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सर्वकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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काण्ड ] छन्द-विधान ( आर्या आदि वृत्तोंके लक्षण ) ३७१

यदि आर्यामें उत्तरार्द्धकी भाँति पूर्वार्द्ध भी हो तो उसको उपगीति आर्या कहा जाता है। आर्यामें जब यही क्रम विपरीत हो जाता है तो वह गीति न होकर उद्गीति छन्द बन जाता है। यदि गीति-जातिवाले छन्दका अन्तिम वर्ण गुरु हो तो वही आर्या गीति नामक छन्द हो जाता है।

यदि विषम (प्रथम और तृतीय) पादमें ६-६, सम (द्वितीय तथा चतुर्थ) पादमें ८-८ मात्राएँ हों और उन सभीका प्रत्येक पाद एक रगण, एक लघु तथा एक गुरुसे संयुक्त हो तो वहाँपर वैतालीय छन्द होता है। किंतु इसीके प्रत्येक चरणमें एक-एक गुरु और बढ़ जाय तो उसको औपच्छन्दसिक छन्द माना गया है।

उपर्युक्त वैतालीय छन्दके प्रत्येक चरणके अन्तमें जो रगण, लघु तथा गुरुकी व्यवस्था मानी गयी है, यदि उनके स्थानपर भगण (ऽ।।) एवं दो गुरुओं (ऽऽ)-को रख दिया जाय तो उसे आपातलिका छन्दके नामसे जानना चाहिये। यदि इसी छन्दके प्रत्येक पादमें द्वितीय मात्रा पराश्रित हो तो वह दक्षिणान्तिका छन्द होता है।

वैतालीय विषमपादमें उदीच्य और समपादमें प्राच्य वृत्तिका प्रयोग होता है। जब समपाद (द्वितीय तथा चतुर्थ चरण)-में पञ्चम मात्राके साथ चतुर्थ मात्रा संयुक्त होती है तो उसे प्राच्यवृत्ति एवं पादसंयोगके कारण जब प्रथम और तृतीय चरणमें दूसरी मात्रा तीसरी मात्राके साथ सम्मिलित हो तो उसे उदीच्यवृत्ति नामक वैतालीय छन्द कहते हैं। जब दोनों छन्दोंके लक्षण एक ही छन्दमें प्रयुक्त हों अर्थात् उस छन्दके प्रथम तथा तृतीय चरणमें तृतीय मात्राके साथ द्वितीय मात्रा संयुक्त हो जाय और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणमें पञ्चम मात्राके साथ चतुर्थ मात्रा संयुक्त हो जाय तो वह प्रवृत्तक नामक वैतालीय छन्द हो जाता है। जब वैतालीय छन्दमें प्रथम और तृतीय, द्वितीय तथा चतुर्थ चरण विषम-पादोंके ही अनुसार हों अर्थात् प्रत्येक पाद चौदह लकारों (मात्राओं)-से युक्त हो और उनमें द्वितीय मात्रा तृतीयसे संलग्न होती हो तो उसे चारुहासिनी वैतालीय छन्द कहते हैं।

वक्त्र जातिके छन्दमें पादके प्रथम वर्णके पश्चात् सगण (।।ऽ) और नगण (।।।)-का प्रयोग नहीं करना चाहिये। इनके अतिरिक्त उनमें अन्य किसी भी गणका प्रयोग हो सकता है, किंतु पादके चतुर्थ अक्षरके बाद भगण (ऽ।।) का प्रयोग उचित है।

जिस वक्त्र जातिके छन्दमें सम (द्वितीय एवं चतुर्थ)-पादके चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग हो तो वह पथ्यावक्त्र छन्द है, किंतु कुछ लोग इसके विपरीत प्रथम और तृतीय पादमें चौथे अक्षरके बाद जगण (।ऽ।)-का प्रयोग करते हैं। जब विषमपादोंमें चतुर्थ वर्णके बाद नगण (।।।) हो और समपादोंमें चतुर्थ वर्णके बाद यगण (।ऽऽ)-का प्रयोग किया जाय तो वह विपुला नामक वक्त्र छन्द है। जब समपादोंमें सातवाँ अक्षर लघु (।) होता है अर्थात् चौथे वर्णके बाद जगण (।ऽ।) हो तो उसको विपुलावक्त्र छन्द कहते हैं। आचार्य सैतवका मत है कि विपुलावक्त्रके सम और विषम सभी पादोंमें लघु (।) होना चाहिये। जब प्रथम और तृतीय पादमें चतुर्थ अक्षरके बाद यगण (।ऽऽ)-को बाधित करके विकल्परूपसे भगण (ऽ।।), रगण (ऽ।ऽ), नगण (।।।) एवं तगण (ऽऽ।) आदि हों तो वहाँ विपुलावक्त्र छन्द होता है।

जिस छन्दके प्रत्येक पादमें सोलह लकार हों तथा पादके अन्तिम अक्षर गुरु हों, उसे मात्रासमक छन्द कहा गया है। इस छन्दमें नवम लकार किसीसे मिला नहीं रहता। जिस मात्रासमकके