चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० ४] निदानस्थानम् ४३७
अ० ४] निदानस्थानम् ४३७
यदा ह्येते त्रयो निदानादिविशेषाः परस्परं नानुबध्नन्ति, अथवा वा
कालप्रकर्षाद्बवलीयांसो वाऽनुबध्नन्ति न तदा विकाराभिनिर्वृत्तिः,
चिराद्वाऽप्यभिनिर्वर्तन्ते, तनवो वा भवन्त्यथवाऽप्ययथोक्तसर्वलिङ्गाः ।
विपर्यये विपरीताः; इति सर्वविकार-विघात-भावाभाव-प्रतिविशेषाभि-
निर्वृत्त हेतुर्भवत्युक्तः ॥ ५ ॥
रोगों के उत्पन्न होने और न होने का कारण—निदान दोष और दूष्य
भावों की भिन्नता से रोग उत्पन्न होते हैं और नहीं भी उत्पन्न होते हैं । जब
निदानादि ये तीनों परस्पर नहीं मिलते, अथवा लम्बे समय पीछे मिलते हैं, या
निर्बल अवस्था में मिलते हैं, तब रोग उत्पन्न नहीं होता, यदि उत्पन्न भी
होता है तो देर में उत्पन्न होता है या निर्बल रूप में या अपूर्ण लक्षणों के
साथ उत्पन्न होता है । परन्तु जब निदान, दोष और दूष्य परस्पर समानरूप में
मिलते हैं, तब शीघ्र, बलवान् एवं सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त रोग उत्पन्न होता है ।
सब रोगों की उत्पत्ति में निदान दोष और द्रव्य का होना या न होना
कारण होता है ॥५॥
तत्रेमे त्रयो निदानादिविशेषाः श्लेष्मनिमित्तानां प्रमेहाणामाश्र्व-
भिनिर्वृत्तिकरा भवन्ति । तद्यथा-हायनक-यवक-चीनकोद्दालक-नैषधै-
त्कट-मुकुन्दक-महाव्रीहि-प्रमोदक-सुगन्धकानां नवानामतिवेलमतिप्रमा-
णेनोपयोगः, तथा सर्पिष्मतां नवहरेणुमाषसूप्यानां ग्राम्यानूपौदकानां
च मांसानां शाक-तिल-पलल-पिष्टान्न-पायस-कृशर-विलेपीक्षुविकाराणां
क्षीर-मन्दक-दधि-द्रव-मधुर-तरुणप्रायाणामुपयोगो, मृजा-व्यायाम-वर्जनं,
स्वप्नशयनासनप्रसङ्गो यश्च कश्चिद्विधिरन्योऽपि श्लेष्म-मेदो-मूत्र-सञ्जननः
स सर्वो निदानविशेषः ॥ ६ ॥
कफजन्य प्रमेह में निदानादि की भिन्नता—निम्न कारणों से कफजन्य
प्रमेह मुख्यतः उत्पन्न होता है । यथा हायनक ( धान्य विशेष ), यवक (जौ ),
चीनक, उद्दालक, नैषध, इत्कट, मुकुन्दक, महाव्रीहि, प्रमोदक, सुगन्धक
इत्यादि जाति के चावलों को अतिमात्रा में वा नूतन चावलों का उपयोग
करने से, इसी प्रकार घी के साथ हरेणु ( मटर ), उड़द की दाल, ग्राम्य
या आनूप अथवा जलचर प्राणियों का मांस अधिक खाने से, भाजी,
तिल, मांस, पिष्टो से बने पदार्थ खीर, खिचड़ी, विलेपी गाढ़ी कांजी),
ईखे के रस से बनी वस्तुओं के अति उपयोग करने से, दूध,
मन्दक, दही, द्रव, मधुर पदार्थ या नवीन धान्यों के अति उपयोग करने से,
शरीर का शोधन न करने से, अंगों को परिचालन न करने से, सोने, बैठने या
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बैठे रहने से, अथवा कफ, मेद व मूत्र को बढ़ाने वाला जो भी कारण होता
है वे सब प्रमेहों के विशेष कारण हैं ॥६॥
बहुद्रवः श्लेष्मा दोषविशेषः ॥ ७ ॥
बह्वबद्धं मेदोमांसं शरीरजक्लेदः शुक्रं शोणितं च वसा मज्जा
लसीका रसश्चौजःसंख्यात इति दूष्यविशेषाः ॥ ८॥
कफप्रमेह के दूष्य — बहुत तरल ( द्रव ) कफ इसमें दोष होता है, बहुत
अबद्ध ( असंहत अर्थात् ढीला-शिथिल ) मेद मांस, शरीरजन्य क्लेद, शुक्र,
शोणित, वसा, मज्जा, लसीका, रस और ओज ये दूष्य विशेष हैं अर्थात् इनमें
ही दोष अपना बुरा प्रभाव उत्पन्न करता है१ ॥८॥
त्रयाणामेषां निदानादिविशेषाणां सन्निपाते क्षिप्रं श्लेष्मा प्रको-
पमापद्यते प्रागभिभूयस्त्वत् , स प्रकुपितः क्षिप्रमेव शरीरे विसृतिं
लभते, शरीरशैथिल्यात्स विसर्पञ्छरीरे मेदसैवादितो मिश्रीभावं
गच्छति, मेदसश्चैव बह्वबद्धत्वान्मेदसश्च गुणानां गुणैः समानगुणभूयि-
ष्ठत्वात्स मेदसा मिश्रीभावं गच्छन् दूषयत्येनद्विकृतत्वात् , स विकृतो
दुष्टेन मेदसोपहितः शरीरक्लेदमांसाभ्यां संसर्गं गच्छति, क्लेदमांसयोर-
तिप्रमाणाभिवृद्धत्वात् स मांसे मांसप्रदोषात्पूतिमांसपिडकाः शरा-
विकाकच्छपिकाद्याः संजनयति, अप्रकृतिभूतत्वात्, शरीरक्लेदं पुन-
र्दूषयन्मूत्रत्वेन परिणमयति । मूत्रवहानां च स्रोतसां वङ्क्षणबस्ति-
प्रभवाणां मेदःक्लेदोपहितानि गुरूणि मुखान्यासाद्य प्रतिरुध्यते; ततस्तेषां
स्थैर्यमसाध्यतां वा जनयति, प्रकृतिविकृतिभूतत्वात् ॥ ६॥
कफप्रमेह की सम्प्राप्ति—निदान, दोष और दूष्य इन तीनों के मिलने से
कफ शीघ्र कुपित हो जाता है। क्योंकि रोग उत्पत्तिकाल में कफ अधिक बढ़ा
होता है। इस प्रकार से कुपित कफ जल्दी ही शरीर में फैल जाता है। शरीर
के शिथिल होने से फैलता हुआ यह कफ सबसे प्रथम शरीर में मेद के साथ
१. प्रमेह में सब से प्रथम कफ का ही बिगाड़ होता है । इसलिये यह
तो दोष है, और सप्तधातु, रस, रक्त, मांस आदि ये इससे दूषित होते हैं,
इसलिये ये दूष्य हैं। इस अवस्था में जिस अपर ओज का परिमाण आधा
अञ्जलि कहा है, वह ओज भाग विकृत होता है । क्लेद रक्त का तरल भाग
है जिसके दूषित होने से मधुमेह रोगी के व्रण शीघ्र अच्छे नहीं होते।
शरीर में त्वचा के नीचे रहने वाला पतला श्वेत, चिकना पदार्थ है जो
की रक्षा करता है। ये सब दूष्य हैं।
मिलता है। क्योंकि मेद बहुत अबद्ध अर्थात् शिथिल रूप में होता है। तथा
मेद के गुणों के समान गुण ही कफ के हैं और शरीर में मेद का परिमाण भी
बहुत है। मेद के साथ मिलकर कफ अपने आप दूषित होने से इस को भी
दूषित बना देता है। यह विकृत कफ दुष्ट मेद के साथ मिलकर शरीर के
क्लेद भाग और मांस के साथ मिल जाते हैं। शरीर में क्लेद और मांस बहुत
मात्रा में बढ़े होते हैं। यह मांस को दूषित करके मांस में उत्पन्न होने वाली
पिडकायें, शराविका, कच्छपिका आदि को उत्पन्न करता है। क्योंकि कफ
अपनी प्रकृति में नहीं रहता, इसलिये अपनी शक्ति से इनको उत्पन्न करता
है। शरीर के क्लेद को दूषित करके मूत्र रूप में बदल देता है। वंक्षण सन्धि
तथा बस्ति से उत्पन्न होने वाले मूत्र वह स्रोतों के मुख मेद और क्लेद के भारी
होने से बन्द हो जाते हैं। इसलिये इनमें प्रमेह टिक जाता है। या बहुत
बढ़कर असाध्य बन जाता है। क्योंकि कफ, मेद और वसा में समान है, परन्तु
रक्तादि में असमान होता है; इसलिये प्रकृति विकृति होने से प्रमेह स्थिर बन
जाते हैं या असाध्य हो जाते हैं ॥९॥
शरीरक्लेदस्तू श्लेष्म-मेदो-मिश्रः प्रविशन्मूत्राशयं मूत्रत्वमापद्यमानः
श्लैष्मिकैरेभिर्दशभिर्गुणैरुपसृज्यते वैषम्ययुक्तः । तद्यथा—श्वेत-शीत-
मूर्त-पिच्छिलाच्छ-स्निग्ध-गुरु-प्रसाद-मधुर-सान्द्र-मन्दैः; अत्र येन
गुणेनैकेनानेकेन वा भूयस्तरमुपसृज्यते तत्समाख्यं गौणं नामविशेषं
प्राप्नोति ॥१०॥
शरीर की आर्द्रता कफ और मेद से मिलकर मूत्राशय में प्रवेश करती है।
वहां पर मूत्ररूप होकर विषमतावाले कफ के दस गुणों के साथ मिल जाती है।
कफ के दस गुण-श्वेत, शीतल, मूर्त, पिच्छिल, स्निग्ध, गुरु, प्रसाद, मधुर,
सान्द्र और मन्द, इनमें से एक गुण की या अनेक गुणों की प्रधानता होने से
उसी के अनुसार सामान्य या विशेष नाम मिलता है ॥१०॥
ते तु खल्विमे दश प्रमेहा नामविशेषेण भवन्ति । तद्यथा—उदक-
मेहश्चेक्षुवालिकाऱसमेहश्च, सान्द्रमेहश्च, सान्द्रप्रसादमेहश्च, शुक्लमेहश्च,
शुक्रमेहश्च, शीतमेहश्च, सिकतामेहश्च, शनैर्मेहश्चाऽऽलाढमेहश्चेति ॥११॥
ते दश प्रमेहाः साध्याः समानगुणमेदाःस्थानत्वात्कफस्य प्राधान्या-
त्क्रियत्वाच्च ॥ १२॥
कफजन्य दस प्रमेह—इस प्रकार से कफजन्य प्रमेह दस प्रकार के हैं।
नाम (१) उदकमेह, (२) इक्षुवालिकारसमेह, (३) सान्द्रमेह, (४) सान्द्र-
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प्रसादमेह, (५) शुक्लमेह, (६), शुक्रमेह, (७) शीतमेह (८) सिकतामेह (६)
शनैर्मेह और (१०) आलालमेह ।
ये कफजन्य दस प्रमेह साध्य हैं। क्योंकि कफ और मेद के गुण एवं स्थान
समान हैं, तथा कफ की प्रधानता होने से और कफ और मेद की चिकित्सा
के समान होने से कफप्रमेह साध्य है ॥ १२॥
तत्र श्लोकाः श्लेष्मप्रमेहविज्ञानार्था भवन्ति ।
कफप्रमेहों को बताने के लिये श्लोक कहते हैं—
अच्छं बहुसितं शान्तं निर्गन्धमुदकोपमम् ।
श्लेष्मकोपान्नरो मूत्रमुदमेही प्रमेहति ॥ १३ ॥
अत्यर्थमधुरं शीतमीषत्पिच्छिलमाविलम् ।
काण्डेक्षुरससंकाशं श्लेष्मकोपात्प्रमेहति ॥ १४ ॥
यस्य पर्युषितं मूत्रं सान्द्रीभवति भाजने ।
पुरुषं कफकोपेन तमाहुः सान्द्रमेहिनम् ॥ १५ ॥
यस्य संहन्यते मूत्रं किंचित् किंचित्प्रसीदति ।
सान्द्रप्रसादमेहीति तमाहुः श्लेष्मकोपतः ॥ १६ ॥
शुक्लं पिष्टनिभं मूत्रमभीक्ष्णं यः प्रमेहति ।
पुरुषं कफकोपेन तमाहुः शुक्लमेहिनम् ॥ १७ ॥
शुक्राभं शुक्रमिश्रं वा मुहुर्मेहति यो नरः ।
शुक्रमेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १८ ॥
अत्यर्थशीतमधुरं मूत्रं मेहति यो भृशम् ।
शीतमेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १६ ॥
मूर्तान्मूत्रगतान्दोषानणन्मेहति यो नरः ।
सिकतामेहिनं विद्यान्नरं तं श्लेष्मकोपतः ॥ २० ॥
मन्दं मन्दमवेगं तु कृच्छ्रं यो मूत्रयेच्छनैः ।
शनैर्मेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ २१ ॥
तन्तुबद्धमिवाऽऽलालं पिच्छिलं यः प्रमेहति ।
आलालमेहिनं विद्यात्तं नरं श्लेष्मकोपतः ॥ २२ ॥
(१) उदकमेह—उदकमेह का रोगी कफ के प्रकोप के कारण बहुत स्वच्छ,
बहुत सफेद, शीतल, बिना गन्ध का, पानी के समान मूत्र करता है यह उदक-
मेह के लक्षण हैं।
- मूत्रमार्ग से शुक्र का मूत्र से पृथक् रूप में जाना यह शुक्रदोष
इसका प्रमेह में अन्तर्भाव नहीं होता ।