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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 323

३०८ [ २.६ २७
एत दळ्ह बन्धनमाहु धीरा,
ओहारिनं सिथिलं दुप्पमुञ्चं,
एतम्पि छेत्वान वजन्ति धीरा,
अनपेक्खिनो कामसुखं पहाय ॥
[ लोहे के, लकड़ी के या बब्बड़ (की रस्सी) के जो बन्धन हैं, धीर-जन
उन्हें (असली) बन्धन नहीं मानते। यह जो मणि में, कुण्डलों में आसक्ति है,
यह जो पुत्र-दारा की अपेक्षा है, धीर-जन इन्हें दृढ बन्धन मानते हैं। यह
नीचे गिराने वाले हैं, शिथिल हैं और कठिनाई से दूर होते हैं। धीर-जन इन्हें
भी छेद कर, काम-भोगों के सुख को छोड़, अपेक्षा रहित हो चल देते हैं । ]
धृत्तिमान् को ही धीर । धिक्कार किया पापों को इसलिए धीर । या
धी का मतलब है प्रज्ञा, उस प्रज्ञा से युक्त धीर बुद्ध, प्रत्येक-बुद्ध, बुद्ध-श्रावक
और बोधिसत्त्व—यह ही धीर हैं। यदायस आदि में य ज़जीर आदि लोहे
से बना हुआ आयस, अन्धुबन्धन । बब्बजञ्च, जो बब्बड़-तृण या अन्य वल्कल
आदि की रस्सी से बना हुआ रस्सी-बन्धन । तं धीरा दळ्ह, मजबूत नहीं कहते ।
सारत्तरत्ता, अधिक अनुरक्त होकर आसक्त, बहुत राग से अनुरक्त मणि-
कुण्डलेसु, मणि में और कुण्डलों में अथवा मणियुक्त कुण्डलों में ।
एतं दळ्ह, जो मणिकुण्डलों में अत्यन्त अनुरक्त है, उन्हीं का जो राग
है, या उनकी पुत्र-दारा में अपेक्षा है, तृष्णा है, इस बन्धन को ही धीर-जन
दृढ़ बन्धन कहते हैं। ओहारिन, निकाल कर चार नरकों में गिराते हैं, उतारते
हैं, नीचे ले जाते हैं, इसलिए ओहारिन । सिथिल जहाँ बन्धन पड़ा होता है
उस जगह की चमड़ी या मास नहीं छिलता, खून भी नहीं निकलता, 'बन्धन
पड़ा हूँ' यह भी पता नहीं लगने देते इसलिए सिथिल। दुप्पमुञ्च, तृष्णा-लोभ
रूप से एक बार भी पैदा हुआ बन्धन उसी तरह कठिनाई से पीछा छोड़ता है
जैसे एक बार किसीको पकड़ लेने पर कछुवा । एतम्पि छेत्वान, ऐसा दृढ़
बन्धन भी ज्ञानरूपी तलवार से काट कर धीर-जन लोहे की ज़जीर तोड़ने वाले
मस्त हाथी की तरह, पिंजरे को तोड़ने वाले सिंह-बच्चे की तरह, वस्तु-कामना
तथा वासना को कूड़ा फेंकने के स्थान को घृणा करने की तरह अनपेक्खिनो