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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( १०० ) माधवनिदान ।

( १०० ) माधवनिदान ।
जिसके अत्यन्त दोषोंका संचय हो गया हो और जिसका अन्न छूटगया हो जो
कृश हो गया हो, जिसका अनेक व्याधिसे देह क्षीण होगया हो और जो वृद्ध है,
अति मैथुन करनेवाला है ऐसे पुरुषके ये दोनों हिचकी उत्पन्न होंयँ तो तत्क्षण
उस रोगीके प्राणनाश करें ॥
यमिकाके असाध्य लक्षण ।
यमिका च प्रलापार्त्तिमोहतृष्णासमन्विता ॥ १३ ॥
बकवाद करे, पीडा हो, मोह प्यास इन लक्षणोंसे युक्त जो यमिकानामकी हिचकी
सो तत्काल प्राण हरनेवाली जाननी ॥
यमिकाके साध्य लक्षण ।
अक्षीणश्चाप्यदीनश्च स्थिरधात्विन्द्रियश्च यः ।
तस्य साधयितुं शक्या यमिका हन्त्यतोऽन्यथा ॥ १४ ॥
बलवान् प्रसन्न मन जिसकी धातु और इन्द्रिय स्थिर हों ऐसे पुरुषकी यमिका
हिचकी साध्य है और इससे विपरीत अर्थात् क्षीण, दीन इत्यादि पुरुषको तत्का-
लही नाश करे । अन्नजा, क्षुद्रा ये दोनों साध्य हैं दो बार आनेसे यमिका कहाती
है । चरकोक्त यमला इस जगह नहीं ग्रहण करना चाहिये ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाधुरीभाषाटीकायां
हिक्कारोगनिदानं समाप्तम् ॥
अथ श्वासनिदानम् ।
हिक्का श्वासका एक हेतु होनेसे हिक्काके अनन्तर श्वासरोगको कहते हैं—
महोर्द्धाच्छिन्नतमकक्षुद्रभेदैस्तु पञ्चधा ।
भिद्यते स महाव्याधिः श्वास एको विशेषतः ॥ १ ॥
महाश्वास, ऊर्ध्वश्वास, छिन्नश्वास, तमकश्वास और क्षुद्रश्वास इन भेदोंसे एक
श्वासरोग पांच प्रकारका है ॥
श्वासके पूर्वरूपके लक्षण ।
प्राग्रूपं तस्य हृत्पीडा शूलमाध्मानमेव च ।
आनाहो वक्त्रवैरस्यं शंखनिस्तोद एव च ॥ २ ॥
हृदय दुखे, शूल हो, अफरा हो, पेट तनासा हो, कनपटी दूखे, मुखमें रसका
स्वाद आवे नहीं, यह श्वासरोगका पूर्वरूप है ॥
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भाषाटीकासमेत । (१०१)
श्वासरोगकी सम्प्राप्ति ।
यदा स्रोतांसि संरुध्य मारुतः कफपूर्वकः ।
विष्वग्व्रजति संरुद्धस्तदा श्वासान् करोति सः ॥ ३ ॥
सर्व देहमें विचरनेवाला पवन जब कफसे मिलकर प्राण अन्न उदक बहनेवाली
सब नसोंके मार्गको रोक देवे तब पवन फिरनेसे रुककर श्वासरोगको प्रगट करे ॥
महाश्वासके लक्षण ।
उद्धूयमानवातो यः शब्दवद् दुःखितो नरः । उच्चैः श्वसिति
संरुद्धो मत्तर्षभ इवानिशम् ॥ ४ ॥ प्रनष्टज्ञानविज्ञानस्तथा
विभ्रान्तलोचनः । विवृताक्ष्याननो बद्धमूत्रवर्चा विशीर्ण-
वाक् ॥ ५ ॥ दीनः प्रश्वसितं चास्य दूराद्विज्ञायते भृशम् ।
महाश्वासोपसृष्टस्तु क्षिप्रमेव विपद्यते ॥ ६ ॥
जिसका वायु ऊपरको जायके प्राप्त हो ऐसा मनुष्य दुःखित होकर मुखसे शब्द-
युक्त श्वासको निकाले, ऊंचे स्वरसे अथवा जैसे मतवाला बैल शब्द करे इस प्रकार
रात्रिदिन श्वाससे पीडित हो उसके ज्ञान विज्ञान जाते रहे, नेत्र चंचल हों और
जिसका श्वास लेनेमें नेत्र और मुख फटजांय, मल मूत्र बन्द हो जाय, बोला जाय
नहीं अथवा बोले तो मन्द बोले, मन खिन्न हो और जिसका श्वास दूरसे सुनाई दे
यह महाश्वास जिस पुरुषके हो वह तत्काल मरणको प्राप्त होय ॥
ऊर्ध्वश्वासके लक्षण ।
ऊर्ध्वं श्वसिति यो दीर्घं न च प्रत्याहरत्यधः । श्लेष्मावृतमुख-
स्रोताः क्रुद्धगन्धवहादितः ॥ ७ ॥ ऊर्ध्वदृष्टिर्विपश्यंश्च विभ्रां-
ताक्ष इतस्ततः । प्रमुह्यन्वेदनार्तश्च शुष्कास्योऽरतिपीडितः ॥८॥
बहुत देरपर्यंत ऊंचा श्वास ले, नीचे आवे नहीं, कफसे मुख भरजाय तथा और
सब नाडियोंके मार्ग कफसे बन्द हो जायँ, कुपित वायुसे पीडित हो, ऊपरको नेत्र
कर चंचल दृष्टिसे चारों ओर देखे, मूर्च्छाकी पीडासे अत्यन्त पीडित हो, मुख सूखे
तथा बेहोश हो ये ऊर्ध्वश्वासके लक्षण हैं ॥
ऊपरकोही श्वास ले नीचे नहीं आवे यह जो कहा उसमें कारण कहते हैं—
ऊर्ध्वश्वासे प्रकुपिते ह्यधश्वासो निरुध्यते ।
मुह्यतस्ताम्यतश्चोर्ध्वं श्वासस्तस्यैव हन्त्यसून् ॥ ९ ॥
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