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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 328

प्रिय हो गए। भर मरकर चारो नरक भरने लगे। देव परिषद घटने लगी।
शक्र ने नए देवपुत्रो को न देख सोचा कि क्या कारण है? जब उसे पता लगा
तो शक्र ने निश्चय किया कि उसका दमन करूँगा। वह बूढे आदमी की शकल
बना पुरानी गाडियो पर मट्ठे की दो चाटियाँ रख दो बूढे बैल जोत एक उत्सव
के दिन जब ब्रह्मदत्त अलङ्कृत हाथी पर चढ़ अलङ्कृत नगर में घूम रहा था,
स्वय चीथडे पहने हुए उस गाडी को हाँक कर राजा के सामने पहुँचा।
राजा ने पुरानी गाडी को देख कहा—इसे हटाओ।
मनुष्यो ने पूछा—देव, गाडी कहाँ है। दिखाई नहीं देती।
शक्र के प्रताप से गाडी केवल राजा को ही दिखाई देती थी।
शक्र ने राजा के पास बार बार आ उसके ऊपर की ओर रथ हाँकते हुए
राजा के सिर पर एक चाटी फोड दी। राजा भीग गया। उसने दूसरी फोड़
दी। उसके सिर से इधर उधर से मठा चूने लगा। राजा घबराया, हैरान हुआ,
घृणा करने लगा।