जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१७४. दुब्बभियमक्कट जातक
दुब्बभियमक्कट ] २२३
१७४. दुब्बभियमक्कट जातक
“अदम्हु ते वारि बहूतहूपं...” यह शास्ता ने वेणुवन में रहते समय
देवदत्त के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
एक दिन धर्मसभा में बैठे हुए भिक्षु देवदत्त के अकृतज्ञता तथा मित्र-द्रोही
भाव की चर्चा कर रहे थे। शास्ता ने कहा—“भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त
अकृतज्ञ तथा मित्र-द्रोही है। पहले भी यह ऐसा ही था।” इतना कह शास्ता
ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
किसी काशीग्राम में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर घर बसाया।
उस समय काशी राष्ट्र की एक बड़ी चलने वाली सड़क पर एक गहरा कुआँ
था। जानवरो की उस तक पहुँच नही हो सकती थी। इसलिए रास्ता चलने
वाले पुण्यार्थी मनुष्य, लम्बी रस्सी बँधे बर्तन से पानी निकाल एक द्रोणी में
भर जानवरो को पानी पिलाते थे।
उसके चारो तरफ भारी जगल था। उसमें बहुत से बन्दर रहते थे।
दो तीन दिन उस मार्ग से आदमियो का आना जाना न हुआ। जानवरो
को पानी न मिला। एक प्यासा बन्दर पानी खोजता हुआ कुएँ के आस पास
घूमता था। बोधिसत्त्व किसी काम से उस रास्ते से आए। जब वह वहाँ जा,
पानी निकाल, पी, हाथ पाँव धो कर खड़े थे, उन्होने उस बन्दर को देखा।
ज यह जानकर कि वह प्यासा है उन्होने पानी निकाल द्रोणी में डाल कर उसे दिया।
पानी देकर वह विश्राम करने के लिए एक वृक्ष के नीचे लेटे।
२२४ [ २.३.१७४
बन्दर ने पानी पी, पास बैठ नकल बनाते हुए, बोधिसत्त्व को डराया।
बोधिसत्त्व ने उसकी वह करतूत देख 'अरे दुष्ट बन्दर ! मैंने तुझे प्यास से
कष्ट पाते हुए को पानी दिया। तू मुझे चिढाता है ? अहो ! पापी पर किया
गया उपकार निरर्थक होता है" कहते हुए पहली गाथा कही—
अदम्ह ते वारि बहूतरूपं
घम्माभितत्तस्स पिपासितस्स
सो दानि पीत्वान किंकि करोसि,
असङ्कमो पापजनेन सेय्यो ॥
[ धूप से तप्त तुझ प्यासे को हमने बहुत सा पानी दिया । अब तू पानी
पी कर चिडाने के लिए 'किं किं' आवाज करता है। पापी से दूर रहना ही
अच्छा है। ]
सो दानि पीत्वान किंकि करोसि, सो अब तू मेरा दिया हुआ पानी पीकर
(मुझे) चिढ़ाता हुआ 'किंकि' आवाज करता है। असङ्कमो पापजनेन सेय्यो,
पापी जन के साथ मिलना अच्छा नहीं। दूर रहना ही अच्छा है।
उसे सुन वह मित्र-द्रोही बन्दर बोला—क्या तू समझता है कि यह इतने
से ही समाप्त हो गया ? अब तेरे सिर पर पाखाना करके जाऊँगा। यह
कहते हुए उसने दूसरी गाथा कही।
को ते सुतो वा दिट्ठो वा सीलवा नाम मक्कटो
इदानि खो तं ऊहच्च एसा अस्माक धम्मत्ता ॥
[तूने कौन सा बन्दर सदाचारी है, सुना वा देखा ? अभी मैं तुझे मैला
करके (जाऊँगा) यही हमारा स्वभाव है। ]
अधिप्पार्थ यह है—रे ब्राह्मण मक्कटो कृतज्ञ, सदाचारी शीलवा नाम
है यह तूने कहाँ सुनो वा दिट्ठो वा ? इदानि खो में तं ऊहच्च तेरे सिर पर
आदिच्चुपट्ठान ] २२५
पाखाना करके चला जाऊंगा। अस्माकं हि बन्दरो का ऐसा धम्मता, यह जातीय
स्वभाव है कि हमें उपकार करने वाले के सिर पर मल त्यागना चाहिए।
इसे सुन बोधिसत्त्व उठकर चलने लगे। बन्दर उसी क्षण उछल, शाखा
पर बैठ, सरकी छोड़ने की तरह उसने सिर पर पाखाना गिरा, चिल्लाता
हुआ वन में घुस गया। बोधिसत्त्व नहा कर चले गए।
शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त अकृतज्ञ है। पहले
भी मेरे किए उपकार को नही जानता था।
इतना कह, यह धर्मदेशना ला शास्ता ने जातक का मेल बैठाया।
उस समय बन्दर देवदत्त था। ब्राह्मण मैं ही था।
१७५. आदिच्चुपट्ठान जातक
“सब्बेसु किर भूतेसु . .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक
ढोगी के बारे में कही। वर्तमान-कथा उक्त कथा ही की तरह है।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी-राष्ट्र में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जा, विद्या
सीख, ऋषियों की प्रव्रज्या के ढंग पर प्रव्रजित हुए। अभिज्ञा और समापत्तियां
प्राप्त कर, अनेक अनुयायियों के साथ उनके गण-शास्ता बन, हिमालय में
रहने लगे।
वह वहाँ चिरकाल तक रह कर, निमक-खटाई खाने के लिए पर्वत से
उतर प्रत्यन्त-देश में किसी ग्राम के पास एक पर्णकुटी में रहने लगे।
१५
२२६ [ २.३.१७५
जिस समय ऋषि-गण भिक्षा के लिए जाते, एक लोभी बन्दर आश्रम पर
आकर पर्ण-कुटी का फूस उजाड देता, पानी के घडो मे से पानी गिरा देता।
कुण्डियाँ तोड देता और अग्नि-शाला में पाखाना कर देता।
तपस्वियो ने वर्षा भर रह कर सोचा कि अब हेमन्त ऋतु आ गई है।
फल फूल बहुत हो गए है। (प्रदेश) रमणीय है। यही चलकर रहें। उन्होने
प्रत्यन्त-गांव के वासियों से विदा माँगी।
मनुष्य बोले—भन्ते ! हम कल आश्रम पर भिक्षा लेकर आएंगे।
उसे ग्रहण कर जाएँ।
दूसरे दिन वे बहुत सारा खाद्य-भोज्य लेकर वहाँ पहुँचे।
उसे देख बन्दर ने सोचा मैं भी ढोंग करके मनुष्यो को प्रसन्न कर अपने
लिए खाद्य-भोज्य मँगवाऊँ।
वह तप करते तपस्वी की तरह हो, सदाचारी की तरह हो, तपस्वियो से कुछ
ही दूर पर सूर्य्य को नमस्कार करता हुआ खडा हुआ। मनुष्यो ने उसे देख सोचा
कि सदाचारियो के पास रहने वाले सदाचारी होते है और पहली गाथा कही—
सब्बेसु किर भूतेसु सन्ति सीलसमाहिता,
पस्स साखामिगं जम्मं आदिच्चमुपतिट्ठति ॥
[ सभी प्राणियो में सदाचारी होते हैं। सूर्य्य की पूजा करते हुए नीच बन्दर
को देखो।]
सन्ति सीलसमाहिता, शील से युक्त है, शीलवान तथा समाहित या
एकाग्रचित्त हैं, यह भी अर्थ है। जम्म नीच, आदिच्चमुपतिट्ठति, सूर्य्य को
नमस्कार करते हुए ठहरा है।
इस प्रकार उन मनुष्यो को उसकी प्रशंसा करते देख बोधिसत्त्व ने कहा
कि तुम इस लोभी बन्दर के आचरण को न जानकर अयोग्य-जगह में ही श्रद्धा-
वान् हुए हो, और यह दूसरी गाथा कही—
नास्स सील विजानाथ अनञ्ञाय पसंसथ
अग्गिहुत्तञ्च ऊहन्त द्वे च भिन्ना कमण्डलु ॥
कळायमुट्ठि ] २२७
[ तुम इसके स्वभाव को नही जानते । बिना जाने ही प्रशंसा कर रहे हो ।
इसने अग्नि-शाला खराब कर दी और दो कमण्डल तोड़ डाले । ]
अनञ्जाय बिना जाने । ऊहन्त इस दुष्ट बन्दर द्वारा मैली की गई।
कमण्डलु कुण्डी, द्वे च कुण्डियां उसके द्वारा भिन्ना । इस प्रकार उसने दुर्गुण
कहे ।
मनुष्यो ने बन्दर का ढोग जान, ढेले और लाठियाँ ले, पीट कर भगा
दिया। तब ऋषिगण को भिक्षा दी। ऋषि भी हिमालय प्रदेश में ही जा
ध्यानावस्थित हो ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय बन्दर यह ढोंगी था। ऋषि-गण बुद्ध-परिषद थी। गण-
शास्ता तो मैं ही था।
१७६. कळायमुट्ठि जातक
"बालो यतायं दुमसारगोचरो . . ." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय
कोशल नरेश के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक बार वर्षा ऋतु के समय कोशल नरेश के इलाके में बग़ावत हुई।
वहाँ जो योद्धा थे, उन्होने दो तीन युद्ध किए। जब वह शत्रुओ को न जीत
सके तो उन्होने राजा के पास सन्देश भेजा।
राजा वर्षा-ऋतु में असमय में ही निकल पड़ा। जेतवन के समीप पड़ाव
डलवाकर उसने सोचा—मैं असमय में निकल पड़ा हूँ। कन्दराएँ और
दरारे पानी से भरी हैं। मार्ग दुर्गम है। मैं शास्ता के पास जाता हूँ। वे
मुझे पूछेंगे, 'महाराज ! कहाँ जाते हो ?' मैं उन्हें यह बात कहूँगा। शास्ता
मुझे केवल पारलौकिक उपदेश ही नहीं देते हैं। वह मुझे इस लोक में भी
लाभ की बात बताते हैं। इसलिए यदि जाने से मेरी हानि होती होगी तो वह
कह देंगे, 'महाराज ! यह असमय है।' यदि लाभ होगा, तो वह चुप रहेंगे।
वह जेतवन जा शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा।
शास्ता ने पूछा--महाराज ! दिन चढ़े तुम कैसे आए ?
भन्ते ! मैं इलाके को शान्त करने के लिए निकला हूँ। तुम्हें प्रणाम करके
जाने की इच्छा से आया हूँ।
शास्ता न कहा--'महाराज ! पूर्व समय में भी सेना के तैयार होने पर,
पण्डितो का कहना मान राजा लोग असमय में सेना को चढ़ा कर नहीं ले गए।'
फिर उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उसके अर्थ-धर्मानुशासक सर्वार्थ-अमात्य थे। राजा के इलाके के बगावत
करने पर प्रत्यन्त के योद्धाओ ने सन्देशा भेजा !
राजा वर्षा ऋतु में निकला। उसका पड़ाव उद्यान में लगा। बोधिसत्त्व
राजा के पास खड़े थे। उस समय घोडो के लिए मटर भिगो, ला कर द्रोणियो
में डाल रहे थे। उद्यान के बन्दरो में से एक बन्दर वृक्ष से उतरा। उसने
वहाँ से मटर लिए, मुँह भरा, हाथ भी भरे और कूद कर वृक्ष पर चढ़ खाना
शुरू किया।
खाते समय उसके हाथ से एक मटर भूमि पर गिर पड़ा। वह हाथ में
और मुंह में जितने मटर थे उन्हें छोड़ वृक्ष से उतर उस मटर को ढूंढने लगा।
जब उसे वह मटर नहीं दिखाई दिया तो वह फिर वृक्ष पर चढा और वहां जुए
मे हजार हार गए की तरह चिन्ता करता हुआ रोनी शकल बना वृक्ष की शाखा
पर बैठा।
राजा ने बन्दर की करतूत देख बोधिसत्त्व को सम्बोधन कर पूछा—
'मित्र ! बन्दर ने यह क्या किया ?' बोधिसत्त्व ने कहा—'महाराज !
कळायमुट्ठि ] २२६
बहुत की ओर ध्यान न दे थोडे की ओर ध्यान देने वाले दुर्बुद्धि मूर्ख जन ऐसा
करते ही हैं।' इतना कह, पहली गाथा कही—
बालो यतायं दुमसाखगोचरो
पञ्ञा जनिन्द ! नयिमस्स विज्जति,
कळायमुट्ठिं अवकिरिय सेयतं
एकं कळायं पतितं गवेसति ॥
[ राजन् ! यह वृक्षों की शाखाओ पर घूमने वाला बन्दर मूर्ख है।
इसे प्रज्ञा नहीं है। यह मटर की सारी मुट्ठी को बगेर कर गिरे हुए एक मटर
को खोजता है।]
दुमसालगोचरो बन्दर, यह वृक्षों की शाखा पर रहता है, इसके रहने
की जगह इसके घूमने की जगह है, इसलिए वृक्षों की शाखा पर घूमने वाला
कहलाया। जनिन्द, राजा को सम्बोधन करता है, परम ऐश्वर्यशाली होने
से, राजा जनता के इन्द्र हैं; इसीलिए जनिन्द। कळायमुट्ठि मटर की मुट्ठि,
काले मास की मुट्ठि भी कहते हैं। अवकिरिय वखेर कर सेयतं सय गवेसति
भूमि पर गिरे एक ही मटर को खोजता है।
ऐसा कहकर बोधिसत्त्व ने फिर राजा को सम्बोधन कर दूसरी गाथा
कही—
एवमेव मयं राज ! ये चञ्ञे अतिलोभिनो
अप्पेन बहुजिज्याम कळायेनेव वानरो ॥
[ इसी प्रकार हे राजन ! हम और दूसरे अत्यन्त लोभी लोग थोडे के
लिए बहुत की हानि कर देते हैं; जैसे बन्दर ने एक मटर के लिए।]
सक्षिप्तार्थ इस प्रकार है—महाराज ! एवमेव मयं और अञ्ञे च
सभी लोभी जन अप्पेन बहुं जिज्याम हम ही अब इस वर्षा काल में, इस अयोग्य
समय में रास्ते पर चलकर थोडे से लाभ के लिए बहुत सी हानि करेंगे।
कळायेनेव वानरो जैसे इस बन्दर ने एक मटर को ढूँढते हुए, उस एक मटर
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के कारण सब मटर गंवाए, उसी प्रकार हम भी असमय में जब कन्दराएँ और
दरारें पानी से भरी हैं, छलने पर छोटे से लाभ के लिए बहुत से हाथी घोड़ों
तथा सेना को गँवाएँगे। इसलिए असमय में जाना उचित नहीं। यूँ राजा को
उपदेश दिया।
राजा उसकी बात सुन वहीं से लौट कर वाराणसी नगर में वापिस चला
गया। चोरों ने सुना कि राजा चोरों को दबाने के लिए नगर से निकल
पड़ा है, ये इलाके से भाग गए। वर्तमान समय में भी चोरों ने जब यह सुना
कि कोशल राजा निकल पड़ा है, वह भाग गए।
राजा ने शास्ता का धर्मोपदेश सुना। फिर आसन से उठ, प्रणाम और
प्रदक्षिणा कर श्रावस्ती को चला गया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय राजा आनन्द था। पण्डित अमात्य तो मैं ही था।
१७७. तिन्दुक जातक
“धनुहत्थकलापेहि. ” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय प्रज्ञा पार-
मिता के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
महाबोधि जातक¹ तथा उम्मग्ग जातक² (में आए वर्णन) की तरह
शास्ता ने अपनी प्रज्ञा की प्रशंसा सुन कर कहा—“भिक्षुओ ! तथागत केवल
¹ महाबोधी जातक (५२८) ² उम्मग्ग जातक (५४६)