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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

दुख नहीं दिया है, पहले भी दिया है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—

भिक्षु तीन बार काण-माता के यहाँ तैयार किए सब पुए खा गए। इससे काणा
र जाना रुक गया। स्वामी ने लडकी को छोड दिया। अब इससे महा-
पासिका के मन को बहुत दुख हुआ है।
शास्ता ने आकर पूछा—“भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?”
अमुक बातचीत।”
भिक्षुओ, उन चार भिक्षुओ ने काण-माता का खाकर केवल अब ही उसे
दुख नहीं दिया है, पहले भी दिया है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व पत्थर-
कट कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर वह अपने शिल्प में पारङ्गत हो गए।
काशी देश के एक कस्बे में एक बडा धनवान् सेठ था। उसका गढा हुआ
खजाना ही चालीस करोड़ का सोना था।
उसकी स्त्री मरी तो वह धन के स्नेह से चुहिया होकर पैदा हुई और उस
खजाने पर रहने लगी। इस प्रकार वह कुल नष्ट हो गया। यज्ञ उजड गया।
वह गाँव भी ध्वस्त हो नामशेष रह गया।
उन दिनो वोधिसत्त्व जहाँ पहले गाँव था उसी जगह के पत्थर उखाडकर
उन्हे तराशते थे। उस चुहिया ने अपने आसपास बोधिसत्त्व को बार बार आते-
जाते देखा तो उसके मन में स्नेह पैदा हो गया। उसने सोचा मेरा बहुत सा
धन निष्प्रयोजन नष्ट हुआ जाता है। मै और यह इकट्ठे मिलकर इस धन को
खाएँगे। एक दिन वह मुँह में एक कार्षापण पकड हुए बोधिसत्त्व के पास पहुँची।
बोधिसत्त्व ने प्रिय वाणी का प्रयोग करते हुए पूछा—
“अम्म ! कार्षापण लेकर क्यो आई है ?”
“तात ! इसे लेकर स्वय भी खाएँ और मेरे लिए भी मास लाएँ।”
बोधिसत्त्व ने ‘अच्छा’ कह स्वीकार कर कार्षापण ले घर जाकर एक मासे
का मास खरीदकर उसे लाकर दिया। उसने उसे ले अपने निवासस्थान पर जा
जी भरकर खाया।
उसके बाद से वह इसी तरह प्रतिदिन बोधिसत्त्व को कार्षापण देती।
वह भी उससे मास ला देता।

९४ [ १.१४.१३७
एक दिन उस चुहिया को बिल्ले ने पकड़ लिया । वह बोली—स्वामी !
मुझे न मारें।"
"क्यो ? मुझे भूख लगी है ! मै मास खाना चाहता हूँ । मैं बिना मारे
नही रह सकता ।"
"क्या केवल एक दिन एक ही बार मास खाना चाहते है, अथवा नित्य
प्रति ?"
"मिले तो नित्य खाना चाहूँगा ।"
"यदि ऐसा है, तो मुझे छोड़ दें । मै नित्य प्रति मांस दिया करूँगी ।"
"अच्छा तो ध्यान रखना" कह बिल्ले ने उसे छोड़ दिया ।
उसके बाद से उसके लिए जो मास आता उसके वह दो हिस्से करके एक
बिल्ले को देती एक स्वयं खाती ।
फिर एक दिन उसे एक दूसरे बिल्ले ने पकड़ लिया । उसे भी उसी तरह
मनाकर अपने आप को छुड़ाया । उसके बाद से तीन हिस्से करके खाने लगी ।
फिर एक और ने पकड़ लिया । उसे भी उसी तरह मनाकर अपने को छुड़ाया
उसके बाद से चार हिस्से करके खाने लगी । फिर एक ने पकड़ लिया । उसे भी
उसी तरह समझाकर अपने को छुड़ाया । उसके बाद से पाँच हिस्से करके
खाने लगी ।
केवल पाँचवाँ हिस्सा मिलने से यह चुहिया आहार की कमी से म्लान तथा
कृश हो गई । उसका मांस और रक्त कम पड़ गया । बोधिसत्त्व ने उसे देखकर
पूछा—"अम्म ! म्लान क्यो पड़ गई है ?"
"इस कारण से ।"

चुहिया बोली—अरे दुष्ट बिलार ! क्या मैं तेरी नौकर हूँ कि मांस लाकर
दूँ । अपने पुत्रों का मांस खा ।
बिल्ला नहीं जानता था कि चुहिया स्फटिक गुहा के अन्दर है । उसने क्रोध
से सहसा आक्रमण किया कि चुहिया को पकडूंगा । उसका हृदय स्फटिक गुहा
से टकराया और उसी समय चूर चूर हो गया । आंखें निकल आईं सी हो गईं ।
वह वही मरकर एक छिपे हुए स्थान पर गिरा । इस प्रकार दूसरे चार जने भी
मृत्यु को प्राप्त हुए ।
उसके बाद से चुहिया निर्भय हो गई । वह बोधिसत्त्व को प्रतिदिन दो
तीन कार्षापण देती । इस प्रकार उसने सारा धन बोधिसत्त्व को ही दे दिया ।
वे दोनो जीवन भर मित्र-भाव से रह यथाकर्म (परलोक) सिधारे ।
शास्ता ने यह पूर्वजन्म की कथा कह सम्यक् सम्बुद्ध हुए रहने पर यह गाथा
कही—
यत्थेषो लभते बब्बु दुतियो तत्थ जायति,
ततियो च चतुत्थो च इदं ते बब्बुका बिलं ॥
[ जहाँ एक बिल्ले को (मांस) मिलता है दूसरा वही जाता है । तीसरा
भी वही जाता है और चौथा भी वही । हे बिल्ले ! यह तेरा बिल¹ है । ]
यत्थ जिस जगह । बब्बु, बिल्ला । दुतियो तत्थ जायति, जहां एक को
चुहिया अथवा मास मिलता है, दूसरा बिल्ला भी वही जाता है । वैसे ही ततियो
च चतुत्थो च, इस प्रकार वहाँ चार बिल्ले हुए । वे दिन प्रति दिन मास खाते
हुए । ते बब्बुका इदं स्फटिक का बना हुआ बिल पेट में गड़ाकर सभी मर गए ।
इस प्रकार शास्ता ने धर्मोपदेश दे जातक का मेल बैठाया ।
उस समय के चारो बिल्ले चार भिक्षु हुए । चुहिया काण-माता हुई ।
पत्थर तराशनेवाला जौहरी तो मैं ही था ।
¹ प्रतीत होता है कि यह गाथा चुहिया द्वारा कही गई थी । इस में
'बिल' शब्द का अर्थ 'हिस्सा' होना चाहिए । जातककार ने यह गाथा
बुद्ध-भाषित बनाई है; और बिल का जो अर्थ किया है वह मेल नहीं खाता ।

१३८. गोध जातक

६६ [ १.१४.१३८
१३८. गोध जातक
“किं ते जटाहि दुम्मेध...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक ढोंगी के बारे में कही।
वर्तमान-कथा जैसी कथा पहले आई है,१ वैसी ही है।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व गोह
के रूप में पैदा हुए।
उस समय पाँच-अभिञ्ज्ञा प्राप्त (एक) उग्र तपस्वी एक गाँव के समीप
जंगल में पर्ण-कुटी में रहता था। ग्रामवासी तपस्वी की अच्छी तरह सेवा करते
थे। बोधिसत्त्व उसके चङ्क्रमण करने की जगह के पास एक बिल में रहते थे।
प्रतिदिन दो तीन बार तपस्वी के पास आकर धर्म तथा अर्थपूर्ण बातें सुन तपस्वी
को प्रणाम कर अपने निवासस्थान को लौट जाते। आगे चलकर तपस्वी ग्राम-
वासियों को पूछकर वहाँ से चला गया। उस शीलव्रतसम्पन्न तपस्वी के चले
जाने पर एक दूसरा कुटिल तपस्वी आकर उसी आश्रम में रहने लगा। बोधि-
सत्त्व उसे भी पहले ही तपस्वी की तरह सदाचारी समझ उसके पास गए।
एक दिन ग्रीष्मऋतु में अकाल वर्षा बरसने पर बिलों में से मक्खियाँ
निकलीं। उन्हें खाने के लिए गोह घूमने लगीं। ग्रामवासियों ने बाहर निकल
बहुत सी गोहें पकड़ चिकनी भोजन सामग्री के साथ खट्टा-मीठा गोह-मांस
तैयारकर उस तपस्वी को दिया।
१भीमसेन जातक (८०)

गोध ] ६७
तपस्वी ने गोह का मांस खाया तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा । उसने पूछा
—यह मांस बड़ा मीठा है। किसका मांस है ? जब उसे पता लगा कि किसका
मांस है, तो वह सोचने लगा कि मेरे पास बड़ी गोह आती है । उसे मारकर
उसका मांस खाऊँगा । उसने पकाने के बरतन और उनके साथ घी, नमक
आदि मँगवा कर एक ओर रख लिए। स्वयं मुद्गर ले काषाय वस्त्र से ढँक
पर्ण-कुटी के सामने शान्त-चित्त की तरह बैठ बोधिसत्त्व की प्रतीक्षा करने
लगा।
बोधिसत्त्व शाम को तपस्वी के पास जाने के लिए निकले। समीप पहुँचते
ही उसकी इन्द्रियों में विकार देखकर सोचने लगे—यह तपस्वी उस तरह नहीं
बैठा है जैसे और दिनों बैठा रहता था। आज यह मेरी ओर द्रूषित दृष्टि
से देख रहा है। इसकी परीक्षा करूँगा । वे जिधर से तपस्वी की देह को छूकर
हवा आ रही थी उधर खड़े हुए । गोह के मांस की गन्ध आई । उसे सूंघकर
बोधिसत्त्व ने सोचा—इस कुटिल तपस्वी ने आज गोह मांस खाया होगा ।
इसी से यह रस-तृष्णा में आसक्त हो गया । आज मेरे समीप पहुँचने पर मुझे
मुद्गर से मार मांस पकाकर खाना चाहता होगा । वह उसके पास न जा
वापिस लौटकर घूमने लगे ।
तपस्वी ने बोधिसत्त्व को न आता देख समझा कि यह जान गया होगा कि
मैं इसे मारना चाहता हूँ । इसी से नहीं आता है । न आने पर भी यह कहाँ
बचकर जाएगा । उसने मुद्गर निकाल फेंककर मारा । वह उसकी पूँछ के
सिरे में ही लगा ।
बोधिसत्त्व जल्दी से बिल में प्रविष्ट हो दूसरे छेद से सीस निकालकर बोले
—'कुटिल जटिल ! मैं तुझे सदाचारी समझ कर तेरे पास आया । लेकिन
अब मैंने तेरा कुटिल स्वभाव जान लिया । तेरे जैसे महाचोर को इस प्रव्रजित
भेष से क्या ?'' इस प्रकार उसकी निन्दा करते हुए यह गाथा कही—
किं ते जटाहि दुम्मेध किं ते अजिन साटिया,
अब्भन्तरं ते गहनं बाहिरं परिमज्जसि ॥१
१ धम्मपद (२६।२२)
७

३८ [ १.१४ १३६
[हे दुर्बुद्धि ! जटाओ से तुझे क्या (लाभ) ? और मृगचर्म के पहनने
से क्या ? अन्दर से तो तू मैला है, बाहर से धोता है।]
किं ते जटाहि दुम्मेध, भो, दुर्बुद्धि ! मूर्ख ! यह जटाएँ प्रव्रजित को
धारण करनी चाहिएँ। प्रव्रज्या गुण से तू रहित है। तुझे इन जटाओ से क्या
लाभ ? किं ते प्रजिन साटिया, मृग-चर्म के अनुकूल सयम का अभाव है, तब
इस मृग-चर्म से क्या ? अब्भन्तर ते गहन—तेरा भीतर राग, द्वेष तथा
मोह से मलिन है, ढका हुआ है। बाहिर परिमज्जसि, सो तू अभ्यन्तर को
मैला ही रख स्नान आदि से तथा (श्रमण-) चिह्न धारण करके बाहर को साफ
करता है। तू वैसा ही है जैसे वाञ्जी से भरा हुआ तूम्बा हो, विष से भरा घडा
हो, साँप से भरी हुई वाँवी हो अथवा गूढ़ से भरा हुआ चित्रित घडा हो। तुझ
चोर के यहाँ रहन से क्या ? शीघ्र भाग । यदि नही जाएगा तो ग्रामवासियो
को कहकर तेरा निग्रह करवाऊँगा।
इस प्रकार बोधिसत्त्व उस कुटिल तपस्वी को धमकाकर बिल में चले गए।
कुटिल तपस्वी भी वहाँ से चला गया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय कुटिल
तपस्वी यह ढोंगी था। पहला शीलवान् तपस्वी सारिपुत्र था। गोधपण्डित
तो मैं ही था।
१३६. उभतोभट्ठ जातक
"अवस्सो भित्तो पटो नष्टो . ." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते
समय देवदत्त के बारे म कही।

वह पीडा से पगला हो हाथ से आंखो को दबाए हुए पानी से बाहर निकल
कांपता हुआ कपडे खोजने लगा।
उसकी भार्या ने भी सोचा कि मे झगडा करके ऐसा कर दूं कि कोई कुछ
आशा न रक्खे। उसने एक कान में ताड का पत्ता पहना, एक आंख में हांडी का
काजल लगाया और गोद में कुत्ता ले पडोसी के घर गई। उसकी एक पडोसन
बोली—"तूने एक ही कान में ताड का पत्ता डाला है, एक ही आंख में कज्जल
लगाया है और गोद में कुत्ते को ऐसे लेकर जैसे यह तेरा प्यारा पुत्र हो एक
घर से दूसरे घर घूम रही है। क्या तू पगली हो गई है ?"
"मै पगली नही हूँ ? तू मुझे व्यर्थ ही गाली देती है, मजाक करती है। अब
में मुखिया¹ के पास जाकर तुझपर आठ कार्षापण जुर्माना करवाऊँगी।"
इस प्रकार परस्पर झगडकर दोनो मुखिया के पास गईं। दोषी का पता
लगाने से वही दण्डित हुई।
लोग उसे बांधकर पीटने लगे कि जुर्माना दे।
वृक्षदेवता ने गांव मे उसका यह हाल और जगल में उसके पति की विपत्ति
को देख एक टहने पर खडे होकर कहा—भो ! पुरुष ! जल में भी तेरा
काम बिगडा, स्थल पर भी। तू दोनो ओर से भ्रष्ट होगया। इतना कह यह
गाथा कही—
अक्खी भिन्ना पटो नट्ठो सखीगेहे च भण्डन,
उभतो पदुट्ठकम्मन्तो उदकम्हि थलम्हि च ॥
[ आंख फूट गई। वस्त्र खोया गया। सखी के घर में झगडा हुआ।
जल और स्थल दोनो ही में तेरा काम बिगड गया।]
सखीगेहे च भण्डन, सखी का मतलब है सहायिका, उसके घर में तेरी भार्या
न झगडा किया। झगडा करके बांधी गई, पीटी गई और दण्डित हुई।
उभतो पदुट्ठ कम्मन्तो, इस प्रकार दोनो जगह में तेरा काम बिगडा ही।
कौन से दो स्थानो में ? उदकम्हि थलम्हि च, आँख फूटने से और वस्त्र नष्ट
¹ ग्रामभोजकं ।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मछुआ

काक ] १०१
होने से जल में काम बिगडा, सखी के घर पर झगडा होने से स्थल पर काम
बिगडा ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मछुआ
देवदत्त था। वृक्षदेवता तो में ही था।
१४०. काक जातक
“निच्चं उब्बिग्ग हृदया...” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय जाति-सेवा के बारे में कही। वर्तमान कथा बारहवें निपात की भद्दसाल
जातक¹ में आएगी।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
कौए की योनि म पैदा हुए।
एक दिन राजा का पुरोहित नगर के बाहर नदी पर स्नान कर, सुगन्धित
लेप कर, मालाएँ पहन सुन्दर वस्त्र धारण किए नगर में प्रविष्ट हुआ। नगर-
द्वार के तोरण पर दो कौए बैठे थे। उनमें से एक ने दूसरे को कहा—
"मित्र ! मै इस ब्राह्मण के सिर पर बीट करूँगा।"
"यह अच्छा नही है। यह ब्राह्मण ऐश्वर्य्यशाली है। ऐश्वर्य्यशालियो
के साथ बैर करना बुरा है। यह क्रुद्ध होने पर सभी कौवो को भी नष्ट कर
सकता है।"
¹ भद्दसाल जातक (४६५)

काक ] १०३
उसके बाद से कौवे मारे जाने लगे, और चर्बी न पाकर जहाँ तहाँ उनका
ढेर लगाया जाने लगा। कौवो पर वडी भारी विपत्ति आई।
उस समय बोधिसत्त्व अस्सी हजार कौओ के साथ महाश्मशान वन में रहते
थे। एक कौये ने जाकर वोधिसत्त्व को कौओ पर आई विपत्ति का समाचार
कहा। उसने सोचा--'मेरे अतिरिक्त कोई मेरी जातिवालो के दुख को दूर
नहीं कर सकता। मै दूर करूँगा।"
बोधिसत्त्व दस पारमिताओं का ख्यालकर, मैत्री पारमिता को प्रमुख कर
एक ही उडान में उड खुले हुए बडे रोशनदान में प्रविष्ट हो राजा के आसन के
नीचे जा बैठे। उन्हें एक मनुष्य पकडने लगा। राजा ने रोका—शरण में
आए को मत पकडो। बोधिसत्व ने थोडा विश्राम ले मैत्री-पारमी का ध्यान
कर आसन के नीचे से निकल राजा से कहा—महाराज ! राजा को चाहिए
कि यह उत्तेजना के वशीभूत होकर राज्य न करे। जो भी कार्य करना हो
वह सोच विचार कर करना चाहिए। जो करने से हो सके, वही कार्य करना
चाहिए, दूसरा नहीं। यदि राजा ऐसा कार्य करते हैं जिसका कोई फल नहीं
होता तो यह जनता के लिए मरण होता है, महान् भय का कारण होता है।
पुरोहित ने बैर के वश हो झूठ कहा है। कौओ को चर्बी होनी ही नही।
राजा प्रसन्न हुआ। उसने बोधिसत्व को सोने का सुन्दर पीढा दिया।
वहाँ बैठने पर उसके परो को सौ-पाक सहस्र-पाक तैल लगवाया। सोने के
थाल में राज-भोजन दिलवाया। पानी पिलवाया। अच्छी तरह से खा चुकने
पर जब बोधिसत्त्व सुखपूर्वक बैठे तब राजा ने पूछा—"पण्डित, तू कहता है,
कौवो को चर्बी नही होती। उनको चर्बी क्यो नही होती ?"
बोधिसत्त्व ने इन इन कारणो से नही होती बताते हुए सारे घर को अपने
शब्द से गूंजाते हुए धर्म-कथा की, और यह गाथा कही—
निच्च उब्बिग्गहृदया सब्बलोकविहेसका,
तस्मा तेसं वसा नत्थि काकानस्माकञातिन ॥
[हृदय नित्य उद्विग्न रहता है। सारे ससार को कष्ट देते हैं। इसलिए
५जा ' हमारी जाति के लोग—जो कौए हैं—चर्बी-रहित होते हैं।]

१०४ [ १.१४.१४० ]
महाराज ! कौवे सदैव उद्विग्न हृदय होते है, भयभीत ही विचरते है।
सारे संसार को कष्ट देते है—क्षत्रिय आदि को भी, स्त्री-पुरुष को भी, लडके
लडकियो को भी—सभी को तकलीफ पहुँचाते है। इसलिए इन दो कारणो से
हमारे जातिवालो को चर्बी नही होती। पहले भी नही हुई। आगे भी नहीं
. होगी।
इस प्रकार बोधिसत्व ने यह बात स्पष्ट कर राजा को समझाया—
महाराज ! राजा किसी भी बात को बिना सोचे-विचारे नही करते ।
राजा ने प्रसन्न हो राज्य बोधिसत्त्व को भेंट किया। बोधिसत्त्व ने राज्य
राजा को लौटा दिया। फिर उसे पञ्चशीलो में प्रतिष्ठित कर उससे सभी
प्राणियो को अभय-दान देने के लिए कहा। राजा ने धर्मोपदेश सुन सभी प्राणियो
को अभय-दान दे कौओ के लिए नित्य-भोजन बाँध दिया। प्रतिदिन अम्मण
भर चावल का भात पकाकर नाना प्रकार के रसो से मिलाकर कौओ को दान
दिया जाता। बोधिसत्त्व को राज-भोजन ही मिलता।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वाराणसी
राजा आनन्द था। कौओ का राजा तो मै ही था।

१४१. गोध जातक (२)

पहला परिच्छेद
१५. कक्कटक वर्ग
१४१. गोध जातक (२)
"न पापजनससेवी..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
विपक्षी भिक्षु की संगत करने वाले भिक्षु के बारे में कही। वर्तमान कथा
महिलामुख जातक¹ की कथा के ही समान है।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व गोह
के रूप में पैदा हुए। बडे होने पर वह नदी के किनारे एक बडे बिल में सैकडो
गोहो के साथ रहने लगे।
उनके पुत्र गोह-पिल्ले की एक गिरगिट के साथ दोस्ती हो गई। वह उसके
साथ आनन्द मनाता और गले लगाने के लिए उस पर आ पडता।
उस गिरगिट के साथ उसकी दोस्ती की बात गोहराज से कही गई।
गोहराज ने पुत्र को बुलाकर कहा—
"तात ! तू अनुचित स्थान में विश्वास कर रहा है। गिरगिट की जाति
नीच होती है। उनका विश्वास नही करना चाहिए। यदि तू उसका विश्वास
करेगा, तो तेरे और गिरगिट के कारण यह सारा गोह-कुल विनाश को प्राप्त
होगा। अब से इसके साथ दोस्ती मत रख।" उसने दोस्ती नही ही
छोडी।
¹महिलामुख जातक (२६)

१०६ [ १.१५ १४१
जब बोधिसत्त्व के बार बार कहने से भी उनकी मित्रता जैसी की तैसी रही,
तब बोधिसत्त्व ने सोचा कि इस गिरगिट के कारण हमको अवश्य खतरा होगा ।
खतरे के समय के लिए भागने का मार्ग तैयार होना चाहिए । उसने एक तरफ
हवा आने का रास्ता बनवा लिया ।
बोधिसत्त्व का पुत्र भी शनै शनै बडे शरीर वाला हुआ, गिरगिट पहले
ही जितना रहा । वह समय समय पर उसका आलिङ्गन करने के लिए गिरगिट
पर आ पडता । गिरगिट को ऐसा मालूम देता कि मानो उस पर पर्वत आ
पडा है । उसने कष्ट पाते हुए सोचा कि यदि यह और कुछ दिन इस प्रकार मेरा
आलिङ्गन करता रहा तो मैं जीवित नही रहूँगा । इसलिए किसी शिकारी
के साथ मिलकर इस गोह-कुल को ही नष्ट करवाऊँ ।
एक दिन ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होने पर बांबी से मक्खियाँ निकलीं । जहाँ
तहाँ से गोह निकलकर मक्खियो को खाने लगे । एक गोह-शिकारी गोह के
बिल को फाडने के लिए कुदाल और कुत्ते साथ में ले जगल में घूम रहा था ।
गिरगिट ने उसे देखकर सोचा कि आज अपना मनोरथ पूरा करूँगा ? उसने
पास आ, थोडी दूर पर ठहर पूछा—हे ! पुरुष ! जगल में क्यो घूम रहे हो ?"
उसन कहा—गोहो के लिए । गिरगिट बोला—"मै कई सौ गोहो का निवास-
स्थान जानता हूँ । आप आग और पुआल लेकर आएँ ।" उसे वहाँ ले जाकर
कहा, "यहाँ पुआल रख, आग लगाकर धुआँ करें। चारो तरफ कुत्तों को बिठाएँ।
अपने आप मुद्गर लेकर बैठें । जो जो गोह निकले उन्हें मार मारकर ढेर लगाएँ
फिर स्वय एक जगह पर सिर उठाकर पड रहा—आज शत्रु की पीठ¹ देखने
को मिलेगी ।
शिकारी ने पुआल का धुआँ किया । धुआँ बिल में घुसा । गोह जब
धुएँ से अधे हुए तब मृत्यु भय से भयभीत हो भागने लगे । शिकारी ने जो जो
गोह निकले उन्हें मारा । उसके हाथ से बच्चो को कुत्तो ने लिया । गोहो के
लिए महाविनाश उपस्थित हुआ ।
¹शत्रु की पीठ देखना मिलने का भावार्थ है पलायन; यहा विनाश
से तात्पर्य्य है ।

गोध ] १०७

बोधिसत्त्व को मालूम हुआ कि गिरगिट के कारण महान् खतरा पैदा हो
गया । वह सोचने लगे कि पापी का साथ नहीं ही करना चाहिए । पापी की
संगत से सुख नहीं हो सकता । एक पापी गिरगिट के कारण इतने गोह नाश
को प्राप्त हुए । इस प्रकार सोचते हुए हवा आने के बिल से भागते हुए यह बात
कही—
न पापजनससेवी अच्छन्तसुखमेधति,
गोधाकुलं कक्कटाव कलिं पापेति अत्तान ॥
[ पापी की संगत करने वाले को निरन्तर सुख कभी नही मिलता । जैसे
गिरगिट के कारण गोह-कुल नष्ट हुआ, इसी प्रकार वह अपना विनाश करता
है । ]

पापजनससेवी, (पापी की संगत करनेवाला) आदमी अच्छन्तसुख, केवल
सुख ही सुख वा निरन्तर सुख न एधति, नहीं प्राप्त करता, जैसे क्या ? गोधा
कुल ककण्टाव, जैसे गिरगिट से गोह-कुल को सुख नहीं मिला । इसी प्रकार
पापी जन की संगत करनेवाले को सुख नहीं मिलता । पापी जन की संगत करने
वाला निश्चय से कलिं पापेति अत्तान, कलि कहते हैं विनाश को, पापी जन की
संगत करने वाला निश्चयपूर्वक अपने को और अपने साथ रहने वालो को नष्ट
करता है ।
पालि में फल पापेति पाठ है । वह पाठ अट्ठकथा में नहीं है । उस अर्थ
का भी यहाँ मेल नहीं बैठता । इसलिए जैसे यहाँ कहा गया, वैसे ही ग्रहण
करना चाहिए ।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय
गिरगिट देवदत्त था । बोधिसत्त्व का पुत्र उपदेश न माननेवाला गोह पिल्ला
विपक्ष-सेवी भिक्षु था । गोह-राज तो मैं ही था ।

१४२. सिगाल जातक

१०८ [ १.१५.१४२
१४२. सिगाल जातक
“एत हि ते दुराजानं...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
देवदत्त के (तथागत को) मारने का प्रयत्न करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
धर्म-सभा में भिक्षुओ की बातचीत सुनकर तथागत ने कहा—भिक्षुओ !
देवदत्त ने केवल अभी मेरे वध की कोशिश नहीं की। पहले भी की ही है।
लेकिन मुझे मार नहीं सका। स्वयं ही दुखी हुआ। यह कह पूर्व-जन्म की कथा
कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
गीदड होकर पैदा हुए। वह शृगाल-राजा बन शृगाल गण सहित श्मशान में
रहने लगे।
उस समय राजगृह में उत्सव था। अधिकांश मनुष्य सुरा पीते थे, वह
था ही सुरा-उत्सव। अनेक धूर्त बहुत सी सुरा और मांस ले आए, और मस्त
होकर सुरा पीने तथा मांस खाने लगे। रात्रि के पहले पहर मे ही उनका मांस
समाप्त हो गया, सुरा तो बहुत थी।
एक बोला—“मांस का टुकडा दो।”
दूसरे ने कहा—“मांस तो समाप्त हो गया।” "मेरे खडे रहते कही मांस
समाप्त हो सकता है ?" 'यह उसने सोचा कि कच्चे श्मशान में मृत मनुष्यो को
खाने के लिए आए हुए शृगालो को मारकर मांस लाऊँगा। वह एक मोगरी ले
नाली के रास्ते शहर से निकल श्मशान म जा मोगरी सहित मृतक की तरह
सीधा ही लेट रहा।

१४३. विरोचन जातक

११० [ १.१५.१४३

१४३. विरोचन जातक

“लसी च ते निष्फलता...” इसे शास्ता ने वेळुवन में रहते समय
देवदत्त के गयाशीर्ष¹ पर सुगत (तथागत) की नकल करने के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

जब देवदत्त का ध्यान (-बल) जाता रहा और उसको लोगों से जो प्राप्ति
होती थी वह बन्द हो गई तथा लोगों ने उसका सत्कार करना छोड़ दिया तो
उसने सोचकर एक उपाय निकाला। उसने बुद्ध से पाँच बातों² की याचना
की, जिन्हें शास्ता ने अस्वीकार किया। तब उसने दोनों अग्रश्रावकों³ के
पाँच सौ शिष्यो को जो अभी प्रव्रजित हुए तथा धर्म विनय से सुपरिचित न थे
बहकाया और उन्हें गयाशीर्ष पर ले जाकर संघ मे भेद पैदा कर एक सीमा⁴ में
पृथक विनय-कर्म⁵ करने लगा।
शास्ता ने उन भिक्षुओं के आने का समय देख दोनो अग्रश्रावको को
भेजा। उन्हें देख देवदत्त प्रसन्न हुआ। रात को धर्मोपदेश देते समय उसने
सोचा कि मैं बुद्ध की नकल करूँगा। वह बोला—सारिपुत्र ! भिक्षु-संघ


¹ गया का ब्रह्मयोनि पर्वत ।
² पाच बातें यह हं—(१) जिन्दगी भर वन में ही रहा करें (२) जिन्दगी
भर भिक्षा मांग कर ही खाएं (३) जिन्दगी भर फेंके चीथड़ों के ही चीवर
पहनें (४) जिन्दगी भर पेड़ के नीचे ही रहें (५) जिन्दगी भर मछली मास
न खाएं (चुल्लवग्ग, द्वितीय भाणवार)।
³ सारिपुत्र और मौद्गल्यायन ।
⁴ सीमित-प्रवेश ।
⁵ साधिक कर्म ।

विरोचन ] १११

आलस्य रहित हैं। तुम भिक्षु-गण को कुछ धर्मोपदेश करो। मेरी पीठ में
दर्द होता है। मैं इसे जरा तानूँगा।
इतना कह देवदत्त सो गया।
दोनो अग्रश्रावक उन भिक्षुओं को धर्मोपदेश दे (आर्य-) मार्ग और फल¹
के प्रति उनका ध्यान जागृत कर सभी को वेणुवन साथ ले गए।
कोकालिक ने जब देखा कि विहार खाली हो गया तब वह देवदत्त के पास
गया और बोला—"आयुष्मान् देवदत्त ! तेरे अनुयायियों में भेद पैदा कर
अग्रश्रावक तेरा विहार खाली कर चले गए। तू पड़ा सो ही रहा है।" उसने
उसकी चादर हटा दीवार में कील ठोकने की तरह उसकी छाती में एड़ी से
एक ठोकर लगाई। उसी समय उसके मुंह से खून गिर पड़ा। उसके बाद से
वह रोगी हो गया।
शास्ता ने स्थविर से पूछा—सारिपुत्र ! तुम्हारे जाने के समय देवदत्त
ने क्या किया ?
"भन्ते ! हमें देखकर देवदत्त ने सोचा कि बुद्ध की तरह व्यवहार करूँगा।
बुद्ध की नकल करता हुआ वह विनाश को प्राप्त हुआ।"
"सारिपुत्र ! देवदत्त केवल अभी मेरी नकल करने जाकर विनाश को
प्राप्त नहीं हुआ, पहले भी हुआ है।" इतना कह पूर्व-जन्म की
कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
केसरी (सिंह) होकर पैदा हुए और हिमालय की कञ्चनगुफा में रहने लगे।
एक दिन वे कञ्चनगुफा से निकल जम्भाई ले, चारो दिशाओं की ओर
नजर उठा, सिंहनाद कर शिकार के लिए निकले। उन्होंने एक बड़े भारी भैंसे
को मारा। उसका मांस खाया। फिर एक तालाब में उतर मणि-वर्ण जल
की डोल पूर्ण करते हुए की तरह गुफा की ओर प्रस्थान किया।


¹ श्रोतापत्ति मार्ग आदि चार आर्य-मार्गों के चार फल।

११२ [ १-१५ १४३ ।
शिकार के लिए निकले एक गीदड ने उन्ह एकाएक देखा । जब वह भाग
न सका तो यह केसरी के पैरो में जाकर गिर पडा ।
"जम्बुक ! क्या बात है ?"
"स्वामी ! मै आपके चरणो की सेवा करना चाहता हूँ।"
"अच्छा, आ मेरी सेवा कर । में तुझे अच्छे अच्छे मास खिलाऊँगा ।"
वह जम्बुक को कञ्चनगुफा में ले गया ।
गीदड तब से सिंह का मारा हुआ मास ही खाता रहा । कुछ ही दिन में
वह मोटा हो गया ।
एक दिन गुफा मे पडे ही पडे उसे केसरी ने कहा-"जम्बुक ! जा, पर्वत
की चोटी पर चढकर पर्वत के नीचे घूमनेवाले हाथी, घोडे तथा भैंसे आदि में से
जिस किसी का मास खाना चाहे, आकर मुझसे कह कि मै अमुक पशु का मास
खाना चाहता हूँ । ओर मुझे प्रणाम कर यह भी कह कि 'हे स्वामी ! अपना
पराक्रम दिखाएँ ।' में उसे मार, उसका मास खा, तुझे भी दूँगा ।"
गीदड पर्वत की चोटी पर चढ नाना प्रकार के पशुओ को देख जिसका
भी मास खाना चाहता कञ्चनगुफा में आकर सिंह से निवेदन कर उसके पाँव
में गिरकर कहता-स्वामी ! अपना पराक्रम प्रकट करें । सिंह जल्दी से
छलांग मारकर चाहे मस्त हाथी ही होता उसकी हत्या कर उसका मास स्वय
खाता ओर शृगाल को भी देता । गीदड पेट भर कर मास खा, गुफा में जा
सो रहता ।
इस प्रकार ज्यो ज्यो समय व्यतीत हुआ उसके दिल में अभिमान पैदा हो
गया । मेरे भी तो चार पैर है । मै क्यो रोज रोज दूसरे पर निर्भर रहता
हूँ । अब से मै भी हाथी आदि को मारकर मास खाऊँगा । सिंह भी 'हे मृगराज !
स्वामी ! अपना पराक्रम दिखाएँ' कहने पर ही हाथियो को मारता है, मै भी
सिंह से यह कहलवाऊँगा कि 'हे जम्बुक ! अपना पराक्रम दिखा' और एक
बडिया हाथी को मार उसका मास खाऊँगा ।
उसने शेर से कहा-स्वामी ! मैने बहुत देर तक आपके मारे हुए हाथियो
का मास खाया । मै भी एक हाथी को मारकर उसका मास खाना चाहता हूँ ।
जिस जगह आप कञ्चनगुफा में लेटते है, मै वहाँ लेट रहूँगा । आप पर्वत के
नीचे घूमनेवाले हाथी को देख मेरे पास आकर कहें 'जम्बुक ! अपना पराक्रम

विरोचन ] ११३
दिया।' इतनी सी बात के लिए अनुदार न हो।
सिंह ने कहा—जम्बुक ! तेरी सामर्थ्य हाथी मारने की नहीं है।
गीदड-कुल में पैदा होकर कोई गीदड हाथी को मारकर उसका मास खा सके,
ऐसा गीदड दुनिया में नहीं है। तू ऐसी इच्छा मत कर। मेरे द्वारा मारे जाने
वाले हाथियो का मास खाकर ही रह।
ऐसा कहने पर भी वह नहीं माना। बार बार कहता ही रहा।
सिंह ने जब देखा कि वह नहीं मानता तो स्वीकार कर कहा—अच्छा !
तो मेरी रहने की जगह पर जाकर लेट रह। जम्बुक को कञ्चनगुफा में लिटा
पर्वत की चोटी पर चढ मस्त हाथी को देख गुफा के द्वार पर जाकर कहा—
जम्बुक ! अपना पराक्रम दिखा।
श्रृगाल कञ्चनगुफा से निकला, जम्हाई ली, चारो ओर देखकर तीन
बार आवाज की। फिर मस्त हाथी के सिर पर आक्रमण करने जाकर उसके
पाँव में गिरा। हाथी ने दाहिना पाँव उठाकर उसके सिरपर रख दिया।
सिर की हड्डियाँ चूर चूर हो गईं।
उसके शरीर को हाथी ने पाँव से इकट्ठा किया, और उस पर लीद करके
चिंघाड़ता हुआ जगल मे चला गया।
बोधिसत्त्व ने यह हाल देख, 'जम्बुक ! अब अपना पराक्रम दिखा'
कह, यह गाथा कही—
लसी च ते निष्फलिता मत्थको च विदाळितो,
सब्बा ते फासुका भग्गा अज्ज खो त्वं विरोचसि ॥
[तेरे सिर का भेजा निकल गया है। मस्तक फट गया है। तेरी सभी
हड्डियाँ टूट गई हैं। आज तू अपना पराक्रम दिखा रहा है।]
लसी का मतलब है माथे का भेजा। निष्फलिता, निकल आई।
बोधिसत्त्व ने यह गाथा कही। जब तक जीवन था तब तक जीवित रह •
कर्मानुसार (परलोक) सिधारे।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय गीदड देवदत्त था। सिंह मैं ही था।
८

१४४. नङ्गुट्ठ जातक

११४
१४४. नङ्गुट्ठ जातक
"बहुम्पेत घसद्धि जातवेद..." इसे शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय आजीवको¹ के मिथ्या-व्रत के बारे में कहा।
क. वर्तमान कथा
उस समय जेतवन की पिछली तरफ आजीवक नाना प्रकार की मिथ्या-
तपस्याएँ करते थे । बहुत से भिक्षुओ ने उनके उकडूं-बैठना, चिमगादड़-व्रत,
काँटो पर सोना, तथा पञ्चाग्नि ताप आदि मिथ्या तपो के भेदो को देखकर भग-
वान से पूछा—भन्ते ! इस मिथ्या तप से कुछ भी उन्नति होती है ?
शास्ता ने उत्तर दिया—"भिक्षुओ, इस प्रकार के मिथ्या तप से न कल्याण
ही होता है, न उन्नति ही होती है। पूर्व समय मे पण्डितो ने यह समझा कि
इस प्रकार के तप से कल्याण होगा या उन्नति होगी। वे जन्म दिन पर रखी
हुई अग्नि लेकर जगल गए। यहां अग्नि-पूजा आदि से कुछ भी लाभ न देख,
आग को पानी से बुझा वे कसिण अभ्यास कर अभिज्ञा तथा समापत्तियां
प्राप्त कर ब्रह्मलोक गामी हुए।" इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उदीच्य ब्राह्मण-कुल में पैदा हुए। उनके पैदा होने के दिन माता पिता ने जन्म-
अग्नि लेकर रक्खी। सोलह वर्ष की आयु होने पर वे बोले—
'पुत्र ! तेरे जन्म के दिन हमने आग रक्खी है। यदि गृहस्थ होना चाहता
¹ नग्न-साधुओ का एक सम्प्रदाय।

नङ्गुट्ठ] ११५
है तो तीनो वेद सीख। यदि ब्रह्मलोक जाना चाहता है तो आग लेकर जगल
चला जा, वहाँ अग्नि की पूजा करते हुए महाब्रह्मा को प्रसन्न कर ब्रह्मलोक गामी
होना।"
उसने कहा, मुझे गृहस्थी से काम नहीं। यह आग ले जगल में प्रवेश कर,
वहाँ आश्रम बना अग्नि-पूजा करता हुआ अरण्य में रहने लगा।
उसे एक दिन किसी प्रत्यन्त-ग्राम से दक्षिणा में एक बैल मिला। उस बैल..
को आश्रम पर लेजाकर उसने सोचा—अग्नि-भगवान को गो-मास खिलाऊँगा।
तभी उसे ख्याल आया—यहाँ नमक नहीं है। अग्नि भगवान् बिना नमक के
खा न सकेंगे। गाँव से नमक लाकर अग्नि-भगवान को नमक सहित खिलाऊँगा।
वह बैल को वैसे ही बांध नमक लेने के लिए गाँव गया। उसके जाने पर,
बहुत से शिकारी वहाँ आए। उन्होंने बैल को देख उसे मार डाला और उसका
मास पका खाकर उसकी पोछ, जाँघ तथा चर्म वही छोड़कर शेष मास लेकर
चले गए।
ब्राह्मण ने लौटकर जब केवल पूँछ आदि को देखा तो सोचने लगा—यह
अग्नि भगवान् अपनी चीज की भी रक्षा नहीं कर सके। मेरी तो क्या रक्षा
करेंगे ? यह अग्नि-पूजा निरर्थक है। इससे कल्याण या उन्नति नहीं है।
'उसका मन अग्नि-पूजा की ओर से उदासीन हो गया। वह बोला—'भो '
अग्नि-भगवान् ! तुम अपनी चीज की भी रक्षा नहीं कर सके। मेरी क्या.
रक्षा करोगे ? मास तो नही है, इतने से ही सन्तुष्ट होओ।' यह कह पूँछ
आदि को आग में फेंकते हुए यह गाथा कही—
बहुम्पेतं असब्भि ! जातवेद ! यं तं वालधिनाभिपूजयाम,
मंसारहस्स नत्थञ्ज मंसं नङ्गुट्ठम्पि भवं पटिग्गहातु ॥
[ हे असत्पुरुष ! अग्निदेव ! यह भी बहुत समझें कि हम पूँछ से तेरी
पूजा कर रहे हैं। तुझे मास मिलना योग्य था, लेकिन मास नही है। इसलिए
आप जनाब पोछ ग्रहण करे । ]
बहुम्पेतं, इतना भी बहुत है, असब्भि, असत्पुरुष ! असाधुजानिक ।
जातवेद, अग्नि को सम्बोधन करता है। अग्नि जात होने ही पैदा होते ही अनु-
भव होती है, ज्ञात होती है, प्रकट होती है—इसलिए जातवेद कहलाती है।