माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
(२०२) माधव निदान।
(२०२) माधव निदान।
श्वास, खांसी होय, त्वचा नख नेत्रादिक सफेद हों पेट निश्चल चिकना सफेद
नाडियोंसे व्याप्त हो, इनकी वृद्धि बहुत कालमें होय, पेट करडा और शीतल मालूम
होय तथा भारी और स्थिर होय ॥
सन्निपातोदरके लक्षण ।
स्त्रियोऽन्नपानं नखरोममूत्रविडार्तवैर्युक्तमसाधुवृत्ताः ।
यस्मै प्रयच्छन्त्यरयो गरांश्र्व दुष्टाम्बुदूषीविषसेवनाद्वा ॥ १३ ॥
तेनाशु रक्तं कुपिताश्र्व दोषाः कुर्युः सुघोरं जठरं त्रिलिंगम् ।
तच्छीतवाते भृशदुर्दिने वा विशेषतः कुप्यति दह्यते च ॥ १४ ॥
स चातुरो मूर्च्छति हि प्रसक्तं पाण्डुः कृशः शुष्यति तृष्णया च ।
दूष्योदरं कीर्तितमेतदेव-
खोटे आचरणवाली स्त्री जिस पुरुषको नख केश (बाल) मल मूत्र आर्तव
(रजोदर्शनका रुधिर) मिला अन्नपान देय, अथवा जिसका शत्रु विष देवे अथवा
दुष्टांबु (जहर मिला मछली तिनका पित्ता आदि औटा हुआ ऐसा जल) और
दूषीविषे (मन्दविष) इनके सेवन करनेसे रुधिर और वातादिक दोष शीघ्र कुपित
होकर अत्यन्त भयंकर त्रिदोषात्मक उदररोग उत्पन्न करते हैं, वे शीतकालमें अथवा
शीतल पवन चले उस समय, अथवा जिस दिन वर्षाका झड लगे उस दिन
विशेष करके कोपको प्राप्त हो और दाह होय (इसका कारण यह है कि, उस
समय दूषीविषका कोप होय है) वह रोगी निरन्तर विषके संयोगसे
मूर्च्छित होय देहका पीला वर्ण तथा कृश होय और परिश्रम करनेसे शोष होय,
प्यास होय तो इसको दूष्योदर कहते हैं ॥
प्लीहोदरके लक्षण ।
-प्लीहोदरं कीर्तयतो निबोध ॥ १५ ॥
विदाह्यभिष्यन्दिरतस्य जन्तोः प्रदुष्टमत्यर्थमसृक्कफश्र्व ।
प्लीहाभिवृद्धिं कुरुतः प्रवृद्धौ प्लीहोत्थमेतज्जठरं वदन्ति ॥ १६ ॥
तद्वामपार्श्वे परिवृद्धिमेति विशेषतः सीदति चातुरोऽत्र ।
मन्दज्वराग्निः कफपित्तलिंगैरुपद्रुतः क्षीणबलोऽतिपाण्डुः ॥ १७ ॥
१ यदुक्तम्-जीर्णं विषन्नोषधिभिर्हृतं वा दावाग्निना वाऽऽतपशोषितं वा ।
स्वभावतो वा गुणविप्रहीणं विषं हि दूषीविषतामुपैति ॥ इति ॥
१ एतदेव सन्निपातोदरं दूष्योदरं कीर्तितं न पुनरधिकम् इत्यर्थः । रक्तं दूष्यं दूषयित्वा
भवतीति दूष्योदरं किंवा परस्परं दूषयन्तीति दोषा एव दूष्यास्तैः कृतमुदरम् दूष्योदरम् ॥
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भाषाटीकासमेत । ( २०३ )
अब प्लीहोदरके लक्षण कहता हूँ तू सुन। विदाही ( वंशकरीरादि अर्थात् दाह
करनेवाली ) और अभिष्यन्दी ( दध्यादि ) अर्थात् स्रोत ( छिद्र ) रोकनेवाली ऐसे
अन्न निरन्तर सेवन करनेवाले पुरुषके अत्यन्त दुष्ट भये जो रुधिर और कफ बढकर
प्लीहा ( तापतिल्ली ) को बढावें इस उदरको प्लीहोत्थ उदर कहते हैं, यह बाईं-
तरफ बढता है। इस अवस्था में रोगी बहुत दुःख पाता है, देहमें मन्दज्वर होय,
मन्दाग्नि होय तथा कफ पित्तोदरके लक्षण इसमें मिलते हैं, बल क्षीण हो अत्यन्त
पीला वर्ण होय ॥
यकृदाल्युदरके लक्षण ।
सव्यान्यपार्श्वे यकृति प्रदुष्टे ज्ञेयं यकृद्धाल्युदरं तदेव ॥ १८ ॥
दहने तरफ जो यकृत् कहिये कलेजा है वह दुष्ट कहिये रोगके होनेसे प्लीहोदरके
समान उदर होय उसको यकृद्दाल्युदर कहते हैं। दोषोंकरके यकृतका भेद होय है
इसीसे यकृद्दालि उदर कहते हैं ॥
इसमें दोषोंका सम्बन्ध कहते हैं-
उदावर्त्तरुजानाहैर्मोह तृड्दहनज्वरैः ।
गौरवारुचिकाठिन्यैर्विद्यात्तत्र मलान्क्रमात् ॥ १९ ॥
उदावर्त्त, शूल, अफरा इनसे वायु, मोह, प्यास, ज्वर इनसे पित्त और भारीपना,
अरुचि, कठिनता इनसे कफ ऐसे क्रमपूर्वक दोषोंका सम्बन्ध जानना ॥
बद्धगुदोदरके लक्षण ।
यस्यांत्रमन्नैरुपलेपिभिर्वा बालाश्मभिर्वा पिहितं यथावत् ।
संचीयते तस्य मलः सदोषः शनैः शनैः संकरवच्च नाड्याम् ॥२०॥
निरुध्यते तस्य गुदे पुरीषं निरेति कृच्छ्रादतिचाल्पमल्पम् ।
हृन्नाभिमध्ये परिवृद्धिमेति तस्योदरं बद्धगुदं वदन्ति ॥ २१ ॥
जिस पुरुषकी आंत उपलेप कहिये गाढे अन्न करके (शाकादिक अथवा बाल
तथा बारीक पत्थरके टुकडे करके ) बद्ध हो जाय, उस पुरुषका दोषयुक्त मल धीरे
धीरे आंतडीकी नलीमें होकर जैसे बुहारीसे झारा तृण धूर आदि क्रमसे बढे है
इसी प्रकार बढे और वह मल बडे कष्टसे गुदद्वारा थोडा थोडा निकलै, जब मलका
निकलना बन्द हो जाय तब मल दोषोंकरके गुदासे ऊपर आवै इसीसे उदर बढे
है अर्थात् हृदय और नाभिके मध्य अन्नपाकस्थानकी वृद्धि हो इसीसे इस उदरको
१ यकृद्धालयति दोषैर्भेदयतीति यकृद्धाल्युदरम् ।
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