कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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११४ कथासरित्सागर
११४ कथासरित्सागर
वस्त्यौषधं गुदे मूर्ख दीयते न तु पीयते।
अह प्रतीक्षितं किं नेत्युपालभ्यत तेन स ॥११८॥
इतीष्टमप्यनिष्टाय जायतेऽविधिना कृतम्।
तस्मान्न विधिमुत्सृज्य प्राज्ञः कुर्वीत किञ्चन ॥११९॥
मूर्ख पुरुषस्य तपस्विनाञ्च कथा
अप्रेक्षापूर्वकारी च निन्द्यतेऽल्पहृतक्षणात्।
तथा च कुत्रचित् कश्चित् जडबुद्धिरभूत् पुमान् ॥१२०॥
तस्य देशान्तरं यातुं गच्छतोऽन्वागतः सुतः।
अटव्यां वासिते सार्थे विवेश विहरन् वनम् ॥१२१॥
पाटितो मर्कटैः सोऽत्र कुब्छाम्बीबधुपेत्य तम्।
वृक्षानभिज्ञः पितरं पृच्छन्तमवदज्जडः ॥१२२॥
वनेऽस्मि पाटितः कैश्चित्सलोमशैः फलमक्षिभिः।
तच्छ्रुत्वा क्रोधकृप्तासिस्तत्पिता तद्वनं ययौ ॥१२३॥
दृष्ट्वा फलान्यादधानाञ्जटिलांस्तत्र तापसान्।
सोऽम्यधावत्क्षवोन्मीभिः सुतो मे लोमशैरिति ॥१२४॥
ऋक्षेस्तैः पाटितः पुत्रो मद्दृष्टैर्मा वधीर्मुनीन्।
इत्थवार्यत पान्थेन तद्भ्रात् सोऽप्य केनचित् ॥१२५॥
ततः स वैशामुत्तीर्णं पावकात्सार्थमागतः।
तन्न जातुचिदप्रेक्षापूर्वकारी भवेदबुधः ॥१२६॥
किमम्यत् सर्वथा भाव्यं जन्तुना कृतबुद्धिना।
लोकोपहसिताः शश्वत् सीदन्त्येव ह्यबुद्धयः ॥१२७॥
तथा च निर्धनः कश्चित् प्राप्तवानध्वनि ब्रजन्।
सार्थवाहस्य कस्यापि च्युतां हेममृतां वृतिम् ॥१२८॥
स मूढस्तां गृहीत्वैव न जगामान्यतोऽपि च।
स्थित्वा तत्रैव सख्यातुमारेभे हेम तच्च तत् ॥१२९॥
तावत्स्मृत्वा हयारूढः प्रत्यागत्य स सत्वरम्।
सार्थवाहोऽस्य दृष्टस्य हेमभस्त्रां जहार ताम् ॥१३०॥
ततः स वृष्टनष्टार्थः शोचन् प्रायादथामुखः।
प्राप्तोऽप्यर्थः क्षणादेव हार्यते मन्दबुद्धिना ॥१३१॥
मूर्ख पुरुष और तपस्वियों की कथा
'मूर्ख वस्ति की न पथि गुदा में दी जाती है। वह पी नहीं जाती। तूने मेरी प्रतीक्षा
क्यों नहीं की ?' इस प्रकार कहते हुए वैद्य ने उसे उलाहना दिया ॥१८॥
इस तरह उलटे प्रकार से किया गया कार्य अच्छा होने पर भी हानिकारक हो जाता है।
इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति उचित प्रकार को छोड़कर कोई काम अनुचित ढंग से न
करे ॥१९॥
मूर्ख पुरुष और तपस्वियों की कथा
बिना विचारे निन्दनीय काम करनेवाला पुरुष क्षण में ही हास्य और निन्दा का पात्र
बन जाता है। कहीं पर कोई जड़बुद्धि पुरुष था। दूसरे देश को जाते हुए उसके पीछे उसका पुत्र
भी आ गया। यात्रियों के दल के जंगल में डेरा डालने पर वह बालक घूमता-फिरता वन में
कहीं दूर निकल गया ॥२०-२१॥
वहाँ पर बन्दरों ने उसे काट लिया और बन्दरों को न जानता हुआ वह लड़का कठिनाई
से जीवित रहकर वहाँ वापस आया और पिता के पूछने पर उससे बोला—'जंगल में कुछ बड़े
बड़े बालावाले और फल खानेवालों ने मुझे काट लिया। यह सुनकर क्रोध से तलवार
खींचकर उसका पिता उस वन में गया ॥२२—२३॥
वहाँ उसने फल खाते हुए जटाधारी तपस्वियों को देखा और उन्हें देखकर 'इन्हीं
लोगों ने मेरे पुत्र को काटा' सोचकर उन पर ही टूट पड़ा ॥२४॥
तब किसी पथिक ने उससे कहा—'मैंने देखा है। तेरे पुत्र को बन्दरों ने काटा है।
इन मुनियों को मत मार। यह सुनकर वह उस हत्याकाण्ड से रुका ॥२५॥
तब वह दैवयोग से मुनियों के वध के पाप से बचकर अपने दल में आ गया। इसलिए,
बिना समझे-बूझे विद्वान् को कोई काम नहीं करना चाहिए ॥२६॥
अधिक क्या कहा जाय। प्राणी को सदा तर्कबुद्धि होना चाहिए। मूर्ख तो संसार
में ठगे जाते हैं और दुःख भोगते हैं ॥२७॥
किसी निर्धन व्यक्ति ने मार्ग में जाते हुए, किसी व्यापारी की गिरी हुई रुपयों से भरी
चमड़े की थैली पाई ॥२८॥
वह मूर्ख उसे पाकर इधर-उधर न जाकर वहीं बैठकर उसमें रखे हुए मान के सिक्कों
को गिनने लगा ॥२९॥
इतने में ही स्मरण आने पर वह व्यापारी घोड़े पर सवार होकर वहाँ आया और उसे
पाकर प्रसन्न होते हुए उस गरीब से अपनी थैली छीन ले गया ॥३०॥
इतना धन पाकर भी उसे गँवाकर वह गँवार पश्चात्ताप करता हुआ मुँह लटकाए हुए
चला गया। इस प्रकार, मूर्ख पाये धन को भी गँवा बैठते हैं ॥३१॥
१२४ कथासरित्सागर
१२४ कथासरित्सागर
वस्त्रेणोपप गूढं मूढ दीयते न तु पीयते।
अहं प्रधावितः किं नत्युपाहसत्ततं तन सः ॥११८॥
इतीष्टमप्यनिष्टाय जायतेऽविधिना कृतम्।
तस्मान्न विधिमुत्सृज्य प्राज्ञः कुर्वीत किञ्चन ॥११९॥
मूर्ख पुरुषस्य तपस्विनाञ्च कथा
अथात्राशूशूकारा च निजसत्यधुरन्धरात्।
महान् पुत्रविन् कश्चिज् जन्मदरिद्रोऽभूत् पुमान् ॥१२०॥
तस्य देशान्तरं जातु गच्छतोऽन्वगात् सुतः।
अटव्यां यामिनो मध्ये विषमं विहरन् पथिम् ॥१२१॥
शान्तो भटो मात्रं दृष्ट्वाऽज्जीयन्मुदञ्च तम्।
स्नानार्थिनं पितरं पृच्छन्तमन्वगत् ॥१२२॥
वनञ्चिन्नि घटितं रूपित्सामान् फलमर्थिभिः।
गच्छता त्रापुष्याग्निमस्तिना तद्धनं ययो ॥१२३॥
दृष्ट्वा फलाशनान्जटिलास्तत्र तापसान्।
गाम्भयारुरनाभाभिर् युतां च नामनरिः ॥१२४॥
च्छात्रो रात्रौ पुत्रा मद्बुद्ध्यां यथाश्रुतान्।
दूरावता साधनं गच्छान् गान्ध्र कश्चिन् ॥१२५॥
उच्चे ण दगृभान गाधारगाधमागता।
गत्र गान्धुर्विन्त्राशूशूकारा भवदूदूध ॥१२६॥
स्थितं तु गान्ध्रा नास्य दनुना ऽरुरङ्गिना।
आक्रार्यतां गच्छन् गान्ध्र्या भवदुदम् ॥१२७॥
तथा च निधने तस्मिन् गान्ध्रानाश्रयनि ययुन्।
गान्ध्राश्य शृण्वन्ति यथा हम्भूता दृशित् ॥१२८॥
न महान्तो गुणा दूरं न शगामादिश्रयीः परे।
विवरं दृष्ट्वा शशुकुलावद् दूरे नष्टा यथा द्रुमाः ॥१२९॥
तदिमेऽपि तपःशान्ता न गान्धार्या न तापसाः।
गच्छत द्रष्टुं दूरेऽपि पश्यन्तो गान्ध्र नाम् ॥१३०॥
इति न दूरे नगरस्य पाश्वं द्रष्टुन्तपोधनम्।
द्रष्टुमाययुः सर्वे च तत्रैते यत् प्रकीर्तिताः ॥१३१॥
मूर्ख पुरुष और तपस्वियों की कथा
'मूर्ख वस्ति की औषध गुदा में दी जाती है। वह पी नहीं जाती। तूने मेरी प्रतीक्षा
क्यों नहीं की?' इस प्रकार कहते हुए वैद्य ने उसे उलाहना दिया॥१८॥
इस तरह, उलटे प्रकार से किया गया कार्य अच्छा होने पर भी हानिकारक हो जाता है।
इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति उचित प्रकार को छोड़कर कोई काम अनुचित ढंग से न
करे॥१९॥
मूर्ख पुरुष और तपस्वियों की कथा
बिना विचारे निन्दनीय काम करनेवाला पुरुष क्षण में ही हास्य और निन्दा का पात्र
बन जाता है। कहीं पर कोई जड़बुद्धि पुरुष था। दूसरे देश को जाते हुए उसके पीछे उसका पुत्र
भी आ गया। यात्रियों के दल के जंगल में डेरा डालने पर वह बालक घूमता-फिरता वन में
कहीं दूर निकल गया॥२०-२१॥
वहाँ पर बन्दरों ने उसे काट लिया और बन्दरा को न जानता हुआ वह लड़का कठिनाई
से जीवित रहकर वहाँ वापस आया और पिता के पूछने पर उससे बोला—'जंगल में कुछ बड़े
बड़े बालोंवाले और फल खानेवालों ने मुझे काट लिया। यह सुनकर क्रोध से तलवार
खींचकर उसका पिता उस वन में गया॥२२-२३॥
वहाँ उसने फल खाते हुए जटाधारी तपस्वियों को देखा और उन्हें देखकर 'इन्हीं
लोगों ने मेरे पुत्र को काटा' सोचकर उन पर ही टूट पड़ा॥२४॥
तब किसी पथिक ने उससे कहा—'मैंने देखा है। तेरे पुत्र को बन्दरों ने काटा है।
इन मुनियों को मत मार। यह सुनकर वह उस हत्याकाण्ड से रुका॥२५॥
तब वह दैवयोग से मुनियों के वध के पाप से बचकर अपने दल में आ गया। इसलिए,
बिना समझे-बूझे विद्वान् को कोई काम नहीं करना चाहिए॥२६॥
अधिक क्या कहा जाय। प्राणी को सदा सूक्ष्मबुद्धि होना चाहिए। मूर्ख तो संसार
में फँसे जाते हैं और दुःख भोगते हैं॥२७॥
किसी निर्धन व्यक्ति ने मार्ग में जाते हुए, किसी व्यापारी की गिरी हुई रुपयों से भरी
चमड़े की थैली पाई॥२८॥
वह मूर्ख उसे पाकर इधर-उधर न जाकर वहीं बैठकर उसमें रखे हुए सोने के सिक्कों
को गिनने लगा॥२९॥
इतने में ही स्मरण आने पर वह व्यापारी घोड़े पर सवार होकर वहाँ आया और उसे
पाकर प्रसन्न होते हुए उस गरीब से अपनी थैली छीन ले गया॥३०॥
इतना धन पाकर भी उसे गँवाकर वह गँवार पश्चात्ताप करता हुआ मुँह लटकाये हुए
चला गया। इस प्रकार, मूर्ख पाये धन को भी गँवा बैठते हैं॥३१॥
११६ कथासरित्सागर
११६ कथासरित्सागर
कश्चिच्च पार्वणं चन्द्रं दिदृक्षुः केनचिज्जडः।
अङ्गुल्यभिमुखं पश्यत्यूचे दृष्टनवेन्दुना ॥३२॥
स हित्वा गगनं तस्यैवाङ्गुलिं तां विलोकयन्।
तस्यौ न चन्द्रमद्राक्षीदद्राक्षीद्धसतो जनान् ॥३३॥
प्रज्ञया साध्यतेऽसाध्यं तथा च श्रूयतां कथा।
काचिद्ग्रामान्तरं नारी गन्तुं प्रावर्त्ततैकका ॥३४॥
पथि सा च जिघृक्षन्तमकस्मादथ वानरम्।
वञ्चयन्ती मुहुर्वृक्षं संस्थिता पर्य्यधत्तत ॥३५॥
स तं तस्यास्तरुं मूढो भुजाभ्यां कपिरावृणोत्।
साप्यस्य बाहू हस्ताभ्यां तत्रेवापीडयत्तरोः ॥३६॥
तावच्च तस्मिन्निःस्पन्दे जातक्रोधे च वानरे।
पथा तेनागतं कश्चिदाभीरं स्त्री जगाद सा ॥३७॥
महाभाग गृहाणेमं क्षण बाह्वोः प्लवङ्गमम्।
यावद्रसनं च वणीं च विस्रस्तां सन्दधाम्यहम् ॥३८॥
एवं करोमि भजसे यदि मामिति वन सा।
उक्तेनानुमेन तावत्तत्साऽथ तं कपिमग्रहीत् ॥३९॥
तताऽस्य धूर्ता कृष्ट्या सा स्त्री हत्वा च तं कपिम्।
एकान्तमहोयुक्त्या तमाभीरं द्रुतमानयत् ॥४०॥
मिक्षिप्त्वथ सार्षेपु तं विहायव सैः सहं।
सा जगामप्सितग्रामं प्रभारशितकिप्सपा ॥४१॥
द्रव्यं प्रभवं नामहृ प्रधानं साक्यसनम्।
जीवत्यपशदिद्रागि धीदद्रिो न जीवति ॥४२॥
पटच्चरचोरयोः कथा
शृणी शृणु नृपान्येकां विचित्राद्भुतां कथाम्।
पटच्चरपनामानो चोरायास्तां पुरे क्वचित् ॥४३॥
उपा ग कृत्वा जानु वह्नित्यज्य पटं निशि।
गपि च्छत्रा नृपगुप्तावागम्यं प्रविश्यान् ॥४४॥
तत्र कान्तस्थिा तं मा शिनिन् राजकन्यका।
दृष्ट्रा गद्य गन्धात्त्ररामा स्वमुणाह्वयत् ॥४५॥
दशम लम्बक ११०
दशम लम्बक ११०
कोई मूर्ख दूज का चाँद देखना चाहता था। उसे किसी ने अंगुली से दिखाते हुए कहा—
'वह है, देखो वह है।' वह मूर्ख आकाश को न देखकर उसकी अंगुली को ही देखता रह गया।
उस हँसनवाले देखकर हँसत ही रह गये ॥३२-३३॥
असाध्य कार्य भी बुद्धि से सिद्ध होते हैं। इस पर कथा सुनो। एक स्त्री किसी दूसरे
गाँव को अकेली जा रही थी। मार्ग में उसे पकड़ने के लिए जाते हुए एक बन्दर को देखकर अपने
को उससे बार-बार बचाती हुई वह स्त्री एक पेड़ पकड़कर उसके चारों ओर घूमने लगी। उस
मूर्ख बन्दर ने उस वृक्ष का दोनों हाथों से पकड़ लिया। स्त्री ने भी उसके दोनों हाथों को पकड़कर
उसी वृक्ष में उलझा दिया ॥३४ - ३६॥
जब बन्दर शिथिल होकर क्रोध से भर गया तब मार्ग में जाते हुए किसी अहीर से उस
स्त्री ने कहा—'हे भाग्यवान्, तुम इस बन्दर को इसी प्रकार हाथ से पकड़े रहो तो मैं खिसकी हुई
चादर और गुथी हुई अपनी चोटी ठीक कर लूँ ॥३७-३८॥
उसने कहा—'यदि मेरे साथ तू रमण करे तो मैं ऐसा करूँ'। उस स्त्री ने स्वीकार कर
लिया और उसने भी बन्दर को पकड़ लिया ॥३९॥
तब उस स्त्री ने उस पुरुष का कटार खींचकर और उससे बन्दर को मार डाला।
तदनन्तर वह उस पुरुष से कहने लगी—'आओ वहीं एकान्त में चलें ऐसा कहकर वह स्त्री उस
अहीर को दूर ले जाकर छोड़ दिया और अन्य यात्रियों के एक झुंड में मिलकर अपने गाँव को
चली गई। इसप्रकार उसने बुद्धिबल से अपने चरित्र की रक्षा कर ली ॥४०-४१॥
इसलिए बुद्धि ही संसार का जीवन है। धन से हीन व्यक्ति जी सकता है किन्तु
बुद्धि से व्यतिरिक्त जीवित नहीं रह सकता ॥४२॥
घट और कर्पर नाम के चोरों की कथा
शिष्यों, अब एक और विचित्र कथा सुनो। किसी नगर में घट और कर्पर नाम के
दो चोर थे। उनमें कर्पर किसी समय घट को बाहर रखकर और स्वयं राजमहल में जाकर राजा का
बहुत-सा धन चुरा लाया। वहाँ पर एक अनन्य सुन्दर कन्या ने जगकर उससे मधुर आलाप में कहा
'चोर यदि हाथ के साथ यह हृदय चुराकर मुझे अपना बना ले ॥४३-४५॥
११८ कथासरित्सागर
११८ कथासरित्सागर
रन्त्वा च तेन साकं सा दत्त्वा चार्थं तमब्रवीत्।
दास्याम्ययमभूतं ते पुनरेष्यसि यदिति॥४६॥
ततो निर्गत्य वृत्तान्तमाख्यायार्थं समर्प्य च।
व्यसृजत्प्राप्य राजार्थं घटं गेहं स कर्परः॥४७॥
स्वयं तत्रैव तु पुनर्विवेशान्तःपुरं स तत्।
आकृष्टः कामलोभाभ्यामपायं को हि पश्यति॥४८॥
तत्रैव सुरतश्रान्तः पानमत्तस्तया सह।
राजपुत्र्या समं सुप्तो न बुबोध गतां निशाम्॥४९॥
प्रातः प्रविष्टैर्लब्ध्वा स बद्धवान्तःपुररक्षिभिः।
राज्ञे निवेदितः सोऽपि क्रुधा तस्यादिशद्वधम्॥५०॥
यावत् स नीयते वध्यभुवं तावत् सखास्य सः।
रात्रावनागतस्यागादन्वेष्टुं पदवीं घटः॥५१॥
तमागतं स दृष्ट्वाथ घटं कर्परकः पुनः।
हृत्वा राजसुतां रक्षेत्याह स्म स्वसञ्ज्ञया॥५२॥
घटनाङ्गीकृतेऽच्छोऽथ सममेव स कर्परः।
नीत्वोत्तम्भ्य तरौ क्षिप्रं वधकेरवणो हृतः॥५३॥
ततो गत्वा घटो गेहमुक्षोचन्निशागमे।
भित्त्वा सुरुङ्गां प्राविक्षत् स तद्राजसुतागृहम्॥५४॥
तामेकां सङ्गमितां दृष्ट्वोपेत्य जगाद सः।
त्वत्कृतञ्च हतस्याहं कर्परस्य सखा घटः॥५५॥
अपनेतुमितस्त्वां च तत्स्नेहादहमागतः।
तदेहि यावन्नानिष्टं किञ्चित्त कुरुते पिता॥५६॥
इत्युक्ते तेन सा हृष्टा राजपुत्री तथेति तत्।
प्रतिपेदे स चैतस्य बन्धनानि न्यवारयत्॥५७॥
ततस्तया समं सद्यः समर्पितशरीरया।
निर्गत्य च ययौ चौरः स्वनिकेतं सुरुङ्गया॥५८॥
प्रातश्च स्नातदुर्लक्ष्यसुरुङ्गेन निजां सुताम्।
केनाप्यपहृतां बुद्ध्वा स राजा समचिन्तयत्॥५९॥
ध्रुवं तस्यास्ति पापस्य निगृहीतस्य बान्धवः।
कश्चित् साहसिको येन हृतेव सा सुता मम॥६०॥
दशम लम्बक १९९
दशम लम्बक १९९
उसके साथ रमण करके और उसे धन देकर वह बोली—'यदि फिर कभी आयेगा तो
तुझे इससे भी अधिक धन दूँगी' ॥४६॥
तब वहाँ से निकलकर, वहाँ का वृत्तान्त सुनाकर और पाया हुआ राज-धन घट को देकर
उसे घर भेज दिया और स्वयं फिर राजकन्या के भवन में जा घुसा। काम और लोभ से खिंचा
हुआ कौन पुरुष हानि की चिन्ता करता है ॥४७-४८॥
वहाँ वह कर्पर, रतिकर्म से थका हुआ और नशे में उन्मत्त होकर राजकुमारी के साथ
ऐसा सो गया कि बीती हुई रात को भी वह न जान सका। प्रातःकाल अन्तःपुर के रक्षकों द्वारा
पकड़ा जाकर राजा के सामने वह उपस्थित किया गया। राजा ने भी क्रोध से उसके वध की
आज्ञा दे दी ॥४९-५०॥
जब वधिक उसे फाँसी देने के लिए ले जा रहे थे उसी समय रात को न आये हुए उसकी
खोज करता हुआ घट वहाँ आ पहुँचा ॥५१॥
फाँसी पर लटकाने के लिए जाते हुए कर्पर ने अपने मित्र घट को आया हुआ देखकर अपने
इंगित से कहा कि तुम राजकन्या को यहाँ से ले जाकर उसकी रक्षा करना ॥५२॥
घट ने भी अपने इंगित से उसे स्वीकृति दे दी। तब वधिकों ने उस बेचारे को शीघ्र
ही फाँसी के स्थान पर ले जाकर और पेड़ पर लटकाकर मार डाला ॥५३॥
तब घट भी घर जाकर दिन-भर सोचता रहा और रात आने पर सुरंग फोड़कर
राजकुमारी के भवन में घुसा ॥५४॥
वहाँ अकेली और बँधी हुई राजकुमारी को देखकर वह बोला—'मैं मारे गये कर्पर का
मित्र घट हूँ। उसी के प्रेम से तुझे भगा ले जाने के लिए यहाँ आया हूँ। इसलिए, आओ।
जबतक तुम्हारा पिता तुम्हारा कुछ अनिष्ट नहीं करता तबतक भाग चलें' ॥५५-५६॥
उस (घट) के ऐसा कहने पर प्रसन्न वह राजकन्या उसकी बात को मानकर भागने
के लिए तैयार हो गई। घट ने भी उसके बन्धन खोल दिये ॥५७॥
तब अपना शरीर छद्मवेश किये हुई राजकन्या के साथ वह चोर, सुरंग के मार्ग से
निकलकर अपने घर आ गया ॥५८॥
प्रातःकाल गड्ढे में छिपी सुरंग के मार्ग से भगाई गई अपनी कन्या का समाचार जानकर
राजा ने सोचा—॥५९॥
'अवश्य ही फाँसी पर लटकाये गये उस पापी का कोई साहसी बन्धु है जिसने इस प्रकार
मेरी कन्या का अपहरण कर लिया है' ॥६०॥
१२ कथासरित्सागर
[Page Header]
१२ कथासरित्सागर
इति संचिन्त्य नृपतिर्मुञ्चत्स कर्परकलेवरम्।
रक्षितुं स्थापयामास स्वभृत्यानब्रवीच्च तान्॥६१॥
यः शवेनाभिमार्गच्छेत् कर्तुं दाहादिकं न वः।
अवष्टभ्यस्ततो रूप्ये पापो तां कुलदीपिकाम्॥६२॥
इति राज्ञा समादिष्टा रक्षिणोऽथ नृपतिं ते।
रक्षन्तस्तस्थुरनिशं तत्कर्परकलेवरम्॥६३॥
तत् सोऽन्विष्य घटो बुद्ध्या राजपुत्रीमुवाच ताम्।
प्रिये बन्धुः सखा योऽभूत् परं कर्परो मम॥६४॥
यत्प्रसादान्मया प्राप्ता त्वं सशङ्करनसञ्चया।
स्नेहानुरूपमकृत्वास्य नास्ति मे हृदि निवृत्तिः॥६५॥
तत्तं गत्वानुशोचामि प्रक्षमाणः स्वयुक्तितः।
श्मशानञ्च सस्करोम्यम्नौ तीर्थेऽस्यास्थीनि च क्षिप॥६६॥
भयं मा भूच्च ते नाहमबुद्धिः कर्परो यथा।
इत्युक्त्वा तां तथैवाभूत् स महाप्रतिवोधकृत्॥६७॥
स दध्योदनमादाय कर्परे कर्परान्तिकम्।
मार्गगत इवोपागाञ्छ्रकेत्र स्खलितं च सः॥६८॥
निपात्य हस्ताद् मद्धंक्त्वा च तं सदध्यन्नकर्परम्।
हा कर्परामृतभूतेत्यादि तत्तन्वशोचत सः॥६९॥
रक्षिणां मन्दिरे तच्च भिन्नभाण्डानुशोचनम्।
क्षणाच्च गृहमागत्य राजपुत्र्यै घटस्तदा॥७०॥
वयद्युदन बभूवेथ भृत्यः कृतकनप्रतः।
अन्यं भृत्यमथारूढमद्यभाण्डं च पृष्ठतः॥७१॥
स्वयं च मत्तग्रामीणवेषो भूत्वा दिनक्षये।
प्रस्खलन्निकटे तेषामगात् कर्पररक्षिणाम्॥७२॥
कस्त्वं क्व च ते भ्रातः क्व यासीति च तन्नतः।
पृष्टः स धूर्तस्तानप्युवाच स्वस्खलिताक्षरम्॥७३॥
ग्राम्योऽहमेषा भार्या मे यासीत् श्वशुरं गृहम्।
नदयथोपसिका नेयमानीता तत्कृते मया॥७४॥
सम्भाषणाच्च यूयं मे सञ्जाता सुहृदोऽधुना।
: तदर्थे तन्न मध्यामि भव्याणामद्यमस्तु वः॥७५॥
इत्युक्त्वा मद्यमर्कक स ददौ तेषु रक्षिषु।
ते हसन्तो गृहीत्वैव मुञ्चत स्वागिता अपि॥७६॥
दशम लम्बक १२१
दशम लम्बक १२१
ऐसा सोचकर राजा ने फाँसी पर लटकाये गये कर्पर के शव की रक्षा के लिए अपने
सिपाही नियुक्त कर दिये और उनसे कहा—॥६१॥
'जो भी कोई इस मुर्दे के लिए शोक करता हुआ इसका शव लेकर दाह आदि क्रिया करने
के लिए आये उसे पकड़ लेना। उससे मैं उस दुष्टा और कुल-कलंकिनी कन्या को प्राप्त कर
लूँगा ॥६२॥
राजा की आज्ञा पाये हुए सेवक उस कर्पर के शव की रक्षा करते हुए रात-दिन वहाँ
पहरा देने लगे ॥६३॥
इस बात का पता लगाकर घट ने राजपुत्री से कहा—'प्यारी वह कर्पर, मेरा बन्धु और
परम मित्र था। जिसकी कृपा से मैंने रत्नों और धन के साथ तुझे पाया है। उसके प्रेम से उऋण
हुए बिना मेरे हृदय को शान्ति न मिलेगी ॥६४-६५॥
इसलिए, मैं जाकर उसका शोक मनाता हूँ और अपनी युक्ति से उसका अग्नि-संस्कार
करके उसकी अस्थियों को किसी तीर्थ में प्रवाहित करता हूँ ॥६६॥
तुझे डरना न चाहिए। मैं कर्पर के समान मूढ़ नहीं हूँ। उस (राजकन्या) से इस प्रकार
कहकर उसने पाशुपत योगी का वेष बनाया और एक खप्पर में दही और भात रखकर मार्ग चलते
हुए मटकता-सा कर्पर के शव के पास आ गया। वहाँ आकर उसने हाथ से खप्पर को गिरा दिया
और 'हाय अमृत-भरे कर्पर, हाय अमृत-भरे कर्पर'—कहकर चिल्लाकर शोक करने लगा।
रक्षकों ने उसे टूटे हुए खप्पर के लिए शोक करके रोते हुए समझा। उसी समय उसने घर वापस
आकर राजपुत्री से सब कहा ॥६७-७०॥
दूसरे दिन स्त्री (बहू) का वेष धारण किए हुए एक सेवक के सिर पर धतूरा मिले
हुए भोजन का बरतन रखकर, दूसरे सेवक को पीछे किये हुए और स्वयं मद्य से उन्मत्त ग्रामीण
का वेष बनाकर सायंकाल के समय गिरता-पड़ता तथा लड़खड़ाता हुआ घट कर्पर के शव की रक्षा
करते हुए सिपाहियों के पास आ गया ॥७१-७२॥
वहाँ पर 'तू कौन है यह स्त्री कौन है? और भाई तू कहाँ जा रहा है? —पहरेदारों द्वारा
इस प्रकार पूछे जाने पर वह धूर्त बोला—'मैं गाँव का रहनेवाला हूँ। यह मेरी पत्नी है। यहाँ से
मैं ससुराल जा रहा हूँ। यह भोजन का सामान मैं उनके लिए ही लाया था किन्तु वार्तालाप होने
के कारण आप लोग भी मेरे मित्र हो गए हैं। अतः आधा ही अन्न वहाँ ले जाऊँगा और आधा
आपलोगों के लिए रहेगा। ऐसा कहकर उसने वह वस्तु निकालकर उन लोगों को खाने के
लिए दी। वे भी सभी हँसते हुए उसे खाने लगे ॥७३-७६॥
१६
१२२ कथासरित्सागर
१२२ कथासरित्सागर
तेन रक्षिषु धत्तूरमोहितेष्वेपु सोऽग्निसात्।
निशि चक्रे घटो देहं कर्परस्याहृतेन्धनः ॥७७॥
गत तस्मिंस्ततः प्रातर्बुद्ध्वा राजा निवार्य तान्।
विमूढांस्थापयामास रक्षिणोऽन्यानुवाच च ॥७८॥
रक्ष्याण्यस्थीन्यपीदानीं यस्तान्यादातुमभ्यति।
स युष्माभिर्ग्रहीतव्यो भक्ष्य किञ्चिच्च नान्यतः ॥७९॥
इति राज्ञोदितास्ते च सावधाना दिवानिशम्।
तत्रासन् रक्षिणस्तं च वृत्तान्तं बुबुधे घटः ॥८०॥
ततः स चण्डिकादत्तमन्त्रप्रभाववित्।
मित्रं प्रव्राजकं किञ्चिच्चञ्चकाराश्वासदस्तनम् ॥८१॥
तत्र गत्वा समं तेन प्रव्राजा मन्त्रजापिना।
रक्षिणो मोहयित्वा तान् कर्परास्थीनि सोऽग्रहीत् ॥८२॥
क्षिप्त्वा च तानि गङ्गायामत्यक्त्याय यथाकृतम्।
राजपुत्र्या समं तस्थौ सुखं प्रव्राजकान्वितः ॥८३॥
राजाऽपि सोऽस्थिहरणं बुद्ध्वा तद्रक्षिमोहनम्।
आ सुताहरणात् सर्वं मेने तद्योगिचेष्टितम् ॥८४॥
येनेदं योगिनाकारि तनयाहरणादि मे।
ददामि तस्मै राज्यार्धमभिव्यक्तिं स याति चेत् ॥८५॥
इति राजा स्वनगरे दापयामास घोषणाम् ।
तां श्रुत्वा चैच्छदात्मानं घटो दर्शयितुं तदा ॥८६॥
मैवं कृथा न कार्योऽस्मिन् विश्वासश्छद्मघातिनि।
राज्ञीत्यवार्यत तया राजपुत्र्या ततश्च सः ॥८७॥
मथोद्भवभयात्तत्र साकं प्रव्राजकेन सः।
घटो देशान्तरं यायाद्राजपुत्र्या तया युतः ॥८८॥
मार्गे च राजपुत्री सा प्रव्राजं तं रहोज्ञब्रवीत्।
एकन ध्वसितान्येन प्रस्थितास्म्यमुना पदात् ॥८९॥
तत्तोरः स मृतो नायं घटो मे त्वं बहुप्रियः।
इत्युक्त्वा तं सङ्गम्य सा विषेणावधीद् घटम् ॥९०॥
ततस्तेन समं यान्ती पापा प्रव्राजकेन सा।
धनदत्ताभिधानेन सञ्जग्मे वणिजा पथि ॥९१॥
कोऽप्य कस्मात्सी त्वं प्रेयान् ममेत्युक्त्वा ययौ समम्।
वणिजा तेन ससुप्तं सा प्रव्राजं विहाय तम् ॥९२॥
द्वादश लम्बक १२५
द्वादश लम्बक १२५
उस भोजन में पड़े हुए धतूरे के कारण उन पहरेदारों के बेहोश हो जाने पर, घट ने
रात्रि के समय लकड़ियाँ इकट्ठी करके आग लगा दी और कर्पट का अग्नि-संस्कार पूरा कर
दिया ॥७७॥
प्रातःकाल इस घटना को जानकर राजा ने उन पहरेदारों को हटाकर दूसरे पहरेदार
नियुक्त किये। और उनसे कहा—'अब भी उसकी अस्थियों की रक्षा करनी है। जो भी उन्हें
लेने आए उसे पकड़ लेना और किसी का दिया हुआ कुछ नहीं खाना ॥७८-७९॥
राजा की इस आज्ञा से वे नये प्रहरी दिन रात सावधानी से उसकी रक्षा करते थे।
यह समाचार घट को मालूम हुआ ॥८०॥
तब उसने चण्डिका से प्राप्त मोहन-मन्त्र को जाननेवाले किसी साधु को अपना विश्वासी
मित्र बनाया ॥८१॥
घट, उसी संन्यासी मित्र के साथ वहाँ गया और पहरेदारों को उस साधु से मोहित
कराकर कर्पट की अस्थियाँ बीनकर वहाँ से ले आया ॥८२॥
तदनन्तर घट, उन अस्थियों को गंगा में प्रवाहित कर, राजकुमारी को अपना सारा
वृत्तान्त सुनाकर और उस साधु के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥८३॥
राजा ने भी पहरेदारों के मोहित होने और कन्या के अपहरण आदि के कार्य को किसी
योगी के योग की माया समझा ॥८४॥
जिस योगी ने मेरी कन्या का हरण किया है, वह यदि प्रकट हो जाय तो मैं
अपना आधा राज्य उसे दे दूँगा। राजा ने अपने नगर में ऐसी घोषणा करा दी। यह सुनकर
जब घट अपने को प्रकट करने के लिए तैयार हुआ तब राजपुत्री ने यह कहकर उसे रोक दिया
कि 'कपट से बात करनेवाले राजा पर विश्वास मत करो' ॥८५-८७॥
तब भेद खुलने के भय से घट उस साधु और राजपुत्री को लेकर दूसरे देश को
चला गया ॥८८॥
मार्ग में उस राजपुत्री ने उस साधु से एकान्त में कहा—'एक कर्पट ने तो मेरा चरित्र
नष्ट किया और दूसरे ने मुझे राजकुमारी-पद से गिरा दिया। वह कर्पट चोर तो मर गया
किन्तु यह घट मरा नहीं। तुम मुझे अत्यन्त प्यारे लगते हो। ऐसा कहकर उससे सम्मति करके
राजकन्या ने विष देकर घट को मार डाला ॥८९-९०॥
तब उस साधु के साथ जाती हुई वह पापिन राजकुमारी मार्ग में धनदेव नामक एक
बनिए से मिल गई और बोली—'यह कंगाल पारण करनेवाला कहाँ ? तुम मेरे प्यारे हो।
इस प्रकार सोए हुए साधु को छोड़कर वह बनिए के साथ चुपके-से भाग गई ॥९१-९२॥
१२२ कथासरित्सागर
१२२ कथासरित्सागर
तेन रक्षिषु धत्तूरमोहितेष्वेषु सोऽग्निसात् ।
निधिं चक्रे घटो गेहे कर्परस्याहृतेन्धनः ॥७७॥
गते तस्मिंस्ततः प्रातर्बुद्ध्वा राजा निवार्य तान् ।
विमूढांस्थापयामास रक्षिणोऽन्यानुवाच च ॥७८॥
रक्ष्यास्थ्यस्थी यपीदानीं यस्तान्यादातुमभ्येति ।
स युष्माभिर्ग्रहीतव्यो भक्ष्यं किञ्चिन्न चान्यतः ॥७९॥
इति राज्ञोदितास्ते च सावधाना दिवानिशम् ।
तत्रासन् रक्षिणस्तं च वृत्तान्तं बुबुधे घटः ॥८०॥
ततः स चण्डिकादत्तमन्त्रप्रभाववित् ।
मित्रं प्रव्राजकं किञ्चिच्चकाराश्वासकेतनम् ॥८१॥
तत्र गत्वा समं तेन प्रव्राजा मन्त्रजापिना ।
रक्षिणो मोहयित्वा तान् कर्परास्थीनि सोऽग्रहीत् ॥८२॥
क्षिप्त्वा च तानि गङ्गायामेत्याख्याय यथाकृतम् ।
राजपुत्र्या समं तस्थौ सुप्तं प्रव्राजकान्वितः ॥८३॥
राजाऽपि सोऽस्थिहरणं बुद्ध्वा तद्रक्षिमोधनम् ।
आ सुताहरणात् सर्वं मेने तद्योगिचेष्टितम् ॥८४॥
येनैव योगिनाकारि तनयाहरणादि मे ।
ददामि तस्मै राज्यार्धमभिव्यक्तिं स याति चेत् ॥८५॥
इति राजा स्वनगरे दापयामास घोषणाम् ।
तां श्रुत्वा चैच्छदात्मानं घटो दर्शयितुं तया ॥८६॥
मैवं कृथा न कार्योऽस्मिन् विश्वासश्छद्मघातिनि ।
राज्ञीत्यवार्यत तया राजपुत्र्या ततश्च सः ॥८७॥
अथोद्वेगभयात्तेन साकं प्रव्राजकेन च ।
घटो देशान्तरं यायाद्राजपुत्र्या तया युतः ॥८८॥
मार्गे च राजपुत्री सा प्रव्राजं तं रहोऽब्रवीत् ।
एकेन श्वसितान्येन अश्वास्यमुमा पदात् ॥८९॥
तच्चोरः स मृतो नाम घटो मे त्वं बहुप्रियः ।
इत्युक्त्वा तेन सङ्गम्य सा विषेणावधीद् घटम् ॥९०॥
ततस्तेन समं यान्ती पापा प्रव्राजकेन सा ।
धनदत्ताभिधानेन सञ्जग्मे वणिजा पथि ॥९१॥
कोऽप्य क्याक्षी त्वं प्रेयान् ममेत्युक्त्वा ययौ समम् ।
वणिजा तेन ससुप्तं सा प्रव्राजं विहाय तम् ॥९२॥
रिक्त पृष्ठ
प्रव्राजकश्च स प्रातं प्रबुद्धः समचिन्तयत्।
न स्नेहोऽस्ति न दाक्षिण्यं स्त्रीष्वहो चापलावृत ॥९३॥
यद्विश्वास्यापि मां पापा हृतार्था च पलायिता।
सेष लाभोऽद्य यन्न हतोऽस्मि घटवत्तया ॥९४॥
इत्यालोच्य निजं देशं ययौ प्रव्राजकोऽप्य सः।
वणिजा सह तद्देशं प्राप्ता राजसुतापि सा ॥९५॥
प्रवेशयामि सहसा बन्धकीं किमिमां गृहम्।
इति स्ववशप्राप्ताञ्च धनदेवो विचिन्तयन् ॥९६॥
वणिकस्तत्र किलिकस्या वृद्धाया वेश्म योषितः।
प्रविवेश तया साकं राजपुत्र्या दिनात्यये ॥९७॥
तत्र नक्तं स वृद्धां तां पप्रच्छापरिजावतीम्।
धनदव वणिग्गेहवार्तामम्वह वेत्सि किम् ॥९८॥
तच्छ्रुत्वा साऽब्रवीद् वृद्धा का वार्ता यत्र तत्र सा।
पुंसा नवन्वेनैव तद्भार्या रमते सदा ॥९९॥
चर्मपटा गवाक्षेण रज्ज्वा तम हि सम्व्यसे।
नक्तं घिशति यस्तस्यां स एवान्तः प्रवेश्यत ॥१००॥
निष्काश्यते सर्वैवात्र पश्चिमार्या पुनर्निशि।
पानमत्ता च सा नैव निभारुयति किञ्चन ॥१०१॥
एषा च वृत्तस्थितिः ख्यातिं नगरेऽत्राखिले गता।
बहुकालो गतोऽद्यापि न चायाति स तत्पतिः ॥१०२॥
एतद्वृद्धावचः श्रुत्वा धनदेवस्तदैव सः।
युक्त्या निर्गत्य तत्रागात् सान्तःपुंश्चः ससंशयः ॥१०३॥
दृष्ट्वा स तत्र वासीभिः पेटो रज्जुववर्मिताम्।
विवेश स ततस्ताभिरुत्क्षिप्यान्तरनीयत ॥१०४॥
प्रविष्टः स तयाऽनिलक्ष्य शय्यां निन्ये मदान्धया।
अविज्ञातः स्वगहिन्या हठात् क्षीबत्वमूढया ॥१०५॥
रिरंसा तस्य यावच्च नास्ति तद्घापदर्शनात्।
तावत्तां मददोषेण निद्रां तद्गृहिणी ययौ ॥१०६॥
निशान्ते च स दासीभिः सत्वरं रज्जुघटया।
गवाक्षेण बहिः क्षिप्तः खिन्नो वणिगचिन्तयत् ॥१०७॥
दशम लम्बक १२५
दशम लम्बक १२५
प्रातःकाल जप हुए साधु न देखा कि स्त्रिया म चंचलता (व्यभिचार) क सिवा न
स्नेह है, न सज्जनता है। इसलिए, वह दुष्टा मुझे विश्वाम दिलाकर भी माछ छककर भाग गई।
इतना ही लाभ हुआ कि उसन मुझ भी पट क समान मार नहीं डाला ॥१९३-१९४॥
ऐसा साचकर साधु अपन स्थान पर फर्मा गया राजपुत्री भी बनिय के साथ उसक
देग जा पहुँची ॥१९५॥
अपन देश पहुँचकर धनदेव सोचन लगा कि मैं इस दुराचारिणी दुष्टा को एकाएक
अपने पर में कैसे ल जाऊँ? ॥१९६॥
तब वह बनिया अपने नगर म सायंकाल के समय उस राजकुमारी के साथ एक वृद्धा स्त्री
के घर में चला गया और वहीं ठहर गया ॥१९७॥
वहाँ पर उस राजकुमारी न उम जानकार वृद्धा स पूछा कि 'क्या तुम धनदेव के घर
का हाल जानती हो ? ॥१९८॥
यह सुनकर बुद्धा बोली--'उमक घर की क्या बात है। उसकी पत्नी जहाँ-तहाँ सरा
सब पुरुष क साथ रमण करती है ॥१९९॥
उसकी खिड़की म रस्सी स बँधी चमड़े की पिटारी लटकती रहती है। रात में जो भी उस
पिटारी में घुसता है, उसे ही वह ऊपर बुला लती है ॥२ ००॥
रात के अन्त म उस उसी प्रकार बाहर निकाल देती है। मद्यपान स उन्मत्त वह कहीं
कुछ देखती नहीं ॥२ ०१॥
उसकी यह स्थिति इस सारे नगर म प्रसिद्ध हो गई है। बहुत समय हो गया उसका
पति अब भी नहीं आया ॥२ ०२॥
उस वृद्धा की बात सुनकर मन-ही-मन बुखी और सन्देह म पड़ा हुआ धनदेव किसी बहाने
अपन घर गया। वहाँ पर उसने दासिमों द्वारा रस्सी में बाँधी हुई पिटारी देखी। वह उसमें बैठ
गया और दासिया ने उसे ऊपर खींचकर भीतर कर लिया ॥१ ३ १ ४॥
उसके भीतर जाते ही नशे में चूर और काम में अन्धी स्त्री ने उसका आलिंगन करके
उस खाट पर पटक दिया। नशे में मत्त रहने के कारण उसकी स्त्री ने उसे पहचाना भी
नहीं ॥१ ५॥
अपनी पत्नी की यह दुरवस्था देख उस धनदेव की रमणेच्छा नहीं रह गई और तब
तक नषे की तीव्रता के कारण उसकी पत्नी भी सो गई ॥१ ६॥
रात का अन्त होने पर उसकी दासियों ने उसे उसी प्रकार पिटारी में भरकर बाहर फेंक
दिया। बाहर निकाला हुआ धनदेव बनिया सोचने लगा--॥१ ७॥
१२६ कथासरित्सागर
१२६ कथासरित्सागर
अलं मे गृहमोहेन गृहे नार्यो निबन्धनम्।
तासामेवेदृशी वार्त्ता तस्माच्छ्रेयो वनं परम् ॥१०८॥
इति निश्चित्य सन्त्यज्य स तां राजसुतामपि।
धनदत्तः प्रवृत्तः गन्तुं दूरं वनान्तरम् ॥१०९॥
गच्छतस्तस्य मार्गे च मिलितो मित्रतामगात्।
ब्राह्मणो रुद्रसोमाख्यः प्रवासादागतश्चिरात् ॥११०॥
स तेनोक्तः स्ववृत्तान्तं स्वमार्गस्थितो द्विजः।
तेनैव वणिजा साकं सायं स्वग्राममासदत् ॥१११॥
तत्र स्वभवनोपान्ते गोपं दृष्ट्वा नदीतटे।
गायन्तमिव गायन्तं नम्रया पृच्छति स्म सः ॥११२॥
गोप तं तरुणी काचित् कस्मिंस्त्वय्यनुरागिणी।
येनैवं गायसि मदान्मन्यमानस्तृणं जगत् ॥११३॥
तच्छ्रुत्वा सोऽहसद् गोपो गोप्यं वस्तु कियन्मया।
चिरविप्रोषितस्याहं रुद्रसोमद्विजन्मनः ॥११४॥
ग्रामाधिपस्य तरुणीमहं भार्यां सदा भजे।
प्रवेशयति सद्दासी समीपं तद्गृहेऽत्र माम् ॥११५॥
एतद्गोपालतः श्रुत्वा मन्युमन्तर्निगृह्य च।
तत्त्वं जिज्ञासमानस्तं रुद्रसोमो जगाद सः ॥११६॥
यद्येवमतिथिस्तेऽहं स्ववेषं देह्यमुं मम।
यावत् त्वमिव तत्राद्य याम्यहं कौतुकं हि मे ॥११७॥
एवं कुरु गृहाण त्वं मदीयं कास्रकम्बलम्।
लगुडं पास्व धवह तद्दासी यावदेष्यति ॥११८॥
मद्बुद्ध्या च तयात्र त्वं वन्दारूनाम्यट।
नक्तं तत्र व्रजाहं च विधास्यामि निशामिमाम् ॥११९॥
एवमुक्तवतस्तस्माद् गोपात्तल्लगुडकम्बलौ।
गृहीत्वा रुद्रसोमोऽत्र तद्रूपेण स तस्थिवान् ॥१२०॥
गोपश्च वणिजा साकं धनदत्तेन तेन सः।
दूरे तत्र मनाक् तस्थौ शशौ सा जाययो ततः ॥१२१॥
सा तं तमसि तूष्णीमाहूय स्त्रीवदवगुण्ठितम्।
एहीत्युक्त्वा तदा रुद्रसोमं गोपाधियानयत् ॥१२२॥
दशम लम्बक १२७
दशम लम्बक १२७
'घर का मोह व्यर्थ है। क्योंकि घर में स्त्री ही एक बन्धन है। उन स्त्रियों की भी
जब यह दशा है, तब घर से अच्छा एकान्त जंगल ही है' ॥१८॥
ऐसा निश्चय करके और उस राजकन्या को भी उसी वृद्धा के घर पर ही छोड़कर धनदेव
बनिया कहीं दूर वन के लिए चल पड़ा ॥१९॥
मार्ग में जाते हुए उसे रुद्रसोम नाम का एक ब्राह्मण मिला जो उसका मित्र बन गया।
वह भी बहुत दिनों बाद लम्बे प्रवास से घर आ रहा था ॥११०॥
बनिये से उसकी स्त्री के वृत्तान्त को सुनकर वह ब्राह्मण भी अपनी स्त्री पर शंका करता
हुआ उसी बनिये के साथ सायंकाल अपने गाँव पहुँचा ॥१११॥
अपने घर के पास नदी में एक ग्वाले को आते हुए देखकर उसने हँसी-हँसी में
उससे पूछा—॥११२॥
'ग्वाले क्या कोई युवती स्त्री तुमसे प्रेम करती है जिस कारण संसार को तृण के समान
समझकर इस प्रकार की मस्ती में तुम गा रहे हो ? ॥११३॥
यह सुनकर वह ग्वाला हँसा और बोला— मैं कहाँतक छिपाऊँ। लम्बे समय से विदेश
गये हुए गाँव के चौधरी रुद्रसोम नामक ब्राह्मण की युवती भार्या है, मैं उसी का सेवन
करता हूँ उसकी दासी स्त्री का वेष पहनाकर मुझे उसके घर ले जाती है। ग्वाल से यह सुनकर
और क्रोध को भीतर-ही-भीतर पीकर सच्चाई को जानने की इच्छा से रुद्रसोम ने ग्वाले से
कहा— ॥११४-११६॥
'यदि ऐसी बात है, तो आज मैं तेरा मेहमान हूँ। अतः अपना वेष मुझे दे दो तो तुम्हारी
तरह आज मैं वहाँ जाऊँ। मुझे बहुत कौतुक हो रहा है' ॥११७॥
'ऐसा करो यह मेरा काला कम्बल ले लो। लाठी भी ले लो और तबतक यहाँ बैठो
जबतक दासी यहाँ आती है। ग्वाले ने उससे इस प्रकार कहा ॥११८॥
और कहा कि—'मेरे भ्रम में दासी तुम्हें स्त्री के कपड़े पहनने को देगी। स्त्री वेष
धारण कर रात में तू वहाँ जाना और मैं आज की रात विश्राम करूंगा ॥११९॥
इस प्रकार कहते हुए ग्वाले से लाठी और कम्बल लेकर वह रुद्रसोम उसी वेष में
बैठा रहा ॥१२०॥
वह ग्वाला धनदेव बनिया के साथ कुछ दूर पर जा बैठा और इतने में ही वहाँ दासी
आ पहुँची ॥१२१॥
उसने चुपचाप आकर अँधेरे में धुर बैठे रुद्रसोम को याराना (ग्वाला) समझकर उस
स्त्री का वेष धारण कराकर कहा—जाओ ॥१२२॥
१९८ कथासरित्सागर
१९८ कथासरित्सागर
स च नीतं स्वभार्यां तां दृष्ट्वा गोपालचुम्बितः।
उत्थायैव कृताश्लेषां रुद्रसोमो व्यचिन्तयत् ॥१२३॥
सन्निकृष्टे निकृष्टेऽपि कष्टं रज्यन्ति कुस्त्रियः।
पापानुactionरक्ता यदियं गोपेऽप्यासनवर्त्तिनि ॥१२४॥
इति ध्यायन् मिषं कृत्वा तत्रवास्फुटया गिरा।
निर्गत्यैव विरक्तात्मा धनदेवान्तिकं ययौ ॥१२५॥
उक्तस्वगृहवृत्तान्तो वणिजं समुवाच सः।
त्वया सहाहमप्यमि वनं यातु गृहं क्षयम् ॥१२६॥
इत्य्रूचिवान् रुद्रसोमो धनदेववणिक् च सः।
वनं प्रति प्रतस्थाते सर्वैष सह तौ यतः ॥१२७॥
मिलितश्च तयो मार्गे धनदेवसुहृच्छशी।
कथाप्रसङ्गात् तौ तस्मै स्ववृत्तान्तं शशंसतुः ॥१२८॥
स तच्छ्रुत्वा शशीप्यर्त्तुश्चिराद्धान्तरागतः।
साशङ्कोऽभूत्स्वगेहिन्यां न्यस्तायामपि भूगृहे ॥१२९॥
प्रक्रमंश्च समं ताभ्यां सायं स स्वगृहान्तिकम्।
शशी प्राप गृहातिथ्यं तयोः कर्तुमियेष च ॥१३०॥
तावच्च दुर्गन्धवहं कुष्ठीर्णकराङ्घ्रिकम्।
तत्रापश्यत् सशृङ्गारं गायन्तं पुरुषं स्थितम् ॥१३१॥
विस्मयाच्च तमप्राक्षीदीदृशः को भवानिति।
कामदेवोऽहमस्मीति कुष्ठी सोऽपि जगाद तम् ॥१३२॥
का भ्रान्तिः कामदेवस्त्वं रूपशोभैव वक्ति ते।
इत्युक्तः शशिना भूयः सोऽवादीच्छृणु वच्मि ते ॥१३३॥
इह धूर्त्तः शशी नाम वसत्कपरिवारिकाम्।
भार्यां निक्षिप्य भूगेहे सोऽप्यों देशान्तरं गतः ॥१३४॥
तद्भार्यया विविक्ताविह दृष्टस्य मे तया।
अर्पितः सद्य एवात्मा मदनाकृष्टचित्तया ॥१३५॥
तया समं च सततं रात्रौ रात्रावहं रमे।
पृष्ठे गृहीत्वा तद्दासी प्रवेशयति तत्र माम् ॥१३६॥
तद् ब्रूहि किन्न कामोऽहं प्राप्य कल्यान्ययोषिताम्।
यच्चित्राकारधारिण्या भार्यया शशिनः प्रियः ॥१३७॥