माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३५६ ) माधवनिदान ।
( ३५६ ) माधवनिदान ।
मछली इनकी हड्डीमें विष है। शकुली नामकी मछली रक्तराजी और चरकी नामकी
मछली इनके पित्तसें विष हैं। सूक्ष्मतुंड, चेंदि, बहर, कनखजूरा, शुक, मोर, तोता
इनके तुंड अर्थात् मुखके अग्रभागमें विष है। कीट और सर्प इनके मरे देहमेंही
विष है और जिनकी गणना यहां नहीं की उनको मुखके संदंशवालोंमें जानना। ये
जंगमविषके स्थान हैं ॥
जंगमविषके सामान्य लक्षण ।
निद्रा तन्द्रा क्लमं दाहमपाकं रोमहर्षणम् ।
शोथं चैवातिसारं च कुरुते जंगमं विषम् ॥ ४ ॥
निद्रा, तन्द्रा, क्लम, दाह, अन्नका न पचना, रोमाञ्च, शोथ और अतिसार ये
लक्षण जंगमविषके हैं ॥
स्थावरविषके सामान्य लक्षण ।
स्थावरं तु ज्वरं हिक्कां दंतहर्षं गलग्रहम् ।
फेनच्छर्द्यरुचिश्वासं मूर्च्छां च कुरुते भृशम् ॥ ५ ॥
स्थावरविषसे ज्वर, हिचकी, दांतोंका घिसना, गलेका घिरना, झागसे मिली रह,
अरुचि, श्वास और अत्यन्त मूर्छा ये लक्षण होते हैं ॥
राजा किंवा कोई दूसरा बडा सेठ साहूकार जिसको समीपके रहनेवाले किसी
नौकर चाकरने विष मिलाकर अन्न दिया हो उस विष देनेवालेके
ढूंढनेके निमित्त कुछ लक्षण कहता हूँ-
इंगितज्ञो मनुष्याणां वाक्चेष्टामुखवैकृतैः ।
जानीयाद्विषदातारमेतैर्लिङ्गैश्च बुद्धिमान् ॥ ६ ॥
न दद्यात्युत्तरं पृष्टो विवक्षुर्मोहमेति च ।
अपार्थं बहुसंकीर्णं भाषते चापि मूढवत् ॥ ७ ॥
हसत्यकस्मात्स्फोटयत्यंगुलीं विलिखेन्महीम् ।
वेपथुश्चास्य भवति त्रस्तश्चान्योन्यमीक्षते ॥ ८ ॥
विवर्णवक्ता क्षामश्च नखैः किंचिच्छिनत्त्यपि ।
आलभेतासनं दीनः करेण च शिरोरुहम् ॥
वर्तते विपरीतं च विषदाता विचेतनः ॥ ९ ॥
मनुष्यके अभिप्राय जाननेवाले बुद्धिमान् वैद्य बोलने चालने तथा मुखकी चेष्टा
इनसे तथा आगे जो कहते हैं इन लक्षणोंसे विषके देनेवाले मनुष्यको जान ले।
भाषाटीकासमेत । ( ३५७)
सो इस प्रकार-जो मनुष्य विष दे उससे कोई बात पूछे तो वह उत्तर न दे और जब
बोले तब मोहको प्राप्त हो अर्थात् घबडा जावे तथा कदाचित् बोले भी तो निरर्थक
और बहुत अस्पष्ट बोले तथा अकस्मात् हँसे, हाथकी उंगली चटकावे, पृथ्वीमें रेखा
काटे, भयसे कांपे और डरकर चारों ओर वारंवार सबकी तरफ देखे, मुखकी
चेष्टा जाती रहे और काला होजाय, नखोंसे कुछ तिनका आदि तोडे, गरीबके
समान एकही स्थानपर बैठा रहे, माथेपर हाथ फेरे, वारंवार इधर उधर डोल कर
बैठजाय, उसका चित्त ठिकाने न रहे तथा उसका चित्त भागनेको चाहे । ये लक्षण
विष देनेवालेके जानने और यही लक्षण घोर अपराध करनेवालेके राजा जान लेवे ॥
मूलादिविषोंके लक्षण ।
उद्वेष्टनं मूलविषैः प्रलापो मोह एव च ।
जृम्भणं वेपनं श्वासो मोहः पत्रविषेण तु ॥ १० ॥
मुखशोथः फलविषैर्दाहोऽन्नद्वेष एव च ।
भवत्युपविषैश्छर्दिराध्मानं श्वास एव च ॥ ११ ॥
त्वक्सारनिर्यांसविषैरुपयुक्तैर्भवंति हि ।
आस्यदौर्गन्ध्यपारुष्यशिरोरुकफसंस्रवाः ॥ १२ ॥
फेनागमः क्षीरविषैर्विद्भेदो गुरुजिह्वता ।
हृत्पीडनं धातुविषैर्मूर्च्छा दाहश्च तालुनि ।
प्रायेण कालघातीनि विषाण्येतानि निर्दिशेत् ॥ १३ ॥
मूलविषसे रोगीके हाथ पैरोंमें पीडा और मोह होवे । पत्रविषसे जम्भाई, कंप
श्वास और मोह होवे । फलविषसे मुखपर सूजन, दाह, अन्नमें अरुचि होवे । पुष्प-
विषसे वमन, अफरा और श्वास होवे । छाल, रस, गोंद-इनसे मुखमें दुर्गन्ध,
अंगमें खरदरापन, मस्तकशूल और मुखके मार्ग कफ गिरे । दुग्धविषसे मुखमें
झाग आवे, दस्त होय और जीभ जकड जावे । धातुविषसे हृदयमें पीडा होय,
मूर्च्छा आवे, तालुएमं दाह होय ये विष बहुधाकरके कालान्तरमें मारनेवाले हों ॥
विषलिप्तशस्त्रहतके लक्षण ।
सद्यः क्षतं पच्यते तस्य जंतोः स्रवेद्रक्तं पच्यते चाप्यभीक्ष्णम् ।
कृष्णीभूतं क्लिन्नमत्यर्थपूति क्षतान्मांसं शीर्यते यस्य चापि ॥ १४ ॥
तृष्णा मूर्च्छा ज्वरदाहौ च यस्य दिग्धाहतं मनुजं तं व्यवस्येत् ।
लिंगान्येतान्येव कुर्यादमित्रैर्व्रणे विषं यस्य दत्तं प्रमादात् ॥ १५ ॥