गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८४- छन्द-विधान (अर्धसमवृत्त लक्षण)
३७० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
जो यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण और सगण हैं ।) लघु (ह्रस्व)-वर्णको ल एवं दीर्घ वर्णको ग कहा गया है। तीन गुरुवर्ण (ऽऽऽ)-को 'मगण', तीन लघुवर्ण ( ।।।)-को 'नगण', प्रथम गुरु और दो लघु (ऽ।।) होनेपर 'भगण', आदि लघु और इसके बाद दो गुरु (।ऽऽ) होनेपर 'यगण', दो आगे-पीछे लघु और मध्यवर्ण गुरु (।ऽ।) होनेपर 'जगण', मध्यवर्ण लघु और दोनों ओर दो वर्ण गुरु (ऽ।ऽ) होनेपर 'रगण', अन्तवर्ण गुरु और उसके पूर्वके दो वर्ण लघु (।।ऽ) होनेपर 'सगण' तथा अन्तवर्ण लघु और उसके पूर्व दो वर्ण गुरु (ऽऽ।) होनेपर 'तगण'—इस प्रकार तीन-तीन वर्णका एक-एक गण होता है। आर्या छन्द चतुष्कला है, इसके आदि, अन्त तथा मध्य सभी जगह चार-चार गण रहते हैं। व्यञ्जनान्त, विसर्गान्त, अनुस्वारयुक्त, दीर्घ एवं संयुक्त वर्णका पहला वर्ण गुरु होता है। पदके अन्तमें स्थित वर्ण विकल्पसे गुरु होता है। गुरुवर्ण दीर्घ मात्रावाला होता है। श्लोककी श्रवणकी मधुरता आदिके लिये कभी-कभी गुरुवर्ण भी लघुके रूपमें व्यवहृत होता है। छन्दोंको श्लोक तथा आर्यादिके नामोंसे अभिहित किया जाता है। विच्छेद स्थानको यति (विराम) कहा जाता है। इसका नाम विच्छेदन भी है। निर्दिष्ट स्थानमें यति न होनेपर यतिच्छेद या यतिभङ्ग होता है। श्लोकके चतुर्थांशको पाद कहा जाता है। समान अर्थात् द्वितीय और चतुर्थ पादको युक् कहा जाता है। विषम अर्थात् प्रथम और तृतीय पादको अयुक् कहा जाता है, वृत्त अर्थात् जिसकी अक्षर-संख्या निर्दिष्ट होती है, वे छन्द तीन प्रकारके हैं—समवृत्त, अर्धसमवृत्त और विषमवृत्त। (अध्याय २०७)
छन्द-विधान (आर्या आदि वृत्तोंके लक्षण)
सूतजीने कहा—आर्या छन्दका लक्षण इस प्रकार है—आर्या छन्दमें आठ गण होते हैं। इसका विषम गण अर्थात् प्रथम, तृतीय, पञ्चम तथा सप्तम सर्वदा जगण (।ऽ।)-रहित होता है। यदि छठे गणमें जगण (।ऽ।) अथवा नगण (।।।) और एक लघु (।) हो तो उस गणके द्वितीय अक्षरमें लघु होनेके कारण सुबन्त या तिङन्त लक्षणवाली 'पद' संज्ञाकी प्रवृत्ति हो सकती है। यदि सातवें गणमें सभी वर्ण ह्रस्व (।।।) हों तो उसके प्रथम अक्षरसे 'पद' संज्ञाकी प्रवृत्ति होती है। यदि आर्याके उत्तरार्द्ध भागमें पाँचवें गणमें सभी वर्ण लघु (।।।) हों तो उसके प्रथम अक्षरसे ही पदका आरम्भ होता है। जिस आर्याके पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्धमें तीन-तीन गणोंके बाद पहले पादका विराम होता है, उसको पथ्या नामकी आर्या कहते हैं। जिस आर्याके पूर्वार्द्ध, उत्तरार्द्ध या दोनोंमें अथवा तीन गणोंपर पादविराम होता है, उसका नाम विपुला है। इन तीन विशेषताओंके कारण इसके तीन भेद हो जाते हैं, जिन्हें—१-आदिविपुला, २-अन्त्यविपुला और ३-उभयविपुला कहा गया है। जिस आर्या छन्दके द्वितीय तथा चतुर्थ गण गुरु अक्षरोंके बीचमें होनेके साथ ही जगण अर्थात् मध्य गुरु (।ऽ।)-से युक्त हों तो उसे मुखपूर्वादिचपला नामकी आर्या कहते हैं। जिस आर्याके दूसरे उत्तरार्द्धमें चपलाका ही लक्षण हो तो उसे सजघना आर्या कहा जाता है। जहाँ आर्याका 'उत्तरार्द्ध' पूर्वार्द्धके समान ही होता है अर्थात् पूर्वार्द्धकी भाँति ही उसके उत्तरार्द्धमें भी छठा गण मध्य गुरु (।ऽ।) अथवा सर्व लघु (।।।) होता है तो उसे गीति की संज्ञासे अभिहित करते हैं।
काण्ड ] छन्द-विधान ( आर्या आदि वृत्तोंके लक्षण ) ३७१
यदि आर्यामें उत्तरार्द्धकी भाँति पूर्वार्द्ध भी हो तो उसको उपगीति आर्या कहा जाता है। आर्यामें जब यही क्रम विपरीत हो जाता है तो वह गीति न होकर उद्गीति छन्द बन जाता है। यदि गीति-जातिवाले छन्दका अन्तिम वर्ण गुरु हो तो वही आर्या गीति नामक छन्द हो जाता है।
यदि विषम (प्रथम और तृतीय) पादमें ६-६, सम (द्वितीय तथा चतुर्थ) पादमें ८-८ मात्राएँ हों और उन सभीका प्रत्येक पाद एक रगण, एक लघु तथा एक गुरुसे संयुक्त हो तो वहाँपर वैतालीय छन्द होता है। किंतु इसीके प्रत्येक चरणमें एक-एक गुरु और बढ़ जाय तो उसको औपच्छन्दसिक छन्द माना गया है।
उपर्युक्त वैतालीय छन्दके प्रत्येक चरणके अन्तमें जो रगण, लघु तथा गुरुकी व्यवस्था मानी गयी है, यदि उनके स्थानपर भगण (ऽ।।) एवं दो गुरुओं (ऽऽ)-को रख दिया जाय तो उसे आपातलिका छन्दके नामसे जानना चाहिये। यदि इसी छन्दके प्रत्येक पादमें द्वितीय मात्रा पराश्रित हो तो वह दक्षिणान्तिका छन्द होता है।
वैतालीय विषमपादमें उदीच्य और समपादमें प्राच्य वृत्तिका प्रयोग होता है। जब समपाद (द्वितीय तथा चतुर्थ चरण)-में पञ्चम मात्राके साथ चतुर्थ मात्रा संयुक्त होती है तो उसे प्राच्यवृत्ति एवं पादसंयोगके कारण जब प्रथम और तृतीय चरणमें दूसरी मात्रा तीसरी मात्राके साथ सम्मिलित हो तो उसे उदीच्यवृत्ति नामक वैतालीय छन्द कहते हैं। जब दोनों छन्दोंके लक्षण एक ही छन्दमें प्रयुक्त हों अर्थात् उस छन्दके प्रथम तथा तृतीय चरणमें तृतीय मात्राके साथ द्वितीय मात्रा संयुक्त हो जाय और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणमें पञ्चम मात्राके साथ चतुर्थ मात्रा संयुक्त हो जाय तो वह प्रवृत्तक नामक वैतालीय छन्द हो जाता है। जब वैतालीय छन्दमें प्रथम और तृतीय, द्वितीय तथा चतुर्थ चरण विषम-पादोंके ही अनुसार हों अर्थात् प्रत्येक पाद चौदह लकारों (मात्राओं)-से युक्त हो और उनमें द्वितीय मात्रा तृतीयसे संलग्न होती हो तो उसे चारुहासिनी वैतालीय छन्द कहते हैं।
वक्त्र जातिके छन्दमें पादके प्रथम वर्णके पश्चात् सगण (।।ऽ) और नगण (।।।)-का प्रयोग नहीं करना चाहिये। इनके अतिरिक्त उनमें अन्य किसी भी गणका प्रयोग हो सकता है, किंतु पादके चतुर्थ अक्षरके बाद भगण (ऽ।।) का प्रयोग उचित है।
जिस वक्त्र जातिके छन्दमें सम (द्वितीय एवं चतुर्थ)-पादके चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग हो तो वह पथ्यावक्त्र छन्द है, किंतु कुछ लोग इसके विपरीत प्रथम और तृतीय पादमें चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग करते हैं। जब विषमपादोंमें चतुर्थ वर्णके बाद नगण (।।।) हो और समपादोंमें चतुर्थ वर्णके बाद यगण (।ऽऽ)-का प्रयोग किया जाय तो वह विपुला नामक वक्त्र छन्द है। जब समपादोंमें सातवाँ अक्षर लघु (।) होता है अर्थात् चौथे वर्णके बाद जगण (।ऽ।) हो तो उसको विपुलावक्त्र छन्द कहते हैं। आचार्य सैतवका मत है कि विपुलावक्त्रके सम और विषम सभी पादोंमें लघु (।) होना चाहिये। जब प्रथम और तृतीय पादमें चतुर्थ अक्षरके बाद यगण (।ऽऽ)-को बाधित करके विकल्परूपसे भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।) एवं तगण (ऽऽ।) आदि हों तो वहाँ विपुलावक्त्र छन्द होता है।
जिस छन्दके प्रत्येक पादमें सोलह लकार हों तथा पादके अन्तिम अक्षर गुरु हों, उसे मात्रासमक छन्द कहा गया है। इस छन्दमें नवम लकार किसीसे मिला नहीं रहता। जिस मात्रासमकके