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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
1189

संक्षिप्त

गरुडपुराण

[ सचित्र, मोटा टाइप, केवल हिन्दी ]


गीताप्रेस, गोरखपुर

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1189

॥ श्रीहरिः ॥

संक्षिप्त

गरुडपुराण

( सचित्र, मोटा टाइप, केवल हिन्दी )


त्वमेवमाता च पितात्वमेव
त्वमेवबन्धुश्चसखात्वमेव।
त्वमेवविद्याद्रविणंत्वमेव
त्वमेवसर्वंममदेवदेव॥

गीताप्रेस, गोरखपुर

सं० २०७६ बत्तीसवाँ पुनर्मुद्रण ५,०००
कुल मुद्रण १,५९,०००

❖ मूल्य— ₹ २००
( दो सौ रुपये )

प्रकाशक एवं मुद्रक—
गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
( गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान )
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नम्र निवेदन

अठारह महापुराणोंमें 'गरुडमहापुराण' का अपना एक विशेष महत्त्व है। इसके अधिष्ठातृदेव भगवान् विष्णु हैं, अतः यह वैष्णव पुराण है। इसके माहात्म्यमें कहा गया है—'यथा सुराणां प्रवरो जनार्दनो यथायुधानां प्रवरः सुदर्शनम्। तथा पुराणेषु च गारुडं च मुख्यं तदाहुर्हरितत्त्वदर्शने॥' जैसे देवोंमें जनार्दन श्रेष्ठ हैं और आयुधोंमें सुदर्शनचक्र श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणोंमें यह गरुडपुराण हरिके तत्त्वनिरूपणमें मुख्य कहा गया है। जिस मनुष्यके हाथमें यह गरुडमहापुराण विद्यमान है, उसके हाथमें नीतियोंका कोश है। जो मनुष्य इस पुराणका पाठ करता है अथवा इसको सुनता है, वह भोग और मोक्ष—दोनोंको प्राप्त कर लेता है।

यह पुराण मुख्यरूपसे पूर्वखण्ड (आचारकाण्ड), उत्तरखण्ड (धर्मकाण्ड-प्रेतकल्प) और ब्रह्मकाण्ड—तीन खण्डोंमें विभक्त है। इसके पूर्वखण्ड (आचारकाण्ड)-में सृष्टिकी उत्पत्ति, ध्रुवचरित्र, द्वादश आदित्योंकी कथाएँ, सूर्य, चन्द्रादि ग्रहोंके मन्त्र, उपासनाविधि, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचारकी महिमा, यज्ञ, दान, तप, तीर्थसेवन तथा सत्कर्मानुष्ठानसे अनेक लौकिक और पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें व्याकरण, छन्द, स्वर, ज्योतिष, आयुर्वेद, रत्नसार, नीतिसार आदि विविध उपयोगी विषयोंका यथास्थान समावेश किया गया है। इसके उत्तरखण्डमें धर्मकाण्ड-प्रेतकल्पका विवेचन विशेष महत्त्वपूर्ण है। इसमें मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये विविध दानोंका निरूपण किया गया है। मृत्युके बाद और्ध्वदैहिक संस्कार, पिण्डदान, श्राद्ध, सपिण्डीकरण, कर्मविपाक तथा पापोंके प्रायश्चित्तके विधान आदिका विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें पुरुषार्थचतुष्टय—धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके साधनोंके साथ आत्मज्ञानका सुन्दर प्रतिपादन है।

इस पुराणके स्वाध्यायसे मनुष्यको शास्त्र-मर्यादाके अनुसार जीवनयापनकी शिक्षा मिलती है। इसके अतिरिक्त पुत्र-पौत्रादि पारिवारिक जनोंकी पारमार्थिक आवश्यकता और उनके कर्तव्यबोधका भी इसमें विस्तृत ज्ञान कराया गया है। विभिन्न दृष्टियोंसे यह पुराण जिज्ञासुओंके लिये अत्यधिक उपादेय, ज्ञानवर्धक तथा वास्तविक अभ्युदय और आत्मकल्याणका निदर्शक है। जन-सामान्यमें एक भ्रान्त धारणा है कि गरुडमहापुराण मृत्युके उपरान्त केवल मृतजीवके कल्याणके लिये सुना जाता है, जो सर्वथा गलत है। यह पुराण अन्य पुराणोंकी भाँति नित्य पठन-पाठन और मननका विषय है। इसका स्वाध्याय अनन्त पुण्यकी प्राप्तिके साथ भक्ति-ज्ञानकी वृद्धिमें अनुपम सहायक है।

'कल्याण'-वर्ष ७४ सन् २०००में विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित इस पुराणके विषय-वस्तुकी उपयोगिताको ध्यानमें रखते हुए इसे पुराणरूपमें अपने पाठकोंके समक्ष प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है। आशा है, 'गीताप्रेस' से प्रकाशित अन्य पुराणोंकी भाँति यह 'गरुडमहापुराण' भी श्रद्धालु पाठकोंके लौकिक और पारलौकिक अभ्युदयमें सहायक बनेगा।

— प्रकाशक

॥ श्रीहरिः ॥

विषय-सूची

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
आचारकाण्ड२५- शिवके पवित्रारोपणकी विधि ............................६६
१- भगवान् विष्णुकी महिमा तथा उनके अवतारोंका वर्णन ....................................................११२६- विष्णुके पवित्रारोपणकी विधि ...........................६७
२- गरुडपुराणकी वक्तृ-श्रोतृ-परम्परा, भगवान् विष्णुद्वारा अपने स्वरूपका वर्णन तथा गरुडजीको पुराणसंहिताके प्रणयनका वरदान.......................१३२७- ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण............................६८
३- गरुडपुराणके प्रतिपाद्य विषयोंका निरूपण .................१६२८- विविध शालग्रामशिलाओंके लक्षण ......................७०
४- सृष्टि-वर्णन .....................................................१७२९- वास्तुमण्डल-पूजा-विधि .................................७१
५- मानस-सृष्टि-वर्णन, दक्ष प्रजापतिद्वारा मिथुनधर्मसे सृष्टिका विस्तार .............................................१९३०- प्रासाद-लक्षण ..............................................७४
६- ध्रुववंश तथा दक्ष प्रजापतिकी साठ कन्याओंकी संततियोंका वर्णन ............................................२१३१- देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि ............................७६
७- देवपूजा-विधान, विष्णुपूजोपयोगी वज्रनाभमण्डल, विष्णुदीक्षा तथा लक्ष्मी-पूजा ...........................२४३२- वर्ण एवं आश्रमधर्मोंका निरूपण .........................८२
८- नवव्यूहार्चनविधि, पूजानुक्रम-निरूपण .....................२७३३- संध्योपासन, तर्पण, देवाराधन आदि नित्य कर्मों तथा आशौचका निरूपण...................................८४
९- पूजानुक्रम-निरूपण .............................................२९३४- दानधर्मका निरूपण एवं विभिन्न देवताओंकी उपासना ......................................................८९
१०- विष्णुपञ्जरस्तोत्र .............................................३२३५- प्रायश्चित्त-निरूपण..........................................९१
११- ध्यान-योगका वर्णन ........................................३३३६- नवनिधियोंके लक्षणोंसे युक्त पुरुषके ऐश्वर्य एवं स्वभावका वर्णन..........................................९३
१२- विष्णुसहस्रनाम ..............................................३४३७- भुवनकोशवर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका निरूपण .९४
१३- भगवान् विष्णुका ध्यान एवं सूर्यार्चन-निरूपण ......३९३८- भारतवर्षका वर्णन ...........................................९५
१४- मृत्युञ्जय-मन्त्र-जपकी महिमा...........................४१३९- प्लक्ष तथा पुष्कर आदि द्वीपों एवं पाताल आदिका निरूपण .............................................९६
१५- सर्पोंके विष हरनेके उपाय तथा दुष्ट उपद्रवोंको दूर करनेके मन्त्र (प्राणेश्वरी विद्या) .....................४२४०- भुवनकोश-वर्णनमें सूर्य तथा चन्द्र आदि नौ ग्रहोंके रथोंका विवरण ......................................९७
१६- पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि.....................४५४१- ज्योतिषक्रममें वर्णित नक्षत्र, उनके देवता एवं कतिपय शुभ-अशुभ योगों तथा मुहूर्तोंका वर्णन ....९९
१७- भगवती त्रिपुरा तथा गणेश आदि देवोंकी पूजा-विधि ......................................................४९४२- ग्रहदशा, यात्राशकुन, छींकका फल तथा सूर्यचक्र आदिका निरूपण ................................१०१
१८- सर्पों एवं अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषको दूर करनेका मन्त्र ..................................५०४३- ग्रहोंके शुभ एवं अशुभ स्थान तथा उनके अनुसार शुभाशुभ फलका संक्षिप्त विवेचन..........१०३
१९- श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र तथा श्रीधर-पूजन-विधि .........................................५१४४- लग्न-फल, राशियोंके चर-स्थिर आदि भेद, ग्रहोंका स्वभाव तथा सात वारोंमें किये जाने योग्य प्रशस्त कार्य ...........................................१०४
२०- पञ्चतत्त्वार्चन-विधि .........................................५५४५- सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार स्त्री-पुरुषके शुभाशुभ लक्षण, मस्तक एवं हस्तरेखासे आयुका परिज्ञान ...१०५
२१- सुदर्शनचक्र-पूजा-विधि .....................................५७४६- स्त्रियोंके शुभाशुभ लक्षण .................................१०६
२२- भगवान् हयग्रीवके पूजनकी विधि ..........................५८४७- स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण ......................१०७
२३- गायत्रीन्यास तथा संध्या-विधि ............................६१४८- चक्राङ्कित शालग्रामशिलाओंके विविध नाम, तीर्थमाहात्म्य तथा साठ संवत्सरोंके नाम ............११२
२४- देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि ...........................................६३

[ ५ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
४९- स्वरोदय-विज्ञान११३८०- श्राद्धके अवसर तथा अधिकारी, श्राद्धकी संक्षिप्त विधि, महिमा और फल१७१
५०- रत्नोंके प्रादुर्भावका आख्यान तथा वज्र (हीरे)-की परीक्षा११४८१- विनायकशान्ति-स्नान१७४
५१- मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि११७८२- ग्रहशान्ति-निरूपण१७६
५२-पद्मरागके विविध लक्षण एवं उसकी परीक्षा-विधि१२०८३- वानप्रस्थ-धर्म-निरूपण१७६
५३-मरकतमणिका लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि१२२८४- संन्यास-धर्म-निरूपण१७७
५४-इन्द्रनीलमणिका लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि१२४८५- कर्मविपाक-निरूपण१७८
५५- वैदूर्यमणिकी परीक्षा-विधि१२५८६- प्रायश्चित्त-विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप१७८
५६-पुष्पराजमणिकी परीक्षा -विधि१२६८७- अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण१८३
५७- कर्केतनमणिकी परीक्षा-विधि१२७८८- महर्षि पराशरप्रोक्त वर्ण तथा आश्रम-धर्म एवं प्रायश्चित्त-धर्मका निरूपण१८६
५८- भीष्मकमणिकी परीक्षा-विधि१२७८९- बृहस्पतिप्रोक्त नीतिसार१८९
५९- पुलकमणिके लक्षण तथा उसकी परीक्षा-विधि१२८९०- नीतिसार-निरूपण१९१
६०- रुधिराक्ष रत्न-परीक्षा१२८९१- नीतिसार१९५
६१- स्फटिक-परीक्षा१२९९२- राजनीति-निरूपण१९७
६२- विद्रुममणिकी परीक्षा१२९९३- राजाद्वारा सेवकोंके लिये अपनायी जाने योग्य भृत्यनीतिका निरूपण१९९
६३- गङ्गा आदि विविध तीर्थोंकी महिमा१२९९४- नीतिसार२०१
६४- गया-माहात्म्य तथा गयाक्षेत्रके तीर्थोंमें श्राद्धादि करनेका फल१३१९५- नीतिसार२०६
६५- गयाके तीर्थोंका माहात्म्य तथा गयाशीर्षमें पिण्डदानकी महिमामें विशालकी कथा१३६९६- नीतिसार२१०
६६- गयातीर्थमें पिण्डदानकी महिमा१४०९७- तिथि आदि व्रतोंका वर्णन२१६
६७- गयाके तीर्थोंकी महिमा तथा आदिगदाधरका माहात्म्य१४१९८- अनंगत्रयोदशीव्रत२१७
६८- चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम१४३९९-अखण्डद्वादशीव्रत२१८
६९- प्रजापति रुचि और उनके पितरोंका संवाद१४६१००- अगस्त्यार्घ्यव्रत-निरूपण२१८
७०- रुचिद्वारा की गयी पितृस्तुति तथा श्राद्धमें इस पितृस्तुतिके पाठका माहात्म्य१४८१०१- रम्भातृतीयाव्रत२१९
७१- प्रम्लोचा नामक अप्सराकी दिव्य कन्या मानिनीसे प्रजापति रुचिका विवाह१५३१०२- चातुर्मास्यव्रतका निरूपण२२०
७२- भगवान् विष्णुका अमूर्त ध्यानस्वरूप१५४१०३- मासोपवासव्रतका निरूपण२२१
७३- भगवान् विष्णुका मूर्त ध्यानस्वरूप१५५१०४- भीष्मपञ्चकव्रत२२१
७४- वर्णधर्म-निरूपण१५५१०५- शिवरात्रिव्रतकथा तथा व्रत-विधान२२२
७५- वर्णधर्म-निरूपण१५७१०६- एकादशीमाहात्म्य२२४
७६- गृहस्थधर्म-निरूपण१५९१०७- विष्णुमण्डल-पूजाविधि२२५
७७- वर्णसंकर जातियोंका प्रादुर्भाव, गृहस्थधर्म, वर्णधर्म तथा सैंतीस प्रकारके अनध्याय१६३१०८- भीमा-एकादशीव्रत एवं माहात्म्य तथा पूजन-विधि२२५
७८- द्रव्यशुद्धि१६९१०९- व्रतपरिभाषा तथा व्रतमें पालन करने योग्य नियम और अन्य ज्ञातव्य बातें२२६
७९- दान-धर्मकी महिमा१७०११०- प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमीमें किये जानेवाले विविध तिथिव्रत२२७
१११-षष्ठी तथा सप्तमीके विविध व्रत२३०
११२-दूर्वाष्टमी तथा श्रीकृष्णमाष्टमी-व्रत२३०

[ ६ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
११३- बुधाष्टमीव्रत-कथा ....................................२३२१४७- पदार्थोंके गुण-दोष और औषधि-सेवनमें अनुपानका महत्त्व ....................................३११
११४- अशोकाष्टमी, महानवमी तथा नवमीके अन्य व्रत और ऋष्येकादशीव्रत-माहात्म्य ..............२३३१४८- ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार ..............३१५
११५- श्रवणद्वादशीव्रत ....................................२३५१४९- नाडीव्रण, कुष्ठ आदि रोगोंकी चिकित्सा ..........३१९
११६- तिथिव्रत, वारव्रत एवं नक्षत्रादिव्रत-निरूपण और प्रतिपदादि तिथियोंमें पूजनीय देवता .........२३६१५०- स्त्रियोंके रोगोंकी चिकित्सा, ग्रहदोषके उपाय, ऋतुचर्या तथा पथ्यकारक सर्वौषधियाँ .............३२३
११७- सूर्यवंशवर्णन .......................................२३७१५१- मधुर, अम्ल और तिक्त आदि द्रव्योंका वर्ग तथा उनका औषधीय उपयोग .............................३२६
११८- चन्द्रवंशवर्णन .......................................२३९१५२- ब्राह्मीघृत आदि स्नेहपाकोंकी निर्माण-विधि तथा विविध रोगोंमें उनका उपचार ...................३२८
११९- भविष्यके राजवंशका वर्णन .........................२४४१५३- ज्वर-चिकित्सा ....................................३२९
१२०- भगवान्‌के विभिन्न अवतारोंकी कथा तथा पतिव्रता-माहात्म्यमें ब्राह्मणपत्नी, अनसूया एवं भगवती सीताके पातिव्रतका आख्यान ............२४४१५४- पलितकेश तथा कर्णशूलके उपचार ................३३०
१२१- रामचरितवर्णन (रामायणकी कथा) .............२४६१५५- नेत्र, नाक, मुख, गला, अनिद्रा तथा पादरोग और शस्त्राघातादिजनित रोगोंकी चिकित्सा .......३३१
१२२- हरिवंशवर्णन (श्रीकृष्णकथा) ....................२४९१५६- गर्भ-सम्बन्धी रोग, दन्त तथा कर्णशूल एवं रोमशमन आदिका उपचार ............................३३४
१२३- महाभारतकी कथा एवं बुद्ध आदि अवतारोंकी कथाका वर्णन .........................................२५०१५७- भोज्य पदार्थोंका विहित सेवनकाल, बल-बुद्धिवर्धक औषधियाँ तथा विषदोषशमनके उपाय ..३३६
१२४- निदानका अर्थ तथा रोगोंका सामान्य निदान-निरूपण ......................................२५२१५८- ग्रहणी, अतिसार, अग्निमान्द्य, छर्दि तथा अर्श आदि रोगोंका उपचार ................................३३७
१२५- ज्वर-निदान .......................................२५३१५९- सिध्म, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण तथा गण्डमाला आदि रोगोंकी औषधियाँ ...........................३३९
१२६- रक्त-पित्त-निदान .................................२६११६०- गणपतिमन्त्रका औषधिक योग तथा शोथ, अजीर्ण, विसूचिका और पीनस आदि विविध रोगोंके उपचार .......................................३४०
१२७- कास (खाँसी)-निदान ............................२६२१६१- प्रमेह, मूत्रनिरोध, शर्करा, गण्डमाला, भगंदर तथा अर्श आदि रोगोंका निदान ....................३४१
१२८- श्वासरोग-निदान ..................................२६४१६२- आयुर्वृद्धिकारी औषधिके सेवनकी विधि ..........३४२
१२९- हिक्कारोग-निदान .................................२६५१६३- व्रण आदि रोगोंकी चिकित्सा .......................३४३
१३०- राजयक्ष्मा-निदान .................................२६६१६४- पटल आदि नेत्ररोग, गुल्म, दन्तकृमि, विविध ज्वर तथा विषदोष-शमनके उपाय .......३४४
१३१- अरोचक, वमन आदि रोगोंका निदान ............२६८१६५- गण्डमाला, प्लीहा, विद्रधि, कुष्ठ, दद्रु, सिध्म, पीनस तथा छर्दि आदि विविध रोगोंका उपचार और सुगन्धित द्रव्योंके निर्माणकी विधि ..........३४४
१३२- हृदय-तृषारोगका निदान ..........................२७०१६६- सर्प, बिच्छू तथा अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषकी चिकित्सा ...................................३४६
१३३- मदात्यय-निदान ..................................२७११६७- विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार, स्मरण तथा मेधाशक्तिवर्धक ब्राह्मीघृतादिके निर्माणकी विधि ..३४७
१३४- अर्श (बवासीर)-निदान ..........................२७४१६८- बुद्धि-शुद्धकर औषधि, विविध अभ्यङ्गों एवं उपयोगी चूर्णोंके निर्माणकी विधि, विरेचक
१३५- अतिसार-ग्रहणी-निदान ..........................२७८
१३६- मूत्राघात-निदान .................................२८०
१३७- प्रमेहरोग-निदान .................................२८३
१३८- विद्रधि एवं गुल्म-निदान .........................२८६
१३९- उदररोग-निदान ..................................२९०
१४०- पाण्डु-शोथ-निदान ..............................२९२
१४१- विसर्परोगका निदान ..............................२९३
१४२- कुष्ठरोगका निदान ...............................२९५
१४३- कृमि-निदान ......................................२९९
१४४- वातव्याधि-निदान ................................३००
१४५- वातरक्त-निदान .................................३०३
१४६- वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा ..........................३०७

[ ७ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
द्रव्य तथा औषध-सेवनमें भगवान् विष्णुके स्मरणकी महिमा३५०१९८- नैमित्तिक तथा प्राकृतिक प्रलय और भगवान् विष्णुसे पुनः सृष्टिका प्रादुर्भाव४१०
१६९- व्याधिहर वैष्णव कवच३५०१९९- कर्मविपाकका कथन४११
१७०- सर्वकामप्रदा विद्या३५२२००- अष्टाङ्गयोग एवं एकाक्षर ब्रह्मका स्वरूप तथा प्रणवजपका माहात्म्य४१३
१७१- विष्णुधर्माख्यविद्या३५३२०१- भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा४१५
१७२- विषहरी गारुडी विद्या तथा भगवान् गरुडके विराट् स्वरूपका वर्णन३५४२०२- नामसंकीर्तनकी महिमा४१९
१७३- त्रिपुराभैरवी तथा ज्वालामुखी आदि देवियोंके पूजनकी विधि३५६२०३- विष्णुपूजामें श्रद्धा-भक्तिकी महिमा४२०
१७४- वायुजय-निरूपण३५७२०४- विष्णुभक्तिका माहात्म्य४२१
१७५- उत्तम तथा अधम अश्वोंके लक्षण, अश्वोंके आगन्तुक और त्रिदोषज रोगोंकी चिकित्सा तथा अश्वशान्ति, गजायुर्वेद, गजचिकित्सा और गजशान्ति३५८२०५- नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा४२५
१७६- स्त्रियोंके विविध रोगोंकी चिकित्सा, बालकोंकी रक्षाके उपाय तथा बलवर्धक औषधियाँ३६०२०६- कुलामृतस्तोत्र४२७
१७७- गो एवं अश्व-चिकित्सा३६१२०७- मृत्वष्टकस्तोत्र४२८
१७८- औषधियोंके पर्यायवाची नाम३६१२०८- अच्युतस्तोत्र४२९
१७९- व्याकरण-निरूपण३६६२०९- ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग४३४
१८०- व्याकरणसार३६७२१०- आत्मज्ञाननिरूपण४३७
१८१- छन्द-विधान३६९२११- गीतासार४३९
१८२- छन्द-विधान (आर्या आदि वृत्तोंके लक्षण)३७०२१२- गीतासार४४०
१८३- छन्द-विधान (समवृत्तलक्षण)३७२२१३- ब्रह्मगीतासार४४१
१८४- छन्द-विधान (अर्धसमवृत्त लक्षण)३७८२१४- ब्रह्मगीतासार४४१
१८५- छन्द-विधान (विषमवृत्तलक्षण)३७८२१५- गरुडपुराणका माहात्म्य४४३
१८६- छन्द-विधान (प्रस्तार-निरूपण)३८०धर्मकाण्ड—प्रेतकल्प
१८७- सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण३८०२१६- वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्योंके बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम४४५
१८८- स्नान तथा संक्षेपमें संध्या-तर्पणकी विधि३९०२१७- मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म, मृत्युसे पूर्वकी स्थिति तथा कर्मविपाकका वर्णन४४९
१८९- तर्पण-विधिको वर्णन३९२२१८- नरकोंका स्वरूप, नरकोंमें प्राप्त होनेवाली विविध यातनाएँ तथा नरकमें गिरनेवाले कर्म एवं जीवकी शुभाशुभ गति४५६
१९०- बलिवैश्वदेवनिरूपण३९३२१९- आसन्नमृत्यु-व्यक्तिके निमित्त किये जानेवाले प्रायश्चित्त, दस दान आदि विविध कर्म, मृत्युके बाद किये जानेवाले कर्म, षट्पिण्डदान, दाह-संस्कारसे पूर्व किये जानेवाले कर्म, दाह-संस्कारके बाद अस्थिसंचयनादि कर्म तथा गृहप्रवेशके समयके कर्म, दुर्मृत्युकी गति, नारायणबलिका विधान, पुत्तलदाहविधि तथा पञ्चक-मृत्युके कृत्य४६३
१९१- संध्याविधि३९४२२०- आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि, दशगात्रविधि, प्रथमषोडशी, मध्यमषोडशी तथा
१९२- पार्वणश्राद्धविधि३९४
१९३- नित्यश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध एवं एकोद्दिष्टश्राद्धका वर्णन३९९
१९४- सपिण्डीकरणश्राद्धकी विधि४००
१९५- धर्मसारका कथन४०२
१९६- प्रायश्चित्तनिरूपण, चान्द्रायणादि विभिन्न व्रतोंके लक्षण तथा पञ्चगव्य-विधान४०४
१९७- भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण, पुराणों तथा उपपुराणों और अठारह विद्याओंका परिगणन, चारों युगोंके धर्मोंका कथन एवं कलियुगमें नामसंकीर्तनका माहात्म्य४०७

[ ८ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
उत्तमषोडशीका विधान, नौ श्राद्धोंका स्वरूप, वार्षिक कृत्य, जीवका यममार्गनिदान, मार्गमें पड़नेवाले षोडश नगरोंमें जीवकी यातनाका स्वरूप, यमपुरीमें पापात्माओं और पुण्यात्माओंको घोर तथा सौम्यरूपमें यमराजके दर्शन .............४७३२३४- जीवका यमपुरीमें प्रवेश, वहाँ शुभाशुभ कर्मोंका फलभोग, कर्मानुसार अन्य देहकी प्राप्ति, मनुष्य-जन्म पाकर धर्माचरण ही मुख्य कर्तव्य५२४
२२१- वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा, देवर्षि नारदके पूर्वजन्मके इतिहासवर्णनमें सत्संगति और भगवद्भक्तिका माहात्म्य, वृषोत्सर्गके प्रभावसे राजा वीरवाहनको पुण्यलोककी प्राप्ति ..........४८३२३५- प्रेतबाधाका स्वरूप तथा मुक्तिके उपाय ...........५२५
२३६- प्रेतबाधाजन्य दीखनेवाले स्वप्न, उनके निराकरणके उपाय तथा नारायणवलिका विधान ................................................५२८
२२२- संतसक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथा, सत्संगति तथा भगवत्कृपासे पाँच प्रेतों तथा ब्राह्मणका उद्धार ..४९०२३७- प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म, पञ्चप्रेतोपाख्यान तथा प्रेतत्वप्राप्ति न करानेवाले श्रेष्ठ कर्म ..........५२९
२२३- और्ध्वदेहिक क्रियाके अधिकारी तथा जीवित-श्राद्धकी संक्षिप्त विधि .................४९५२३८- प्रेतबाधाजन्य विविध स्वप्न तथा उसका प्रायश्चित्तविधान ...................................५३३
२२४- राजा बभ्रुवाहनकी कथा, राजाद्वारा प्रेतके निमित्त की गयी और्ध्वदेहिक क्रिया एवं वृषोत्सर्गसे प्रेतका उद्धार ......................................४९७२३९- अल्पमृत्युके कारण तथा बालकोंकी अन्त्येष्टि-क्रियाका निरूपण .................................५३४
२४०- बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका स्वरूप, सत्पुत्रकी महिमा तथा औरस और क्षेत्रज आदि पुत्रोंद्वारा अन्त्येष्टि करनेका फल ............................५३७
२२५- श्राद्धान्नका पितरोंके पास पहुँचना, दृष्टान्तरूपमें देवी सीताद्वारा भोजन करते हुए ब्राह्मणके शरीरमें महाराज दशरथ आदिका दर्शन करना, मृत्युके अनन्तर दूसरे शरीरकी प्राप्ति, सत्कर्मकी महिमा तथा पिण्डदानसे शरीरका निर्माण ................५०१२४१- सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व, प्रतिवर्ष विहित मासिक श्राद्ध आदिकी अनिवार्यता, पति-पत्नीके सह-मरण आदिकी विशेष परिस्थितिमें पाक एवं पिण्डदान आदिकी विभिन्न व्यवस्थाका निरूपण तथा बभ्रुवाहनकी कथा ...................५४०
२२६- जीवकी ऊर्ध्वगति एवं अधोगतिका वर्णन ........५०६२४२- प्रेतत्वमुक्तिके उपाय ................................५४७
२२७- चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्यजन्मकी श्रेष्ठता, मनुष्यमात्रका एकमात्र कर्तव्य—धर्माचरण ........५०७२४३- दानधर्मकी महिमा, आतुरकालके दानका वैशिष्ट्य, वैतरणी-गोदानकी महिमा .............५४७
२२८- वृषोत्सर्ग तथा सत्कर्मकी महिमा ..................५०९२४४- और्ध्वदेहिक क्रियामें विहित पद आदि विविध दानोंका फल तथा जीवको प्राप्त-देहके स्वरूपका वर्णन .............................५५०
२२९- और्ध्वदेहिक क्रिया, गोदान एवं वृषोत्सर्गका माहात्म्य .............................................५१०२४५- शुक्र-शोणितके संयोगसे जीवका प्रादुर्भाव, गर्भमें जीवका स्वरूप तथा उसकी वृद्धिका क्रम, शरीरके निर्माणमें पञ्चतत्त्वादिका अवदान, षाट्कौशिक शरीर, गर्भसे जीवके बाहर निकलनेपर विष्णुमायाद्वारा मोहित होना, आतुर व्यक्तिके लिये क्रियमाण कर्म तथा उनका फल, पिण्ड और ब्रह्माण्डकी समान स्थिति ....................५५२
२३०- मरनेके समय तथा मृत्युके अनन्तर किये जानेवाले कर्म, पापात्माओंको रौद्ररूपमें तथा पुण्यात्माओंको सौम्यरूपमें यम-दर्शन, यमदूतोंद्वारा दी जानेवाली यातनाका स्वरूप, शवके निमित्त प्रदत्त छः पिण्डोंका प्रयोजन, शवदाहकी विधि, संक्षेपमें दशाहासे त्रयोदशाहतकके कृत्य, यममार्गमें पड़नेवाले सोलह पुर तथा प्रेतका विलाप ........५१३२४६- यमलोक, यममार्ग, यमराजके भवन तथा चित्रगुप्तके भवनका वर्णन, यमदूतोंद्वारा पापियोंको पीड़ित करना ..........................५५८
२३१- यममार्गके सोलह पुरोंका वर्णन ..................५१८२४७- इष्टापूर्तकर्मकी महिमा तथा और्ध्वदेहिक कृत्य, दस पिण्डदानसे आतिवाहिक शरीरके निर्माणकी प्रक्रिया, एकादशाहदि श्राद्धका विधान, शय्यादानकी
२३२- समस्त शुभाशुभ कर्मोंके साक्षी ब्रह्माके पुत्र श्रवणदेवोंका स्वरूप ..............................५२१
२३३- विविध दानादि कर्मोंका फल प्रेतको प्राप्त होना, पददानका माहात्म्य, जीवको अवान्तर-देहकी प्राप्तिका क्रम ...............................५२२

[ ९ ]

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
महिमा एवं सपिण्डीकरण-श्राद्धका स्वरूप ......५६०२६१- दुःखी गर्भस्थ जीवका विविध प्रकारका चिन्तन करना, यमयातनाग्रस्त जीवका सदा सुकृत करनेका उपदेश देना ....................................५९१
२४८- सपिण्डीकरण-श्राद्धमें प्रेतपिण्डके मेलनका विधान, पितरोंकी प्रसन्नताका फल, पञ्चक-मरण तथा शान्तिविधान, पुत्तलिकादाह, प्रेत-श्राद्धमें त्याज्य अठारह पदार्थ, मलिनषोडशी, मध्यमषोडशी तथा उत्तमषोडशी श्राद्ध, शवयात्रा-विधान ................................................५६८२६२- भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश, मनुष्ययोनि-प्राप्तिकी दुर्लभताका वर्णन, मनुष्य-शरीर प्राप्तकर आत्मकल्याणके लिये सचेष्ट रहना, संसारकी दुःखरूपता तथा अनित्यता और ईश्वरकी नित्यताका वर्णन, कालके द्वारा सभीके विनाशका प्रतिपादन, सत्संग और विवेकज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति, तत्त्वज्ञानरूपी मोक्षप्राप्तिके उपाय, गरुडपुराणकी वक्तृ-श्रोतृपरम्परा तथा गरुडपुराणका माहात्म्य .................................५९४
२४९- तीर्थमरण एवं अनशनव्रतका माहात्म्य, आतुरावस्थाके दानका फल, धनकी एकमात्र गति दान तथा दानकी महिमा ......................५७१<div align="center">ब्रह्मकाण्ड</div><br>२६३- भगवान् श्रीहरिकी महिमा तथा उनके सर्वेश्वरत्वका प्रतिपादन, श्रीहरिको श्रीमद्भागवत, विष्णु तथा गरुड—ये तीन पुराण विशेष प्रिय हैं, इनका निरूपण तथा गरुडपुराणका माहात्म्य ...........................<br><br><br>६०३
२५०- और्ध्वदेहिक कर्ममें उदकुम्भदानका माहात्म्य ....५७३२६४- गरुडजीको श्रीकृष्णद्वारा भगवान् विष्णुकी महिमा बताना तथा प्रलयकालके अन्तमें योगनिद्रामें शयन कर रहे उन भगवान् विष्णुको सृष्टि-हेतु अनेक प्रकारकी स्तुति करते हुए जगाना ..........६०४
२५१- तीर्थमरणकी महिमा, अन्त समयमें भगवन्नामकी महिमा, शालग्रामशिला तथा तुलसीकी संनिधिमें मरणका फल, मुक्तिदायक तथा स्वर्गदायक प्रशस्त कर्म, इष्टापूर्तकर्म तथा अनाथ प्रेतके संस्कारका माहात्म्य ....................................५७४२६५- नारायणसे सृष्टिका प्रादुर्भाव तथा तत्त्वाभिमानी देवोंका प्राकट्य ...........................................६०६
२५२- आशौचकी व्यवस्था ......................................५७६२६६- देवताओंद्वारा नारायणकी स्तुति.......................६०८
२५३- दुर्मृत्यु होनेपर सद्गतिलाभके लिये नारायण-बलिका विधान ...........................................५७८२६७- नारायणसे प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका विस्तार ....६१३
२५४- वृषोत्सर्गकी संक्षिप्त विधि ...............................५८०२६८- नारायणकी पूर्णताका वर्णन तथा पदार्थोंके सारासारका निर्णय .........................................६१५
२५५- भूमि तथा गोचर्म भूमि आदि दानोंका माहात्म्य और ब्रह्मस्वहरणका दोष ...................................५८१२६९- परमात्मा हरि तथा देवी महालक्ष्मीके विभिन्न अवतारोंका वर्णन ...........................................६१६
२५६- शुद्धि-विधान ..............................................५८२२७०- भगवान् शेष तथा भगवान् रुद्रके विविध अवतार६१७
२५७- दुर्मृत्यु तथा अकालमृत्युपर किये जानेवाले श्राद्धादि कर्म और सर्पदंशसे मृत्युपर विहित क्रिया-विधान ................................................५८२२७१- श्रीकृष्णपत्नी देवी नीला (नाग्नजिती)-की कथा ...६१७
२५८- पार्वण आदि श्राद्धोंके अधिकारी, एकसे अधिककी मृत्युपर पिण्डदान आदिकी व्यवस्था; मृत्युतिथि-मासके अज्ञात होनेपर तथा प्रवासकालमें मृत्यु होनेपर श्राद्ध आदिकी व्यवस्था; नित्य एवं दैव तथा वृद्धि आदि श्राद्धोंकी कर्तव्यताका प्रतिपादन .५८४२७२- भद्रा तथा मित्रविन्दाद्वारा श्रीकृष्णकी भार्या बननेकी कथा .................................................६१९
२५९- सत्कर्मकी महिमा तथा कर्मविपाकका फल ...५८६२७३- सूर्यपुत्री कालिन्दीकी कथा ..............................६२१
२६०- यममार्गमें स्थित वैतरणी नदीका वर्णन, पाप-कर्मोंसे घोर वैतरणीमें निवास, वैतरणीसे पार होनेके लिये वैतरणी-धेनुदान, भगवान् विष्णु, गङ्गा तथा ब्राह्मणकी महिमा ...........................५८८२७४- लक्ष्मणाद्वारा भगवान् श्रीकृष्णको प्राप्त करनेकी कथा<br>२७५- सोमपुत्री जाम्बवतीकी कथा ............................६२२<br>६२२

[ १० ]

चित्र-सूची (इकरंगे)

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१- नैमिषारण्यमें सूतजीके द्वारा मुनियोंके प्रश्नोंका समाधान१११९- 'असिपत्रवन' नरकमें पापका फल४५८
२- श्रीविष्णुके द्वारा गरुडको वरदान देना१६२०- 'तप्तकुम्भ' नरकमें पापका फल४५९
३- प्रजापति रुचि और पितरोंका संवाद१४७२१- 'सन्दंश, तप्तसूर्मि, वैतरणी, अन्धकूप, प्राणरोध और वज्रकण्टक-शाल्मली' नरकमें पापका फल४६०
४- ब्रह्माजीद्वारा रुचिको वरदान देना१४८२२- पुण्यगति प्राप्त प्राणीका स्वर्गगमन४६२
५- रुचिद्वारा दिव्य तेजोरशिका स्तवन१५२२३- यमदूतोंके द्वारा कठोर यातना४७८
६- तेजोरशिका पितृगणके रूपमें प्रकट होना१५३२४- यमलोकमें पहुँचा हुआ जीव४८२
७- प्रम्लोचाकी दिव्य कन्या मानिनीसे प्रजापति रुचिका विवाह१५४२५- ब्राह्मण और प्रेतगणका संवाद४९२
८- माण्डव्य ऋषिद्वारा कौशिकको शाप देना२४६२६- श्रीरामजीके द्वारा निमन्त्रित ऋषियोंको भोजन कराना५०३
९- गरुडपुराणका माहात्म्य बताना४४४२७- गोदानका माहात्म्य५१०
१०- क्षीरसागरमें श्रीविष्णु और देवगण४४५२८- दीपदानका माहात्म्य५२२
११- श्रीविष्णुद्वारा गरुडके प्रश्नोंका श्रवण४४७२९- जीवका यमपुरीमें प्रवेश५२४
१२- मृत्युके समय यमदूतका प्राकट्य४५२३०- ब्राह्मण संतसकके ऊपर पुष्प-वर्षा एवं देव विमानका आगमन५३३
१३- किये गये अशुभ कर्मोंका फल४५४३१- उदकुम्भदानका माहात्म्य५७३
१४- 'रौरव' नरकमें पापका फल४५६३२- योगनिद्रामें श्रीविष्णुकी स्तुति६०५
१५- 'महारौरव' नरकमें पापका फल४५६३३- श्रीकृष्णद्वारा कालिन्दीका पाणिग्रहण६२१
१६- 'अतिशीत' नरकमें पापका फल४५७३४- जाम्बवान्‌के द्वारा अपनी पुत्रीका समर्पण६२४
१७- 'निकृन्तन' नरकमें पापका फल४५७
१८- 'अप्रतिष्ठ' नरकमें पापका फल४५८