माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १२० ) माधवनिदान ।
( १२० ) माधवनिदान ।
अञ्जनका लगाना, अनामिकाको पीडित करना, कौंचकी फली लगाना, दाह देना,
नास देना इत्यादिक न करे तो वह रोगी प्राणवियुक्त कहिये मरणको प्राप्त हो
अन्यथा बचे है ॥
मधुकोशं सुनिर्मथ्य सारमाकृष्य यत्नतः ।
ब्रजभाषाकृता टीका माधवार्थप्रकाशिका ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां
मूर्च्छानिदानं समाप्तम् ॥
अथ मदात्ययनिदानम् ।
ये विषस्य गुणाः प्रोक्तास्तेऽपि मद्ये प्रतिष्ठिताः ।
तेन मिथ्योपयुक्तेन भवत्युग्रो मदात्ययः ॥ १ ॥
किंतु मद्यं स्वभावेन यथैवान्नं तथा स्मृतम् ।
अयुक्तियुक्तं रोगाय युक्तियुक्तं यथाऽमृतम् ॥ २ ॥
विषके जो गुण कहे हैं सोई गुण मद्यमें हैं अर्थात् यही मद्य अविधिसे सेवन
करामया घोर भयंकर मदात्यय रोग प्रगट करे हैं। कोई ऐसी शंका करे कि, विषके
गुण मद्यमें हैं इससे विषके समान मद्यको सेवन न करे । इस विषयमें कहते हैं कि,
मद्य यह स्वभावसे ही जैसे अन्न देहधारक है ऐसा ही है, परन्तु वह मद्य अविधिसे
पावे तो रोगकारक होता है और विधिंसे सेवन करे तो अमृतके समान गुण करे ॥
विधिसे मद्य पीनेका लक्षण।
विधिना मात्रया काले हितैरन्नैर्यथाबलम् ।
प्रहृष्टो यः पिबेन्मद्यं तस्य स्यादमृतं यथा ॥ ३ ॥
स्निग्धैः सदन्नैर्मासैश्च सह भक्ष्यैश्च सेवितम् ।
भवेदायुःप्रकर्षाय बलायोपचयाय च ॥ ४ ॥
१ विधिश्चायं तद्यथा-कुसुमितलतोपगूढः प्रकटनिरन्तरनवां कुरनिकररोमांचैः मधुकरमधुर-
झंकारसीत्कारैर्मुक्ककण्ठकलकण्ठकूजितै-दक्षिणसमीरणोद्विजितसमुल्लसितपल्लवकरप्रचारैस्तबणे
स्तबभिरुपक्रांततरललताभिरतिशोभनेषु वनोपवनेषु तुषारकिरणै रंजितप्रदोषेषु श्रृंगारसमुचि-
तालंकृतिकमनीयकामिनीसमर्पितं ललिटललनोपनीयमानं सुरभिरुचिररूपरसोपदंशकं नाम
परिमितपराद्धंमधुपानं कं न सुखयति । चरकेण तु विस्तरेणैतदुक्तं विद्धि।
भाषाटीकासमेत। ( १२१ )
विधिपूर्वक प्रमाणके संग, योग्यकालमें, चिकना आदि अच्छे अन्नके संग बला-
बलके अनुसार अत्यन्त हर्षकें साथ जो मद्यपान करे उसको अमृतके तुल्य गुण
करे। इसके पीनेकी विधि मदात्ययके दूसरे श्लोककी टिप्पणीमें लिख आये हैं तथा
अन्यान्तरोंमें विधि तथा मात्रा कालका नियम लिखा है अर्थात् शुद्ध शरीर होकर
प्रातःकाल सोपदंश ( अर्थात् मद्यपान करनेके बाद जो चटनी आदि पदार्थ खायेजाते
हैं सो ) इन करके सहित दो पल पीवे, मध्याह्नको चार पल पीवे, तदनन्तर चिकना
पदार्थ भोजन करे और सायंकालको आठ पल पीवे, इस जगह पल नाम जयपुरसाई
१ टके पक्केको कहते हैं। अथवा चिकने अन्नके साथ मांसके साथ अथवा और
भक्ष्य हैं उनके साथ मद्यके सेवन करे तो मनुष्यकी आयुष्य बढे, बल बढे तथा
देह पुष्ट हो। इस श्लोकमें "स्निग्धैः सदन्नैः" यह जो पद धरा सो स्निग्धका
एक उपलक्षण है अर्थात् जो मद्यसे विपरीत गुण रखते हैं जैसे तीक्ष्णादि दश गुण
हैं उनसे विपरीत होय उसके साथ मद्य पीना चाहिये सो तीक्ष्णादि दशगुण ग्रन्थां-
तरोंमें लिखे हैं और विशेष देखना होय तो भावप्रकाशमें देख लेवे, इस स्थलमें
ग्रन्थविस्तारभयसे हमने त्याग दिये हैं ॥
विधिसे मद्य पीनेके दूसरे गुण ।
काम्यता मनसस्तुष्टिस्तेजो विक्रम एव च ।
विधिवत्सेव्यमाने तु मद्ये सन्ति हिता गुणाः ॥ ५ ॥
मद्यको विधिपूर्वक पीनेसे सुन्दर (स्वरूप) वस्तुओंमें मनकी वृत्ति, मनको सन्तोष,
उत्साह, दूसरेको जीतनेकी सामर्थ्य इत्यादि हितकारक गुण होते हैं। कही हुई
विधिसे विरुद्ध मद्यपान करनेसे मदात्यय रोग होता है। सो मदात्यय तीन प्रकारका
है-पूर्वमद मध्यमद और अन्त्यमद ॥
१ शुद्धकायः पिबेत्प्रातः सोपदंशंपलद्वयम् । मध्याह्ने द्विगुणं तच्च स्निग्धाहारेण पाचयेत् ॥
प्रदोषेऽष्टपलं तद्वन्मात्रा मद्ये रसायनम् । आरोग्यं धातुसात्म्यं च कांतिपुष्टिबलप्रदम् । अनेन
विधिना सेव्ये मद्य नित्यमतंद्रितैः । अन्यैर्बुद्ध्यादयो यावदुल्लसंति निरत्ययाः ॥ मात्रेयं विहिता
मद्ये पाने रोगाय चापरा ॥ इति । २ तत्र कालो द्विविधः-नित्यकः आवश्यकश्च । तत्र नित्यकः
ऋतुसम्बन्धी । यथा ग्रीष्मे शीतमधुरं माध्वीकादि । शिते उष्णं तीक्ष्णं गौडिकपैष्टिकादि । तथा
आवश्यके काले वाते स्निग्धादि एवं वयस्युदाहार्यम् ॥
३-लघुतीक्ष्णो हि सूक्ष्माम्लो व्यवायाशुगमेव च । रूक्षं विकाशि विशदं मद्ये दशगुणाः
स्मृताः ॥ तथा च सुश्रुते-" मद्यं ह्यम्लं तथा तीक्ष्णं सूक्ष्मं विशदमेव च । रूक्षमाशुकरं चैव
व्यवायि च विकासि च ॥" इति ॥ अत्र अम्लरसत्वं चास्योद्भूतरसत्वेनोक्तम् । यदुक्तमन्यत्र
" सर्वेषामम्लजातीनां मद्यं मूर्ध्नि व्यवस्थितम् ।" इति ॥
१ मद्यपानानन्तरं भक्षणीयद्रव्यविशेषः ॥