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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

५०- रत्नोंके प्रादुर्भावका आख्यान तथा वज्र (हीरे)-की परीक्षा

१०६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

आयुरेखाके पहुँचनेपर मनुष्य शतायु होता है। अंगुष्ठके मूलभागसे निकलनेवाली प्रथम रेखा ज्ञानरेखा है। मध्यमा अंगुलीके मूलसे जो रेखा जाती है, वह आयुरेखा है। यह रेखा कनिष्ठा अंगुलीके मूलसे निकलकर मध्यमाके मूल भागको पार करती है। यदि यह रेखा विच्छिन्न या किसी अन्य रेखासे विभक्त नहीं होती है तो ऐसे व्यक्तिकी आयु सौ वर्ष होती है।

हे रुद्र! जिसके हाथमें यह आयुरेखा स्पष्ट दिखायी देती है उसकी आयु सौ वर्ष अवश्य होती है, इसमें संदेह नहीं। जो रेखा कनिष्ठा अंगुलीके मूलसे होकर मध्यमा अंगुलीके मूलतक विस्तारको प्राप्त करती है, वह रेखा मनुष्यको साठ वर्ष आयु प्रदान करनेमें सक्षम होती है। (अध्याय ६३)

स्त्रियोंके शुभाशुभ लक्षण

श्रीहरिने कहा—जिस कन्याके केश घुँघराले, मुख मण्डलाकार अर्थात् गोल एवं नाभि दक्षिणावर्त होती है, वह कुलकी वृद्धि करनेवाली होती है। जो स्वर्णसदृश आभावाली होती है, जिसके हाथ लाल कमलके समान सुन्दर होते हैं, वह हजारों स्त्रियोंमें अद्वितीय तथा पतिव्रता होती है।

जो कन्या वक्र केशोंवाली और गोल नेत्रवाली होती है, वह निश्चित ही दुःख भोगनेवाली होती है तथा उसका पति शीघ्र ही मर जाता है।

पूर्णचन्द्रके सदृश मुखमण्डलसे सुशोभित, बालसूर्यके समान लाल-लाल कान्तिवाली, विशाल नेत्रोंसे युक्त, बिम्बाफलकी भाँति ओष्ठवाली कन्या चिरकालतक सुखका उपभोग करती है। हस्ततलमें बहुत-सी रेखाओंके होनेपर कष्ट तथा अल्प रेखाओंके होनेपर वह धनहीनताका दुःख भोगती है। हाथमें रक्तवर्णकी रेखाओंके होनेसे वह सुखी जीवन व्यतीत करती है, किंतु कृष्णवर्णकी रेखाओंके होनेपर वह दास्यवृत्तिवाली दूतीका जीवन व्यतीत करती है।

अच्छी स्त्री वह है, जो पतिके कार्योंमें मन्त्रीके समान परामर्श देनेवाली होती है। सहयोगमें मित्रके समान बर्ताव करती है। स्नेहके व्यवहारमें भार्या अथवा माता तथा शयनकालमें वेश्याके समान सुख प्रदान करती है।

जिस कन्याके हाथमें अंकुश, कुण्डल और चक्रके चिह्न विद्यमान रहते हैं, वह पुत्रसे सम्पन्न होती है और राजाको पतिके रूपमें वरण करती है।

जिस स्त्रीके दोनों पार्श्व और स्तन-प्रदेश रोमसमन्वित होते हैं तथा अधरोष्ठ-भाग ऊँचा उठा हुआ होता है, वह निश्चित ही शीघ्र पतिका नाश करनेवाली होती है। जिसके हाथमें प्राकार और तोरणकी रेखाएँ दिखायी देती हैं, वह दासकुलमें भी उत्पन्न होकर रानीके पदको प्राप्त करती है। जिस कन्याकी नाभि ऊपरकी ओर उठी हुई, मण्डलाकार एवं कपिलवर्णकी रोमावलियोंसे आवृत्त रहती है, वह कन्या राजकुलमें उत्पन्न होकर दासीकी वृत्तिसे जीवनयापन करती है।

जिस स्त्रीके चलनेपर दोनों पैरकी अनामिका तथा अंगुष्ठ पृथिवीतलका स्पर्श नहीं करते हैं, वह शीघ्र ही पतिका नाश करती है तथा स्वयं स्वेच्छाचार-पूर्वक जीवन बितानेवाली होती है। जिस स्त्रीके चलनेसे पृथिवीमें कम्पन हो उठता है, वह शीघ्र ही पतिका नाश करके स्वेच्छाचारिणी बन जाती है।

सुन्दर मनोहारी नेत्रोंके होनेसे स्त्री सौभाग्यशालिनी, उज्ज्वल चमकते हुए दाँतोंके होनेपर उत्तम भोजन प्राप्त करनेवाली, शरीरकी त्वचा सुन्दर एवं कोमल होनेसे उत्तम प्रकारकी शय्या तथा कोमल स्निग्ध चरणोंके होनेपर वह श्रेष्ठ वाहनका सुख प्राप्त करती है।

काण्ड ] स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण १०७

चिकने, ऊँचे उठे हुए ताम्रवर्णके समान लाल-लाल नखोंसे युक्त, मत्स्य, अंकुश, पद्म, चक्र तथा लाङ्गल (हल)-चिह्नसे सुशोभित एवं पसीनेसे रहित और कोमल तलवाले स्त्रीके चरण सौभाग्यशाली होते हैं।

सुन्दर रोमविहीन जंघा, गजशुण्डके सदृश ऊरु, पीपलपत्रके समान विशाल उत्तम गुह्यभाग, दक्षिणावर्त गम्भीर नाभि, रोमरहित त्रिवली और हृदयपर सुशोभित रोमरहित स्तन-प्रदेश—ये उत्तम स्त्रीके शुभ लक्षण हैं। (अध्याय ६४)


स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण

**श्रीहरिने कहा—**अब मैं सामुद्रिकशास्त्रमें कहे गये स्त्री और पुरुषके शुभाशुभ लक्षणोंका वर्णन करता हूँ, जिन्हें जान लेनेसे भूत तथा भविष्यका ज्ञान हो जाता है।

मार्गमें गमन करनेपर विषम रूपसे पड़नेवाले, कषाय वर्णसे युक्त विचित्र प्रकारके बने हुए चरण वंशका नाश करते हैं। शङ्ख्वाकार चरणोंसे युक्त मनुष्य ब्रह्महत्या करता है तथा अगम्या स्त्रीके साथ रमण करनेकी इच्छा रखता है।

विरल रोमभागयुक्त जंघा तथा हाथीके सूँडके समान सुन्दर ऊरु भागोंवाले अंग राजाके शरीरमें सुशोभित होते हैं।

दरिद्रकी जंघाएँ सियारकी जंघाओंके समान होती हैं। कुंचित केशराशिवाले मनुष्यकी मृत्यु विदेशमें होती है।

मांसरहित जानु-प्रदेशवाला व्यक्ति सौभाग्यशाली होता है। अल्प और छोटी-छोटी जानुओंके होनेसे मनुष्य स्त्री-प्रेमी तथा विशाल विकटाकार होनेपर दरिद्र होता है। मांससे भरपूर जानुओंके होनेपर मनुष्यको राज्यकी प्राप्ति होती है। बड़ी जानुओंके होनेपर मनुष्य दीर्घायु होता है।

मांसल स्फिक् (कूल्हा)-प्रदेशवाला व्यक्ति सुखी तथा सिंहके समान स्फिक् होनेपर वह राजपुरुष माना गया है। इसी प्रकार सिंहके सदृश कटिप्रदेशके होनेपर वह राजा होता है, किंतु कपिके समान कटिभागवाला व्यक्ति निर्धन होता है।

समान कक्ष (काँख)-प्रदेशवाले अत्यधिक भोग-विलासी होते हैं। निम्न कक्षाओंवाले धनहीन तथा उन्नत एवं विषम कक्षाओंवाले कुटिल होते हैं।

मत्स्यके समान उदरवाले प्रचुर धनवान् होते हैं। विस्तीर्ण नाभिप्रदेशसे सुशोभित जन सुखी एवं अत्यधिक गहरी नाभिके होनेपर कष्ट भोगनेवाले होते हैं।

त्रिवलीके मध्यभागमें नाभिके अवस्थित होनेपर प्राणी शूलरोगसे ग्रसित होते हैं। वामावर्त नाभिके होनेपर शक्तिसम्पन्न और दक्षिणावर्त होनेपर मेधावी होते हैं। पार्श्वदेशमें नाभिके विस्तृत होनेसे मनुष्य चिरंजीवी, उन्नत होनेपर ऐश्वर्यशाली, अधोमुख होनेपर गोधनसे सम्पन्न एवं पद्मकर्णिकाके सदृश सुन्दर होनेपर वे राजत्वको प्राप्त करते हैं।

उदरभागपर एक वलिके रहनेपर मनुष्य शतायु होता है। दो वलियोंके होनेसे वह ऐश्वर्यका भोग करनेवाला तथा त्रिवलियोंके होनेपर राजा या आचार्यकी पदवीको प्राप्त करता है। सरल वलियोंवाला मनुष्य सुखी होता है। वक्र वलिवाला व्यक्ति अगम्यागामी होता है।

जिसके दोनों पार्श्वभाग मांसल होते हैं, वह राजा होता है। मृदु, कोमल, सुन्दर और समभागकी दूरियोंपर अवस्थित दक्षिणावर्तीय रोमराशियोंसे सुशोभित व्यक्ति भी राजा होते हैं। यदि उदर-

१०८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

प्रदेशपर इन लक्षणोंके विपरीत रोम-राशियाँ होती हैं तो ऐसे मनुष्य दूत-कर्म करनेवाले, निर्धन तथा सुखसे रहित होते हैं।

समुन्नत, मांसल तथा कम्पनरहित विशाल वक्षःस्थल राजाओंका होता है। अधमजनोंका वक्षःस्थल तो गर्दभोंकी रोमराशिके समान, कर्कश तथा रोमावलियोंसे युक्त स्पष्ट परिलक्षित होनेवाली नसोंसे व्याप्त रहता है।

समतल वक्षःस्थलवाले मनुष्य धन-सम्पन्न होते हैं। पीन (मांसल) वक्षःस्थलोंसे युक्त प्राणी शक्तिसम्पन्न होता है। विषम वक्षःस्थलके होनेपर मनुष्य निर्धन होता है और उसकी मृत्यु शस्त्राघातसे होती है।

स्कन्ध-प्रदेशके सन्धिस्थान (पखुरा)-में विषमता तथा अस्थि-संलग्नताके होनेपर भी मनुष्य निर्धन होते हैं। उन्नत स्कन्ध-प्रदेशके रहनेसे व्यक्ति भोगी, निम्न होनेपर धनहीन तथा स्थूल होनेपर धनी होते हैं।

चिपटाकार कण्ठसे युक्त मनुष्य निर्धन, शुष्क एवं उन्नत शिराओंसे व्याप्त गलेवाला सुखी होता है। महिषके सदृश ग्रीवावाला वीर तथा मृगके समान कण्ठवाला शास्त्रोंमें पारंगत होता है। शंखके समान ग्रीवावाला मनुष्य राजा और लम्बे कण्ठवाला बहुत भोजन करनेवाला होता है।

रोमरहित एवं मुड़ा हुआ पृष्ठ-प्रदेश शुभ तथा उसके विपरीत रहनेपर अशुभ माना गया है।

पीपल-पत्रके सदृश, सुगन्धित तथा मृगके सदृश रोमावलियोंवाली कक्षाएँ उत्तम होती हैं। इसके विपरीत कक्षाओंके जो लक्षण होते हैं, वे निर्धनोंकी दरिद्रताके कारण हैं।

मांसल, श्लिष्ट, विशाल, बलिष्ठ, वृत्ताकार तथा जानुपर्यन्त लम्बी सुन्दर भुजाएँ राजाकी होती हैं। प्रचुर रोमावलियोंसे युक्त छोटे-छोटे हाथ निर्धनके होते हैं। हाथीकी शुण्डके समान सुन्दर भुजाएँ श्रेष्ठ मानी गयी हैं।

भवनमें वायु-प्रवेशके लिये बने द्वारके समान बनी हुई अंगुलियाँ शुभ होती हैं। मेधावीजनोंकी अंगुलियाँ छोटी होती हैं। चिपटाकार अंगुलियाँ भृत्योंमें पायी जाती हैं। स्थूल अंगुलियोंके होनेपर मनुष्य निर्धन होते हैं। जब मनुष्यकी अंगुलियाँ कृश होती हैं तो वे विनयी होते हैं। बन्दरके सदृश हाथके होनेपर मनुष्य निर्धन और बाघके समान हाथ होनेपर बलवान् होते हैं।

करतल भागके निम्न होनेसे मनुष्य पिताके द्वारा संचित धनको नष्ट करनेवाले होते हैं। मणिबन्धके सुगठित, श्लिष्ट तथा सुगन्धयुक्त होनेपर व्यक्तियोंको राजपदकी प्राप्ति होती है। कटे-फटे कर-भागसे युक्त, शब्द करनेवाले मणिबन्धोंके रहनेसे मनुष्य धनहीन और नीच प्रकृतिके माने जाते हैं।

संवृत्त अर्थात् गोलाकार एवं गहरे करतलोंके होनेसे मनुष्योंको धनवान् कहा गया है। उन्नत करतलोंके होनेपर व्यक्ति दानी और विषम भागवाले व्यक्ति कठोर होते हैं। लाक्षारसके समान करतलोंके होनेसे प्राणी राजा होते हैं। पीतवर्णवाले करतलोंसे युक्त व्यक्ति परस्त्रीके साथ रमण करनेवाले होते हैं। जिनके हाथ और तल-प्रदेश रूखे हैं, वे मनुष्य निर्धन होते हैं।

तुष (भूसी)-के समान रंगसे युक्त नखवाले लोग नपुंसक, कुटिल तथा फटे हुए नखवाले धनहीन होते हैं। विवर्ण नखवाले दूसरेके साथ तर्क करनेवाले होते हैं।

ताम्रवर्णके सदृश रक्ताभ नखवाले मनुष्य राजा होते हैं। यव-चिह्नसे युक्त अंगुष्ठवाले व्यक्ति अत्यधिक धन-वैभवसे युक्त होते हैं। अंगुष्ठके मूलभागमें यव-चिह्नके होनेसे व्यक्ति पुत्रवान् होता है। लम्बे पर्वोंसे युक्त अँगुलियोंके होनेपर दीर्घायु तथा पुत्र-