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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( १६८ माधवनिदान ।

( १६८ माधवनिदान ।
अन्न पचगया होय अथवा पचरहा हो अथवा अजीर्ण हो अर्थात् सर्वदा जो
शूल प्रगट होय यह पथ्यापथ्यके योगसे अथवा भोजन करनेसे किंवा न भोजन
करनेसे नियमसे शांत नहीं होय, उसको अन्नद्रवशूल कहते हैं, यह शूल त्रिदोष विकृ-
तसे एक प्रकारका है, परन्तु असाध्य नहीं है, क्योंकि इसकी चिकित्सा कही है ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
परिणामशूलनिदानं समाप्तम् ॥
अथोदावर्त्तनिदानम् ।
-:-:-:-
उदावर्त्तके कारण ।
वातविण्मूत्रजृम्भास्त्रक्षवोद्गारवमीन्द्रियैः ।
क्षुत्तृष्णोच्छ्वासनिद्राणां धृत्योदावर्त्तसंभवः ॥ १ ॥
अधोवायु, विष्ठा, मूत्र, जम्भाई, अश्रुपात, छींक, डकार, वमन, शुक्र, भूख, प्यास,
श्वास और निद्रा इन तेरह वेगोंके रोकनेसे उदावर्त्तरोग उत्पन्न होता है । तेरहके
नियमके करनेसे यह प्रयोजन है कि, क्रोध, लोभ, मन इत्यादि वेगोंके धारण
करनेसे रोग उत्पन्न नहीं होता । क्योंकि, इनके रोकनेसे तो स्वस्थता प्राप्त होती
है । सब उदावर्त्तोमें मुख्य कारण वायु है । उदावर्त्तकी निरुक्ति इस प्रकार है-
“उद्भूतेन वेगविधारणेन आवृतस्य वायोरावर्त्तनमुदावर्त्तः” ॥
तेरह उदावर्त्तोके लक्षण क्रमसे कहते हैं-
वातमूत्रपुरीषाणां सङ्गो ऽध्मानं क्लमो रुजः ।
जठरे वातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वातनिग्रहात् ॥ २ ॥
अधोवायुके रोकनेसे अधोवायु, मल, मूत्र ये बन्ध हो जायँ, पेट फूल जावे,
अनायासश्रम और पेटमें बादीसे पीडा होय तथा और वातकृत तोद (शूलादि-
पीडा) होय ॥
आटोपशूलौ परिकर्त्तिका च संगः पुरीषस्य तथोर्ध्ववातः ।
पुरीषमास्यादथ वा निरेति पुरीषवेगेऽभिहते नरस्य ॥ ३ ॥
मलके वेग रोकनेसे पेटमें गुडगुडाहट होय, शूल हो, गुदामें कतरनेकीसी पीडा
होय, मल उतरे नहीं, डकार आवे, अथवा मल मुखके द्वारा निकले ॥

भाषाटीकासमेत । (१६९)
वस्तिमेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छ्रं शिरोरुजा ।
विनामो वंक्षणानाहः स्याल्लिङ्गं मूत्रनिग्रहे ॥ ४ ॥
मूत्रके वेग रोकनेसे बस्ति ( मूत्राशय ) और शिश्न इंद्रिय इनमें पीडा होय,
मूत्र कष्टसे उतरे, मस्तककी पीडासे शरीर सीधा होय नहीं, पेटमें अफरा होय ॥
मन्यागलस्तम्भशिरोविकारा जृंभोपरोधात्पवनात्मकाः स्युः ।
तथाऽक्षिनासावदनामयाश्च भवन्ति तीव्राः सह कर्णरोगैः ॥ ५ ॥
जम्भाई आती हुईके रोकनेसे, मन्या कहिये नाडीके पीछेकी नस और गला
इनका और वातजन्य विकार मस्तकमें होयँ, उसी प्रकार नेत्ररोग, नासारोग, मुख-
रोग और कर्णरोग ये तीव्र होते हैं ॥
आनन्दजं वाप्यथ शोकजं वा नेत्रोदकं प्राप्तममुञ्चतो हि ।
शिरोगुरुत्वं नयनामयाश्च भवन्ति तीव्राः सह पीनसेन ॥ ६ ॥
आनन्दसे अथवा शोकसे प्रकट अश्रुपातका जो मनुष्य नहीं त्याग करे उसके
इतने रोग प्रगट होयँ-मस्तक भारी रहे, नेत्ररोग और पीनस ये प्रबल हों ॥
मन्यास्तम्भशिरःशूलमर्दिताधर्धावभेदकौ ।
इन्द्रियाणां च दौर्बल्यं क्षवथोः स्याद्विधारणात् ॥ ७ ॥
मन्या ( नाडके पिछाडीकी नस ) का स्तम्भ कहिये जकड जाना, शिरमें शूलका
चलना, आधा मुख टेढा हो जाय, अर्धांगवात और सब इंद्रिय दुर्बल होजायँ
इतने रोग आती हुई छींक रोकनेसे होते हैं ॥
कण्ठास्यपूर्णत्वमतीव तोदः कूजश्च वायोरथवाऽप्रवृत्तिः ।
उद्गारवेगेऽभिहते भवन्ति घोरा विकाराः पवनप्रसूताः ॥ ८ ॥
आती हुई डकारके वेग रोकनेसे वातजन्य इतने रोग होते हैं-कण्ठ और मुख
भारीसा मालूम होय, अत्यन्त नोचनेकीसी पीडा होय, अव्यक्त भाषण ( जो
समझमें न आवे ) ॥
कण्डूकोठारुचिव्यङ्गशोफपाण्ड्वामयज्वराः ।
कुष्ठहृल्लासवीसर्पाऽश्छर्दिनिग्रहजा गदाः ॥ ९ ॥
जो मनुष्य आतीहुई वमनके वेगको रोके उसके अंगोंमें खुजली चले, देहमें
चकत्ते हो जायँ, अरुचि, मुखपर झांईंसी पडे, सूजन, पांडुरोग, ज्वर, कुष्ठ, खाली
रह, विसर्प ये होयँ ॥