चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० २८] सूत्रस्थानम् ३७३
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अ० २८] सूत्रस्थानम् ३७३
तथा शरीर में चिरकाल से जड़पकड जाने पर, शंख आदि दृढ प्राणाशयों में
स्थित होने से, मर्मस्थानों को पीड़ित करने से बहुत दुःख देने के कारण असाध्य
होने से, शीघ्र विकार उत्पन्न करने से अपथ्य बलवान् बन जाता है। इसी
प्रकार बहुत मोटा, बहुत कृश, जिनके मांस, रक्त, अस्थि, ढीले, निर्बल हो गये
हों जो विषम शरीर वाले हैं, जो असात्म्य आहार को सेवन करने वाले, थोड़ा
खाने वाले, अल्प सत्त्व वाले शरीर रोगों को सहन नहीं कर सकते। इनके विप-
रीत गुणों वाले शरीर व्याधि को सहन कर सकते हैं। इसलिये अपथ्य आहार,
दोष शरीर की विशेषता से रोग मृदु, दारुण, शीघ्र होने वाले, अथवा देर में
होने वाले होते हैं। इसलिये हे अग्निवेश ! वात, पित्त, कफ विशेष स्थानों में
कुपित होकर भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥ ५-६ ॥
तत्र रसादिषु स्थानेषु प्रकुपितानां दोषाणां यस्मिन् यस्मिन् स्थाने
ये ये व्याधयः संभवन्ति तांस्तान् यथावदनुव्याख्यास्यामः ॥ ७ ॥
अश्रद्धा चारुचिश्चास्य वैरस्यमरसज्ञता ।
हृल्लासो गौरवं तन्द्रा साङ्गमर्दो ज्वरस्तमः ॥ ८ ॥
पाण्डुत्वं स्रोतसां रोधः क्लैब्यं सादः कृशाङ्गता ।
नाशोऽग्नेरयथाकालं वलयः पलितानि च ॥ ९ ॥
रसप्रदोषजा रोगा, वक्ष्यन्ते रक्तदोषजाः ।
कुष्ठ-वीसर्ष-पिडका रक्तपित्तमसृग्दरः ॥ १० ॥
गुदमेढ्रास्यपाकश्च प्लीहा गुल्मोऽथ विद्रधी ।
नीलिका कामला व्यङ्गः पिप्लवस्तिलकालकाः ॥ ११ ॥
दद्रुश्चर्मदलं श्वित्रं पामा कोठास्रमण्डलम् ।
रक्तप्रदोषाज्जायन्ते, शृणु मांसप्रदोषजान् ॥ १२ ॥
अधिमांसार्बुदं कील-गल-शालूक-शुण्डिकाः ।
पूतिमांसालजी-गण्ड-गण्डमालोपजिह्विकाः ॥ १३ ॥
विद्यान्मांसाश्रयान्, मेदःसंश्रयांस्तु प्रचक्ष्महे ।
निन्दितानि प्रमेहाणां पूर्वरूपाणि यानि च ॥ १४ ॥
अध्यस्थि-दन्त-दन्तास्थि-भेदशूलं विवर्णता ।
केश-लोम-नख-श्मश्रु-दोषाश्चास्थिप्रकोपजाः ॥ १५ ॥
रुक् पर्वणां भ्रमो मूर्च्छा दर्शनं तमसो मताः ।
अरुषां स्थूलमूलानां पर्वजानां च दर्शनम् ॥ १६ ॥
मज्जप्रदोषजाच्छुक्रस्य दोषात्क्लैब्यमहर्षणम् ।
३८० चरकसंहिता [ सू० २८
रोगिणं वा क्लीबमल्पायुर्बिरूपं वा प्रजायते ॥ १७ ॥
न वा संजायते गर्भः पतति प्रस्रवत्यपि ।
शुक्रं हि दुष्टं सापत्यं सदारं बाधते नरम् ॥ १८ ॥
इनमें रस आदि स्थानों में कुपित वात आदि दोष, जिस जिस स्थान पर
जो जो रोग उत्पन्न करते हैं उन उन रोगों को कहते हैं—अश्रद्धा, भोजन में
श्रद्धा न होना, अरुचि ( भोजन में अरुचि, अनिच्छा ), भारीपन, तन्द्रा,
शरीर में पीड़ा, ज्वर, तम, अन्धकार, पाण्डु वर्ण स्रोतों का अवरोध, नपुंसकता,
साद ( शिथिलता ) शरीर की निर्बलता, अग्नि ( जाठराग्नि ) का नाश, बिना
समय के झुर्रियां और बालों का श्वेत होना ये रसजन्य रोग हैं ।
रक्तजन्य रोग कहते हैं-कुष्ठ, वीसर्प, पिडकायें, रक्तपित्त, रक्तप्रदर, गुद-
पाक, शिश्न का पकना, प्लीहा, गुल्म, विद्रधि नीलिका, व्यंग ( झाई ), कामला,
पिप्लुव, तिल के आकार के मस्से, दाद, चर्मदल श्वित्र, पामा, कोठ, रक्तमण्डल
( लाल लाल चक्के ) ये रक्तजन्य रोग हैं ।
मांसजन्य रोग कहते हैं-अधिमांस, अर्बुद, कील, गलशालूक, ( गले में
शोथ होने से बढ़ा हुआ मांस ) गलशुण्डिका, पूतिमांस, अलजी, गलगण्ड,
गण्डमाला, उपजिह्विका, ये मांसजन्य रोग हैं ।
मेदजन्य रोग-कहते हैं प्रमेह के निन्दित पूर्वरूप ( बालों की जटिलता,
आदि अथवा अति स्थूल पुरुष के आयु ह्रास आदि आठ रूप) ये रोग हैं अथवा
अतिस्थूलता से उत्पन्न आयु का ह्रास आदि रोग मेद जन्य है ।
अस्थि के नीचे दूसरी अस्थि आना, अधिद्न्त, दन्तभेद, दांत दुखना,
अस्थियों में शूल, केश, रोम, नख और दाढ़ी मूंछ के रंग का परिवर्तन होना
ये अस्थिजन्य रोग हैं । जोड़ों में दर्द, चक्कर, आना, मूर्छा, आँखों के सामने
अंधेरा आना, व्रण, शिर में छोटी-छोटी फुन्सियां छोटे-छोटे जोड़ों में गांठें पड़
जाना ये मज्जाजन्य रोग हैं ।
शुक्र के दोष से नपुंसकता, अहर्षण ( ध्वज के खड़े होने पर भी मैथुन में
अशक्ति ), संतान रोगी, नपुंसक या थोड़ी आयु वाली, विरूप, उत्पन्न हो,
अथवा गर्भ नहीं रहता, रहने पर गिर जाता है या तीन मास से पूर्व ही बह
जाता है । दूषित शुक्र, बच्चे और स्त्री दोनों को तकलीफ देता है ॥ १७-१८ ॥
इन्द्रियाणि समाश्रित्य प्रकुप्यन्ति यदा मलाः ।
उपघातोपघाताभ्यां योजयन्तीन्द्रियाणि ते ॥ १९ ॥
स्नायौ शिराकण्डरयोर्दुष्टाः क्लिश्नन्ति मानवम् ।