गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२४- देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि
काण्ड ] पञ्चतत्त्वार्चन-विधि ५५
हे महादेव! इस प्रकार इन मन्त्रोंसे अधिकारी मनुष्योंको चाहिये कि वे विष्णुके विभिन्न अङ्गोंकी पूजा करें, तदनन्तर ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका पूजन करके इस स्तुतिसे उन अविनाशी परमात्म प्रभुका स्तवन करें—
विष्णवे देवदेवाय नमो वै प्रभविष्णवे॥
विष्णवे वासुदेवाय नमः स्थितिकराय च।
ग्रसिष्णवे नमश्चैव नमः प्रलयशायिने॥
देवानां प्रभवे चैव यज्ञानां प्रभवे नमः।
मुनीनां प्रभवे नित्यं यक्षाणां प्रभविष्णवे॥
जिष्णवे सर्वदेवानां सर्वगाय महात्मने।
ब्रह्मेन्द्ररुद्रवन्द्याय सर्वेशाय नमो नमः॥
सर्वलोकहितार्थाय लोकाध्यक्षाय वै नमः।
सर्वगोप्त्रे सर्वकर्त्रे सर्वदुष्टविनाशिने॥
वरप्रदाय शान्ताय वरेण्याय नमो नमः।
शरण्याय सुरूपाय धर्मकामार्थदायिने॥
(३१।२४–२९)
देवाधिदेव, तेजोमूर्ति भगवान् विष्णुदेवके लिये नमस्कार है। संसारकी स्थिति (पालन) करनेवाले वासुदेव विष्णुके लिये नमन है। प्रलयके समय संसारको अपने मूल कारण प्रकृतिमें लीन करके आत्मसात्कर शयन करनेवाले विष्णुको प्रणाम है। देवोंके अधिपति तथा यज्ञोंके अधिपति विष्णुको नमन है। मुनियों तथा यक्षोंके प्रभु और समस्त देवोंपर विजय प्राप्त करनेवाले, सबमें व्याप्त रहनेवाले, महात्मा, ब्रह्मा, इन्द्र-रुद्रादिके वन्दनीय सर्वेश्वर भगवान् विष्णुके लिये नमस्कार है।
समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाले, लोकाध्यक्ष, सर्वगोसा, सर्वकर्ता तथा समस्त दुष्टोंके विनाशक भगवान् विष्णुके लिये नमन है। वर प्रदान करनेवाले, परम शान्त, सर्वश्रेष्ठ, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सुन्दर रूपवाले, धर्म-काम तथा अर्थ—इस त्रिवर्गके प्रदाता भगवान् विष्णुके लिये बार-बार प्रणाम है।
हे शङ्कर! इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप, अव्यय, परात्पर भगवान् विष्णुकी स्तुति करके अपने हृदयमें उनका ध्यान करना चाहिये। तत्पश्चात् मूल मन्त्रसे उन विष्णुकी पूजा करनी चाहिये और मूल मन्त्रका जप करना चाहिये। जो अधिकारी व्यक्ति ऐसा करता है, वह भगवान् विष्णुको प्राप्त कर लेता है। हे रुद्र! इस प्रकार मैंने आपसे इस रहस्यपूर्ण, परम गुह्य, भुक्ति-मुक्तिप्रद और उत्तम विष्णुकी पूजाविधिको कहा है। हे शङ्कर! जो विद्वान् पुरुष इसका पाठ करता है, वह विष्णुभक्त हो जाता है। इसे जो सुनता है अथवा सुनाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय २८–३१)
पञ्चतत्त्वार्चन-विधि
महेश्वरने कहा— हे शङ्ख-चक्र-गदाधर! आप पञ्चतत्त्वोंकी उस पूजा-विधिको मुझे बतानेकी कृपा करें, जिसका ज्ञान प्राप्त कर लेनेमात्रसे ही मनुष्य परमपदको प्राप्त कर लेता है।
श्रीहरिने कहा— हे सुव्रत शिव! मैं आपसे पञ्चतत्त्व-पूजा-विधिको कह रहा हूँ, यह दिव्य, मङ्गलस्वरूप, कल्याणकारी, रहस्यपूर्ण, श्रेष्ठ तथा अभीष्टोंकी सिद्धि करनेवाली है। हे महादेव! ऐसे उस परम पवित्र कलिदोष-विनाशक पूजन-विधिका आप श्रवण करें।
हे सदाशिव! एक ही परमात्मा जो वासुदेव श्रीहरि हैं, वे ही अविनाशी, शान्त, सनातन, सत्-स्वरूप हैं। वे ध्रुव (नित्य, अचल), शुद्ध, सर्वव्याप्त तथा निरञ्जन हैं। वे ही विष्णुदेव अपनी मायाके प्रभावसे पाँच प्रकारसे अवस्थित हैं। वे जगत्का कल्याण करनेवाले हैं। वे ही अद्वितीय विष्णु
| ५६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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वासुदेव, संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायणस्वरूपसे पाँच रूपों (तत्त्वों)-में स्थित हैं।
हे वृषध्वज ! जनार्दन विष्णुके उक्त पञ्चरूपोंके वाचक मन्त्र इस प्रकार हैं—
ॐ अं वासुदेवाय नमः, ॐ आं संकर्षणाय नमः, ॐ अं प्रद्युम्नाय नमः, ॐ अः अनिरुद्धाय नमः, ॐ ॐ नारायणाय नमः।
—ये पाँच मन्त्र उक्त पाँच देवताओंके वाचक हैं, जो सभी पातक, महापातकोंके विनाशक, पुण्यजनक तथा समस्त रोगोंको दूर करनेवाले हैं। अब मैं आपसे मङ्गलमय पञ्चतत्त्वार्चन-विधिको कह रहा हूँ। हे शिव ! उसको जिस विधिसे और जिन मन्त्रोंके द्वारा सम्पन्न करना चाहिये, उसको आप श्रवण करें।
—इन पाँच देवोंकी पूजामें सर्वप्रथम स्नान करके विधिवत् संध्या करनी चाहिये। तदनन्तर हाथ-पैर धोकर पूजा-गृहमें प्रवेश करके विद्वान् साधकको चाहिये कि वह आचमन करके मनोऽनुकूल आसन लगाकर बैठ जाय और—'अं क्षौं रम्'—इन मन्त्रोंसे शोषणादि क्रिया करे।
वे वासुदेव कृष्ण जगत्के स्वामी, पीतवर्णके कौशेय (रेशमी) वस्त्रोंसे विभूषित, सहस्रों सूर्यकी किरणोंके समान तेजःस्वरूप तथा देदीप्यमान मकराकृति-कुण्डलोंसे सुशोभित हैं, ऐसे उन भगवान् कृष्णका अपने हृदय-कमलमें ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर भगवान् संकर्षणका ध्यान करे। उसके बाद यथाक्रम प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा श्रीमन्नारायणके स्वरूपका ध्यान करके उन देवाधिदेवसे प्रादुर्भूत इन्द्रादि देवोंका ध्यान करके मूल मन्त्रके द्वारा दोनों हाथोंसे व्यापक रूपमें करन्यास करे, तत्पश्चात् अङ्गन्यासके मन्त्रोंसे अङ्गन्यास करे। हे महादेव ! सुव्रत ! उन न्यास एवं पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं—
'ॐ आं हृदयाय नमः, ॐ ईं शिरसे नमः, ॐ ऊं शिखायै नमः, ॐ ऐं कवचाय नमः, ॐ औं नेत्रत्रयाय नमः, ॐ अः अस्त्राय फट्, ॐ समस्तपरिवारायाच्युताय नमः, ॐ धात्रे नमः, ॐ विधात्रे नमः, ॐ आधारशक्त्यै नमः, ॐ कूर्माय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ पृथिव्यै नमः, ॐ धर्माय नमः, ॐ ज्ञानाय नमः, ॐ वैराग्याय नमः, ॐ ऐश्वर्याय नमः, ॐ अधर्माय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अनैश्वर्याय नमः, ॐ अं अर्कमण्डलाय नमः, ॐ सों सोममण्डलाय नमः, ॐ वं वह्निमण्डलाय नमः, ॐ वं वासुदेवाय परब्रह्मणे शिवाय तेजोरूपाय व्यापिने सर्वदेवाधिदेवाय नमः, ॐ पाञ्चजन्याय नमः, ॐ सुदर्शनाय नमः, ॐ गदायै नमः, ॐ पद्माय नमः, ॐ श्रियै नमः, ॐ ह्रियै नमः, ॐ पुष्ट्यै नमः, ॐ गीत्यै नमः, ॐ शक्त्यै नमः, ॐ प्रीत्यै नमः, ॐ इन्द्राय नमः, ॐ अग्नये नमः, ॐ यमाय नमः, ॐ निर्ऋतये नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ वायवे नमः, ॐ सोमाय नमः, ॐ ईशानाय नमः, ॐ अनन्ताय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ विष्वक्सेनाय नमः।'
तत्पश्चात् 'ॐ पद्माय नमः' ऐसा कहकर स्वस्तिक और सर्वतोभद्रादि मण्डलोंका निर्माण करके उस मण्डलमें इन्हीं मन्त्रोंसे देवोंका पूजन करना चाहिये।
मूल मन्त्रसे पाद्य आदिका निवेदन करके स्नान, वस्त्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य प्रदान करके नमस्कार तथा प्रदक्षिणा करनी चाहिये। हे शङ्कर ! उसके बाद यथाशक्ति मूल मन्त्रका जपकर उसे प्रभुको समर्पित कर दे।
तदनन्तर भगवान् वासुदेवका स्मरणकर इस स्तोत्रका पाठ करे—
ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च॥
प्रद्युम्नायादिदेवायानिरुद्धाय नमो नमः।
| काण्ड ] | सुदर्शनचक्र-पूजा-विधि | ५७ |
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नमो नारायणायैव नराणां पतये नमः ॥
नरपूज्याय कीर्त्याय स्तुत्याय वरदाय च ।
अनादिनिधनायैव पुराणाय नमो नमः ॥
सृष्टिसंहारकर्त्रे च ब्रह्मणः पतये नमः ।
नमो वै वेदवेद्याय शङ्खचक्रधराय च ॥
कलिकल्मषहर्त्रे च सुरेशाय नमो नमः ।
संसारवृक्षच्छेत्रे च मायाभेत्रे नमो नमः ॥
बहुरूपाय तीर्थाय त्रिगुणायागुणाय च।
ब्रह्मविष्ण्वीशरूपाय मोक्षदाय नमो नमः ॥
मोक्षद्वाराय धर्माय निर्वाणाय नमो नमः ।
सर्वकामप्रदायैव परब्रह्मस्वरूपिणे ॥
संसारसागरे घोरे निमग्नं मां समुद्धर ।
त्वदन्यो नास्ति देवेश नास्ति त्राता जगत्प्रभो ॥
त्वामेव सर्वगं विष्णुं गतोऽहं शरणं ततः ।
ज्ञानदीपप्रदानेन तमोमुक्तं प्रकाशय ॥
(३२।३०—३८)
'हे वासुदेव! हे संकर्षण (बलराम)! आपको नमस्कार है। हे प्रद्युम्न, आदिदेव, अनिरुद्ध! आपके लिये नमस्कार है। हे नारायण! नराधिपति! आपको नमन है, कीर्तन करने योग्य, मनुष्योंसे पूजनीय, स्तुति करने योग्य, वर देनेवाले, आदि तथा अन्तसे रहित सनातन प्रभुको बारम्बार नमस्कार है। सृष्टि और संहार-कर्ता, ब्रह्माके भी स्वामी तथा शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नमस्कार है।'
कलिकालके दोषोंको नष्ट करनेवाले, देवोंके ईश! आपको बारम्बार प्रणाम है। सम्पूर्ण जगत्-रूपी मूल वृक्षका छेदन करनेवाले, मायाका भेदन करनेवाले, बहुतसे रूपोंको धारण करनेवाले, तीर्थस्वरूप, सत्त्व, रजस् तथा तमोरूप एवं वस्तुतः निर्गुण तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन रूपोंमें अवस्थित रहनेवाले मोक्षदायक भगवान् विष्णु परमेश्वरको नमस्कार है। मोक्षके द्वारभूत, धर्मस्वरूप, निर्वाणरूप, समस्त अभीष्टोंको प्रदान करनेवाले परब्रह्मस्वरूप आपके लिये बार-बार नमस्कार है। इस गहन संसारसागरमें मैं डूब रहा हूँ, आप मेरा उद्धार करें। हे देवदेवेश्वर ! हे जगत्के स्वामी! आपके अतिरिक्त मेरा कोई भी रक्षक नहीं है। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हे भगवान् विष्णु! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे भगवन् ! ज्ञानरूपी दीपकको प्रज्वलितकर मेरे (अज्ञानरूपी) अन्धकारको दूर करके मुझे प्रकाशित कर दें।
इस प्रकार समस्त कष्टोंको दूर करनेवाले देवेश भगवान् वासुदेवकी स्तुति करके हे नीललोहित शिव! अन्य वैदिक स्तोत्र-पाठोंसे भी स्तुति करके पञ्चतत्त्वोंसे युक्त उन भगवान् विष्णुका अपने हृदयमें ध्यान करे। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये। इस प्रकार हे शङ्कर! सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली वासुदेवकी श्रेष्ठ पूजा कही गयी। इस पूजाके करनेमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।
हे रुद्र! जो व्यक्ति इस पञ्चतत्त्वार्चनको पढ़ता है, सुनता है अथवा दूसरोंको सुनाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ३२)
सुदर्शनचक्र-पूजा-विधि
रुद्रने कहा— हे शङ्ख-गदाधर! उस सुदर्शनकी पूजाके विषयमें मुझे बतायें, जिसे करनेसे ग्रहदोष और रोगादि—सभी कष्ट विनष्ट हो जाते हैं।
श्रीहरिने कहा— हे वृषभध्वज! सुदर्शनचक्रकी पूजा-विधिको मैं कह रहा हूँ, आप सुनें। सर्वप्रथम स्नान करके हरिका पूजन करे। साधकको चाहिये कि अपने निर्मल एवं शुभ हृदय-कमलमें भगवान्