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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 479 में से

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पृष्ठ 117

भिक्षु तीन बार काण-माता के यहाँ तैयार किए सब पुए खा गए। इससे काणा
र जाना रुक गया। स्वामी ने लडकी को छोड दिया। अब इससे महा-
पासिका के मन को बहुत दुख हुआ है।
शास्ता ने आकर पूछा—“भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?”
अमुक बातचीत।”
भिक्षुओ, उन चार भिक्षुओ ने काण-माता का खाकर केवल अब ही उसे
दुख नहीं दिया है, पहले भी दिया है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व पत्थर-
कट कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर वह अपने शिल्प में पारङ्गत हो गए।
काशी देश के एक कस्बे में एक बडा धनवान् सेठ था। उसका गढा हुआ
खजाना ही चालीस करोड़ का सोना था।
उसकी स्त्री मरी तो वह धन के स्नेह से चुहिया होकर पैदा हुई और उस
खजाने पर रहने लगी। इस प्रकार वह कुल नष्ट हो गया। यज्ञ उजड गया।
वह गाँव भी ध्वस्त हो नामशेष रह गया।
उन दिनो वोधिसत्त्व जहाँ पहले गाँव था उसी जगह के पत्थर उखाडकर
उन्हे तराशते थे। उस चुहिया ने अपने आसपास बोधिसत्त्व को बार बार आते-
जाते देखा तो उसके मन में स्नेह पैदा हो गया। उसने सोचा मेरा बहुत सा
धन निष्प्रयोजन नष्ट हुआ जाता है। मै और यह इकट्ठे मिलकर इस धन को
खाएँगे। एक दिन वह मुँह में एक कार्षापण पकड हुए बोधिसत्त्व के पास पहुँची।
बोधिसत्त्व ने प्रिय वाणी का प्रयोग करते हुए पूछा—
“अम्म ! कार्षापण लेकर क्यो आई है ?”
“तात ! इसे लेकर स्वय भी खाएँ और मेरे लिए भी मास लाएँ।”
बोधिसत्त्व ने ‘अच्छा’ कह स्वीकार कर कार्षापण ले घर जाकर एक मासे
का मास खरीदकर उसे लाकर दिया। उसने उसे ले अपने निवासस्थान पर जा
जी भरकर खाया।
उसके बाद से वह इसी तरह प्रतिदिन बोधिसत्त्व को कार्षापण देती।
वह भी उससे मास ला देता।