माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३२२ ) माधवनिदान ।
( ३२२ ) माधवनिदान ।
तीसरे पटलमें दोष जानेसे ऊपरकी वस्तु दीखे, नीचेकी वस्तु नहीं दीखे, जो
वस्तु बडी और भव्य होवे, वह वस्त्रसे ढकीसी दीखे, कान नाक और नेत्र इन करके
रहित पुरुषोंको देखें, टेढे बांके दीखे और जिस वातादि दोषका रुधिर मांस मेदादिकोंके
सहाय होनेसे उनमें जो दोष बलवान् होय उसका जैसा रूप ( रंग ) होवे उसी
प्रकारका दीखे अर्थात् जिस जिस दोषका जैसा वर्ण होय वैसा दीखे, दोष नीचे
स्थित होयें सो समीपस्थ वस्तु नहीं दीखे और ऊपर दोष स्थित होयें तो दूरकी
वस्तु न दीखे और दोष पार्श्व ( पसवाडे ) में स्थित होनेसे पसवाडेकी वस्तु नहीं
दीखे और दोष दृष्टिमें सर्वत्र स्थित होवें तो उस पुरुषको सब चीज मिलीसी दीखे,
दृष्टिके मध्यमें दोष जानेसे बडी वस्तु छोटी दीखे, दो ठिकाने दोष रहनेसे एक
वस्तुकी दो दीखे और दोष अव्यवस्थित अर्थात् एकही स्थानमें स्थित न होनेसे
एक वस्तुके दो टुकडेसे दिखलाई देवें, दृष्टिगत दोष तिरछे स्थित होनेसे एक
वस्तुके दो टुकडे दिखाई देवे यह स्वरूपोंका दीखना तीसरे ( पटल ) से प्रारम्भ
होता है सो विदेहने लिखा भी है ॥
चतुर्थपटलगत तिमिरलक्षण ।
तिमिराख्यः स वै रोगश्चतुर्थपटलं गतः ॥ ४१ ॥
रुणद्धि सर्वतो दृष्टिं लिङ्गनाशमतः परम् ।
अस्मिन्नपि तमोभूते नातिरूढे महागदे ॥ ४२ ॥
चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रावन्तरिक्षे च विद्युतः ।
निर्मलानि च तेजांसि भ्राजिष्णूनि च पश्यति ॥ ४३ ॥
वह तिमिररोग चौथे पटल ( परदे ) में पहुँचनेसे दृष्टिको चारों ओरसे रोकदे
इसको कोई आचार्य लिंगनाश कहते हैं और कोई तिमिर कहते हैं । यह अन्धकार-
मय रोग अति बढजाय तब उस मनुष्यको आकाशमें चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, बिजली
और निर्मल तेज भी यथार्थ नहीं दीखे, तेजके पुंजसे दीखे, लिंगनाशकी निरुक्ति-
“ लिंग्यते ज्ञायते अनेनेति लिंगमिन्द्रियशक्तिस्तस्य नाशो यस्मिन्निति लिंगनाशः ”
अर्थात् जिसकरके जाने सो कहिये लिंग ( इन्द्रिय ) उसका नाश जिसमें होय
उसको लिंगनाश कहते हैं और इसीरोगको लौकिकमें मोतियाबिंदु भी कहते हैं ॥
तृतीयपटलाश्रित काचदोषकी दूसरी संज्ञा ।
स एव लिंगनाशस्तु नीलिकाकाचसंज्ञितः ।
१ यथास्वं रज्यते दृष्टिर्दोषैस्त्रिपटलस्थितैः । चतुर्थं पटलं प्राप्य मण्डलं रज्यते तु तैः ॥ इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३२३ )
तीसरे पटलगत काच ( मोतियाबिन्दु की ) उपेक्षा करनेसे वही फिर चौथे पटलमें
पहुँचता है, तब उसे लिंगनाश और नीलिका कहते हैं, यह रोग असाध्य है, सो
निमि'आचार्य लिखते हैं, परन्तु गदाधर आचार्य कहते हैं कि, विशेष काचको
नीलिकाकाच कहते हैं ॥
दोषविशेषकरके रूपका दीखना कैसा होता है ?
तत्र वातेन रूपाणि भ्रमन्तीव हि पश्यति ।
आविलान्यरुणाभानि व्याविद्धानीव मानवः ॥ ४४ ॥
पित्तेनादित्यखद्योतशक्रचापत्तडिद्रुणान् ।
नृत्यतश्चैव शिखिनः सर्वं नीलं च पश्यति ॥ ४५ ॥
कफेन पश्येद्रूपाणि स्निग्धानि च सितानि च ।
सलिलप्लावितानीव परिजाड्यानि मानवः ॥ ४६ ॥
पश्येद्रक्तेन रक्तानि तमांसि विविधानि च ।
ससितान्यथ कृष्णानि पीतान्यपि च मानवः ॥ ४७ ॥
सन्निपातेन चित्राणि विप्लुतानि च पश्यति ।
बहुधा च द्विधा वापि सर्वाण्येव समंततः ॥
हीनांगान्यधिकांगानि ज्योतींष्यपि च पश्यति ॥ ४८ ॥
बादीसे रोगीको मलीन, कुछ लाल, तिरछी और भ्रमती ऐसी वस्तु दीखे । पित्तसे
सूर्य, खद्योत ( पटबीजना ) इन्द्रधनुष, बिजली इनको और नाचनेवाले मोर तथा सर्व
वस्तु नीली दीखे। कफसे चिकना और सफेद तथा पानीमें डुबोया हुआ निकालनेके
समान और भारी ऐसा रूप दीखे । रुधिरसे लाल और अनेकप्रकारका अन्धकार
तथा किंचित् सफेद काली और पीली ऐसी वस्तु दीखे । सन्निपातसे अनेक प्रकारके
विपरीत अर्थात एककी अनेक तथा दो अथवा अनेक प्रकारके रूप दीखें, हीन
अंगके अथवा अधिक अंगके रूप रोगी देखे और ज्योतिस्वरूपसे सब पदार्थ दीखे॥
पित्तसे दूसरा परिम्लायिसंज्ञक तिमिर होय है ।
पित्तं कुर्यात्परम्लायि मूर्च्छितं रक्ततेजसा ।
पीता दिशस्तथोद्द्योतान्नवीनपि स पश्यति ।
विकीर्यमाणान्खद्योतैवॄक्षांस्तेजोभिरेव च ॥ ४९ ॥
१ काच इत्येष किजयो याप्यस्त्रिपटलस्यितैः । चतुर्थपटलं प्राप्तो लिङ्गनाशः सः उच्यते ॥
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