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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

ख. अतीत कथा

=] बन्धनागार ]
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
एक दरिद्र गृहस्थ के घर में पैदा हुआ। उसके बड़े होने पर पिता मर गया।
वह नौकरी करके माता को पालने लगे।
उसके अनिच्छा प्रकट करने पर भी उसकी माँ ने उसे एक लड़की ला दी
और स्वयं मर गई। उसकी भार्या की कोख में गर्भ रह गया। उसे न
मालूम था कि भार्या की कोख में गर्भ है। उसने कहा—'भद्रे ! तू नोक-
चाकरी करके अपना पालन पोषण कर, मैं प्रव्रजित होऊँगा।
उसने उत्तर दिया—मेरी कोख में गर्भ है। बच्चों को देख कर प्रव्रजि-
होना ।
बोधिसत्त्व ने 'अच्छा' कह स्वीकार किया और उसके बच्चे को जन्म देने पर
पूछा—भद्रे ! तूने कुशलपूर्वक बच्चे को जन्म दिया। अब मैं प्रव्रजित होऊँ ?
उसने कहा कि जब तक बच्चा स्तन का दूध पीता है, तब तक प्रतीक्ष-
करें। इस बीच में वह फिर गर्भवती हो गई। उसने सोचा इसकी रजामन्द-
से जाना न हो सकेगा, इसे बिना कहे ही भाग कर प्रव्रजित होऊँगा। वह
बिना कहे ही रात को उठकर भाग गया। उसे नगर रक्षको ने पकड़ा। बोधि-
सत्त्व ने कहा—'स्वामी ! मैं 'माँ का पोषण करन वाला' हूँ। मुझे छोड़ दें
उनसे अपने आपको छुड़ा एक स्थान पर ठहर, मुख्य द्वार से ही निकल
बोधिसत्त्व ने हिमालय में प्रवेश किया। वहाँ ऋषियों के प्रव्रज्या क्रम के
अनुसार प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर ध्यान क्रीडा में रत
हो रहने लगा।
वहाँ रहते हुए 'ऐसे दुष्करता से तोडे जा सकने वाले पुत्र-दारा के प्रति
आसक्ति के बन्धन को भी तोड़ते हैं' उल्लास-वाक्य कहते हुए उसने यह गाथा
कही—
न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा,
यदायसं दारुज बब्बजञ्च,
सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु,
पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा ॥

३०८ [ २.६ २७
एत दळ्ह बन्धनमाहु धीरा,
ओहारिनं सिथिलं दुप्पमुञ्चं,
एतम्पि छेत्वान वजन्ति धीरा,
अनपेक्खिनो कामसुखं पहाय ॥
[ लोहे के, लकड़ी के या बब्बड़ (की रस्सी) के जो बन्धन हैं, धीर-जन
उन्हें (असली) बन्धन नहीं मानते। यह जो मणि में, कुण्डलों में आसक्ति है,
यह जो पुत्र-दारा की अपेक्षा है, धीर-जन इन्हें दृढ बन्धन मानते हैं। यह
नीचे गिराने वाले हैं, शिथिल हैं और कठिनाई से दूर होते हैं। धीर-जन इन्हें
भी छेद कर, काम-भोगों के सुख को छोड़, अपेक्षा रहित हो चल देते हैं । ]
धृत्तिमान् को ही धीर । धिक्कार किया पापों को इसलिए धीर । या
धी का मतलब है प्रज्ञा, उस प्रज्ञा से युक्त धीर बुद्ध, प्रत्येक-बुद्ध, बुद्ध-श्रावक
और बोधिसत्त्व—यह ही धीर हैं। यदायस आदि में य ज़जीर आदि लोहे
से बना हुआ आयस, अन्धुबन्धन । बब्बजञ्च, जो बब्बड़-तृण या अन्य वल्कल
आदि की रस्सी से बना हुआ रस्सी-बन्धन । तं धीरा दळ्ह, मजबूत नहीं कहते ।
सारत्तरत्ता, अधिक अनुरक्त होकर आसक्त, बहुत राग से अनुरक्त मणि-
कुण्डलेसु, मणि में और कुण्डलों में अथवा मणियुक्त कुण्डलों में ।
एतं दळ्ह, जो मणिकुण्डलों में अत्यन्त अनुरक्त है, उन्हीं का जो राग
है, या उनकी पुत्र-दारा में अपेक्षा है, तृष्णा है, इस बन्धन को ही धीर-जन
दृढ़ बन्धन कहते हैं। ओहारिन, निकाल कर चार नरकों में गिराते हैं, उतारते
हैं, नीचे ले जाते हैं, इसलिए ओहारिन । सिथिल जहाँ बन्धन पड़ा होता है
उस जगह की चमड़ी या मास नहीं छिलता, खून भी नहीं निकलता, 'बन्धन
पड़ा हूँ' यह भी पता नहीं लगने देते इसलिए सिथिल। दुप्पमुञ्च, तृष्णा-लोभ
रूप से एक बार भी पैदा हुआ बन्धन उसी तरह कठिनाई से पीछा छोड़ता है
जैसे एक बार किसीको पकड़ लेने पर कछुवा । एतम्पि छेत्वान, ऐसा दृढ़
बन्धन भी ज्ञानरूपी तलवार से काट कर धीर-जन लोहे की ज़जीर तोड़ने वाले
मस्त हाथी की तरह, पिंजरे को तोड़ने वाले सिंह-बच्चे की तरह, वस्तु-कामना
तथा वासना को कूड़ा फेंकने के स्थान को घृणा करने की तरह अनपेक्खिनो

केळिसील ] ३०१
होकर कामगुणं पहाय यजन्ति, धन देते हैं। धन देकर, हिमवन्त में प्रविष्ट हो
ऋषियों के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो ध्यान-सुख में रत रही हूँ।

इस प्रकार बोधिसत्त्व यह उल्लास-वाक्य कह ध्यान-युक्त हो ब्रह्मलोक-
गामी हुए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों का प्रकाशन किया। सत्यों के अन्त
में कोई सोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी तथा कोई अर्हत् हुए।
उस समय माता महामाया थी। पिता शुद्धोदन महाराजा। भार्या
राहुलमाता। पुत्र राहुल। पुत्र-दारा को छोड़ निरत कर प्रव्रजित होने वाला
पुरुष मैं ही था।

२०२. केळिसील जातक

"हंसा कोञ्चा मञ्जुरा च . ." यह शास्ता ने जेतवन में विहरते समय
आयुष्मान् लकुण्टक भद्दिय के सम्बन्ध में कही।

क. वर्तमान कथा

वह आयुष्मान् बुद्ध-शासन में प्रसिद्ध थे, सर्व-विदित थे, मधुर स्वर वाले
थे, मधुर धर्मोपदेशक थे, पटिसम्भिदा-ज्ञान प्राप्त थे, महा क्षीणास्रव थे, लेकिन
साथ ही वे अस्सी स्थविरों में कद के ठिंगने, श्रामणेर की तरह बौने, खेलने
के लिए बनाए खिलौने की तरह छोटे।
एक दिन जब वह तथागत को प्रणाम कर जेतवन के कोठे में गए थे,
देहात के तीस भिक्षु बुद्ध को प्रणाम करने की इच्छा से जेतवन आए। उन्होंने
विहार के दरवाजे पर स्थविर को देख 'कोई श्रामणेर हैं' समझ स्थविर को

३१० [ २.६.२०२
चीवर के सिरे से पकड, हाथो से पकड, सिर से पकड, नाक को रगढ, कान
पकड घसीटते हुए, हाथ से गुदगुदी उठाते हुए पात्रचीवर सौंप शास्ता के पास
गए। वहाँ शास्ता को प्रणाम कर बैठे। शास्ता ने मधुर-वाणी से कुशल क्षेम
पूछा। तब वे बोले— भन्ते ! लकुण्टक भद्दिय नाम के आपके एक शिष्य
स्थविर मधुर भाषी धर्मोपदेशक है। वह इस समय कहाँ है ?
"भिक्षुओ, क्या उसे देखना चाहते हो ?"
"भन्ते ! हाँ।"
"भिक्षुओ, जिसे तुम द्वार-कोठे पर देख, चीवर के कोने आदि से पकड
हाथ से छेडते हुए आए, वही यह है।"
"भन्ते ! इस तरह का प्रार्थी,१ इस तरह का उच्चाभिलाषी२ किस कारण
से इतने छोटे आकार का पैदा हुआ ?"
"अपने पूर्व-कृत पापकर्म के कारण।" उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने
पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
देवेन्द्र शक्र हुए। उस समय ब्रह्मदत्त जीर्ण जरा-प्राप्त हाथी, घोडे वा बैल को
नही देख सकता था; देखते ही क्रीडा करने की इच्छा से उसका पीछा करता था।
पुरानी गाडी देख कर तुडवा देता, वृद्ध स्त्रियो को देख, उन्हें बुलवा, उनके
पेट पर प्रहार दिलवा, उन्हें गिरवा, फिर उठवा डरवाता। वृद्ध आदमियो
को देख बाजीगर की तरह कलाबाजियाँ खिलवाता। न दिखाई देने की अवस्था
में यदि यह सुन भी लेता कि अमुक घर में वृद्ध मनुष्य है, तो उसे बुलवा कर
खेलता।
मनुष्य लज्जित होकर अपने अपने माता पिता को विदेशो में भेजने लगे।
माता की सेवा, पिता की सेवा का कर्तव्य छूटने लगा। राजसेवक भी क्रीडा-
१ जिसने पूर्व-बुद्धों के पास प्रार्थना की।
२ जिसने पूर्व-जन्म में ऊँची अभिलाषा से सत्कर्म किए।

[केळिसील ] ३११

प्रिय हो गए। मर मरकर चारो नरक भरने लगे। देव परिषद घटने लगी।
शक्र ने नए देवपुत्रो को न देख सोचा कि क्या कारण है ? जब उसे पता लगा
तो शक्र ने निश्चय किया कि उसका दमन करूंगा। वह बूढे आदमी की शक्ल
बना पुरानी गाडियो पर मट्ठे की दो चाटियां रख दो बूढे बैल जोत एक उत्सव
के दिन जब ब्रह्मदत्त अलङ्कृत हाथी पर चढ अलङ्कृत नगर में घूम रहा था,
स्वयं चीथडे पहने हुए उस गाडी को हांक कर राजा के सामने पहुँचा।
राजा ने पुरानी गाडी को देख कहा—इसे हटाओ।
मनुष्यो ने पूछा—देव, गाडी कहां है। दिखाई नही देती।
शक्र के प्रताप से गाडी केवल राजा को ही दिखाई देती थी।
शक्र ने राजा के पास बार बार आ उसके ऊपर की ओर रथ हांकते हुए
राजा के सिर पर एक चाटी फोड दी। राजा भीग गया। उसने दूसरी फोड
दी। उसके सिर से इधर उधर से मठा चूने लगा। राजा घबराया, हैरान हुआ,
घृणा करने लगा।
जब शक्र ने देखा कि राजा घबरा रहा है तो अपने रथ को अन्तर्धान कर
शक्र का असली रूप बना वज्र हाथ में ले आकाश में खडे हो कहा—अरे पापी
अधार्मिक राजा ! क्या तू बूढा न होगा ? तेरे शरीर पर बुढापा आक्रमण न
करेगा ? क्रीडा प्रिय होकर वृद्धो को कष्ट देता है। तेरे एक के कारण यह
करतूत करके मरने वाले नरक भर रहे हैं। आदमियो को माता पिता की सेवा
करनी नही मिलती। यदि इस कर्म से बाज नही आएगा तो वज्र से तेरा सिर
फोड दूंगा। इसके बाद से ऐसा कर्म मत करना।
इस प्रकार डराकर, माता पिता के गुण कह, बडो की सेवा का महात्म
प्रकाशित कर, उपदेश दे शक्र अपने निवास-स्थान को चला गया।
राजा ने उसके बाद वैसा करने का विचार भी नही किया।
शास्ता ने यह पूर्व-जन्म की कथा कह अभिसम्बुद्ध हुए रहने पर यह
गाथाएं कहीं—
हंसा कोञ्चा मयूरा च हत्थियो पसदा मिगा,
सब्बे सीहस्स भायन्ति नत्थि कायस्मि तुल्यता ॥
एवमेवं मनुस्सेसु दहरो चेपि पञ्ञवा,
सोहि तत्थ महा होति नेव बालो सरीरवा ॥

३१० [ २.६.२०२
चीवर के सिरे से पकड़, हाथो से पकड़, सिर से पकड़, नाक को रगड़, कान
पकड़ घसीटते हुए, हाथ से गुदगुदी उठाते हुए पात्रचीवर सौंप शास्ता के पास
गए। वहाँ शास्ता को प्रणाम कर बैठे। शास्ता ने मधुर-वाणी से कुशल क्षेम
पूछा। तब वे बोले—'भन्ते ! लकण्टक भद्दिय नाम के आपके एक शिष्य
स्थविर मधुर भाषी धर्मोपदेशक हैं। वह इस समय कहाँ हैं ?
'भिक्षुओ, क्या उसे देखना चाहते हो ?'
"भन्ते ! हाँ।"
'भिक्षुओ, जिसे तुम द्वार-कोठे पर देख, चीवर के कोने आदि से पकड़
हाय से छेड़ते हुए आए, वही यह है।'
"भन्ते ! इस तरह का प्रार्थी,१ इस तरह का उच्चाभिलाषी२ किस कारण
से इतने छोटे आकार का पैदा हुआ ?"
'अपने पूर्व-कृत पापकर्म के कारण।' उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने
पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
देवेन्द्र शक्र हुए। उस समय ब्रह्मदत्त जीर्ण जरा प्राप्त हाथी, घोड़े या बैल को
नही देख सकता था, देखते ही क्रीडा करने की इच्छा से उसका पीछा करता था।
पुरानी गाड़ी देख कर तुड़वा देता, वृद्ध स्त्रियो को देख, उन्हें बुलवा, उनके
पेट पर प्रहार दिलवा, उन्हें गिरवा, फिर उठवा डरवाता। वृद्ध आदमियो
को देख बाजीगर की तरह कुलावाजियाँ खिलवाता। न दिखाई देने की अवस्था
में यदि यह सुन भी लेता कि अमुक घर म वृद्ध मनुष्य है, तो उसे बुलवा कर
खेलता।
मनुष्य लज्जित होकर अपने अपने माता पिता को विदेशो में भेजने लगे।
माता की सेवा, पिता की सेवा का कर्तव्य टूटने लगा। राजसेवक भी क्रीडा-
१ जिसने पूर्व-बुद्धों के पास प्रार्थना की।
२ जिसने पूर्व-जन्म में ऊँची अभिलाषा से सत्कर्म किए।

प्रिय हो गए। भर मरकर चारो नरक भरने लगे। देव परिषद घटने लगी।
शक्र ने नए देवपुत्रो को न देख सोचा कि क्या कारण है? जब उसे पता लगा
तो शक्र ने निश्चय किया कि उसका दमन करूँगा। वह बूढे आदमी की शकल
बना पुरानी गाडियो पर मट्ठे की दो चाटियाँ रख दो बूढे बैल जोत एक उत्सव
के दिन जब ब्रह्मदत्त अलङ्कृत हाथी पर चढ़ अलङ्कृत नगर में घूम रहा था,
स्वय चीथडे पहने हुए उस गाडी को हाँक कर राजा के सामने पहुँचा।
राजा ने पुरानी गाडी को देख कहा—इसे हटाओ।
मनुष्यो ने पूछा—देव, गाडी कहाँ है। दिखाई नहीं देती।
शक्र के प्रताप से गाडी केवल राजा को ही दिखाई देती थी।
शक्र ने राजा के पास बार बार आ उसके ऊपर की ओर रथ हाँकते हुए
राजा के सिर पर एक चाटी फोड दी। राजा भीग गया। उसने दूसरी फोड़
दी। उसके सिर से इधर उधर से मठा चूने लगा। राजा घबराया, हैरान हुआ,
घृणा करने लगा।

३१२ [ २.६.२०३

[ हंस, क्रोञ्च, मोर, हाथी तथा चितकबरा मृग सभी सिंह से डरते हैं।
शरीर से बड़ा-छोटा नही होता। इसी प्रकार मनुष्यो में चाहे आयु का छोटा
हो लेकिन यदि यह बुद्धिमान् हैं तो वह ही बडा है। बडे शरीर वाला मूर्ख
बडा नही होता।]


पसदामिगा, पसद नामक मृग, पसद मृग तथा शेष मृग भी अर्थ है। पसद-
मिगा भी पाठ है। पसद मृग अर्थ है। नत्थि कायस्मि तुल्यता, शरीर से बडा
छोटा नही है, यदि हो तो बडे शरीर वाले पसद मृग और हाथी सिंह को मार
डालें। सिंह हंसादि क्षुद्र शरीर वालो को ही मारे। छोटे ही सिंह से डरें, बडे
नही, ऐसा नही है। इसलिए सभी सिंह से डरते है। सरीरवा मूर्ख वडे शरीर
वाला होने पर भी बडा नही होता। इसलिए लकुण्टक भद्दिय यद्यपि शरीर
से छोटा है, इससे यह न समझो कि वह ज्ञान में भी छोटा हैं।


शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यो के अन्त में उन भिक्षुओ में से कोई स्रोतापन्न, कोई सकृदागामी,
कोई अनागामी तथा कोई अर्हत हो गए।

उस समय राजा लकुण्टक भद्दिय था। उसके क्रीडा-प्रिय होने से दूसरे
क्रीडा-प्रिय हो गए। शक्र मै ही था।

* २०३. खन्धवत्त जातक

“विरूपक्खेहि मे मेत्तं .” इसे शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
एक भिक्षु के बारे में कहा।