जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआदिच्चुपट्ठान ] २२५
पाखाना करके चला जाऊंगा। अस्माकं हि बन्दरो का ऐसा धम्मता, यह जातीय
स्वभाव है कि हमें उपकार करने वाले के सिर पर मल त्यागना चाहिए।
इसे सुन बोधिसत्त्व उठकर चलने लगे। बन्दर उसी क्षण उछल, शाखा
पर बैठ, सरकी छोड़ने की तरह उसने सिर पर पाखाना गिरा, चिल्लाता
हुआ वन में घुस गया। बोधिसत्त्व नहा कर चले गए।
शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त अकृतज्ञ है। पहले
भी मेरे किए उपकार को नही जानता था।
इतना कह, यह धर्मदेशना ला शास्ता ने जातक का मेल बैठाया।
उस समय बन्दर देवदत्त था। ब्राह्मण मैं ही था।
१७५. आदिच्चुपट्ठान जातक
“सब्बेसु किर भूतेसु . .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक
ढोगी के बारे में कही। वर्तमान-कथा उक्त कथा ही की तरह है।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी-राष्ट्र में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जा, विद्या
सीख, ऋषियों की प्रव्रज्या के ढंग पर प्रव्रजित हुए। अभिज्ञा और समापत्तियां
प्राप्त कर, अनेक अनुयायियों के साथ उनके गण-शास्ता बन, हिमालय में
रहने लगे।
वह वहाँ चिरकाल तक रह कर, निमक-खटाई खाने के लिए पर्वत से
उतर प्रत्यन्त-देश में किसी ग्राम के पास एक पर्णकुटी में रहने लगे।
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