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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

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पृष्ठ 975

द्वादश लम्बक १२५
उस भोजन में पड़े हुए धतूरे के कारण उन पहरेदारों के बेहोश हो जाने पर, घट ने
रात्रि के समय लकड़ियाँ इकट्ठी करके आग लगा दी और कर्पट का अग्नि-संस्कार पूरा कर
दिया ॥७७॥
प्रातःकाल इस घटना को जानकर राजा ने उन पहरेदारों को हटाकर दूसरे पहरेदार
नियुक्त किये। और उनसे कहा—'अब भी उसकी अस्थियों की रक्षा करनी है। जो भी उन्हें
लेने आए उसे पकड़ लेना और किसी का दिया हुआ कुछ नहीं खाना ॥७८-७९॥
राजा की इस आज्ञा से वे नये प्रहरी दिन रात सावधानी से उसकी रक्षा करते थे।
यह समाचार घट को मालूम हुआ ॥८०॥
तब उसने चण्डिका से प्राप्त मोहन-मन्त्र को जाननेवाले किसी साधु को अपना विश्वासी
मित्र बनाया ॥८१॥
घट, उसी संन्यासी मित्र के साथ वहाँ गया और पहरेदारों को उस साधु से मोहित
कराकर कर्पट की अस्थियाँ बीनकर वहाँ से ले आया ॥८२॥
तदनन्तर घट, उन अस्थियों को गंगा में प्रवाहित कर, राजकुमारी को अपना सारा
वृत्तान्त सुनाकर और उस साधु के साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥८३॥
राजा ने भी पहरेदारों के मोहित होने और कन्या के अपहरण आदि के कार्य को किसी
योगी के योग की माया समझा ॥८४॥
जिस योगी ने मेरी कन्या का हरण किया है, वह यदि प्रकट हो जाय तो मैं
अपना आधा राज्य उसे दे दूँगा। राजा ने अपने नगर में ऐसी घोषणा करा दी। यह सुनकर
जब घट अपने को प्रकट करने के लिए तैयार हुआ तब राजपुत्री ने यह कहकर उसे रोक दिया
कि 'कपट से बात करनेवाले राजा पर विश्वास मत करो' ॥८५-८७॥
तब भेद खुलने के भय से घट उस साधु और राजपुत्री को लेकर दूसरे देश को
चला गया ॥८८॥
मार्ग में उस राजपुत्री ने उस साधु से एकान्त में कहा—'एक कर्पट ने तो मेरा चरित्र
नष्ट किया और दूसरे ने मुझे राजकुमारी-पद से गिरा दिया। वह कर्पट चोर तो मर गया
किन्तु यह घट मरा नहीं। तुम मुझे अत्यन्त प्यारे लगते हो। ऐसा कहकर उससे सम्मति करके
राजकन्या ने विष देकर घट को मार डाला ॥८९-९०॥
तब उस साधु के साथ जाती हुई वह पापिन राजकुमारी मार्ग में धनदेव नामक एक
बनिए से मिल गई और बोली—'यह कंगाल पारण करनेवाला कहाँ ? तुम मेरे प्यारे हो।
इस प्रकार सोए हुए साधु को छोड़कर वह बनिए के साथ चुपके-से भाग गई ॥९१-९२॥