्रोतांस्युदावर्त्तयति पुरीषं चातिवर्त्तयेत् ॥१४॥
ततो हृद्वस्तिशूलार्तो हृल्लासारतिपीडितः। वातमूत्रपुरीषाणि
कृच्छ्रेण लभते नरः ॥ १५ ॥ श्वासकासप्रतिश्यायदाहमोह-
तृषाज्वरान् । वमिहिक्काशिरोरोगमनःश्रवणविभ्रमान् ॥१६॥
बहूनन्यांश्च लभते विकारान् वातकोपजान् ॥ १७ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( १७१ )
रूखा, कसैला, तीखा और कडुवा ऐसे भोजन करनेसे कोष्ठगत वायु मल, मूत्र,
अश्रुपात, कफ और मेद इनके बहनेवाली नाडियोंके मार्गको रोकदे, मलको
सुखाय दे, तब रोगी हृदय मूत्रस्थानमें शूलके होनेसे विकल हो, सूखी रह, अस्व-
स्थपना इनसे पीडित हो, मलमूत्र और वात ये कष्टसे उतरें और श्वास, खांसी,
पीनस, दाह, मोह, प्यास, ज्वर, वमन, हिचकी, मस्तकरोग, मनकी भ्रांति, मन्द सुने
तथा वातकोपसे और भी बहुतसे विकार होयं ॥
आनाहरोगनिदान ।
आमं शकृद्वा निचितं क्रमेण भूयो विबद्धं विगुणानेलेन ।
प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानाहमुदाहरन्ति ॥ १ ॥
तस्मिन्भवत्यामसमुद्भवे तु तृष्णाप्रतिश्यायशिरोविदाहाः ।
आमाशये शूलमथो गुरुत्वं हृत्स्तंभ उद्गारविघातनं च ॥ २ ॥
स्तंभः कटीपृष्ठपुरीषमूत्रे शूलोऽथ मूर्च्छा शकृतश्च छर्दिः ।
श्वासश्च पक्वाशयजे भवन्ति तथाऽलसोक्तानि च लक्षणानि ॥३॥
आम अथवा पुरीष क्रमसे संचित हो विगुण वायुसे बारंबार विबद्ध होकर अपने
मार्गसे अच्छी रीतिसे प्रवृत्त होय नहीं, इस विकारको आनाह कहते हैं । आमसे
प्रगट अनाहरोगसे प्यास, पीनस, मस्तकमें दाह, आमाशयमें शूल, देहमें भारीपना,
हृदयका जकड जाना, शूल, मूर्च्छा, डकार, कमर, पीठ, मल, मूत्र इनका रुकना,
शूल, मूर्च्छा और विष्ठा मिलीहुई रह और श्वास ये लक्षण होयं । पक्वाशयमें आनाह
रोग होनेसे अलसकरोगोक्त लक्षण ( आध्मानवातोरोधादिक ) होते हैं ॥
असाध्य लक्षण ।
तृष्णार्दितं परिक्लिष्टं क्षीणं शूलैरुपद्रुतम् ।
शकृद्वमन्तं मतिमानुदावर्तिनमुत्सृजेत् ॥ ४ ॥
प्याससे पीडित, क्लेशयुक्त, क्षीण, शूलसे पीडित और मलको रह करनेवाला ऐसे
उदावर्त्तरोगीको वैद्य त्याग दे ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषा-
टीकायामुदावर्त्तनिदानं समाप्तम् ॥
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