माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १६६ ) माधवनिदान ।
( १६६ ) माधवनिदान ।
नीलशुक्र, रक्तबभ्रु, एकपर्वा, उपपर्वा ये घोर विषवाले १५ बिच्छू हैं। इनके काट-
नेसे सर्पके समान वेग, फोडोंकी उत्पत्ति, भ्रांति, दाह, ज्वर, नाक कान आदिके
छिद्रोंसे काला रुधिर निकले इसीसे शीघ्र प्राणत्याग होवे ॥
वृश्चिकविषके असाध्य लक्षण ।
दष्टोऽसाध्यस्तु हृद्घ्राणरसनोपहतो नरः ।
मांसैः पतद्भिरत्यर्थं वेदनात जहात्यसून् ॥ ४८ ॥
हृदय, नाक, जीभ इनमें बिच्छूके काटनेसे मांस गले, अत्यन्त वेदना होकर
मनुष्य मरे ॥
कणभदष्टके लक्षण ।
विसर्पः श्वयथुः शूलं ज्वरश्छर्दिरथापि वा ।
लक्षणं कणभैर्दष्टे दंशश्चैवं विशीर्यते ॥ ४९ ॥
कणभ एक जातिका कीडा होता है उसके काटनेसे विसर्प, सूजन, शूल, ज्वर,
वमन ये लक्षण होते हैं और वह काटनेका स्थान गलजाय ॥ अब कहते हैं कि,
त्रिकंटक, कुणी, हस्तीकक्ष, अपराजित ये कणभकीडाके चार भेद हैं। इनके काट-
नेसे पूर्वोक्त रोग होयँ और अंगोंका टूटना, देहमें भारीपन और काटनेकी ठौर काली
होजाय ये लक्षण विशेष होयँ ॥
उच्चिटिंग ( झींगर ) विषके लक्षण ।
हृष्टरोमोच्चिटिंगेन स्तब्धलिंगो भृशार्तिमान् ।
दष्टः शीतोदकेनेव सिक्तान्यंगानि मन्यते ॥ ५० ॥
उच्चिटिंगनामक बिच्छूके काटने से देहमें रोमांच होय, लिंग जकड जाय, घोर
पीडा होय और सब देहपर शीतल जल मानो डाल दिया है, उच्चिटिंगको सुश्रुत-
वाला झींगर कहता है और कोई उष्ट्रधूम कहते हैं परन्तु आतंकदर्पण टीकाकारने
बिच्छूका भेद माना है ॥
मंडूक ( मेंडक ) विषके लक्षण ।
एकदंष्ट्रार्दितः शूनः सरुजः पीतकः सतृट् ।
छर्दिर्निद्रा च सविषैर्मंडूकैर्दष्टलक्षणम् ॥ ५१ ॥
विषैले मेंडकके काटनेसे उसको एक दांत लगे, उस ठिकाने पीली सूजन होय,
दूखे, प्यास, वमन और निद्रा ये लक्षण होयँ ॥ अब कहते हैं कि कृष्णसार, कुहक,
हरित, रक्त, यववर्णाभ भुकुटी, कोटिक इन भेदोंसे मेंडक आठ प्रकारका है
इनके काटनेसे पूर्वोक्त लक्षण होयँ और खुजली, मुखमें पीले झाग आना, इन
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भाषाटीकासमेत । ( ३६७ )
आठमें भी भ्रुकुटी और कोटिक इन दोनों मेंडकोंके काटनेसे पूर्वोक्त लक्षण होयँ
और दाह, मूर्च्छा अत्यन्त होय ये विशेष लक्षण हैं ॥
विषैले मत्स्य ( मछली ) के विषके लक्षण ।
मत्स्यास्तु सविषाः कुर्युर्दाहं शोथं रुजं तथा ।
विषैले मछलीके काटनेसे दाह, सूजन और शूल ये होयँ, विषैले मछलीके सत्ता-
ईस भेद हैं उनके नाम नहीं लिखे इस लिये कि मिले नहीं ॥
सविषजलौका ( जोंक ) के विषके लक्षण ।
कण्डूं शोथं ज्वरं मूर्च्छां सविषास्तु जलौकसः ॥ ५२ ॥
विषैले जोंकके काटनेसे खुजली, सूजन, ज्वर और मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं।
विषैले जोंक काली, विचित्रवर्णकी, अलगर्दा, इन्द्रायुधा, सामुद्रिका, गोचन्दना इन
भेदोंसे छः प्रकारकी है। इनमें भी अंजनचूर्णवर्णा और पृथुशिराके भेदसे काली
जोंक दो प्रकारकी है। वर्म्मि मछलीके समान लम्बी छिन्नोन्नत कुक्षिक भेदसे विचित्र-
वर्णकी जोंक दो प्रकारकी है। रोमशा, महापाश्र्वा, कृष्णमुखी इन भेदोंसे अल-
गर्दा जोंक तीन प्रकारकी है-इन्द्रधनुषके समान ऊपरसे विचित्र होयँ वह इन्द्रा-
युधा जोंक है, कुछ सफेद और पीला तथा विचित्रपुष्पके समान चित्रित ये दो
भेद सामुद्रिका जोंकके हैं और बैलके अंडकोशके समान नीचेसे दो भाग होवें
उसको गोचन्दना कहते हैं ॥
गृहगोधिका ( छिपकली ) के विषके लक्षण ।
विदाहं श्वयथुं तोदं स्वेदं च गृहगोधिका ।
छिपकलीके विषसे दाह होय, सूजन, नोंचनेकीसी पीडा और पसीना आवे
कोई गृहगोधिकाको भाषामें विषखपरा कहते हैं ॥
शतपदी ( कानखजूरा ) के विषके लक्षण ।
दंशे स्वेदं रुजं दाहं कुर्याच्छतपदीविषम् ॥ ५३ ॥
कानखजूरेके काटनेसे स्थानमें पसीना आवे, शूल होय और दाह होय ॥ अब
जानना चाहिये कि, परुषा, कृष्णा, चित्रा, कपीलिका, पित्तिका, रक्ता, श्वेता,
अग्निप्रभा ये शतपदीके आठ भेद हैं। इनमेंसे छः तो पूर्वोक्त लक्षण करती हैं और
श्वेता तथा अग्निप्रभा दो जातिकी शतपदीके काटनेसे दाह और मूर्च्छा अधिक होय
ये विशेष लक्षण जानना ॥
मशक ( मच्छर वा डांस ) के विषके लक्षण ।
कण्डूमान्मशकैरीषच्छोथः स्यान्मन्दवेदनः ।
मच्छर अथवा डांसके काटनेसे किंचित् सूजन होय उसमें खुजली चले तथा
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