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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

अ० ८ ] सूत्रस्थानम् १०१

Page 125Permalink

अ० ८ ] सूत्रस्थानम् १०१
अष्टमोऽध्यायः ।
अथात इन्द्रियोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
आहार एवं 'स्वस्थ-चतुष्क' कहने के अनन्तर 'इन्द्रियोपक्रमणीय' नामक
अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
इह खलु पञ्चेन्द्रियाणि पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि
पञ्चेन्द्रियार्थाः पञ्चेन्द्रियबुद्धयो भवन्तीत्युक्तमिन्द्रियाधिकारे ॥ ३ ॥
इस आयुर्वेद के प्रकरण में पाँच इन्द्रियाँ हैं। पाँच ही इन्द्रियों के ग्राह्य
द्रव्य हैं। पांच ही इन्द्रियों के अधिष्ठान हैं। पांच ही इन्द्रियों के अर्थ, पाँच
प्रकार की इन्द्रियों का ज्ञान है ऐसा पूर्वाचार्यों ने इन्द्रियों के विषय में कहा है ॥
अतीन्द्रियं पुनर्मनः सत्त्वसञ्ज्ञकं चेत इत्याहुरेके, तदर्थात्मसंपत्त-
दायत्तचेष्टं चेष्टाप्रत्ययभूतमिन्र्द्रियाणाम् ॥ ४ ॥
'मन' अतीन्द्रिय अर्थात् इन्द्रियों में सूक्ष्मतम है वह इसी मन को 'सत्त्व'
कहते हैं। इसी मन को कितने 'चित्त' इस नाम से कहते हैं। वह मन अपने
विषय और आत्मा इन की श्रेष्ठता के अधीन व्यापार वाला है और इन्द्रियों की
चेष्टाओं का कारण है। एवं इन्द्रियों की चेष्टाओं, व्यापार वा प्रतीति का
कारण मन ही है ॥ ४ ॥
स्वार्थेन्द्रियार्थ-संकल्प-व्यभिचरणाच्चानेकमेकस्मिन् पुरुषे सत्त्वम्,
रजस्तमः सत्त्व-गुण-योगाच्च; न चानेकत्वम्, नह्येकं ह्येककालमनेकेषु
प्रवर्तते, तस्मान्नैक-काला सर्वेन्द्रिय-प्रवृत्तिः ॥ ५ ॥
वास्तव में 'मन' एक ही है, परन्तु इन्द्रियों के अपने २ द्रव्य में विषय के
संकल्पों के बदलते रहने से एक पुरुष में अनेक मन एवं मन के सत्त्व गुण होने
पर, सत्त्व, रजस्, तमस् इन गुणों के न्यूनाधिक होने से अनेक मन एकही
मनुष्य में प्रतीत होते हैं। वास्तव में मन एक ही है अनेक नहीं है। क्योंकि
एक ही समय में एक मन अनेक इन्द्रियों में प्रवृत्त नहीं हो सकता इसलिये
एक ही समय में सब इन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ चेष्टा नहीं होती ॥ ५ ॥
यद्गुणं चाभीक्ष्णं पुरुषमनुवर्त्तते सत्त्वम्, तत्सत्त्वमेवोपविशन्ति
...यद्बहुत्वानुशयात् ॥ ६ ॥
जिस गुण (सत्व, रजस् या तमस् ) वाला मन बार बार अनु-

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१०८ चरकसंहिता [अ० ८
सरण करता है, मन को उसी ही गुण वाला मुनि लोग कहते हैं। क्योंकि जिस
गुण की अधिकता होगी उसी गुण वाला मन होगा ॥ ६ ॥
मनःपुरःसराणीन्द्रियाण्यथं-ग्रहण-समर्थानि भवन्ति ॥ ७॥
इन्द्रियां मन को साथ में लेकर ही विषय के ग्रहण करने में समर्थ होती हैं।
बिना मन के इन्द्रियां विषय को ग्रहण नहीं कर सकतीं ॥ ७ ॥
तत्र चक्षुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं स्पर्शनमिति पञ्चेन्द्रियाणि ॥ ८ ॥
पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि—खं वायुर्ज्योतिरापो भूरिति ॥ ६ ॥
पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि अक्षिणी कर्णौ नासिके जिह्वा त्वक् चेति।१०।
पञ्चेन्द्रियार्थाः—शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः ॥ ११ ॥
आंख, श्रोत्र, नासिका, जिह्वा और त्वचा ये पांच इन्द्रियां हैं। पांच
इन्द्रियों के पांच ग्राह्य पदार्थ हैं, यथा आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी।
इन्द्रियों के पांच अधिष्ठान हैं, यथा चक्षु गोलक दो, दोनों बाह्य कान, जीभ,
दोनों नासिकायें और त्वचा। इन्द्रियों के पांच विषय हैं:—शब्द, स्पर्श, रूप,
रस और गन्ध। इन्द्रिय-ज्ञान भी पांच प्रकार का है—चक्षुर्ज्ञान, श्रोत्र-ज्ञान,
गन्ध-ज्ञान, रस ज्ञान और स्पर्श ज्ञान ॥ ८-११ ॥
पञ्चेन्द्रियबुद्धयश्चक्षुर्बुद्ध्यादिकाः, ताः पुनरिन्द्रियेन्द्रियार्थसत्त्वा-
त्मसंनिकर्षजाः क्षणिका निश्चयात्मिकाश्च इत्येतत्पञ्चपञ्चकम् ॥१२॥
ये पांचों इन्द्रियों के विषय, मन और आत्मा इनका एक साथ संयोग होने
से उत्पन्न होते हैं। यह और ही क्षणिक निश्चयात्मक (स्थायो ज्ञान) है। इस
प्रकार से ये पांच-पांच पदार्थों के समूह होते हैं ॥ १२ ॥
मनो मनोऽर्थो बुद्धिरात्मा चेत्यध्यात्म-द्रव्य-गुण-संग्रहः शुभाशुभ-प्रवृ-
त्तिनिवृत्ति हेतुश्च, द्रव्याश्रितं च कर्म, यदुच्यते क्रियेति ॥ १३ ॥
मन, मन के अर्थ (विषय), बुद्धि और आत्मा यह अध्यात्म द्रव्यों का
और गुणों का संग्रह है। तथा जो कर्म द्रव्य में आश्रित है उसे क्रिया कहते हैं।
'शुभ' दोनों लोकों में कल्याणकारी, अशुभ (लोकों में निन्दित), प्रवृत्ति,
निवृत्ति ये कारण हैं ॥१३ ॥
तत्रानुमानगम्यानां पञ्च-महाभूत-विकार-समुदायात्मकानामपि स-
तामिन्द्रियाणां तेजश्चक्षुषि, खं श्रोत्रे, घ्राणे क्षितिः, आपोरसने, स्पर्शनेऽ-
निलो विशेषेणोपदिश्यते ॥ १४ ॥
अनुमान द्वारा जानने योग्य इन्द्रियां पंचमहाभूतों के विकार के समूह...
उत्पन्न हुई हैं तो भी, तेज आंखों में, आकाश श्रोत्रों में, पृथिवी ना... और
जल रसना में और वायु त्वचा में विशेष रूप से रहते हैं ॥ १४ ...