चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० ५] २६ निदानस्थानम् ४४९
अ० ५] २६ निदानस्थानम् ४४९
वातादि दोष के अनुसार कुष्ठ—वात आदि तीनों दोष प्रकुपित होकर
जब त्वचा, मांस, रक्त और लसीका इन चारों को दूषित करते हैं, तब कुष्ठ-
रोग उत्पन्न होता है । इनमें वात की अधिकता से कापालकुष्ठ, पित्त की
अधिकता से औदुम्बर-कुष्ठ, कफ की अधिकता से मण्डल-कुष्ठ, वात-पित्त की
अधिकता से ऋष्यजिह्व-कुष्ठ, पित्त-कफ की अधिकता से पुण्डरीक-कुष्ठ, कफ-
वायु की अधिकता से सिध्म-कुष्ठ होता है और सब दोषो की वृद्धि होने से
काकणक-कुष्ठ उत्पन्न होता है । इस प्रकार से सात कुष्ठ उत्पन्न होते हैं ।
यही सात प्रकार के कुष्ठ प्रकृति के तर-तम अर्थात् न्यूनाधिक भेद के
कारण नाना प्रकार के कुष्ठों के असंख्य भेद उत्पन्न कर देते हैं ॥७॥
तत्रे॒दं सर्वकुष्ठनिदानं समासेनोपदेक्ष्यामः । शीतोष्णव्यत्यासमननु-
पूर्व्योपसेवमानस्य तथा संतर्पणापतर्पणाभ्यवहार्यव्यत्यासं च, मधु-फा-
णित-मत्स्य-मूल-काकमाचीश्च सततमतिमात्रमप्यजीर्णेऽन्ने समश्नतश्चि-
लिचिमं च पयसा,हायनक-यवक-चीनकोद्दालक-कोरदूषप्रायाणि चान्नानि
क्षीर-दधि-तक्र-कोल-कुलत्थ-माषातसी-कुसुम्भ-परुष-स्नेहवन्ति, एतैरेवा-
तिमात्रं सुहितभक्षितस्य च व्यवाय-व्यायाम-संतापानत्युपसेवमानस्य,
अतिभयश्रमसंतापोपहतस्य च सहसा शीतोदकमवतरतो, विदग्धं
चाऽऽहारजातमनुल्लिख्य विदाहीन्यभ्यवहरतः, छर्दिं च प्रतिघ्नतः,
स्नेहांश्चातिचरतो युगपत् त्रयो दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, त्वगादयश्चत्वारः
शैथिल्यमापद्यन्ते, तेषु शिथिलेषु त्रयो दोषाः प्रकुपिताः स्थानमभिगम्य
संतिष्ठमानास्तानेव त्वगादीन् दूषयन्तः कुष्ठान्यभिनिर्वर्तयन्ति ॥ ८ ॥
कुष्ठ रोग के कारण—अब संक्षेप से सब कुष्ठों का निदान कहते हैं।
शीत और उष्ण के परिवर्त्तन से, शीत और उष्ण के परित्याग से (अर्थात्
उष्ण सेवन करके सहसा शीत सेवन या इसके विपरीत तथा अनुचित काल में
शीतोष्ण सेवन से ), संतर्पण एवं अतर्पण दोनों के उलट फेर से, मधु, फाणित
(राब), मछली, मूली, काकमाची (मकोय), इनके निरन्तर या अधिक मात्रा
में खाने से, अजीर्ण में भोजन करने से, दूध के साथ चिलचिम-मछली के
उपयोग से, हायनक, यवक, चीनक, उद्दालक, कोद्रव आदि कुधान्यों के बहुत
खाने से, दूध, दही, छाछ, बेर, कुलथी, उड़द, अलसी, धनिया, इनके तेल
में तैयार किये पदार्थों के अतिसेवन से, मैथुन, व्यायाम और सन्ताप के
करने से, भय, श्रम और सन्ताप से युक्त होने पर एकदम ठण्डे पानी
से (ठण्डी वायु के स्पर्श से भी), विदाहकारक पदार्थों का वमन
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न करके पुनः विदाहकारक पदार्थों के खाने से; वमन के वेग को रोकने से,
स्निग्ध पदार्थों के अति भोजन से, तीनों दोष एक साथ में कुपित होजाते हैं,
तथा त्वचा, रक्त, मांस और लसीका चारों धातु शिथिल होजाते हैं। इन
शिथिल हुए धातुओं में कुपित हुए दोष किसी एक भाग में स्थान पाकर घर
कर लेते हैं। वहां पर रहकर त्वचा आदि को दूषित बनाकर कुष्ठरोग उत्पन्न
करते हैं ॥८॥
तेषामिमानि खलु पूर्वरूपाणि । तद्यथा—अस्वेदनमतिस्वेदनं
पारुष्यमतिश्लक्ष्णता वैवर्ण्यं कण्डूर्निस्तोदः सुप्तता परिदाहः परिहर्षो
लोमहर्षः खरत्वमुष्णायनं गौरवं श्वयथुर्विसर्पागमनमभीक्ष्णं कायच्छि-
द्रेषूपदेहः पक-दग्ध-दष्ट-क्षतोपस्खलितेष्वतिमात्रं वेदना स्वल्पानामपि च
व्रणानां दुष्टिरसंरोहणं चेति कुष्ठपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ६ ॥
कुष्ठरोग के पूर्वरूप ये हैं—जैसे पसीने का सर्वथा न आना या बहुत
पसीना आना, त्वचा में कर्कशता या कठोरता, अथवा बहुत चिकनापन, रंग
परिवर्तन, खाज, सुई चुभने की सी वेदना, स्पर्शज्ञान की शून्यता, जलन,
रोमांच, हर्ष, रूक्षता, उष्णता, भारीपन, सूजन, वीसर्प रोग का होना, शरीर
के छिद्रों में बार बार लेप सा होना, अवरोध, पकने या जलने या कटने या
चोट लगने या गिरने पर बहुत दर्द होना, थोड़े से व्रण का भी संक्रान्त होना
या शीघ्र न भरना, ये कुष्ठ के पूर्वरूप हैं ॥६॥
तेभ्योऽनन्तरं कुष्ठानि जायन्ते । तेषामिदं वेदना-वर्ण-संस्थान-
प्रभाव-नाम-विशेष-विज्ञानं भवति । तद्यथा—रूक्षारुणपरुषाणि विष-
मविस्तृतानि खरपर्यन्तानि तनुन्युद्गच्छद्बहिरस्तनूनि सुप्तसुप्तानि हृषितलो-
माचितानि निस्तोदबहुळान्यल्पकण्डू-दाह-पूय-लसीकान्याशुगतिसमु-
त्थानान्याशुभेदीनि जन्तुमन्ति कृष्णारुणकपालवर्णानि च कापालकुष्ठा-
नीति विद्यात् ॥ १० ॥
उनके पीछे कुष्ठ उत्पन्न होते हैं । इसके आगे इनके वेदना, वर्ण,
संस्थान, प्रभाव, नाम विशेष वर्णन करते हैं ।
कापाल-कुष्ठ—रूक्ष, अरुण वर्ण, कर्कश, विषम, फैला, तथा किनारों
पर खरखर, बाह्य पार्श्व से पतला तथा थोड़ा उभरा हुआ, पतला, फैला, सोये
हुये के समान सोया, बहरा ( स्पर्शज्ञान शून्य ), रोमांच सहित, अतिशय
चुभने की वेदनावाले, थोड़ी, खाज, दाह, पूय, लसीका युक्त; शीघ्रता
उत्पन्न होनेवाले, शीघ्र फटनेवाले, कीड़ेवाले, काले लाल, कपाल वर्ण के,
को 'कापाल कुष्ठ' कहते हैं । कपाल-मिट्टी का ठीकरा, उसके समान ॥ १ ॥