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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

अ० ८] निदानस्थानम् ४७३

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अ० ८] निदानस्थानम् ४७३
वाले, शरीर की अन्य चेष्टाओं को विषम रूप से करने वाले, अत्यन्त क्षीण
शरीर वाले तथा रज और तमोगुण से व्याप्त चित्तवाले—ऐसे पुरुषों में अन्त-
रात्मा के प्रधान स्थान हृदय को बढ़े हुए दोष घेर लेते हैं । इसी प्रकार भिन्न-
भिन्न इन्द्रियों के स्थानों में भी जब ये कुपित दोष फैल जाते हैं और काम,
क्रोध, भय, लोभ, मोह, हर्ष, शोक, चिन्ता, उद्वेग आदि द्वारा हृदय तथा
इन्द्रिय स्थानों को भर देते हैं, उस समय मनुष्य की स्मृति (भान) नष्ट हो
जाती है और वह बेहोश हो जाता है ॥ ४ ॥
अपस्मारं पुनः स्मृति-बुद्धि-सत्त्व-संप्लवाद्वीभत्सचेष्टमावस्थिकं तमः-
प्रवेशमाचक्षते ॥ ५ ॥
अपस्मार का लक्षण—स्मृति, बुद्धि और चित्त इन के विकृत होने से
मुख में झाग, वमन, अंग-भंग आदि बीभत्स शरीर चेष्टाओं के होने से एक-
दम तमोगुण के कारण बेसुध स्थिति में आ जाने को 'अपस्मार' कहते हैं ॥५॥
तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा—भ्रूव्युदासः सततमक्ष्णो-
र्वैकृतमशब्दश्रवणं लालासिङ्घाणकप्रस्रवणमनन्नाभिलषणमरोचका-
विपाको हृदयग्रहः कुक्षेराटोपो दौर्बल्यमङ्गमर्दो मोहस्तमसो दर्शनं
मूर्च्छा भ्रमश्चाभीक्ष्णं च स्वप्ने मद-नर्तन-पीडन-वेपथु-व्यथन-व्यधन-
पतनादीन्यपस्मारपूर्वरूपाणि भवन्ति । ततोऽनन्तरमपस्माराभिनिर्वृ-
त्तिरेव ॥ ६ ॥
अपस्मार के पूर्वरूप—अपस्मार के निम्नलिखित पूर्वरूप होते हैं । यथा—
भ्रुवों का संकुचित (वक्र) होना, आंखों का निरन्तर विकृत रहना, कान की
श्रवण शक्ति का नष्ट होना (जो बोला जाय उसे स्पष्ट न सुनना), मुख से लार
और नासिका से मल का बहना, भोजन में अनिच्छा, अरुचि, अविपाक, हृदय-
ग्रह, पेट में अफारा, कृशता, अंगों में पीड़ा, मोह, अन्धकार का आंखों के
सामने आना, मूर्च्छा, भ्रम (चक्कर आना), स्वप्न में मस्त हो कर नाचना,
कांपना, पीड़न, बींधना, गिरना आदि पूर्व-लक्षण होते हैं । इन लक्षणों के पीछे
अपस्मार रोग उत्पन्न होता है ॥ ६ ॥
तत्रेदमपस्मारविशेषविज्ञानं भवति । तद्यथा—अभीक्ष्णमपस्मरन्तं
क्षणे संज्ञां प्रतिलभमानमुत्पिण्डिताक्षमसाज्ञा विलपन्तमुद्वमन्तं फेनमती-
वाऽऽध्मातग्रीवमाविद्धशिरस्कं विषमविनताङ्गुलिकमनवस्थितसक्थि-
[-पादहस्तं-परुष-श्याव-नख-नयन-वदन-त्वचमनवस्थित-चपल-परुष-
वातळानुपशयं विपरीतोपशयं वातेनापस्मरन्तं

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४७४ चरकसंहिता [ अ० ८
वातजन्य अपस्मार के लक्षण - अपस्मार रोग के विशेष लक्षण ये हैं।
यथा—रोगी बेसुध होकर शीघ्र ही थोड़े थोड़े समय में सचेत हो जाता है, आंखों
का बहुत फैलना, व्यर्थ का बकवाद करना, मुख से झाग गिरना, ग्रीवा का भरा
एवं जकड़ा रहना, शिर का टेढ़ा रहना ( शिर में बींधने के समान पीडा होना),
अंगुलियों का विषम होना या मुड़ जाना, टांग, पांव और हाथ का चलाना
( इन में अस्थिरता ), नख, आंख, मुख और त्वचा का लाल, कठोर, खर्रा
होना, चंचल, अस्थिर, कठोर, रूक्ष आदि रूप गिरते समय रोगी को दीखते
हैं। वातकारक पदार्थों से रोग में वृद्धि और विरुद्ध पदार्थों से इस की शान्ति
होती है, ये वातजन्य अपस्मार के लक्षण हैं ॥ ७ ॥
अभीक्षणमपस्मरन्तं क्षणे क्षणे संज्ञां प्रतिलभमानमवकूजन्तमास्फा-
लयन्तं च भूमिं हरित-हारिद्र-ताम्र-नख-नयन-वदन-त्वचं रुधिरोक्षितोग्र-
भैरव