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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

९५- नीतिसार

१९८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

अथवा वह धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है।

जो मनुष्य परायी स्त्रियोंमें मातृभाव रखता है, जो दूसरेके द्रव्योंको मिट्टी-पत्थरके ढेलेके समान नगण्य समझता है और सभी प्राणियोंमें अपने ही स्वरूपका दर्शन (आत्मदर्शन) करता है, वही विद्वान् है—

मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्।
आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥
(१११।१२)

हे ब्राह्मणो! सत्य तो यही है कि राजागण अपनी आत्माके लिये ही राज्यप्राप्तिकी कामना करते हैं और इसीलिये सभी कार्योंमें अपनी वाणीका उल्लंघन भी सहन नहीं करते हैं तथा धनका संचय भी इसीके लिये करते हैं, किंतु राजाको भी अपनी रक्षा करके शेष बचे हुए धनका उपयोग द्विजातियोंके भरण-पोषणमें करना चाहिये।

ब्राह्मणोंका मूल मन्त्र ॐकार है। इस ॐकारकी उपासनासे राष्ट्रकी अभिवृद्धि होती है और योगसे राजा वृद्धिको प्राप्त करते हैं और किसी भी प्रकारकी व्याधियाँ उसे बाँध नहीं सकतीं।

सब प्रकारसे असमर्थ मुनिजन भी द्रव्योपार्जन करते हैं, फिर पुत्रवत् प्रजाका पालन करते हुए अर्थका संग्रह करनेवाले राजाके विषयमें क्या कहा जा सकता है? धनसंचय करना तो उसके लिये आवश्यक ही है।

जिसके पास धन है, उसीके मित्र एवं बन्धु-बान्धव हैं। वही इस संसारमें पुरुष है और वही धन-सम्पन्न व्यक्ति विद्वान् है। धनरहित होनेपर मनुष्यको मित्र, पुत्र, स्त्री तथा परिजन छोड़ देते हैं। धनवान् होनेपर पुनः वे सभी उसीका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं; क्योंकि इस संसारमें धन ही पुरुषका बन्धु है—

यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सुहृज्जनाश्च।
ते चार्थवन्तं पुनराश्रयन्ति ह्यर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः॥
(१११।१७-१८)

जो राजा शास्त्रोंके ज्ञानसे शून्य है, वह नेत्रोंके रहते हुए भी अन्धेके समान है; क्योंकि अन्धा व्यक्ति तो अपने गुप्तचरके द्वारा देख सकता है, किंतु शास्त्र-ज्ञानसे रहित राजा देखनेमें असफल ही रहता है—

अन्धो हि राजा भवति यस्तु शास्त्रविवर्जितः।
अन्धः पश्यति चारेण शास्त्रहीनो न पश्यति॥
(१११।१९)

जिस राजाके पुत्र, भृत्य, मन्त्री एवं पुरोहित तथा इन्द्रियाँ प्रसुप्त रहती हैं अर्थात् अपने-अपने कर्तव्यके पालनमें सावधान नहीं रहती हैं, उसका राज्य निश्चित ही चिरस्थायी नहीं होता। जिस [ज्ञान-सम्पन्न] व्यक्तिने [बुद्धिमान् तथा आलस्यरहित] पुत्र, भृत्य एवं परिजन—इन तीनोंको योग्यरूपमें प्राप्त किया है, वह राजाओंके सहित चारों समुद्रसे संयुक्त पृथिवीपर विजय प्राप्त कर लेता है।

जो राजा शास्त्रसम्मत और युक्तियुक्त सिद्धान्तोंका उल्लंघन करता है, वह निश्चित ही इस लोक एवं परलोक—दोनोंमें नष्ट हो जाता है<sup>१</sup>।

आपत्कालके आनेपर राजाको दुःखी नहीं होना चाहिये, उसे समबुद्धि, प्रसन्नात्मा तथा सुख-दुःखमें समान रहना चाहिये। धैर्यवान् मनुष्य कष्ट प्राप्त करके भी दुःखी नहीं होते हैं, क्योंकि राहुके मुखमें प्रविष्ट होकर चन्द्र क्या पुनः उदित नहीं होता?<sup>२</sup> शरीरके लालन-पालनमें अनुरक्त जनोंके


१-लंघयेच्छास्त्रयुक्तानि हेतुयुक्तानि यानि च। स हि नश्यति वै राजा इह लोके परत्र च॥ (१११।२२)
२-धीराः कष्टमनुप्राप्य न भवन्ति विषादिनः। प्रविश्य वदनं राहोः किं नोदेति पुनः शशी॥ (१११।२४)

काण्ड ] राजाद्वारा सेवकोंके लिये अपनायी जाने योग्य भृत्यनीतिका निरूपण १९९

प्रति धिक्कार है! धिक्कार है!! मनुष्यको धनहीन होनेसे क्षीण हुए शरीरके प्रति भी खेद नहीं करना चाहिये। यह तो सुना ही गया है कि [पतिव्रता] पत्नीसहित पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर आदिने आपत्कालके दुःखसे मुक्त होकर पुनः सुख प्राप्त किया था। अतः अनुकूल समयकी प्रतीक्षा धैर्यके साथ करनी चाहिये।

गन्धर्व-विद्या, वाद्य, गणिकागण, धनुर्वेद और अर्थशास्त्रकी रक्षा राजाको करनी चाहिये, क्योंकि ये सभी अपनी-अपनी जगह राष्ट्रके लिये उपयोगी हैं। जो राजा भृत्यपर अकारण क्रोध करता है, वह काले भयंकर नागसे छोड़े गये विषसे ग्रस्त उन्मादको प्राप्त करता है।

राजाको कभी भी श्रोत्रियके प्रति, भृत्यके प्रति किं बहुना मानवमात्रके प्रति न कभी चपलदृष्टि रखनी चाहिये और न कभी भी मिथ्या वाक्यका प्रयोग करना चाहिये। जो राजा अपने योग्य भृत्य एवं योग्य स्वजनके बलपर गर्वित होकर शासनकी उपेक्षा करता है और मदान्ध होकर विलासी जीवन व्यतीत करता है, वह अति शीघ्र शत्रुओंसे पराजित हो जाता है।

राजाको क्रोधातुर होकर अहंकारमें भृकुटि टेढ़ी नहीं करनी चाहिये। जो राजा दोषरहित भृत्योंपर अधर्मपूर्वक शासन करता है, इस लोकमें उसके सभी विलासपूर्ण सुखोपभोग नष्ट हो जाते हैं। राजाको विलासी वस्तुओंका परित्याग कर देना चाहिये, परंतु धार्मिक राजाके सुखमें प्रवृत्त होनेपर भी उसके शत्रु युद्धमें पराजित हो जाते हैं।

उद्योग, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम—ये छः प्रकारके जो साहस कहे गये हैं, इनसे समन्वित राजासे देवता भी सशंकित रहते हैं। उद्योग करनेपर यदि व्यक्तिको कार्यमें सफलता प्राप्त नहीं होती है तो उसमें भाग्य ही कारण है, तथापि मनुष्यको सदा पुरुषार्थ करते रहना चाहिये। प्रयत्नसे विरत नहीं होना चाहिये, क्योंकि इस जन्मका ही पौरुष अगले जन्ममें भाग्य बनता है।*

(अध्याय १११)


राजाद्वारा सेवकोंके लिये अपनायी जाने योग्य भृत्यनीतिका निरूपण

श्रीसूतजीने कहा—उत्तम, मध्यम और अधम-भेदसे भृत्योंके तीन प्रकार जानना चाहिये। अतः उनकी योग्यताके अनुसार ही उन्हें विभिन्न कार्योंमें लगाना चाहिये।

सर्वप्रथम भृत्योंकी परीक्षण-विधिको कहा जा रहा है, साथ ही जिस-जिस भृत्यका जो गुण है, उसका भी वर्णन किया जा रहा है।

घर्षण, छेदन, तापन और ताडन—इन चार विधियोंसे जिस प्रकार सुवर्णकी परीक्षा की जाती है, उसी प्रकार राजाको व्रत, शील, कुल तथा कर्म—इन चार प्रकारोंसे भृत्यकी परीक्षा करनी चाहिये।

कुल, शील तथा सद्गुणसे सम्पन्न, सत्य-धर्मपरायण, रूपवान् तथा प्रसन्नचित्त मनुष्यको कोषाध्यक्षके पदपर नियुक्त करना चाहिये। द्रव्योंके मूल्य और रूपकी परीक्षा करनेमें कुशल व्यक्तिको रत्न-परीक्षकके पदपर नियुक्त करना चाहिये। जो सैन्य-शक्तिके बलाबलका परिज्ञान प्राप्त करनेमें


* उद्योगः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षड्विधो यस्य उत्साहस्तस्य देवोऽपि शंकते ॥
उद्योगेन कृते कार्ये सिद्धिर्यस्य न विद्यते। दैवं तस्य प्रमाणं हि कर्तव्यं पौरुषं सदा ॥ (१११।३२-३३)

२००संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

निपुण हो, उसीको सेनाध्यक्ष बनाना चाहिये।

जो व्यक्ति संकेतमात्रसे स्वामीके अभिप्रायको समझनेमें समर्थ है, बलवान् तथा सुन्दर शरीरवाला है, प्रमादहीन एवं जितेन्द्रिय है, उसको प्रतीहारके पदपर नियुक्त करनेके लिये कहा गया है। जो मेधावी, वाक्पटु, विद्वान्, सत्यवादी, जितेन्द्रिय और सभी शास्त्रोंकी सम्यक् आलोचना करनेवाला हो, वही सज्जन व्यक्ति लेखकके पदका अधिकारी है। जो बुद्धिमान्, विवेकशील, दूसरेके चित्तका परिज्ञाता, शूर तथा यथोक्तवादी है, उसे दूतके पदपर नियुक्त करना चाहिये। जो मनुष्य समस्त स्मृतियों और शास्त्रोंका पण्डित है, जितेन्द्रिय, शौर्य एवं पराक्रमादि गुणोंसे सम्पन्न है, उसे धर्माध्यक्षके पदपर नियुक्त करना चाहिये।

जिसके पितृ-पितामह आदिकी परम्परामें रसोइयेका ही काम होता रहा हो और जो विशेषरूपसे पाकशास्त्रका जाननेवाला, सत्यवादी, पवित्र एवं दक्ष हो, ऐसा पुरुष रसोइयेके लिये उचित होता है।

जो आयुर्वेदशास्त्रका सम्यक् ज्ञान रखनेवाला, सौम्य स्वरूपसे सम्पन्न, सभीके लिये देखनेमें प्रिय लगनेवाला, आयु, शील और गुणोंसे सम्पन्न हो, वह वैद्यके पदका अधिकारी होता है। वेद-वेदाङ्गके तत्त्वोंको जाननेमें समर्थ, जप-होमपरायण, नित्य आशीर्वाद देनेमें तत्पर (अर्थात् राजाकी मङ्गलकामनामें अहर्निश दत्तचित्त) विद्वान् राजपुरोहितके योग्य होता है।

यदि लेखक, पाठक, गणक, प्रतिरोधक (प्रतीहार) आदि पदाधिकारी कार्य करनेमें आलस्य करते हों तो राजा सदैव उनको उस कार्यसे पृथक् कर दे।

जो दो प्रकारकी बात करता है, उद्वेगकर वाणी बोलता है, क्रूरकर्मा है तथा अत्यन्त दारुण है, ऐसे दुष्ट व्यक्ति और सर्पका मुख—ये मात्र दूसरेके अपकारके लिये ही होते हैं। विद्यासे सुशोभित होनेपर भी दुर्जन व्यक्तिका परित्याग कर देना चाहिये, मणिसे अलंकृत सर्प क्या भयंकर नहीं होता?<sup>१</sup>

अकारण क्रोध करनेवाले दुष्टसे किस व्यक्तिको भय नहीं रहता? अर्थात् ऐसे दुष्टसे सभी भयभीत रहते हैं; क्योंकि महाभयंकर नागराजका विष तथा दुष्टका कुत्सित वचन दूसरेके लिये असहनीय होता ही है।

राजाको अपने समान धन-वैभवसे सम्पन्न, पौरुष और ज्ञानमें समकक्ष एवं अपने रहस्यको जाननेवाले और उद्योगशील भृत्यको पूर्णरूपसे निष्प्रभावी बना देना चाहिये, अन्यथा राजा निश्चित ही अपने राज्यसे भ्रष्ट हो जाता है; क्योंकि ऐसा भृत्य राज्यका अपहारक ही होता है।

आरम्भमें जो भृत्य शूरता दिखाये, मधुर और धीमे वाक्य बोले, जितेन्द्रियके रूपमें स्वयंको प्रदर्शित करे और साथ ही पराक्रमशीलता भी प्रदर्शित करे पर बादमें इसके विपरीत आचरण करे, ऐसे भृत्य हितैषी नहीं होते। आलस्यरहित, अच्छी तरहसे संतुष्ट, अनिद्रारोगसे रहित, सदा सजग रहनेवाले, सुख-दुःखमें स्थिर-मतिवाले तथा धैर्यसम्पन्न भृत्य इस जगत्में दुर्लभ हैं।<sup>२</sup> क्षमासे रहित, सत्यविहीन, क्रूरबुद्धि, निन्दक, अहंकारी, कपटी, शठ, लोभी, पौरुषहीन और भयभीत होनेवाला भृत्य राजाके लिये त्याज्य है। ऐसे व्यक्तिको किसी भी राज्य-कार्यमें नियुक्त नहीं करना चाहिये।

राजाको दुर्ग (किले)-में संधान किये जाने योग्य अस्त्र तथा विविध प्रकारके शस्त्रोंका अच्छी प्रकारसे


१-दुर्जनः परिहर्त्तव्यो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्। मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः ॥ (११२। १५)
२-निरालस्याः सुसंतुष्टाः सुस्वप्नाः प्रतिबोधकाः। सुखदुःखसमा धीरा भृत्या लोकेषु दुर्लभाः॥ (११२।१९)

काण्ड ] नीतिसार २०९


संग्रह करना चाहिये। ऐसा करनेसे राजा शत्रुको पराजित कर सकता है। परिस्थितिके अनुसार संधिकी अनिवार्यता होनेपर राजाको शत्रुके साथ छः मास अथवा एक वर्षपर्यन्त ही संधि करनी चाहिये। उसके बाद अपनी संचित सामर्थ्यको देखते हुए शत्रुको पराजित करना चाहिये। जो राजा राज्यकार्यमें मूर्ख व्यक्तिको नियोजित करता है, उस राजाको अपयश, धन-विनाश तथा नरकभोग-ये तीन प्राप्त होते हैं।

जो राजा भृत्योंकी सूक्ष्म कार्यप्रणालीके द्वारा जो कुछ भी शुभाशुभ कर्म करता है, उसीके अनुसार ही वह भविष्यमें अभिवृद्धि या ह्रासको प्राप्त करता है। अतः राजाको धर्म-अर्थ तथा काम-इस त्रिवर्गकी साधना एवं गौ-ब्राह्मणकी अभिरक्षाके लिये राज्यकार्यमें सर्वगुणसम्पन्न विद्वान् व्यक्तिको ही नियुक्त करना चाहिये।
(अध्याय ११२)


नीतिसार

श्रीसूतजीने कहा-राजाको राज्यकार्यमें गुणवान् पुरुषकी नियुक्ति और गुणहीनका परित्याग करना चाहिये। विद्वान् व्यक्तिमें सभी गुण विद्यमान रहते हैं, किंतु मूर्ख व्यक्तिमें तो केवल दोष ही रहते हैं।

निरन्तर सज्जनोंके साथ रहना चाहिये और सज्जनोंकी ही संगति करनी चाहिये। विवाद एवं मैत्री भी सज्जनोंके साथ ही करनी चाहिये। दुर्जनोंके साथ कुछ भी नहीं करना चाहिये। पण्डित, विनीत, धर्मज्ञ एवं सत्यवादी जनोंके साथ बन्धनमें भी रहना श्रेयस्कर है, किंतु दुष्टोंके साथ राज्यका भी उपभोग करना उचित नहीं है-

सद्बिरासीत सततं सद्भिः कुर्वीत संगतिम्।
सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किंचिदाचरेत् ॥
पण्डितैश्च विनीतैश्च धर्मज्ञैः सत्यवादिभिः।
बन्धनस्थोऽपि तिष्ठेच्च न तु राज्ये खलैः सह ॥
(११३।२-३)

सभी कार्योंको पूर्ण कर लेना चाहिये। कोई काम अधूरा नहीं छोड़ना चाहिये। इससे सभी प्रकारके अर्थोंकी प्राप्ति हो जाती है।

जिस प्रकार भ्रमर पुष्पके परागको ग्रहण कर लेता है, किंतु पुष्पको नष्ट नहीं करता; जैसे दूध दुहनेवाला व्यक्ति बछड़ेके हितको ध्यानमें रखते हुए दूधको दुहता है, वैसे ही राजाको प्रजाहितका ध्यान रखते हुए प्रजासे करका दोहन करना चाहिये। जिस प्रकार मधुमक्खी एक-एक पुष्पसे मधुको ग्रहण कर उसे एकत्र करती है, उसी प्रकार राजाको भी प्रजासे धन-संग्रह करना चाहिये।<sup>१</sup> जैसे वल्मीक (बाँबी), मधुमक्खीका छत्ता तथा शुक्लपक्षका चन्द्रमा प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा बढ़ता रहता है, वैसे ही राजाका द्रव्य तथा भिक्षा भी धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा धर्मपूर्वक संग्रह करनेसे बढ़ते रहते हैं।

समुचित रीतिसे अर्जित किये गये धनका भी क्षय होता ही है और श्रद्धापूर्वक दीयमान दान कोटिगुणित होकर यथासमय मिलता ही है—इस वास्तविकताको ध्यानमें रखते हुए अपना कोई भी दिन दान, अध्ययन या सत्कर्मसे विहीन नहीं होने देना चाहिये।<sup>२</sup> रागी व्यक्तिसे वनमें भी दोष हो जाते हैं। अतः घरमें मनुष्यके द्वारा किया गया पञ्चेन्द्रियोंका निग्रह तप ही है। जो व्यक्ति जितेन्द्रिय होकर अनिन्दित कर्मोंमें प्रवृत्त हो सन्मार्गकी ओर


१-मधुहेव दुहेत् सारं कुसुमं च न घातयेत्। वत्सापेक्षी दुहेत् क्षीरं भूमिं गां चैव पार्थिवः ॥
यथा क्रमेण पुष्पेभ्यश्चिनुते मधु षट्पदः। तथा वित्तमुपादाय राजा कुर्वीत संचयम् ॥ (११३।५-६)
२-अर्जितस्य क्षयं दृष्ट्वा सम्प्रदत्तस्य संचयम्। अवन्ध्यं दिवसं कुर्याद्दानाध्ययनकर्मसु ॥ (११३।८)