माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ें( १७० ) माधवनिदान ।
मूत्राशये वै गुदमुष्कयोश्च शोथो रुजा मूत्रविनिग्रहश्च ।
शुक्राश्मरी तत्स्रवणं भवेच्च ते ते विकारा विहते च शुक्रे॥१०॥
मैथुन करते समय वीर्य निकलनेको जो मनुष्य रोके अथवा और प्रकारसे शुक्रके
वेगको रोके उसके मूत्राशयमें सूजन होय तथा गुदामें और अंडकोशोंमें पीडा होय,
मूत्र बडे कष्टसे उतरे, शुक्राश्मरी ( पथरीके निदानमें आगे कहेंगे सो ) होय, शुक्रका
स्राव होय, ऐसे अनेक प्रकारके रोग होयँ ॥
तन्द्राङ्गमर्दारुचिः श्रमश्च क्षुधाभिघातात्कृशता च दृष्टेः ।
भूखके रोकनेसे तन्द्रा, अंगोंका टूटना, अरुचि, श्रम और दृष्टिका मन्द होना ये
रोग प्रगट होयँ । चकारसे कृशता और दुर्बलता होय यह अन्य ग्रन्थसे जानना ॥
कण्ठास्यशोषः श्रवणावरोधस्तृषाभिघाताद्धृदये व्यथा वै ॥११॥
प्यासके रोकनेसे कण्ठ और मुखका सूखना, कानोंसे मन्द सुनना और हृदयमें
पीडा ये लक्षण होयँ ॥
श्रान्तस्य निःश्वासविनिग्रहेण हृद्रोगमोहावथवापि गुल्मः ।
जो मनुष्य हारगया और वह श्वासको रोके उसके हृदयरोग, मोह और वाय-
गोला इतने रोग होयँ ॥
जृम्भाऽङ्गमर्दाक्षिशिरोऽतिजाड्यं निद्राभिघातादथ वापि तन्द्रा॥१२॥
आतीहुई निद्राके रोकनेसे जम्भाई, अंगोंका टूटना, नेत्र और मस्तककी अत्यन्त
जडता होना और तन्द्रा होय । इस प्रकार वेग रोकनेसे प्रगट रोगोंको कहे ॥
अब रूक्षादिकारणोंसे कुपित वायुसे उत्पन्न होनेवाले उदावर्त्त रोगोंको कहते हैं-
वायुः कोष्ठानुगो रूक्षकषायकटुतिक्तकैः । भोजनैः कुपितः
सद्य उदावर्त्तं करोति च ॥ १३॥ वातमूत्रपुरीषाश्रुकफमेदो-
वहानि वै । स्रोतांस्युदावर्त्तयति पुरीषं चातिवर्त्तयेत् ॥१४॥
ततो हृद्वस्तिशूलार्तो हृल्लासारतिपीडितः। वातमूत्रपुरीषाणि
कृच्छ्रेण लभते नरः ॥ १५ ॥ श्वासकासप्रतिश्यायदाहमोह-
तृषाज्वरान् । वमिहिक्काशिरोरोगमनःश्रवणविभ्रमान् ॥१६॥
बहूनन्यांश्च लभते विकारान् वातकोपजान् ॥ १७ ॥
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