जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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प्रिय हो गए। मर मरकर चारो नरक भरने लगे। देव परिषद घटने लगी।
शक्र ने नए देवपुत्रो को न देख सोचा कि क्या कारण है ? जब उसे पता लगा
तो शक्र ने निश्चय किया कि उसका दमन करूंगा। वह बूढे आदमी की शक्ल
बना पुरानी गाडियो पर मट्ठे की दो चाटियां रख दो बूढे बैल जोत एक उत्सव
के दिन जब ब्रह्मदत्त अलङ्कृत हाथी पर चढ अलङ्कृत नगर में घूम रहा था,
स्वयं चीथडे पहने हुए उस गाडी को हांक कर राजा के सामने पहुँचा।
राजा ने पुरानी गाडी को देख कहा—इसे हटाओ।
मनुष्यो ने पूछा—देव, गाडी कहां है। दिखाई नही देती।
शक्र के प्रताप से गाडी केवल राजा को ही दिखाई देती थी।
शक्र ने राजा के पास बार बार आ उसके ऊपर की ओर रथ हांकते हुए
राजा के सिर पर एक चाटी फोड दी। राजा भीग गया। उसने दूसरी फोड
दी। उसके सिर से इधर उधर से मठा चूने लगा। राजा घबराया, हैरान हुआ,
घृणा करने लगा।
जब शक्र ने देखा कि राजा घबरा रहा है तो अपने रथ को अन्तर्धान कर
शक्र का असली रूप बना वज्र हाथ में ले आकाश में खडे हो कहा—अरे पापी
अधार्मिक राजा ! क्या तू बूढा न होगा ? तेरे शरीर पर बुढापा आक्रमण न
करेगा ? क्रीडा प्रिय होकर वृद्धो को कष्ट देता है। तेरे एक के कारण यह
करतूत करके मरने वाले नरक भर रहे हैं। आदमियो को माता पिता की सेवा
करनी नही मिलती। यदि इस कर्म से बाज नही आएगा तो वज्र से तेरा सिर
फोड दूंगा। इसके बाद से ऐसा कर्म मत करना।
इस प्रकार डराकर, माता पिता के गुण कह, बडो की सेवा का महात्म
प्रकाशित कर, उपदेश दे शक्र अपने निवास-स्थान को चला गया।
राजा ने उसके बाद वैसा करने का विचार भी नही किया।
शास्ता ने यह पूर्व-जन्म की कथा कह अभिसम्बुद्ध हुए रहने पर यह
गाथाएं कहीं—
हंसा कोञ्चा मयूरा च हत्थियो पसदा मिगा,
सब्बे सीहस्स भायन्ति नत्थि कायस्मि तुल्यता ॥
एवमेवं मनुस्सेसु दहरो चेपि पञ्ञवा,
सोहि तत्थ महा होति नेव बालो सरीरवा ॥