गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१३८- विद्रधि एवं गुल्म-निदान
| २७८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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अतिसार-ग्रहणी-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं आपको अतिसार तथा संग्रहणी<sup>१</sup>-रोगके निदानकी बात बताता हूँ।
वात-पित्त-कफ और सन्निपात दोषके कुपित होनेसे ही इन रोगोंकी उत्पत्ति होती है। भय तथा शोकके कारण भी ये प्राणियोंके शरीरमें उत्पन्न हो सकते हैं। अतः वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, भयज तथा शोकजके रूपमें इनके छः भेद हो जाते हैं।
अतिसाररोग अधिक जल पीनेसे होता है। इसके अतिरिक्त सूखे अंकुरित एवं कच्चे अन्न, तेल पदार्थ, वसा (चर्बी) और तिलकुटको अधिक खानेसे भी यह उत्पन्न हो जाता है। मद्यपान, रूक्षाहार, अधिकतम मात्रामें रस और तेलका सेवन तथा उदरजन्य कृमियोंके प्रकोपसे एवं वेगरोधसे शरीरकी वायु प्रकुपित हो उठती है। तदनन्तर वह अपानवायुके रूपमें शरीरके अधोभागमें जाकर उस दोषका विस्तार कर जठराग्नि-शक्तिको ह्रासोन्मुखी बना देता है। उस अग्निकी मन्दताके कारण शरीरमें गया हुआ अन्न-पिण्ड और पहलेसे स्थित पुरीष (मल) भस्म अथवा सूखनेकी अपेक्षा द्रवतादिके दोषमें बदलकर अतिसाररोगके लक्षणको प्रकट करता है। उस रोगसे प्रभावित होनेवाले रोगीके हृदय, गुह्यभाग तथा आमाशयादिमें पीड़ा होती है, शरीरमें अवसाद होता है एवं पुरीषका निरोध और अपच होता है। शरीर पसीनेसे युक्त हो जाता है और कष्टकी उत्पत्ति होती है। वातदोषके कारण शरीर शिथिल पड़ जाता है, पाचनशक्ति सुचारुरूपसे कार्य नहीं करती है तथा शरीरमें विशेष प्रकारका ज्वर रहता है। उस दोषके कारण उदरमें कुछ गुड़गुड़ाहट भी बनी रहती है। गुह्य भागसे बार-बार सूखा हुआ फेनसे युक्त स्वच्छ ग्रथित, जलाइन्ध और पिच्छिल (कचड़ाहीन) मल कष्टके साथ होता है। इस रोगमें मलद्वार शुष्क एवं विकृत होकर बाहर निकल जाता है, मल निकलनेमें कष्ट होता है। उस कष्टके कारण रोगी लम्बी-लम्बी श्वासें छोड़ता हुआ काँखता रहता है।
पित्त<sup>२</sup>-दोषसे रोगीको पीत-कृष्ण-हल्दी तथा नवांकुर तृण वर्ण रक्तके सहित अत्यन्त दुर्गन्धपूर्ण दस्त होता है। उसको तृष्णा, मूर्च्छा, स्वेद और दाहका प्रकोप भी होता है। कफजनित अतिसाररोगके होनेपर गुह्यभागमें दाहपाक शूल उठता है और संतापजनित कष्ट होता है। इस रोगमें मल द्रव्युक्त न होकर कठोर, भारी एवं घनीभूत रूपमें गुदाभागसे बाहर निकलता है, वह पिच्छिल (कचड़ाहीन) रहता है। उसीके अनुसार वह बहुत ही कम या अधिक मात्रामें उदरके अंदर विद्यमान मलस्रोतमें पाया जाता है। मल-निस्सारणके समय कष्टके कारण रोगीको रोमाञ्च, हर्ष मिचली और क्लेशकी अनुभूति होती है। शरीरके अंदर भारीपन रहता है और इसीके कारण वस्ति-प्रदेश, गुदाभाग और उदरमें भी भारीपन बना रहता है। ऐसे रोगीको दस्त होनेके उपरान्त भी दस्तकी अनुभूति बनी रहती है। जब वह वात-पित्त तथा कफजन्य सभी दोषपूर्ण लक्षणोंसे युक्त हो जाता है अर्थात् रोगीके शरीरमें सन्निपातजन्य अतिसारका प्रकोप जन्म ग्रहण कर लेता है तो रोगी उस समय उक्त समस्त वातादिक त्रिदोषोंके लक्षणसे समन्वित बन जाता है। भयवश चित्तके विक्षुब्ध होनेपर स्थान-विशेषमें पड़े हुए रोगीके उदरभागका मल द्रवीभूत हो
१-च०चि०अ० १९, अ०हृ०नि०अ० ८, सु०उ०तं, अ० ४०। २-सु०उ०अ० ४, अ०हृ०नि०अ० ८।
काण्ड ] अतिसार-ग्रहणी-निदान २७१
उठता है। तदनन्तर उस द्रवपूर्ण मलको यथाशीघ्र वायु गुह्यमार्गसे बाहर निकाल देता है अर्थात् भयवशात् रोगीमें मलोत्सर्गकी इच्छा बलवती हो उठती है और अन्ततोगत्वा उसे पानीके समान मल होता है। वात तथा पित्तदोषसे होनेवाले अतिसाररोगके एक समान ही लक्षण बताये गये हैं, वैसे ही लक्षण शोकज अतिसारमें भी उत्पन्न होते हैं।
संक्षिप्ततः अतिसाररोगके दो प्रकार हैं। उनमें प्रथम साम है और द्वितीय निराम है। साम अतिसाररोगमें मल आँवके सहित होता है, किंतु निराम अतिसारमें आँव दोषरहित मल निकलता है, उनमें एक सरक्त होता है और दूसरा बिना रक्तका होता है। साम अतिसारमें मल बड़ा दुर्गन्धित होता है और जलमें डालनेसे डूब जाता है। रोगीके पेटमें गुड़गुड़ाहट, विष्टम्भ वेदना और मुखप्रसेक होता है। निरामके लक्षण सामसे विपरीत होते हैं, कफजन्य होनेके कारण पक्व होनेपर भी मल जलमें नहीं डूबता है। जो अतिसारमें सावधानी नहीं करता, उसे ग्रहणीरोग हो जाता है।
अग्निमान्द्यताको बढ़ानेवाले अत्यधिक मात्रामें किये गये दोषपूर्ण आहार-विहारके सेवनसे अतिसाररोगका प्रादुर्भाव होता है। जब रोगीके शरीरसे साम या निराम मल अत्यधिक निकलता है तो उसे अतिसार कहते हैं। मलोत्सर्ग अधिक होनेके कारण इसकी अतिसार संज्ञा है। यह स्वाभाविक आशुकारी है। यही अतिसार जीर्ण होनेपर संग्रहणीरोग बन जाता है। ग्रहणीरोगमें भुक्त अन्नके अजीर्ण होनेपर कभी आमसहित और कभी सान्न मल निकलता है। अन्नके जीर्ण होनेपर कभी पक्व मल निकलता है, कभी कुछ नहीं निकलता और कभी बार-बार बँधा या ढीला दस्त होता है। यह रोग चिरकारी होता है, इसलिये इसे संग्रहणी कहते हैं। संग्रहणी चिरकारी तथा अतिसार आशुकारी होता है।
इस रोगमें एकाएक मलकी प्रवृत्तिका बारम्बार संघात होता है अथवा वह एकाएक रुक-रुककर बाहर निकलता है। ऐसा यह संग्रहणीरोग वात-पित्त तथा कफजन्य दोषसे तो तीन प्रकारका है ही, किंतु सन्निपातिक दोषके कारण भी उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह चार प्रकारका हो जाता है। रोगीके शरीरमें शिथिलता, अग्निमान्द्य, खट्टी डकार, मुखसे लालास्राव, धूमनिर्गमवत् प्रतीति, तमक, ज्वर, मूर्च्छा, अरुचि, तृष्णा, थकान, भ्रम, अपच, वमन, कानमें भनभनाहट और अन्त्रकूजन—ये ग्रहणीके पूर्वरूप हैं। वातज ग्रहणीरोगमें तालुशोष, तिमिररोग, दोनों कानोंमें शब्द, पसली, ऊरु, वंक्षण और ग्रीवामें दर्द, बार-बार विसूचिका, सब कुछ भोजनकी इच्छा, क्षुधा, तृषा, कैंचीसे कतरनेकी पीड़ा, अफरा, कुछ भोजन करनेसे स्वस्थता, फेनसहित मल—ये सब लक्षण उपस्थित होते हैं। रोगी वातज, हृद्रोग, गुल्म, अर्श, प्लीहा और पाण्डुरोगकी शंका करने लगता है। देरमें कष्टके साथ पतला या गाढ़ा थोड़ा कच्चा एवं फेनयुक्त बार-बार मल आता है। गुदामें दर्द और श्वास-खाँसी भी उठने लगती है।
पित्तज संग्रहणीरोगमें रोगी पीला पड़ जाता है। उसे पीला, नीला और पतला दस्त होता है। वह दुर्गन्धित खट्टी डकार, हृदय और कण्ठमें दाह, अरुचि और तृषासे पीड़ित रहता है।
पित्तज ग्रहणीके होनेपर रोगीका मल द्रवरूप हो जाता है और कफजन्य ग्रहणीरोग होनेपर रोगीको अन्न कठिनतासे पचता है। उसको
१-च०चि०अ० १५, अ०हृ०नि०अ० ८।
२-च०चि०अ० १५, १९, सु०उ०तं० अ० ४०।
| २८० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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छरछराहटभरा वमन होता है। उसे भोजनमें अरुचि होने लगती है। उसके मुखमें दाह होता है। उसको कफयुक्त खाँसी आती है। उसके हृदयसे उबकाई छूटती है और जुकाम हो जाता है। उसका हृदय पीड़ित और उदर भारी-सा प्रतीत होता है। उसपर आलस्य छा जाता है। उसे मीठी-मीठी डकार और शरीरमें शिथिलता आने लगती है। रोगीको समान या कुछ कम-अधिक मात्रामें कफसे युक्त मल होता है, जो भारी तथा अम्लताके दोषसे संश्लिष्ट रहता है। उस रूपमें प्रायः मैथुन अशक्ति एवं रोगीकी शक्तिका अधिक ह्रास होता है। इस रोगमें बलवान् व्यक्ति भी दुर्बल हो जाता है और उसमें रोगके सभी लक्षण दिखायी देने लगते हैं। | शरीरप्रकरणके अङ्ग-विभाग नामक तीसरे अध्यायमें जो विषम, तीक्ष्ण एवं मन्द नामक तीन पित्ताग्नियाँ कही गयी हैं, वे भी ग्रहणी-दोष ही हैं। केवल समाग्नि उत्तम स्वास्थ्यकी हेतु है। इस रोगमें भी प्राणीको प्यास लगती है, अधिक मल निकलनेके कारण भूख सताती है, हर क्षण शिथिल होते हुए शरीरके कारण उसके मनमें विकृत चिन्ताएँ भी बढ़ जाती हैं। समस्त रोगोंका यही—मल ही कारण है। इसी मलके शरीरमें रहनेपर प्राणीमें वातव्याधि (बाई), अश्मरी (पथरी), कुष्ठ (कोढ़), मेह, जलोदर, भगंदर, बवासीर और ग्रहणीरोग होता है—ये आठों रोग महारोग माने गये हैं, इनका निदान अत्यन्त कठिन है और ये कष्टसाध्य हैं। | (अध्याय १५७)
मूत्राघात-निदान
धन्वन्तरिजीने कहा— हे सुश्रुत ! अब इसके बाद आप मूत्राघातका निदान सुनें।
वस्ति* (पेड़ू अर्थात् नाभि-प्रदेशसे नीचे और मूत्र-प्रवाहिकाके ऊपरका भाग), वस्तिशिर (मूत्र-प्रवाही नली), मेढ़्र (जननेन्द्रिय अर्थात् लिंग), कटी (कूल्हेके भागके गड्ढे), वृषण और पायु (गुदा) नामक शरीरके ये छः अङ्ग विशेष हैं, जो परस्पर एक-दूसरेसे सम्बद्ध और एक ही जगह ग्रथित हैं। इन सभीका आश्रय गुदाभागमें रहनेवाले अस्थि-विशेषके छिद्रसे सम्बद्ध रहता है। पेड़ू (वस्ति) अधोमुखी है। इसमें चारों ओरसे सूक्ष्म शिराओंके मुखभागसे होकर रिसाव होता रहता है, इससे वस्ति मूत्रसे भरी रहती है। इन्हीं शिराओंसे वात-पित्तादि दोष भी वस्तिमें प्रविष्ट हो जाते हैं, जिससे मूत्राशयमें बीस प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं। मर्माश्रित होनेके कारण ये प्रमेहादि रोग अत्यन्त कष्ट-साध्य हैं, अर्थात् इन रोगोंके होनेसे रोगीको मर्माहत करनेवाली पीड़ा होती है। रोगीके पेड़ू, वंक्षण और लिंगभागमें भी कष्ट होता है। उस कष्टसे गुप्ताङ्गोंके द्वारा होता हुआ मूत्र अल्पमात्रामें बार-बार निकलता है। वातजरोगमें प्राणीको मूत्र कष्टके साथ होता है। पित्तज मूत्राघात होनेपर मूत्र पीला, लाल तथा दाहसे युक्त हो जाता है और उसके मूत्राशयमें रुके रहनेपर अत्यन्त पीड़ा होती है। जब यह रोग कफज होता है तो उसके पेड़ू और लिंगमें भारीपन तथा शोथ आ जाता है। मूत्र पिच्छल और रुक-रुककर होता है। रोगीपर सर्वदोषजन्य मूत्राघात होनेसे सभी लक्षण पाये जाते हैं। जब वायु वस्तिके मुखको आच्छादित कर कफ, मूत्र और वीर्यको शुष्क कर देता है, उस
* सु० नि० अ० ३, मा० नि० पृ० ५०५, सु० उ० त० ५८।
काण्ड ] मूत्राघात-निदान २८१
समय रोगीके शरीरमें अश्मरी (पथरी) नामक रोग उत्पन्न हो जाता है। यह रोग बड़ा भयंकर होता है। जैसे गायका पित्त सूखकर गोरोचन बन जाता है, वैसे ही यह अश्मरी होती है। प्रायः सभी प्रकारकी पथरियाँ कफाश्रित ही होती हैं। इस रोगका पूर्वरक्षण इस प्रकार है—
इस रोगके होनेमें वस्तिभागमें अवरोध होता है अथवा उसके सन्निकट अन्य किसी भागमें भी हो सकता है। जिस भागमें होता है उस भागके चारों ओर अवयवोंमें अत्यधिक पीड़ा होती है। वस्तिभागमें मूत्रका अवरोध तथा उसकी कृच्छ्रता बनी रहती है। रोगीके मूत्रमें अजामूत्रके समान गन्ध, ज्वर और अरुचि होती है। इस रोगका सामान्य लक्षण तो यह है कि रोगीके नाभि-लिंगमणि और वस्तिके शिरोभागमें कष्ट रहता है। अश्मरीद्वारा मार्गावरोधके कारण वहाँ उस समय पर्याप्त भागमें मूत्र फैल जाता है। वह रुक-रुककर बाहर निकलता है। मूत्र निकलनेपर रोगीको सुखानुभूति होती है। उस मूत्रका वर्ण गोमेद या गोमूत्रके समान झलकता रहता है।
मूत्र-निर्गमनमें ऐसा प्रकोप हो जानेपर रक्त, मांस तथा धातु-प्रवाहके मार्गमें कष्ट होता है। वातजरोगसे व्यथित रोगी अपने दाँतोंको किटकिटाता हुआ काँपता है। मूत्रसे भरे हुए नाभिसे नीचे स्थित वस्तिभागको पकड़कर दबाता हुआ वह कराह उठता है। अपानवायुके सहित मल-पिण्ड उसके गुह्यभागसे निकलता है और बूँद-बूँद करके मूत्र टपका करता है। वातज दोषके कारण शरीरमें उत्पन्न हुई अश्मरीरोगका वर्ण श्याम है। उसमें रूक्षता रहती है। देखनेमें वह काँटोंसे बिंधी हुई-सी प्रतीत होती है।
पित्तज दोषके कारण उत्पन्न इस अश्मरीरोगमें वस्तिभाग जलने लगता है। उसमें ऐसा प्रतीत होता है, जैसे अंदर-ही-अंदर कुछ पक रहा हो। इस पित्त-दोषजन्य अश्मरीका स्वरूप भल्लातक (भिलावेके बीज)-के समान होता है। इसका वर्ण लाल, पीला अथवा काला होता है।
कफजन्य अश्मरी होनेसे वस्तिभागमें पीड़ा होती है। उस स्थानमें भारीपन तथा शीतलताका अनुभव होता है। इस रोगमें उत्पन्न हुई अश्मरी आकारमें बड़ी, चिकनी, मधु (शहद) अथवा श्वेतवर्णा होती है। ये तीनों अश्मरी प्रायः बालकोंमें हुआ करती हैं। आश्रय, मृदुता और उपचयकी अल्पताके कारण बालकोंकी अश्मरी ग्रहण करके सुखपूर्वक निकाली जा सकती है।
शुक्रके वेगको रोकनेसे प्राणीके शरीरमें शुक्राश्मरी नामक भयंकर रोगकी उत्पत्ति होती है। जब धातु-प्रवाहिका नाड़ीसे गिरा हुआ अथवा कुपित वीर्य दोनों अण्डकोशोंके बीच रुक जाता है और लिंग-मार्गसे वह बाहर नहीं निकलता, तब वहाँ स्थित विकृत वायु विक्षुब्ध होकर उसको सुखा देता है, उसी दोषसे इस शुक्राश्मरीका जन्म होता है। इस रोगमें भी वस्तिभागमें पीड़ा होती है। रोगीको मूत्र³ निर्गत करनेमें कष्ट होता है। इसका भी वर्ण श्वेत माना गया है। इसके कारण मूत्रावरोध होनेसे तत्सम्बन्धी स्थानोंमें सूजन आ जाती है। अण्डकोष और उपस्थेन्द्रियके बीचमें हाथसे दबाया जाय तो वह विलीन हो जाती है। इस रोगके हो जानेपर रोगीको पीड़ा होती है, उसके दुष्प्रभावसे ज्वर हो जाता है, रोगीको खाँसी आने लगती है। इसी अश्मरीरोगके कारण रोगीके शरीरमें शर्करारोगका विकार भी उत्पन्न हो जाता है। यदि इसकी
१-वा०नि० ९, अ०हृ०नि०अ० ९। २-सु०नि०अ० ३, अ०हृ०नि०अ० ९।