जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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जिस समय ऋषि-गण भिक्षा के लिए जाते, एक लोभी बन्दर आश्रम पर
आकर पर्ण-कुटी का फूस उजाड देता, पानी के घडो मे से पानी गिरा देता।
कुण्डियाँ तोड देता और अग्नि-शाला में पाखाना कर देता।
तपस्वियो ने वर्षा भर रह कर सोचा कि अब हेमन्त ऋतु आ गई है।
फल फूल बहुत हो गए है। (प्रदेश) रमणीय है। यही चलकर रहें। उन्होने
प्रत्यन्त-गांव के वासियों से विदा माँगी।
मनुष्य बोले—भन्ते ! हम कल आश्रम पर भिक्षा लेकर आएंगे।
उसे ग्रहण कर जाएँ।
दूसरे दिन वे बहुत सारा खाद्य-भोज्य लेकर वहाँ पहुँचे।
उसे देख बन्दर ने सोचा मैं भी ढोंग करके मनुष्यो को प्रसन्न कर अपने
लिए खाद्य-भोज्य मँगवाऊँ।
वह तप करते तपस्वी की तरह हो, सदाचारी की तरह हो, तपस्वियो से कुछ
ही दूर पर सूर्य्य को नमस्कार करता हुआ खडा हुआ। मनुष्यो ने उसे देख सोचा
कि सदाचारियो के पास रहने वाले सदाचारी होते है और पहली गाथा कही—
सब्बेसु किर भूतेसु सन्ति सीलसमाहिता,
पस्स साखामिगं जम्मं आदिच्चमुपतिट्ठति ॥
[ सभी प्राणियो में सदाचारी होते हैं। सूर्य्य की पूजा करते हुए नीच बन्दर
को देखो।]
सन्ति सीलसमाहिता, शील से युक्त है, शीलवान तथा समाहित या
एकाग्रचित्त हैं, यह भी अर्थ है। जम्म नीच, आदिच्चमुपतिट्ठति, सूर्य्य को
नमस्कार करते हुए ठहरा है।
इस प्रकार उन मनुष्यो को उसकी प्रशंसा करते देख बोधिसत्त्व ने कहा
कि तुम इस लोभी बन्दर के आचरण को न जानकर अयोग्य-जगह में ही श्रद्धा-
वान् हुए हो, और यह दूसरी गाथा कही—
नास्स सील विजानाथ अनञ्ञाय पसंसथ
अग्गिहुत्तञ्च ऊहन्त द्वे च भिन्ना कमण्डलु ॥