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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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२२४ [ २.३.१७४

बन्दर ने पानी पी, पास बैठ नकल बनाते हुए, बोधिसत्त्व को डराया।
बोधिसत्त्व ने उसकी वह करतूत देख 'अरे दुष्ट बन्दर ! मैंने तुझे प्यास से
कष्ट पाते हुए को पानी दिया। तू मुझे चिढाता है ? अहो ! पापी पर किया
गया उपकार निरर्थक होता है" कहते हुए पहली गाथा कही—
अदम्ह ते वारि बहूतरूपं
घम्माभितत्तस्स पिपासितस्स
सो दानि पीत्वान किंकि करोसि,
असङ्कमो पापजनेन सेय्यो ॥
[ धूप से तप्त तुझ प्यासे को हमने बहुत सा पानी दिया । अब तू पानी
पी कर चिडाने के लिए 'किं किं' आवाज करता है। पापी से दूर रहना ही
अच्छा है। ]
सो दानि पीत्वान किंकि करोसि, सो अब तू मेरा दिया हुआ पानी पीकर
(मुझे) चिढ़ाता हुआ 'किंकि' आवाज करता है। असङ्कमो पापजनेन सेय्यो,
पापी जन के साथ मिलना अच्छा नहीं। दूर रहना ही अच्छा है।

उसे सुन वह मित्र-द्रोही बन्दर बोला—क्या तू समझता है कि यह इतने
से ही समाप्त हो गया ? अब तेरे सिर पर पाखाना करके जाऊँगा। यह
कहते हुए उसने दूसरी गाथा कही।
को ते सुतो वा दिट्ठो वा सीलवा नाम मक्कटो
इदानि खो तं ऊहच्च एसा अस्माक धम्मत्ता ॥
[तूने कौन सा बन्दर सदाचारी है, सुना वा देखा ? अभी मैं तुझे मैला
करके (जाऊँगा) यही हमारा स्वभाव है। ]
अधिप्पार्थ यह है—रे ब्राह्मण मक्कटो कृतज्ञ, सदाचारी शीलवा नाम
है यह तूने कहाँ सुनो वा दिट्ठो वा ? इदानि खो में तं ऊहच्च तेरे सिर पर