गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३१- देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि
६८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
आवाहितोऽसि देवेश पूजार्थं परमेश्वर॥
तत्प्रभातेऽर्चयिष्यामि सामग्र्याः संनिधौ भव।
(४३। २८-२९)
हे परमेश्वर! देवदेवेश्वर! आप यहाँपर पूजाके लिये आवाहित हैं। इस समस्त सामग्रीसे प्रभातकालमें मैं आपका पूजन करूँगा। आपकी संनिधि यहाँ बनी रहे।
एक रात्रि या तीन रात्रितक पवित्रकको अधिवासितकर स्वयं रात्रिमें जागरण करके प्रातःकाल भगवान् केशवका पूजन करे और निर्मित पवित्रकोंको उन देवको अर्पित करे। पवित्रकको धूपसे धूपित करके मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित भी करना चाहिये।
गायत्री-मन्त्रसे पूजित इस पवित्रकके द्वारा देव-पूजन करके उसे मन्त्र पढ़कर देवताके समक्ष स्थापित कर दे—
विशुद्धग्रन्थिकं रम्यं महापातकनाशनम्।
सर्वपापक्षयं देव तवाग्रे धारयाम्यहम्॥
(४३। ३३)
हे देव! यह पवित्रक विशुद्ध रूपसे ग्रथित, सुन्दर तथा महापातकोंको नष्ट करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका क्षय करनेवाला है। इसे मैं आपके समक्ष स्थापित करता हूँ। तदनन्तर इस मन्त्रका पाठकर स्वयं भी धारण करना चाहिये—
पवित्रं वैष्णवं तेजः सर्वपातकनाशनम्॥
धर्मकामार्थसिद्धयर्थं स्वकण्ठे धारयाम्यहम्।
(४३। ३४-३५)
[हे देव!] यह विष्णु-तेजःस्वरूप, सर्वपाप-विनाशक पवित्रक है। मैं धर्म, काम तथा अर्थ—इस त्रिवर्गकी सिद्धिके लिये इसे अपने कण्ठमें धारण करता हूँ। अनन्तर इस प्रकार प्रार्थना करे—
वनमाला यथा देव कौस्तुभं सततं हृदि।
तद्वत् पवित्रं तन्तूनां मालां त्वं हृदये धर॥
(४३। ४१)
हे देव! आपके हृदयपर जिस प्रकार वनमाला और कौस्तुभ विराजते हैं, उसी प्रकार तन्तुओंकी बनी हुई यह माला और पवित्रक आप अपने हृदयपर धारण करें।
इस प्रकार प्रार्थना करके ब्राह्मणोंको भोजन कराकर और उन्हें दक्षिणा देकर उसी दिन सायंकाल या दूसरे दिन पुनः उसी प्रकार पूजा सम्पन्न करके निम्न मन्त्र पढ़ते हुए विसर्जन करे—
सांवत्सरीमिमां पूजां सम्पाद्य विधिवन्मया।
व्रज पवित्रकेदानीं विष्णुलोकं विसर्जितः॥
(४३। ४३)
हे पवित्रक! मैंने इस सांवत्सरी पूजाको विधिवत् सम्पादित किया है। इस समय मेरे द्वारा विसर्जित आप विष्णुलोकको पधारें। (अध्याय ४३)
ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण
**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! भगवान्की पवित्रक आदिसे पूजाकर ब्रह्मका ध्यान करके साधक हरि बन जाता है (मेरा स्वरूप हो जाता है)। अब मैं मायाजालको नष्ट करनेवाले ब्रह्मके ध्यानका वर्णन करता हूँ। आप सुनें—
ब्रह्मके ध्यानके लिये प्रवृत्त प्राज्ञ (विशेष साधक) अपनी वाणी एवं मनको नियन्त्रितकर अपनी आत्मामें ही ज्ञानस्वरूप ब्रह्मका यजन करे और जिस प्राज्ञको यह उत्कट इच्छा हो कि मैं अपनी आत्मामें ब्रह्मका दर्शन (जीवब्रह्मका अभेददर्शन) करूँ, उसे महद्ब्रह्म (प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न परब्रह्म)-में ज्ञानकी भावना (ब्रह्म एवं निर्विषय-नित्य-ज्ञानमें अभेदभाव) करनी चाहिये।
ब्रह्मका ध्यान ही समाधि है। 'मैं ब्रह्म हूँ' इस रूपमें सदा स्वयंकी अवस्थिति ही ब्रह्मका ध्यान है। स्वयंसे अभिन्न ब्रह्म देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि,
काण्ड ] ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण ६९
प्राण, अहङ्कार, पञ्चमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश), पञ्चतन्मात्र (गन्धतन्मात्र, रसतन्मात्र, रूपतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र एवं शब्दतन्मात्र) विविध गुण, जन्म और भोजन, शयन आदि भोगसे सर्वथा रहित, स्वप्रकाश, निराकार, सदा निरतिशय, नित्य आनन्दस्वरूप, अनादि, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सर्वतः परिपूर्ण, सत्यस्वरूप, परमसुखस्वरूप, परमपद एवं तुरीय (कूटस्थ निरञ्जन परब्रह्म)-के रूपमें वेदोंमें वर्णित है।
हे वृषभध्वज! अपनी आत्माको रथी और शरीरको रथ समझना चाहिये। बुद्धि उसमें सारथि तथा मन लगाम है। इन्द्रियोंको उस रथमें जुते हुए अश्वके रूपमें स्वीकार किया गया है। ये इन्द्रियाँ ही रूप, रस, गन्ध आदि विषयका अनुभव करती हैं।
इन्द्रिय और मनसे युक्त आत्माको ही मनीषियोंने भोक्ता कहा है। जो मनुष्य विज्ञानरूपी सारथिसे युक्त है, मनरूपी लगामको अपने वशमें रखता है, वही उस परमपदको प्राप्त करता है, फिर वह उत्पन्न नहीं होता। जो विज्ञानरूपी सारथिसे नियन्त्रित मनरूपी लगामवाला मनुष्य है, वह स्वर्धुनी<sup>१</sup> (अज्ञान)-से पार हो जाता है और वही विष्णुका परमपद है<sup>२</sup>।
इस योगकी परम साधनामें अहिंसादि धर्मोंको यम तथा शौचादिक कर्मोंको नियम कहा गया है। पद्मादि आसन हैं। प्राण, अपानादिक वायुपर विजय प्राप्त करना प्राणायाम है। इन्द्रियोंपर विजय प्रत्याहार और ईश्वरका चिन्तन करना ध्यानावस्था है। मनको नियन्त्रित करना ही धारणा है और ब्रह्ममें मनको केन्द्रित करनेकी जो स्थिति होती है, वह समाधि है। यदि पहले इस योगके द्वारा चञ्चल चित्त स्थिर नहीं होता तो उस मूर्ति (परमेश्वर)-का इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये—
जो हृदयकमलकी कर्णिकाके मध्य विराजमान रहनेवाले हैं तथा शङ्ख, चक्र, गदा और कमलसे सुशोभित हैं, जो श्रीवत्स तथा कौस्तुभमणि, वनमाला एवं लक्ष्मीसे विभूषित हैं, जो नित्य-शुद्ध, ऐश्वर्यसम्पन्न, सत्य, परमानन्दस्वरूप, आत्मस्वरूप, परमब्रह्म तथा परम ज्योतिःस्वरूप हैं—ऐसे वे चौबीस स्वरूप (अवतार)-वाले, शालग्रामकी शिलामें विराजमान, द्वारकादि<sup>३</sup> शिलाओंपर अवस्थित रहनेवाले परमेश्वर ध्यानके योग्य हैं और पूजनीय हैं। मैं भी वही हूँ—ऐसा समझना चाहिये।
इस प्रकार आत्मस्वरूप नारायणका यम-नियम इत्यादिक योगके साधनोंसे एकाग्रचित्त होकर जो ध्यान करता है, वह मनोऽभिलषित इच्छाओंको प्राप्तकर वैमानिक<sup>४</sup> देव हो जाता है। यदि निष्काम होकर उन हरिकी मूर्तिका ध्यान और स्तवन करे तो मुक्ति प्राप्त हो जाती है। (अध्याय ४४)
१-शब्दकल्पद्रुमके—'धूनयति कम्पयति शत्रून्'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'धुनी' शब्द कम्पित कर देनेवालेके लिये प्रयुक्त होता है। इसलिये यहाँ प्रसंगानुसार 'स्वः' शब्दका मोक्ष अर्थ मानकर मोक्षको कम्पित (प्रतिबन्धित) करनेवाले अज्ञानको 'स्वर्धुनी' कह सकते हैं। इस तरह अज्ञानको पार कर लेना ही 'स्वर्धुनी' को पार करना समझना चाहिये।
२-आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं च सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च। इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयास्तेषु गोचराः॥
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तो भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः। यस्तु विज्ञानवानात्मा युक्तेन मनसा सदा॥
स तु तत्पदमाप्नोति स हि भूयो न जायते। विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः॥
स्वर्धुन्याः परमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्। (४४।६-९)
३-शब्दकल्पद्रुमके अनुसार द्वारकामें होनेवाली तक्षशिला भी भगवान् विष्णुकी मूर्ति मानी जाती है। इसीलिये जैसे गण्डकी नदीमें होनेवाली चक्रयुक्त शिला (शालग्रामशिला)-में विष्णुका सदा संनिधान है, वैसे ही द्वारकाकी शिलामें भी विष्णुका संनिधान है।
४-वैमानिक देव—शब्दकल्पद्रुमके—'विगतं मानम् उपमा यस्य'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार निरुपमेयको विमान कहा जा सकता है। 'विमान एव वैमानिकः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार वैमानिक शब्द भी निरुपमेय (उपमारहित)-का बोधक हो सकता है। इसलिये प्रकृतमें 'वैमानिक देव'का अर्थ निरुपमेय—उपमारहित—सर्वोत्कृष्ट देव महाविष्णु किया जा सकता है।
| ७० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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विविध शालग्रामशिलाओंके लक्षण
**श्रीहरिने कहा—**हे वृषभध्वज! अब मैं प्रसंगवश शालग्रामका लक्षण कहता हूँ। शालग्रामशिलाओंके स्पर्शमात्रसे करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। केशव, नारायण, गोविन्द तथा मधुसूदन आदि नामोंवाली विभिन्न शालग्रामशिलाएँ होती हैं, जो शंख, चक्र आदि चिह्नोंसे सुशोभित रहती हैं। इन शिलाओंके लक्षण इस प्रकार हैं—
शंख, चक्र, गदा तथा पद्मके चिह्नसे सुशोभित शिला ‘केशव’, पद्म, कौमोदकी* गदा, चक्र तथा शंखके चिह्नसे सुशोभित शिला ‘नारायण’, चक्र, शंख, पद्म तथा गदाके चिह्नसे विभूषित शिला ‘माधव’ और गदा, पद्म, शंख तथा चक्रके चिह्नसे शोभायमान शिला ‘गोविन्द’ नामसे जानी जाती है।
पद्म, शंख, चक्र, गदासे युक्त ‘विष्णु’ नामकी, शंख, पद्म, गदा तथा चक्रसे युक्त ‘मधुसूदन’ नामकी, गदा, चक्र, शंख, पद्मसे संयुक्त ‘त्रिविक्रम’ नामकी, चक्र, गदा, पद्म, शंखसे चिह्नित ‘वामन’ नामकी, चक्र, पद्म, शंख एवं गदासे समन्वित ‘श्रीधर’ नामकी और पद्म, गदा, शंख, चक्रसे अंकित ‘हृषीकेश’ नामकी शालग्राम-मूर्ति कही गयी हैं। इन देवमूर्तियोंको बार-बार नमन है।
पद्म, चक्र, गदा, शंख-चिह्नपूरित शालग्रामशिला ‘पद्मनाभ’, शंख, चक्र, गदा, पद्मयुक्त शालग्रामशिला ‘दामोदर’, चक्र, शंख, गदा तथा पद्मसे संयुक्त शालग्रामशिला ‘वासुदेव’, शंख, पद्म, चक्र, गदा-चिह्नसे समन्वित शालग्रामशिला ‘संकर्षण’, शंख, गदा, पद्म, चक्रसे सुशोभित शालग्रामशिला ‘प्रद्युम्न’ तथा गदा, शंख, पद्म और चक्रसे शोभित शालग्रामशिला ‘अनिरुद्ध’ नामसे अभिहित है। इन्हें बारम्बार प्रणाम है।
पद्म, शंख, गदा, चक्रके चिह्नसे विभूषित ‘पुरुषोत्तम’ नामकी, गदा, शंख, चक्र, पद्म-चिह्नसे विभूषित ‘अधोक्षज’ नामकी, पद्म, गदा, शंख, चक्रसे विभूषित ‘नृसिंह’ नामकी, पद्म, चक्र, शंख, गदासे अंकित ‘अच्युत’ नामकी और शंख, चक्र, पद्म, गदासे संयुक्त ‘जनार्दन’ की शालग्राम-मूर्ति है—इन देवनामोंसे अभिहित मूर्तियोंको नमस्कार है।
गदा, चक्र, पद्म, शंखसे अंकित शालग्राम ‘उपेन्द्र’, चक्र, पद्म, गदा, शंखसे युक्त शालग्राम ‘हरि’, गदा, पद्म, चक्र, शंख-चिह्नसे शोभित शालग्राम ‘श्रीकृष्ण’ नामसे प्रसिद्ध हैं और शालग्रामशिलाके द्वारदेशपर चिह्नित दो चक्र धारण करनेवाले, शुक्लवर्णवाले भगवान् वासुदेव हैं। इन सभी रूपों एवं नामोंको धारण करनेवाले हे गदाधर भगवान् विष्णु! हम सबकी आप रक्षा करें।
दो चक्रोंसे युक्त, रक्त आभावाली और पूर्वभागमें पद्म-चिह्नसे अंकित शालग्रामशिला ‘संकर्षण’ की मूर्ति होती है, किंतु छोटे-छोटे चक्रोंवाली तथा पीतवर्णकी होनेपर वह शिला ‘प्रद्युम्न’ कही जाती है। यदि शालग्रामशिला बड़ी तथा छिद्रसे संयुक्त शिरोभागवाली और वर्तुलाकार हो तो उसे ‘अनिरुद्ध’ नामक शालग्राम-मूर्ति कहते हैं। जो द्वारमुखपर नीलवर्णकी तीन रेखाओंसे युक्त होती है और जिसका शेष सम्पूर्ण भाग कृष्णवर्णसे सुशोभित रहता है, वह शालग्रामशिला ‘नारायण’ शिलाके नामसे जानी जाती है।
जिस शिलाके मध्यमें गदाके समान रेखा हो, यथास्थान नाभिचक्र उन्नत हो तथा वक्षःस्थल विस्तृत हो, वह ‘नृसिंह’ नामवाली शालग्रामशिला है और
* श्रीविष्णुकी गदाका नाम 'कौमोदकी' है।
काण्ड ] वास्तुमण्डल-पूजाविधि ७१
इन चिह्नोंके साथ ही उसमें तीन विन्दु अथवा पाँच विन्दु हों तो वह 'कपिल' नामक शिला है, वह शिला हम सबकी रक्षा करे। उसका पूजन ब्रह्मचारियोंको करना चाहिये। विषम परिमाणवाले दो चक्रोंसे चिह्नित शक्ति-चिह्नसे युक्त शिलाको 'वाराह' शिला कहते हैं। वह हम सबकी रक्षा करे। नीलवर्णवाली, तीन रेखाओंसे युक्त, स्थूल तथा विन्दुयुक्त शिला 'कूर्ममूर्ति' है और वही अगर वर्तुलाकार है तथा उसका पीछेका भाग झुका हुआ हो तो वह शिला 'कृष्ण' कही गयी है, वह हम सबकी रक्षा करे। पाँच रेखावाली शिला 'श्रीधर' नामकी कही जाती है। गदासे अंकित शिला 'वनमाली' है—ये हम सबकी रक्षा करें। गोलाकार तथा छोटी शिला 'वामन' शिला है, बायें भागमें चक्राङ्कित शिला 'सुरेश्वर' की मूर्ति है। विभिन्न रंगोंवाली, अनेक रूपोंवाली, नागके समान फणोंसे युक्त शिला 'अनन्तक' है। स्थूल हो, नीलवर्णकी हो और मध्यमें नीलवर्णका चक्र हो तो वह 'दामोदर'- शिला है। संकुचित द्वारवाली, रक्तवर्णवाली, लम्बी रेखाओंवाली, छिद्रयुक्त, एक चक्र तथा एक कमलवाली विस्तीर्ण शिला 'ब्रह्मशिला' है, ये सब हम सबकी रक्षा करें। विस्तृत छिद्रवाली तथा स्थूल चक्रवाली शिला 'कृष्णशिला' तथा बिल्वाकार शिला 'विष्णुशिला' है। अंकुशके आकारवाली, पाँच रेखाओंवाली तथा कौस्तुभ-चिह्नसे युक्त शिला 'हयग्रीव' शिला है। एक चक्र तथा एक कमलसे अंकित, मणि तथा रत्नोंकी आभासे युक्त कृष्णवर्णकी शिला 'वैकुण्ठ' शिला और द्वारपर रेखावाली, विस्तृत कमलसदृश शिला 'मत्स्यशिला' है—ये हम सबकी रक्षा करें। दाहिनी ओर रेखायुक्त, श्यामवर्णसे समन्वित, रामचक्रसे अंकित 'त्रिविक्रम' नामवाली शिला हम सबकी रक्षा करे। द्वारकामें स्थित, शालग्राममें निवास करनेवाले गदाधारी भगवान्को नमस्कार है। एक द्वारवाली, चार चक्रोंसे युक्त, वनमालासे विभूषित, स्वर्णरेखासमन्वित, गोपदसे सुशोभित तथा कदम्बके पुष्पकी आकृतिवाली 'लक्ष्मीनारायण' नामवाली शिला हम सबकी रक्षा करे।
एक चक्रवाले शालग्रामको 'सुदर्शन' कहते हैं, उनके रूपमें वे गदाधारी श्रीविष्णु हम सबकी रक्षा करें। दो चक्र होनेसे शालग्रामशिलाकी 'लक्ष्मीनारायण' संज्ञा होती है। जिसमें तीन चक्र हैं, वह (शिला) 'त्रिविक्रम' की मूर्ति है, चार चक्रवाली चतुर्व्यूह, पाँच चक्रवाली 'वासुदेव', छः चक्रवाली शालग्रामशिला 'प्रद्युम्न', सात चक्रवाली शिला 'संकर्षण', आठ चक्रवाली 'पुरुषोत्तम', नव चक्रवाली शिला 'नवव्यूह', दस चक्रवाली 'दशावतार' तथा ग्यारह चक्रवाली शिला 'अनिरुद्ध' कहलाती है—ये हम सबकी रक्षा करें। बारह चक्रोंसे युक्त शिला 'द्वादशात्मा' है। बारहसे अधिक चक्रकी शिला 'अनन्त' नामवाली है।
जो मनुष्य इस विष्णुमूर्तिमय स्तोत्रका पाठ करता है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है।
(अध्याय ४५)
वास्तुमण्डल-पूजाविधि
**श्रीहरिने कहा—**गृहेनिर्माणके प्रारम्भमें जिसके करनेसे समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं। संक्षेपमें उस वास्तुपूजाकी विधि कहता हूँ, यह पूजा ईशानकोणसे प्रारम्भ होकर इक्यासी पदवाले मण्डपके अन्तर्गत पूर्ण की जानी चाहिये।
इस मण्डलके ईशानकोणमें वास्तुदेवताका मस्तक होता है। नैर्ऋत्यकोणमें उनके दोनों पाद तथा अग्नि और वायुकोणमें दोनों हाथ होते हैं। आवास
७२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
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अर्थात् भवन, गृह आदि, नगर, ग्राम, व्यापारिक पथ, प्रासाद, उद्यान, दुर्ग, देवालय तथा मठ आदिके निर्माणमें वास्तुदेवताकी स्थापनापूर्वक पूजा करनी चाहिये। बाईस* देवता बाह्यभागमें तथा तेरह देवता अन्तःभागमें अवस्थित रहते हैं।
यथा—ईश, शिखी, पर्जन्य, जयन्त, कुलिशायुध, सूर्य, सत्य, भृगु, आकाश, वायु, पूषा, वितथ, ग्रहक्षेत्र, यम, गन्धर्व, भृगुराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, गणाधिप, असुर, शेष, पाप, रोग, अहिमुख, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति तथा दिति—ये वास्तुमण्डलके बाह्य देव हैं।
—इन बाह्य देवोंका पूजन करके बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि वह ईशानादि चारों कोणोंपर स्थित देवताओंकी पूजा करे। यथा—ईशानकोणमें आप (जल), अग्निकोणमें सावित्री, नैर्ऋत्यकोणमें जय और वायुकोणमें रुद्रदेवकी पूजा करे। नवपद परिमापके मध्यमें ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये और उनके समीप ही अन्य आठ देवताओंका भी पूजन करे। पूर्वादिक क्रमसे उन पूजनीय देवोंके नाम इस प्रकार हैं—
अर्यमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप, मित्र, राजयक्ष्मा, पृथ्वीधर और अपवत्स—ये आठ देव हैं, जो ब्रह्माके चारों ओर मण्डलाकार स्थित हैं।
दुर्गनिर्माणमें ईशानकोणसे नैर्ऋत्यकोणपर्यन्त सूत्रद्वारा किया गया रेखाङ्कन वंश कहा जाता है और अग्निकोणसे जब वायुकोणपर्यन्त दूसरी रेखा खींची जाती है तो वह वंश-रेखा, दुर्धर-रेखा कहलाती है। वंश-रेखापर ईशानकोणमें अदिति, दुर्धरयोग विन्दुपर हिमवन्त, नैर्ऋत्यकोण अर्थात् वास्तुमण्डलके अन्तिम नैर्ऋत्य विन्दुपर जयन्तके पूजनका विधान है। तत्पश्चात् दुर्धर-रेखाके प्रारम्भमें अग्निकोणपर नायिका तथा अन्तिम छोर वायुकोणपर कालिकादेवीकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर शुक्र अर्थात् इन्द्रसे लेकर गन्धर्वपर्यन्त उक्त वास्तुदेवोंकी पूजा करके भवन-निर्माणका कार्य प्रारम्भ करना चाहिये।
वास्तु (भवन)-के सम्मुख-भागमें देवालय, अग्निकोणमें पाकशाला, पूर्व दिशामें यज्ञ-मण्डप, ईशानकोणमें काष्ठ या प्रस्तरसे बनी पट्टिकाओंके द्वारा घिरा हुआ सुगन्धित पदार्थों तथा पुष्पोंको रखनेका स्थान, उत्तर दिशामें भाण्डारागार, वायुकोणमें गोशाला, पश्चिम दिशामें खिड़की तथा जलाशय, नैर्ऋत्यकोणमें समिधा, कुश, ईंधन तथा अस्त्र-शस्त्रका कक्ष, दक्षिण दिशामें सुन्दर शय्या, आसन, पादुका, जल, अग्नि, दीप और सज्जन भृत्योंसे युक्त अतिथिगृहका निर्माण करना चाहिये।
गृहके बीच समस्त रिक्तभागमें कूप, जलसिंचित कदलीगृह और पाँच प्रकारके पुष्पपादपोंको सुनियोजित करे। भवनके बाह्य भागमें चारों ओर पाँच हाथ ऊँची दीवाल बनाकर वन और उपवनसे आच्छादित भगवान् विष्णुका मन्दिर बनाना चाहिये।
इस मन्दिरके निर्माणकार्यके प्रारम्भमें चौंसठ पदका वास्तुमण्डल बनाकर वास्तुदेवताकी विधिवत् पूजा करे। उक्त रीतिके अनुसार वास्तुमण्डलके मध्य भागमें चार पदके मण्डलान्तर्गत ब्रह्मा तथा उनके समीपस्थ प्रत्येक दो पदपर अर्यमादि आठ देवोंकी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर कर्णभागपर कार्तिकेय आदिका पूजन करके, दोनों ओर पार्श्व विन्दुओंपर दो-दो पदोंकी दूरीसे स्थित अन्य पार्श्व देवोंका पूजन करे। तत्पश्चात् वास्तुमण्डलके ईशानादि कोणोंपर क्रमशः चरकी, विदारी, पूतना और पापराक्षसी नामक देवशक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद
* मूलपाठमें 'द्वाविंशति' पाठ है, वास्तवमें द्वात्रिंशत् पाठ होना चाहिये।
काण्ड ] वास्तुमण्डल-पूजाविधि ७३
बाह्य भागमें हेतुकादि देवोंका पूजन करे। इनके नाम हेतुक, त्रिपुरान्तक, अग्नि, वैताल, यम, अग्निजिह्वा, कालक, कराल और एकपाद हैं। उनकी पूजा करनेके पश्चात् ईशानकोणमें भीमरूप, पातालमें प्रेतनायक, आकाशमें गन्धमाली तथा उसके बाद क्षेत्रपाल देवोंकी पूजा करनी चाहिये।
यथासाध्य वास्तु संकुचित या विस्तृत क्षेत्रफलकी राशिको वसुओंकी संख्या अर्थात् आठसे पहले भाग दे, उसके बचे हुए शेष भागको यम माने। पुनः उक्त वास्तुराशिको आठसे गुणा करे, जो गुणनफल हो उसको ऋक्ष भाग अर्थात् सत्ताईससे भाग दे, जो शेष हो उसे ऋक्ष या नक्षत्रराशि कहते हैं और जो भागफल है, वह अव्यय कहलाता है।
उस ऋक्षराशिको चारसे गुणा करके गुणनफलमें नौसे भाग दे, जो शेषांश हो उसका नाम स्थिति है। इसी स्थिति अङ्कपर वास्तुमण्डलका निर्धारण करना चाहिये। ऐसा देवल ऋषिका अभिमत है।
उक्त वास्तुराशिको आठसे गुणा करके जो गुणनफल हो उसे पिण्ड कहते हैं। उस पिण्डको साठसे भाग देना चाहिये, जो शेषांक हो उसके द्वारा गृहस्वामीके जीवन-मरण और परिजनोंके विनाशका निर्धारण होता है।
मनुष्यको चाहिये कि वास्तुमण्डलके मध्यमें ही सदा गृहका निर्माण करे। उसके पृष्ठभागमें न करे। इसी प्रकार वास्तुमण्डलके वामपार्श्वमें भी गृह-निर्माण करना उचित नहीं होता है, क्योंकि वामपार्श्वमें वास्तुदेव सोये रहते हैं। अतः इसमें गृह-निर्माण नहीं करना चाहिये।
सिंह, कन्या तथा तुला राशि रहनेपर उत्तर दिशाके द्वारका शोधन करे और उसी प्रकार वृश्चिकादि अन्य राशियोंके रहनेपर पूर्व-दक्षिण तथा पश्चिम द्वारका शोधन करना चाहिये (क्योंकि भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिकमासमें पूर्व दिशामें मस्तक, उत्तर दिशामें पृष्ठ, दक्षिण दिशामें क्रोड और पश्चिम दिशामें चरण फैलाकर वास्तुनाग सोये रहते हैं। अतः उत्तर दिशाका द्वार इस कालमें प्रशस्त होता है। वृश्चिक, धनु एवं मकर राशि अर्थात् मार्गशीर्ष, पौष और माघमें वास्तुनागका सिर दक्षिण, पृष्ठ पूर्व, क्रोड पश्चिम और पैर उत्तर दिशामें रहता है। जिससे उस समय पूर्व दिशाका द्वार-शोधन उचित है। कुम्भ, मीन और मेष राशि अर्थात् फाल्गुन, चैत्र तथा वैशाखमासमें वास्तुनागका मस्तक पश्चिम, पृष्ठ दक्षिण तथा पैर उत्तर-पूर्व दिशामें रहता है। अतः दक्षिण दिशाके द्वारका शोधन इस कालमें श्रेयस्कर है। इसी प्रकार वृष, मिथुन और कर्कराशि अर्थात् ज्येष्ठ, आषाढ़ तथा श्रावणमासमें वास्तुनागका सिर उत्तर, पृष्ठ पश्चिम, क्रोड पूर्व और पैर दक्षिण दिशामें रहता है। उस समय पश्चिम द्वारका शोधन करना उचित होता है)।
वास्तुके विस्तारके अनुसार आधे भागमें द्वारका निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार आठ दिशाओंमें आठ द्वार कहे गये हैं।
यदि उपर्युक्त शास्त्र-सम्मत विधिसे द्वार-शोधन नहीं होता है तो हानि होती है।
अतः उपर्युक्त विधिसे प्रासाद या भवनका निर्माण करके उसके पूर्वमें पीपल, दक्षिणमें पाकड़, पश्चिममें बरगद, उत्तरमें गूलर तथा ईशानकोणमें सेमलका वृक्ष लगाना चाहिये, जो घरके लिये शुभ-फलदायी होते हैं। इस प्रकार पूजित वास्तु प्रासाद और घरके विघ्नोंका नाश करनेवाला होता है।
(अध्याय ४६)